संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड * १२७७
उपस्थित हुआ, तब वेदचिन्तक ब्राह्मणोंने बताया, यही प्रतिष्ठाके लिये सबसे उत्तम समय है। उस समय ब्रह्माजीको पुष्कर तीर्थकी ओर प्रस्थान करते देख निशानाथ चन्द्रमाने कहा—'भगवन्! ज्योतिषियोंने प्रतिष्ठाके लिये यही शुभ मुहूर्त बताया है। यह मुहूर्त बीतने न पाये, इसका ध्यान रखना चाहिये।' तब ब्रह्माजीने मन-ही-मन पुष्कर तीर्थोंका चिन्तन किया। उनके स्मरण करते ही वे तीनों नदीके तटपर प्रकट हुए। उस समय नदीमें ज्येष्ठ, मध्य और कनिष्ठ—तीन भँवरें उठीं। उन तीनों आवर्तोंको देखकर लोकपितामह ब्रह्माजीने कहा—'आजसे यह सुन्दर नदी पुष्करावर्तका नामसे प्रसिद्ध होगी। जो मनुष्य इसमें स्नान करके भक्तिपूर्वक पितरोंका तर्पण करेगा, उसे तीनों पुष्करमें स्नानके समान पुण्य प्राप्त होगा। जो मानव श्रावण शुक्ला तृतीयाको उसमें पितरोंका तर्पण करता है, उसके वे पितर दस हजार कल्पोंतक तृप्त रहते हैं।'
वहीं कंकालभैरव नामक क्षेत्रपाल हैं, जिन्हें उस क्षेत्रकी रक्षाके लिये भैरवजीने नियुक्त किया है। जो श्रावण शुक्ला पंचमी तथा आश्विन शुक्ला अष्टमीको कंकालभैरवका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, उस महात्माके उस क्षेत्रमें निवासके लिये वे सब विघ्नोंका निवारण करते हैं और उसकी पुत्रकी भाँति रक्षा करते हैं। उस स्थानके दक्षिण भागमें ब्रह्मकुण्डके समीप दरिद्रताका नाश करनेवाले चित्रादित्य विराजमान हैं। प्राचीनकालमें इस पृथ्वीपर मित्र नामके एक धर्मात्मा कायस्थ निवास करते थे, जो सदा सब प्राणियोंके हितमें तत्पर रहते थे। उनके दो सन्तानें हुईं—एक पुत्र और एक कन्या। पुत्रका नाम चित्र और कन्याका नाम चित्रा हुआ। चित्रा बड़ी सुन्दरी और सुशीला थी। इन दोनोंके जन्म लेते ही उनके पिता मित्रकी मृत्यु हो गयी। मित्रकी पत्नीने पतिके साथ चितामें प्रवेश किया। तदनन्तर इन दोनों अनाथ बालकोंका ऋषियोंने पालन किया। वे महान् वनमें ही बड़े हुए और बचपनसे ही व्रतपरायण रहे। एक बार प्रभासक्षेत्रमें आकर उन दोनोंने महादेव सूर्यकी स्थापना की और वे बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न हो गये। धर्मात्मा चित्रने धूप, माला, चन्दन आदि उपचारोंसे सूर्यदेवका पूजन किया और वसिष्ठजीके द्वारा बताये हुए अड़सठ नामोंद्वारा उनका स्तवन किया।
**चित्र बोले—**जो आदिदेव जगन्नाथ पापनाशक तथा रोग-निवारण करनेवाले हैं, उन आकाशके स्वामी भगवान् भास्करको मैं सिरसे प्रणाम करके उनकी स्तुति करता हूँ। उनके सहस्रों नेत्र, सहस्रों रश्मियाँ तथा सहस्रों किरणमय आयुध हैं। अनेक गुह्य नामोंद्वारा उनका स्तवन किया जाता है। उन प्रातःकाल गंगासागर-संगमपर निवास करनेवाले मुण्डीर स्वामीको मैं नमस्कार करता हूँ। मध्याह्नकालमें यमुनातटवर्ती भगवान् कालप्रियको और सूर्यास्तके समय चन्द्रभागा नदीके तटपर विराजमान श्रीमूलस्थानको मैं प्रणाम करता हूँ, जहाँ उपवास करके श्रीसाम्बजीको स्वतः सिद्धि प्राप्त हुई है। काशीमें लोहिताक्ष, गोभिलाक्षमें बृहन्मुख, प्रयागमें प्रतिष्ठान, महाद्युतिमें वृद्धादित्य, कोट्यक्षमें द्वादशादित्य, चतुर्घटमें गंगादित्य, नैमिषारण्यमें गोलस्थ, भद्रपुटमें भद्र, जयामें विजयादित्य, प्रभासमें स्वर्णवेतस, कुरुक्षेत्रमें सामन्त, इलावृतमें त्रिमन्त्र, महेन्द्रमें क्रमणादित्य, हिरण्यमें सिद्धेश्वर, कौशाम्बीमें पद्मबोध, ब्रह्मबाहुमें दिवाकर, केदारमें चण्डकान्ति, नित्यमें तिमिरापह, गंगामार्गमें हरद्वार, भूप्रदीपनमें आदित्य, सरस्वती-तटपर हंस, पृथूदकमें विश्वामित्र, उज्जयिनीमें नरद्वीप, सिद्धापुरीमें अमितद्युति, कुन्तीकुमारमें सूर्य, पंचनदीमें विभावसु, मथुरामें विमलादित्य, संज्ञिकमें संज्ञादित्य, श्रीकण्ठमें मार्तण्ड, दशार्णमें दण्डक, गोधनमें गोपति, मरुस्थलमें कर्णदेव, देवपुरमें पुष्प, लोहितमें केशवादित्य, वैदिशमें शार्दूल, शोणमें अरुणवासी, वर्द्धमानमें साम्बादित्य, कामरूपमें शुभंकर, कान्यकुब्जमें मिहिर, पुण्यवर्द्धनमें मन्दार, गान्धारमें क्षोभणादित्य, लंकामें अमरद्युति, चम्पामें कर्णादित्य, प्रबोधमें शुभदर्शी, द्वारावतीमें