भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
  • प्रभासखण्ड * १२८३

शालकटङ्कटा देवी, दशरथेश्वर, भरतेश्वर, लिंगचतुष्टय, कुन्तीश्वर, अर्कस्थल तथा त्रिसंगमतीर्थ आदिका महत्त्व

महादेवजी कहते हैं—पार्वती ! तदनन्तर शालकटंकटा देवीके समीप जाय। उनका स्थान सावित्रीसे दक्षिण तथा रैवन्तसे पूर्व दिशामें है। वे महान् पापपुंज तथा सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश करनेवाली हैं। सिद्ध और गन्धर्व भी उनकी उपासना करते हैं। वे महाप्रचण्ड दैत्योंका नाश करनेवाली तथा महिषासुरमर्दिनी हैं। पुलस्त्य-पुत्र विश्रवाने उनकी स्थापना की है। माघ मासकी चतुर्दशीको जो उनकी पूजा करता है, वह पशु-धनसे सम्पन्न, बुद्धिमान्, विद्वान्, लक्ष्मीवान् और पुत्रवान् होता है।

तदनन्तर दशरथेश्वरका दर्शन करे। पूर्वकालमें सूर्यवंशके भूषण महाराज दशरथने प्रभासक्षेत्रमें आकर अत्यन्त दुष्कर तपस्या की। वहाँपर एक शिवलिंगकी स्थापना करके मुझे सन्तुष्ट किया और अत्यन्त तेजस्वी पुत्र प्राप्त होनेके लिये प्रार्थना की। तब मैंने उन्हें त्रैलोक्यपूजित पुत्र प्रदान किया, जिनका नाम श्रीराम था और जिनका यश तीनों लोकोंमें फैला हुआ है और आज भी त्रिभुवनके निवासी देवता, दैत्य, असुर तथा वाल्मीकि आदि महर्षि जिनकी कीर्ति-कथाका गान करते हैं। उस शिवलिंगके प्रभावसे राजा दशरथको महान् यश प्राप्त हुआ। जो कार्तिकमासमें कार्तिककी पूर्णिमाको विधिपूर्वक धूप, दीप और पूजा आदिके उपहारोंसे दशरथेश्वरकी पूजा करता है, वह यशस्वी होता है।

उससे उत्तर कोणमें थोड़ी ही दूरपर भरतेश्वरलिंग है। भूतलमें भरत नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जिनके नामसे लोकमें इस देशको भारतवर्ष कहते हैं। उन्होंने मेरे विग्रहकी स्थापना करके सहस्रों वर्षोंतक यहाँ दुष्कर तपस्या की, जिससे सन्तुष्ट होकर मैंने उन्हें आठ पुत्र और एक यशस्विनी कन्या प्रदान की। इस प्रकार अभीष्ट मनोरथ पाकर राजा भरत कृतकृत्य हुए और भारतवर्षके नौ विभाग करके उन्होंने अपने पुत्रों और पुत्रीको एक-एक भाग बाँट दिया। वे द्वीप उन पुत्रोंके नामसे ही प्रसिद्ध हुए। इन्द्रद्वीप, कुशेरु, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व तथा वारुणि—ये आठ द्वीप हैं और यह कुमारी नामसे प्रसिद्ध नवाँ द्वीप है। इनमेंसे आठ द्वीप जो उत्तरमें स्थित थे, समुद्रमें डूब गये। ग्राम और देश आदिके सहित सागरमें विलीन हो गये। उनमेंसे यह कुमारी नामक द्वीप ही अवशेष है। यह विन्दुसरसे लेकर समुद्रतक दक्षिणसे उत्तरतक फैला हुआ है, जिसकी लम्बाई नौ हजार योजन और चौड़ाई एक हजार योजन है। जो भरतेश्वर लिंगका पूजन करता है, वह सब यज्ञों और दानोंका फल पाता है। जो कार्तिकमासकी पूर्णिमाको कृत्तिका नक्षत्रके योगमें भरतेश्वरका दर्शन करता है, वह स्वप्नमें भी भयंकर नरकको नहीं देखता।

