संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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महादेवजी बोले—देवेश्वरी! पतिव्रता सावित्रीने जिस व्रतका पालन किया है, उसका वर्णन करता हूँ; सुनो। ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशीको दन्तधावनपूर्वक स्नान करके त्रिरात्र उपवासका नियम ग्रहण करे। जो स्त्री त्रिरात्र करनेमें असमर्थ हो, वह जितेन्द्रिय होकर त्रयोदशीको नक्तव्रत, चतुर्दशीको अयाचित व्रत और पूर्णिमाको उपवास करे। प्रतिदिन तड़ाग, किसी बड़ी नदी अथवा झरनेमें स्नान करे। यदि पाण्डुकूपमें स्नान कर ले तो सबमें स्नान करनेका फल प्राप्त हो जाता है। विशेषतः पूर्णिमाको सरसों, मिट्टी और जलसे स्नान करना चाहिये। एक पात्रमें बालू भरकर अथवा जौ, चावल या तिल आदि धान्य भरकर उसपर दो वस्त्रोंमें लपेटा हुआ बाँसका पात्र रखे और उसमें सोने-चाँदी अथवा मिट्टीकी बनी हुई सावित्रीदेवी और ब्रह्माजीकी सर्वांगशोभित प्रतिमा स्थापित करे। फिर उन प्रतिमाओंपर दो लाल वस्त्र चढ़ाये और अपनी शक्तिके अनुसार उन दोनों विग्रहोंकी पूजा करे। चन्दन, सुगन्धित पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तरोई या लटजीराके फूलोंसे, कुम्हड़ा और ककड़ीके फलोंसे, नारियल, छुहारा, कैथ, अनार, जामुन, नीबू, नारंगी, कंकोल, कटहल, जीरक, खाँड़, गुड़, लवण, चरभट तथा सप्तधान्य आदि वस्तुएँ बाँसके पात्रोंमें रखकर निवेदन करे। कण्ठसूत्रको सुन्दर केसर और कुंकुमसे रँगे। तत्पश्चात् मन्त्रोच्चारणपूर्वक पूजन करे। मन्त्र इस प्रकार है—
ओङ्कारपूर्विके देवि वीणापुस्तकधारिणि।
देव्यम्बिके नमस्तुभ्यमवैधव्यं प्रयच्छ मे॥
वीणा और पुस्तक धारण करनेवाली सच्चिदानन्दमयी माता सावित्री देवी! तुम्हें नमस्कार है। तुम मुझे सौभाग्य प्रदान करो।
इस प्रकार पूजा-प्रार्थना करके बहुत-से स्त्री-पुरुषोंके साथ गाना-बजाना करते हुए वहाँ जागरण करे। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे सावित्रीकी कथा कहलाये। ब्रह्मा-सावित्रीका विवाह करे। सारी सामग्री वेदज्ञ ब्राह्मणको दान करे। जिसकी जीविका कठिनाईसे चलती हो, ऐसे निर्धन अग्निहोत्री ब्राह्मणको सावित्रीकी प्रतिमा दान करे। उस रात्रिमें ब्राह्मण-दम्पतियोंको निमन्त्रित करके प्रातःकाल वटवृक्षके नीचे सावित्रीके सम्मुख भोजन कराये। वहाँ एक-एक ब्राह्मणको भोजन कराना कोटि-कोटि ब्राह्मणोंको भोजन करानेके समान पुण्यदायक कहा गया है। ब्राह्मणोंको भोजन कराते समय कड़वे तेलका बना हुआ सामान न परोसे। स्त्रीको खट्टा और खारा भोजन कभी नहीं देना चाहिये। पाँच प्रकारके मधुर भोजन कराये—१. दूध और घीमें बने हुए पूवे, २. अशोकवर्तिका (एक प्रकारका पकवान), ३. छुहारेके साथ बनी हुई पूपिका, ४. घी और गुड़से बना हुआ हलवा, ५. और मोदक। जो स्त्री ऐसा करती है, वह धन-धान्य और मनुष्योंसे पूर्ण होती है। उसका वंश भरा-पूरा रहता है, उसके कुलमें कभी कोई स्त्री विधवा नहीं होती। अथवा यदि तीर्थमें भोजनकी सुविधा न हो तो घर लौटनेपर भोजन कराये, जिससे सावित्री देवी प्रसन्न हों। इसी प्रकार अपने घरपर आकर पितरोंके लिये पिण्डदानपूर्वक श्राद्ध भी करे। इससे पितर सन्तुष्ट होते हैं। ऐसा ब्रह्माजीका कथन है। अपने घरमें श्राद्ध-दान करनेसे तीर्थकी अपेक्षा भी आठगुना पुण्य होता है। क्योंकि वहाँ नीच पुरुषोंकी दृष्टि नहीं पड़ती। पितरोंका श्राद्ध एकान्त एवं गुप्त होना चाहिये। नीच पुरुषोंकी दृष्टिसे दूषित होनेपर वह पितरोंको नहीं प्राप्त होता, अतः प्रयत्नपूर्वक श्राद्धको गुप्त रखकर ही करे। वही पितरोंके लिये तृप्तिदायक होता है।