संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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विशेषरूपसे कुन्तीश्वरका पूजन करता है, वह समस्त कामनाओंसे सम्पन्न हो शिवलोकमें सम्मानित होता है। कुन्तीश्वर लिंगके दर्शनसे मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
पार्वती! वहाँसे अग्निकोणमें समस्त पातकोंका नाश करनेवाला पुण्यतीर्थ अर्कस्थल है। उसका दर्शन करके मनुष्य सात जन्मोंतक दरिद्र नहीं होता तथा उसके अठारहों प्रकारके कुष्ठ नष्ट हो जाते हैं। इसलिये सप्तमी तिथिको त्रिसंगमतीर्थमें स्नान करके पुण्यवान् मनुष्य उनका पूजन अवश्य करे। सिद्धेश्वरसे दक्षिणभागमें तीन धनुषके अन्तरपर माण्डव्येश्वर लिंग है। जो माघमासकी चतुर्दशीको जितेन्द्रिय होकर उसकी पूजा करके रातमें वहाँ जागरण करता है, वह यमलोकमें नहीं जाता।
वहींपर पुष्पदन्तने कठोर तपस्या करके एक शिवलिंग स्थापित किया, जिसका दर्शन करके प्राणी जन्म-मृत्युमय संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है और इहलोक तथा परलोकमें मनोवांछित फल प्राप्त करता है।
सिद्धेश्वरके पास ही थोड़ी दूर पूर्वकी ओर क्षेत्रपेश्वर नामका उत्तम लिंग है। शुक्लपक्षकी पंचमीको उनका दर्शन करनेसे मनुष्यको कभी सर्प नहीं काटता।
सरस्वती, हिरण्या और समुद्रका संगम देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। उसका नाम मिश्रतीर्थ है। वहाँका जल सब जलोंमें प्रधान है; इसलिये वह उत्तम तीर्थ है। सूर्यग्रहण आनेपर उसकी महत्ता कुरुक्षेत्रसे भी बढ़ जाती है। उस स्थानपर किया हुआ जप और दान कोटिगुना फल देनेवाला होता है। मंकीशसे पश्चिम भागमें कृतस्मर तीर्थतक दस करोड़ तीर्थोंका निवास है। उसके भीतर रहनेवाले कृमि, कीट, पतंग और श्वपच आदि भी स्वर्गलोकमें चले जाते हैं; फिर शुद्ध चित्तवाले पुरुषके लिये तो कहना ही क्या है? कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको वहाँ स्नान करके जो पितरोंका तर्पण करता है, उसके पितर तबतक तृप्त रहते हैं, जबतक आकाशमें सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र प्रकाशित रहते हैं। देवि! यह त्रिसंगम तीर्थ बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है।
त्रिसंगमके पास ही मंकीश्वर लिंग है। प्राचीन कालमें तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मंकि नामके एक महर्षि हो गये हैं। उन्होंने मेरे विग्रहकी स्थापना करके दस हजारसे कुछ अधिक वर्षोंतक यहाँ घोर तपस्या की थी। इससे सन्तुष्ट होकर मैंने उन्हें वरदान दिया। तभीसे उस शिवलिंगका मंकीश्वर नाम प्रसिद्ध हुआ। जो माघमासकी त्रयोदशी और चतुर्दशी तिथियोंको पंचोपचारसे मंकीश्वरका पूजन करता है, वह मनोवांछित फल पाता है।
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देवमाता, शेषस्थान, प्रभासपंचक, रुद्रेश्वर, महाश्मशान तथा सरस्वती नदी और संगममें स्नानका महत्त्व
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! मंकीश्वरसे नैर्ऋत्य कोणमें देवमाताका स्थान है। वे गौरीरूप धारण करके वहाँ रहती हैं। सरस्वती देवीका ही नाम वहाँ देवमाता है। उन्होंने बड़वानलसे देवताओंकी माताके समान रक्षा की, इसीलिये उन्हें देवमाता कहते हैं। जो पतिव्रता स्त्री अथवा पुरुष माघमासकी तृतीयाको उनकी पूजा करते हैं, वे सब अभीष्ट फलोंको प्राप्त कर लेते हैं। जो वहाँ शर्करायुक्त खीर आदिसे ब्राह्मण-दम्पतिको भोजन कराते हैं, वे एक सहस्र गौरी कन्याओंको भोजन देनेका फल पाते हैं।
नगरादित्यसे पूर्व दिशामें मित्रवनके भीतर जहाँ बलभद्रजीने शरीर छोड़ा है, वह स्थान शेषस्थान कहलाता है। उसीको नागस्थान भी कहते हैं। जो पुरुष त्रिसंगम तीर्थमें स्नान करके पंचमीको निराहार रहकर नागस्थानकी पूजा