सावित्रीके स्थानसे पश्चिम दिशामें एक ही स्थानपर चार शिवलिंग हैं, उनमें दो शिवलिंग तो पूर्वमें हैं और दो पश्चिममें। उन चारोंके नाम इस प्रकार हैं—कुशकेश्वर, गर्गेश्वर, पौरुषेश्वर तथा मैत्रेयेश्वर। जो जितेन्द्रिय मनुष्य भक्तिपूर्वक इन चारों लिंगोंका दर्शन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो मेरे परम धामको जाता है। वैशाख शुक्ला चतुर्दशीको वहाँ स्नान करके ब्राह्मणोंकी पूजा करे और उन्हें यथाशक्ति वस्त्र दे।

सावित्रीके पूर्वभागमें गड्ढेके भीतर कुन्तीश्वर नामसे प्रसिद्ध एक शिवलिंग है। पूर्वकालमें जब पाण्डवलोग तीर्थयात्राके प्रसंगसे कुन्तीके साथ प्रभासक्षेत्रमें आये थे, उस समय कुन्तीदेवीने वहाँ एक शिवलिंग स्थापित किया, जो समस्त पापभयको दूर करनेवाला है। जो मनुष्य कार्तिककी पूर्णिमाको

१२८४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

विशेषरूपसे कुन्तीश्वरका पूजन करता है, वह समस्त कामनाओंसे सम्पन्न हो शिवलोकमें सम्मानित होता है। कुन्तीश्वर लिंगके दर्शनसे मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

पार्वती! वहाँसे अग्निकोणमें समस्त पातकोंका नाश करनेवाला पुण्यतीर्थ अर्कस्थल है। उसका दर्शन करके मनुष्य सात जन्मोंतक दरिद्र नहीं होता तथा उसके अठारहों प्रकारके कुष्ठ नष्ट हो जाते हैं। इसलिये सप्तमी तिथिको त्रिसंगमतीर्थमें स्नान करके पुण्यवान् मनुष्य उनका पूजन अवश्य करे। सिद्धेश्वरसे दक्षिणभागमें तीन धनुषके अन्तरपर माण्डव्येश्वर लिंग है। जो माघमासकी चतुर्दशीको जितेन्द्रिय होकर उसकी पूजा करके रातमें वहाँ जागरण करता है, वह यमलोकमें नहीं जाता।

वहींपर पुष्पदन्तने कठोर तपस्या करके एक शिवलिंग स्थापित किया, जिसका दर्शन करके प्राणी जन्म-मृत्युमय संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है और इहलोक तथा परलोकमें मनोवांछित फल प्राप्त करता है।

सिद्धेश्वरके पास ही थोड़ी दूर पूर्वकी ओर क्षेत्रपेश्वर नामका उत्तम लिंग है। शुक्लपक्षकी पंचमीको उनका दर्शन करनेसे मनुष्यको कभी सर्प नहीं काटता।

सरस्वती, हिरण्या और समुद्रका संगम देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। उसका नाम मिश्रतीर्थ है। वहाँका जल सब जलोंमें प्रधान है; इसलिये वह उत्तम तीर्थ है। सूर्यग्रहण आनेपर उसकी महत्ता कुरुक्षेत्रसे भी बढ़ जाती है। उस स्थानपर किया हुआ जप और दान कोटिगुना फल देनेवाला होता है। मंकीशसे पश्चिम भागमें कृतस्मर तीर्थतक दस करोड़ तीर्थोंका निवास है। उसके भीतर रहनेवाले कृमि, कीट, पतंग और श्वपच आदि भी स्वर्गलोकमें चले जाते हैं; फिर शुद्ध चित्तवाले पुरुषके लिये तो कहना ही क्या है? कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको वहाँ स्नान करके जो पितरोंका तर्पण करता है, उसके पितर तबतक तृप्त रहते हैं, जबतक आकाशमें सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र प्रकाशित रहते हैं। देवि! यह त्रिसंगम तीर्थ बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाला है।

त्रिसंगमके पास ही मंकीश्वर लिंग है। प्राचीन कालमें तपस्वियोंमें श्रेष्ठ मंकि नामके एक महर्षि हो गये हैं। उन्होंने मेरे विग्रहकी स्थापना करके दस हजारसे कुछ अधिक वर्षोंतक यहाँ घोर तपस्या की थी। इससे सन्तुष्ट होकर मैंने उन्हें वरदान दिया। तभीसे उस शिवलिंगका मंकीश्वर नाम प्रसिद्ध हुआ। जो माघमासकी त्रयोदशी और चतुर्दशी तिथियोंको पंचोपचारसे मंकीश्वरका पूजन करता है, वह मनोवांछित फल पाता है।

