भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1312
  • प्रभासखण्ड * १२८३

शालकटङ्कटा देवी, दशरथेश्वर, भरतेश्वर, लिंगचतुष्टय, कुन्तीश्वर, अर्कस्थल तथा त्रिसंगमतीर्थ आदिका महत्त्व

महादेवजी कहते हैं—पार्वती ! तदनन्तर शालकटंकटा देवीके समीप जाय। उनका स्थान सावित्रीसे दक्षिण तथा रैवन्तसे पूर्व दिशामें है। वे महान् पापपुंज तथा सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश करनेवाली हैं। सिद्ध और गन्धर्व भी उनकी उपासना करते हैं। वे महाप्रचण्ड दैत्योंका नाश करनेवाली तथा महिषासुरमर्दिनी हैं। पुलस्त्य-पुत्र विश्रवाने उनकी स्थापना की है। माघ मासकी चतुर्दशीको जो उनकी पूजा करता है, वह पशु-धनसे सम्पन्न, बुद्धिमान्, विद्वान्, लक्ष्मीवान् और पुत्रवान् होता है।

तदनन्तर दशरथेश्वरका दर्शन करे। पूर्वकालमें सूर्यवंशके भूषण महाराज दशरथने प्रभासक्षेत्रमें आकर अत्यन्त दुष्कर तपस्या की। वहाँपर एक शिवलिंगकी स्थापना करके मुझे सन्तुष्ट किया और अत्यन्त तेजस्वी पुत्र प्राप्त होनेके लिये प्रार्थना की। तब मैंने उन्हें त्रैलोक्यपूजित पुत्र प्रदान किया, जिनका नाम श्रीराम था और जिनका यश तीनों लोकोंमें फैला हुआ है और आज भी त्रिभुवनके निवासी देवता, दैत्य, असुर तथा वाल्मीकि आदि महर्षि जिनकी कीर्ति-कथाका गान करते हैं। उस शिवलिंगके प्रभावसे राजा दशरथको महान् यश प्राप्त हुआ। जो कार्तिकमासमें कार्तिककी पूर्णिमाको विधिपूर्वक धूप, दीप और पूजा आदिके उपहारोंसे दशरथेश्वरकी पूजा करता है, वह यशस्वी होता है।

उससे उत्तर कोणमें थोड़ी ही दूरपर भरतेश्वरलिंग है। भूतलमें भरत नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जिनके नामसे लोकमें इस देशको भारतवर्ष कहते हैं। उन्होंने मेरे विग्रहकी स्थापना करके सहस्रों वर्षोंतक यहाँ दुष्कर तपस्या की, जिससे सन्तुष्ट होकर मैंने उन्हें आठ पुत्र और एक यशस्विनी कन्या प्रदान की। इस प्रकार अभीष्ट मनोरथ पाकर राजा भरत कृतकृत्य हुए और भारतवर्षके नौ विभाग करके उन्होंने अपने पुत्रों और पुत्रीको एक-एक भाग बाँट दिया। वे द्वीप उन पुत्रोंके नामसे ही प्रसिद्ध हुए। इन्द्रद्वीप, कुशेरु, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व तथा वारुणि—ये आठ द्वीप हैं और यह कुमारी नामसे प्रसिद्ध नवाँ द्वीप है। इनमेंसे आठ द्वीप जो उत्तरमें स्थित थे, समुद्रमें डूब गये। ग्राम और देश आदिके सहित सागरमें विलीन हो गये। उनमेंसे यह कुमारी नामक द्वीप ही अवशेष है। यह विन्दुसरसे लेकर समुद्रतक दक्षिणसे उत्तरतक फैला हुआ है, जिसकी लम्बाई नौ हजार योजन और चौड़ाई एक हजार योजन है। जो भरतेश्वर लिंगका पूजन करता है, वह सब यज्ञों और दानोंका फल पाता है। जो कार्तिकमासकी पूर्णिमाको कृत्तिका नक्षत्रके योगमें भरतेश्वरका दर्शन करता है, वह स्वप्नमें भी भयंकर नरकको नहीं देखता।

सावित्रीके स्थानसे पश्चिम दिशामें एक ही स्थानपर चार शिवलिंग हैं, उनमें दो शिवलिंग तो पूर्वमें हैं और दो पश्चिममें। उन चारोंके नाम इस प्रकार हैं—कुशकेश्वर, गर्गेश्वर, पौरुषेश्वर तथा मैत्रेयेश्वर। जो जितेन्द्रिय मनुष्य भक्तिपूर्वक इन चारों लिंगोंका दर्शन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो मेरे परम धामको जाता है। वैशाख शुक्ला चतुर्दशीको वहाँ स्नान करके ब्राह्मणोंकी पूजा करे और उन्हें यथाशक्ति वस्त्र दे।

सावित्रीके पूर्वभागमें गड्ढेके भीतर कुन्तीश्वर नामसे प्रसिद्ध एक शिवलिंग है। पूर्वकालमें जब पाण्डवलोग तीर्थयात्राके प्रसंगसे कुन्तीके साथ प्रभासक्षेत्रमें आये थे, उस समय कुन्तीदेवीने वहाँ एक शिवलिंग स्थापित किया, जो समस्त पापभयको दूर करनेवाला है। जो मनुष्य कार्तिककी पूर्णिमाको