भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1309, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1309

१२८० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

राजाने कहा—देवि! मुझे संतान दो।

सावित्री बोलीं—राजन्! तुम्हें एक पुत्री प्राप्त होगी।

इतना कहकर सावित्रीदेवी अन्तर्धान हो गयीं। तदनन्तर कुछ कालके बाद राजा अश्वपतिके यहाँ एक दिव्यरूपधारिणी कन्या उत्पन्न हुई। सावित्रीकी पूजासे सावित्रीने ही प्रसन्न होकर वह कन्या दी थी, इसलिये ब्राह्मणोंने उसका नाम सावित्री रख दिया। वह राजकन्या मूर्तिमती लक्ष्मीकी भाँति बढ़ने लगी। उसे देखकर लोग यही कहते थे कि यह कोई देवकन्या ही पृथ्वीपर उतर आयी है। एक दिन उस देवरूपिणी कन्याको देखकर मन्त्रियोंसे परामर्श करके राजाने कहा—'बेटी! तुम्हारे विवाहका समय आ पहुँचा है, परंतु अबतक तुम्हारा किसीने वरण नहीं किया। मैं जब विचार करके देखता हूँ, तब यहाँ तुम्हारे योग्य कोई वर नहीं दिखायी देता। अतः देवता आदिके द्वारा मैं निन्दनीय न होऊँ, ऐसा कोई प्रयत्न करना आवश्यक है। मैंने धर्मशास्त्रोंमें यह बात सुनी है कि जो कन्या पिताके घरमें विवाह संस्कारके पहले ही अपनेको रजस्वला देखती है, उसके पिताको ब्रह्महत्याका पाप लगता है। अतः मैं तुम्हें बूढ़े मन्त्रियोंके साथ तीर्थयात्राके लिये भेजता हूँ, तुम स्वयं पतिका वरण करो।'

'जो आज्ञा' कहकर सावित्रीने पिताकी बात मान ली और यात्राके लिये निकली। वह राजर्षियोंके सुन्दर तपोवनोंमें गयी। वृद्ध महर्षियोंके चरणोंमें मस्तक झुकाया और समस्त आश्रमों एवं तीर्थोंमें घूम-फिरकर पुनः घरपर लौट आयी। वहाँ उसने अपने सामने आसनपर विराजमान देवर्षि नारदको देखा और प्रणाम करके पितासे कहा—'शास्वदेशमें एक धर्मात्मा क्षत्रिय राज्य करते थे। उनका नाम द्युमत्सेन है। वे दैववश अन्धे हो गये। उनका सामन्त रुक्मी पहलेसे ही उनसे वैर रखता था। उसने यह अवसर देखकर राजाका राज्य छीन लिया। राजा द्युमत्सेन अपनी पत्नीके साथ वनमें चले गये। उनकी पत्नीकी गोदमें एक छोटा-सा बालक भी था। राजाका वह पुत्र वनमें ही बड़ा हुआ है। वह परम धर्मात्मा है। उसका नाम सत्यवान् है। सत्यवान् ही मेरे मनके अनुरूप पति है। मैं उन्हींको प्राप्त करना चाहती हूँ।'

नारदजीने कहा—राजन्! सावित्री अभी बच्ची है, तभी इसने गुणवान् सत्यवान्का वरण किया है। उसके पिता सत्य बोलते हैं। उसकी माता सत्य भाषण करती है और वह स्वयं भी सत्य बोलता है। इसीलिये मुनियोंने उस राजकुमारका नाम सत्यवान् रखा है। सत्यवान्को अश्व बड़े प्रिय हैं। वह मिट्टीके अश्व बनाया करता है और अश्वके ही चित्र भी बनाता है, अतः उसका दूसरा नाम चित्राश्व है; किंतु उसे स्वीकार करके सावित्रीने बहुत बड़ा कष्ट मोल ले लिया है। द्युमत्सेनका वह पुत्र शिक्षा, दान और गुणोंमें देवताओंके समान है। उशीनरराज शिबिके समान सत्यवादी और ब्राह्मणभक्त है। ययातिके समान उदार, चन्द्रमाके समान सुन्दर, अश्विनीकुमारोंके समान रूपवान् तथा अतिशय बलवान् है। परंतु उसमें एक दोष है। आजसे एक वर्ष पूर्ण होनेपर उसकी आयु समाप्त हो जायगी और वह अपना शरीर त्याग देगा।

नारदजीकी यह बात सुनकर राजाने कन्यासे कहा—बेटी सावित्री! जाओ, किसी दूसरे श्रेष्ठ पतिका वरण करो। यह सत्यवान् तो एक ही वर्षमें शरीर त्याग देगा।

सावित्री बोली—पिताजी! राजालोग एक बार ही कोई बात कहते हैं। विद्वान् पुरुष भी एक ही बोली बोलते हैं और कन्याओंका दान भी एक ही बार किया जाता है। ये तीनों बातें एक-एक बार ही होती हैं। सत्यवान् दीर्घायु हों या अल्पायु, गुणवान् हों या गुणहीन—उन्हें एक बार मैंने वरण कर लिया, अब वे मेरे पति हो गये; अतः दूसरे किसीका वरण नहीं करूँगी। पहले मनसे निश्चय करके ही वाणीद्वारा किसी बातको

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