~~ ० ~~

देवमाता, शेषस्थान, प्रभासपंचक, रुद्रेश्वर, महाश्मशान तथा सरस्वती नदी और संगममें स्नानका महत्त्व

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! मंकीश्वरसे नैर्ऋत्य कोणमें देवमाताका स्थान है। वे गौरीरूप धारण करके वहाँ रहती हैं। सरस्वती देवीका ही नाम वहाँ देवमाता है। उन्होंने बड़वानलसे देवताओंकी माताके समान रक्षा की, इसीलिये उन्हें देवमाता कहते हैं। जो पतिव्रता स्त्री अथवा पुरुष माघमासकी तृतीयाको उनकी पूजा करते हैं, वे सब अभीष्ट फलोंको प्राप्त कर लेते हैं। जो वहाँ शर्करायुक्त खीर आदिसे ब्राह्मण-दम्पतिको भोजन कराते हैं, वे एक सहस्र गौरी कन्याओंको भोजन देनेका फल पाते हैं।

नगरादित्यसे पूर्व दिशामें मित्रवनके भीतर जहाँ बलभद्रजीने शरीर छोड़ा है, वह स्थान शेषस्थान कहलाता है। उसीको नागस्थान भी कहते हैं। जो पुरुष त्रिसंगम तीर्थमें स्नान करके पंचमीको निराहार रहकर नागस्थानकी पूजा

* प्रभासखण्ड * १२८५

करता है तथा श्राद्ध करके ब्राह्मणको यथाशक्ति दक्षिणा देता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर मेरे लोकमें जाता है।

नागस्थानसे पश्चिम दिशामें प्रभासपंचक नामक स्थान है जो परम पुण्यमय आदितीर्थ है। उसके पश्चिम भागमें प्रभासक्षेत्र है, उससे दक्षिण भागमें वृद्धप्रभास है। उससे दक्षिण जलप्रभास है। उससे दक्षिण महाप्रभास है। तदनन्तर कृतस्मर प्रभास है, जहाँ श्मशानभैरव हैं। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इन पाँच प्रभासोंका दर्शन करता है, वह जरा-मृत्युसे रहित परम पदको प्राप्त होता है। प्रभास तीनों लोकोंमें विख्यात आदितीर्थ है। वह देवताओंके लिये भी दुर्लभ तथा महापातकोंका नाशक है। प्रभासमें अमावास्याको एक रात व्रत रखनेवाला पुरुष सब पातकोंसे मुक्त हो शिवलोकमें जाता है। पुष्करमें स्नान करनेसे सात जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है।

आदिप्रभासके आगे तीन धनुषकी दूरीपर रुद्रेश्वर लिंग स्थित है, जहाँ मुझ रुद्रने ध्यान लगाकर अपने तेजको स्थापित किया है। उसका दर्शन और पूजन करके मनुष्य सब वांछित फलोंको प्राप्त कर लेता है।

कृतस्मरसे लगाकर मंकीश्वरतक महाश्मशान है, जो पुनर्जन्मका निवारण करनेवाला है। उस स्थानपर मरे हुए जीवके शरीरका दाह करना चाहिये। वह कर्मबीजके लिये ऊसर क्षेत्र कहा गया है। वह मुझे सदा अत्यन्त प्रिय है। मैं कल्पान्तमें भी उसका त्याग नहीं करता। मेरे लिये वह अविमुक्त क्षेत्रसे भी अधिक प्रिय है।

