संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1305, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२७६ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
कर लिया, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जिन्होंने दैत्य, दानव, विद्याधर तथा नागगणोंको भी, जो इस पृथ्वीपर फल-मूलका आहार करते हुए तपस्यामें संलग्न रहे हैं, अपने परमपदकी प्राप्ति करायी है, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। यह सम्पूर्ण जगत् सदा जिनके अधीन रहता है, जो अपनी आठ मूर्तियोंद्वारा समस्त लोकोंका पालन करते हैं तथा जो परम कारण-तत्त्वोंके भी कारण हैं, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जिन वरदायक परमेश्वरके चरणोंमें भक्तिपूर्वक प्रणाम करके तथा अमृतमयी वाणीसे जिनकी स्तुति करके उत्तम हृदयवाले भगवान् सूर्य अपनी दिव्य दीप्ति तथा किरणोंके द्वारा जगत्का अन्धकार दूर करते हैं, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ।
जो मनुष्य अपने मनको वशमें रखकर साक्षात् ध्रुवजीके द्वारा रचित इस रुचिर अर्थवाले स्तोत्रका पाठ करता है, वह कभी मोहमें नहीं पड़ता। उसके कर्म सदैव शुद्ध और पवित्र होते हैं तथा वह अनादिसिद्ध शिवलोकमें जाता है। पार्वती! शुद्ध चित्तवाले महात्मा ध्रुवके इस प्रकार स्तुति करनेपर मैं बहुत प्रसन्न हुआ और इस प्रकार बोला—‘वत्स ध्रुव! तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुमसे बहुत सन्तुष्ट हूँ। अब तुम परम शुद्ध हो गये। मैं तुम्हें दिव्यदृष्टि देता हूँ। तुम मुझे प्रत्यक्ष देखो।’
ध्रुवजीने कहा—देव! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे निर्मल भक्ति दीजिये और इस शिवलिंगमें सदा निवास कीजिये।
मैंने कहा—ध्रुव! तुमने जो माँगा है, वह सब मैंने तुम्हें दे दिया; साथ ही तुम्हें वह ध्रुव स्थान भी दिया, जिसे भगवान् विष्णुका परम पद कहते हैं। जो श्रावणकी अमावास्या तथा आश्विनकी पूर्णिमाको ध्रुवेश्वरकी पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है।
सोमेश्वरसे ईशानकोणमें थोड़ी ही दूरपर क्षेत्रपीठकी अधिष्ठात्री देवी वैष्णवी शक्ति है, जो सिद्धलक्ष्मीके नामसे विख्यात है। ब्रह्माण्डमें यह पहला पीठ है। इस पीठमें निवास करनेवाली भगवती महालक्ष्मी समस्त पापोंका नाश करनेवाली तथा सम्पूर्ण अभीष्ट फलों और शुभको देनेवाली हैं। जो मनुष्य श्रीपंचमीके दिन गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक इनकी पूजा करता है, उसे लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। तृतीया, अष्टमी तथा चतुर्दशीको जो विधिपूर्वक लक्ष्मीदेवीकी पूजा करता है, उसके हाथमें सिद्धि आ जाती है।
महाकाली देवी, पुष्करावर्तका नदी, कंकालभैरव तथा चित्रादित्यकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—वहीं पातालविवरसे युक्त एक महापीठ है, जहाँ महाकाली देवी निवास करती हैं। वे सब दुःखोंकी शान्ति तथा समस्त शत्रुओंका नाश करनेवाली हैं कृष्णपक्षकी अष्टमीको आधी रातमें गन्ध-पुष्प आदि उपचारोंसे विधिपूर्वक पूजा करनेपर वे समस्त दुःखोंका निवारण करती हैं। जो स्त्री शुद्धचित्त होकर एक वर्षतक प्रत्येक शुक्लपक्षकी तृतीयाको विधिपूर्वक देवीकी पूजा करती है, वह सात जन्मोंतक क्षुधा, दुर्भाग्य और दीनताका कष्ट नहीं भोगती।
ब्रह्मकुण्डसे उत्तरमें थोड़ी ही दूरपर पुष्करावर्तका नदी है। पूर्वकालमें जब महात्मा सोमका यज्ञ प्रारम्भ हुआ, उस समय उनका निमन्त्रण पाकर सोमनाथकी प्रतिष्ठा करानेके लिये सब देवताओंके साथ ब्रह्माजी भी प्रभासक्षेत्रमें आये और इस प्रकार बोले—‘मैं जबतक यहाँ रहूँ तबतक त्रिपुष्कर तीर्थमें ही मुझे तीनों समयोंकी सन्ध्या करनी चाहिये।’ इसी समय जब लग्नकाल