भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1308, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1308

* प्रभासखण्ड * । १२७९

आकर श्राद्ध करेगा और हमें एक कल्पतकके लिये तृप्त कर देगा।' यों जानकर सब पापोंके नाश और पितरोंकी तृप्तिके लिये वहाँ स्नान और श्राद्ध करना चाहिये।

महादेवी! ब्रह्मकुण्डके उत्तरभागमें रूपकुण्ड है। वहाँ स्नान करके मनुष्य चोरीके पापसे छूट जाता है। उसमें स्नान करनेके प्रभावसे उसके वंशमें सात जन्मोंतक कोई चोर और क्रूर नहीं होता। जो शस्त्रसे मारे गये हों अथवा पापी रहे हों, ऐसे पूर्वजोंकी मुक्तिके लिये वहाँ शिवरात्रिको विशेषरूपसे पिण्डदान आदि कार्य करने चाहिये।

वहीं उत्तम रत्नेश्वरलिंग है, जिसकी स्थापना साक्षात् भगवान् विष्णुने की है। जो रत्नकुण्डमें स्नान करके रत्नेश्वरकी पूजा करता है, वह सात जन्मोंतक लक्ष्मीवान्, बुद्धिमान् तथा गाय, बैल आदि पशुओंसे सम्पन्न होता है। जो श्रवण नक्षत्र और द्वादशीके योगमें विधिवत् उपवास करके भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह मनोवांछित फलको पाता है। पार्वती! वह स्थान मुझे विशेष प्रिय है। मैं वहाँ सदा निवास करता हूँ और प्रलयकालमें भी उसका त्याग नहीं करता। वह सुदर्शन नामक वैष्णव क्षेत्र कहा गया है। उसका विस्तार सब ओर छत्तीस-छत्तीस धनुषतक है। इस सीमाके भीतर जो कोई अधम प्राणी भी कालवश मृत्युको प्राप्त होते हैं, उन्हें परमपदकी प्राप्ति होती है। जो लोग वहाँ भगवान् विष्णुकी प्रीतिके लिये सोनेका गरुड़ और पीताम्बर दान करते हैं, उन्हें यात्राका उत्तम फल प्राप्त होता है।

रत्नेश्वरसे उत्तरमें तीन धनुष दूर विनतानन्दन गरुड़के द्वारा स्थापित वैनतेयेश्वर लिंग है। जो मनुष्य पंचमीके दिन भक्तिपूर्वक गरुड़ेश्वरकी पूजा करता है, उसे सात जन्मोंतक सर्पजनित विषका भय नहीं प्राप्त होता। जो वैनतेयेश्वरको पंचामृतसे स्नान कराकर विधिवत् उनका पूजन करता है, वह स्वर्गलोकमें आनन्द भोगता है।

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रैवन्त और अनन्तेश्वरकी महिमा, सावित्रीकी कथा, सावित्री-व्रतकी महिमा तथा ब्रह्मा-सावित्रीके पूजनका महत्त्व

महादेवजी कहते हैं—महादेवि! तदनन्तर सावित्रीसे नैर्ऋत्यकोणमें स्थित अश्वारूढ़ राजभट्टारक रैवन्तकका दर्शन करनेके लिये जाय। उनके दर्शनसे मनुष्य सब आपत्तियोंसे छूट जाता है। जो रविवारयुक्त सप्तमी तिथिमें उनकी पूजा करता है, उसके वंशमें कोई भी मनुष्य दरिद्र नहीं होता; इसलिये यत्नपूर्वक उन्हींकी पूजा करे।

उससे दक्षिण अनन्तद्वारा स्थापित अनन्तेश्वर लिंग है। वह स्थान लक्ष्मणेश्वरसे पूर्व दिशामें है। वह सब पापोंका नाशक और बड़े भारी विषका विनाशक है। सिद्ध और गन्धर्व ही उसकी पूजा करते हैं। वह उपासकको मनोवांछित फल देनेवाला है। विशेषतः कृष्णपक्षकी अष्टमीमें जो अनन्तेश्वरकी पूजा करता है, वह घोर पातकोंसे मुक्त होकर नागलोकमें प्रतिष्ठित होता है।

पार्वती! मद्रदेशमें अश्वपति नामसे प्रसिद्ध एक धर्मात्मा राजा थे, जो सब प्राणियोंके हितमें तत्पर, क्षमावान्, सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय थे। परंतु उनके कोई सन्तान नहीं थी। एक समय राजा अश्वपतिने प्रभासक्षेत्रकी यात्रा की। यहाँके तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए वे सावित्रीस्थलपर आये। वहाँ उन्होंने सावित्री-व्रतका अनुष्ठान किया। इससे उनके ऊपर ब्रह्माजीकी प्रिय पत्नी भूर्भुवःस्वःस्वरूपा सावित्री देवी प्रसन्न हुईं और मूर्तिमती होकर उनके नेत्रोंके समक्ष प्रकट हुईं। उनके हाथमें कमण्डलु शोभा पा रहा था और मुख एवं नेत्र प्रसन्नतासे खिले हुए थे।

सावित्री बोलीं— राजन्! वर माँगो।

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