सरस्वतीका जल स्वतः पवित्र है। उसमें जहाँ-कहीं भी स्नान किया जा सकता है, किन्तु सरस्वती और समुद्रका संगम तो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। सब नदियोंमें सरस्वती नदी ही पुण्यदायिनी तथा समस्त लोकोंको सुख देनेवाली है। सरस्वतीको पाकर स्वर्गलोकमें पहुँचे हुए मनुष्य सदाके लिये शोकमुक्त हो जाते हैं। सरस्वतीका पावन जल पुण्यात्मा पुरुषोंको ही प्राप्त होता है। वैशाखकी पूर्णिमा तथा चन्द्रग्रहणके अवसरपर तो वह तीनों लोकोंके लिये भी दुर्लभ है। यदि सोमवती अमावास्याको वहाँ स्नानका सुयोग मिल जाय तो सौ कोटि पर्वोंसे क्या प्रयोजन है। मनुष्यकी हड्डी जबतक सरस्वतीके जलमें रहती है, उतने ही सहस्र वर्षोंतक वह मेरे लोकमें सम्मानित होता है। जो समर्थ होकर भी प्रभास तीर्थमें सरस्वतीका दर्शन नहीं करते, उन्हें जन्मके अन्धों और पंगुओंके समान जानना चाहिये। वे देश, वे तीर्थ, वे आश्रम तथा वे पर्वत धन्य हैं, जिनके बीचसे होकर सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती नदी निकलती हैं। जो त्रिभुवनको पवित्र करनेवाली पुण्यदायिनी सरस्वतीकी शरण ले चुके हैं, वे संसाररूपी कीचड़की दुर्गन्ध फिर नहीं सूँघते। प्रभास तीर्थमें सरस्वती नदी स्वर्गकी सीढ़ी है। सरस्वतीके दर्शनसे मनुष्य राजसूय यज्ञका फल पाता है। सरस्वतीसे बढ़कर दूसरा कोई तीर्थ न हुआ है न होगा। जहाँ सरस्वतीका जल समुद्रकी लहरोंसे व्याप्त रहता है, उस संगममें जो मनुष्य स्नान करेंगे, वे प्रत्येक युगमें ऐश्वर्यवान् होंगे। जिन मनुष्योंका शरीर सरस्वतीके जलसे अभिषिक्त होता है, वे धन्य हैं, वे मुनि हैं और उन्हींका निर्मल यश सर्वत्र फैला हुआ है।


~~ ० ~~

श्राद्धके विषयमें कुछ ज्ञातव्य बातें

महादेवजी कहते हैं— पार्वती! सबेरे तीन मुहूर्ततक प्रातःकाल, फिर तीन मुहूर्त संगव-काल, फिर तीन मुहूर्त मध्याह्नकाल और उसके बाद तीन मुहूर्त अपराह्नकाल होता है। तदनन्तर तीन मुहूर्ततक सायाह्नकाल होता है। उसमें श्राद्ध नहीं करना चाहिये। कुशके अग्रभागको दैव और

१२८६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

मूलसहित अग्रभाग (द्विभुग्न कुश)-को पैतृक कहा गया है। उसमें अवलम्बित कुशोंको कुतुक माना गया है। श्राद्धकालमें शरीर, द्रव्य, स्त्री, भूमि, मन, मन्त्र तथा ब्राह्मण—इन सात वस्तुओंकी शुद्धिपर विशेष ध्यान देना चाहिये। श्राद्धमें तीन वस्तुएँ पवित्र मानी गयी हैं—दौहित्र, कुतपकाल तथा तिल। तीन बातें प्रशंसाके योग्य कही गयी हैं—शुद्धि, अक्रोध तथा अत्वरा (उतावलेपनका अभाव)। सात प्रकारका धन शुद्ध माना गया है—श्रुत, शौर्य, तप, कन्या, शिष्य आदि, कुल-परम्परा तथा न्यायवृत्तिसे जो प्राप्त हुआ हो। इनकी प्राप्तिके उपाय भी सात प्रकारके हैं— १. कृषि और २. वाणिज्यसे प्राप्त धन कुत्सित है। ३. शिल्पानुवृत्तिसे मिले हुए धनको शुक्ल (उत्तम) कहा गया है। ४. किये हुए उपकारके बदलेमें प्राप्त किया हुआ धन शबल (मध्यम श्रेणीका) बताया गया है। ५. सूद, ६. साहस और ७. छल-कपटसे कमाये हुए धनको कृष्ण (अधम) कहते हैं। अन्यायोपार्जित धनसे जो श्राद्ध किया जाता है, उससे चाण्डाल आदि योनियोंमें पड़े हुए लोगोंकी ही तृप्ति होती है। मनुष्य धरतीपर जो अन्न बिखेरते हैं, उससे पिशाचयोनिमें पड़े हुए पितरोंकी तृप्ति होती है। स्नानके वस्त्रसे धरतीपर जो जल गिरता है, उससे नीच योनियोंमें पड़े हुए पूर्वजोंकी तृप्ति होती है। धरतीपर जो सुगन्धित जलकी बूँदें पड़ती हैं, उससे देवयोनिमें आये हुए पितरोंकी तृप्ति होती है। पिण्ड उठानेपर जो अन्नके दाने पृथ्वीपर गिरते हैं, उनसे सम्मार्जनका जल पीनेवाले विकिर नामके पितर तृप्तिलाभ करते हैं। श्राद्ध-भोजन करके ब्राह्मणलोग जो आचमन और कुल्ला करते हैं, उससे पशुयोनिके पितर तृप्त होते हैं।

श्राद्धमें जो उत्तम माने गये हैं, ऐसे ब्राह्मणोंका वर्णन करता हूँ; सुनो। विशिष्ट, श्रोत्रिय, योगी, वेदवेत्ता, नाचिकेतसंज्ञक त्रिविध अग्नियोंका सेवन करनेवाला, अथवा 'अयं वाव यः पवते' इत्यादि तीन अनुवाकोंका अध्ययन और अनुष्ठान करनेवाला, 'मधुवाता ऋतायते' इत्यादि तीन ऋचाओंका जप करनेवाला, 'ब्रह्ममेतु माम्' इत्यादि तीन अनुवाकोंका अध्ययन और तत्सम्बन्धी व्रत करनेवाला पुत्रीका पुत्र, जामाता और भानजा, पंचाग्निकर्ममें तत्पर, तपोनिष्ठ, मामा, पिता-माताका भक्त, शिष्य, सम्बन्धी, बन्धु-बान्धव, वेदार्थका ज्ञाता और वक्ता, ब्रह्मचारी, सहस्रोंका दान करनेवाला तथा सौ वर्षकी आयुवाला पुरुष—ऐसे ब्राह्मण पंक्तिपावन जानने चाहिये। अपना भानजा तथा भाई-बन्धु मूर्ख भी हों तो भी श्राद्धमें उनका त्याग न करे। देवकर्ममें ब्राह्मणकी परीक्षा न करे, किंतु श्राद्धकर्ममें यत्नपूर्वक ब्राह्मणकी परीक्षा करे। जो चोर, पतित, नपुंसक और नास्तिक-वृत्तिके ब्राह्मण हैं, उन्हें मनुजीने यज्ञ और श्राद्धमें सम्मिलित करनेका निषेध किया है। जो जटाधारी, वेदाध्ययनरहित, दुर्बल, धूर्त तथा शूद्रोंके पुरोहित हों, उनका श्राद्धकर्ममें पूजन न करे। वैद्य, वेतन लेकर देव-पूजा करनेवाले, मांसविक्रेता तथा वाणिज्यसे जीविका चलानेवाले ब्राह्मण भी यज्ञ और श्राद्धमें त्याज्य हैं। जो गँवार, राजसेवक, बुरे नखोंवाला, काले दाँतोंवाला, गुरुके प्रतिकूल आचरण करनेवाला, अग्निहोत्रका त्यागी, सूदखोर, राजयक्ष्माका रोगी, पशु-पालनकी वृत्तिसे जीनेवाला, परिवेत्ता (बड़े भाईसे पहले ही विवाह करनेवाला), निराकृति (किसी अंगसे हीन), ब्राह्मणद्वेषी, परिवित्ति (परिवेत्ताका बड़ा भाई), कुशीलव (नाचने-गानेवाला), अपकीर्णी (धर्मभ्रष्ट), दुःशील, काना, शूद्रजातीय स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाला, उढ़रीका बेटा, जुआरी, शराबी, कोढ़ी, कलंकित, पाखण्डी, रस बेचनेवाला, धनुष-बाण बनानेवाला, बड़ी बहिनके अविवाहित रहते उसकी छोटी बहिनसे विवाह करनेवाला, मित्रद्रोही, पुत्रसे शिक्षा लेनेवाला, मिरगीका रोगी, घेघेवाला, श्वेतकुष्ठी, चुगलखोर, उन्मादी, अन्धा तथा

* प्रभासखण्ड * १२८७


वेदकी निन्दा करनेवाला—ये सभी ब्राह्मण श्राद्धमें त्याग देनेयोग्य हैं। जलके प्रवाहको छिन्न-भिन्न करनेवाला अथवा उसे रोकनेवाला, दूतकर्म करनेवाला, वृक्षारोपणकी वृत्तिसे जीनेवाला, कुत्तेसे शिकार खेलनेवाला, बाज पक्षीसे जीविका चलानेवाला, कुमारी कन्याको कलंकित करनेवाला, हिंसक, शूद्रवृत्तिसे जीनेवाला, आचारहीन, बहुत बड़े जनसमुदायकी पुरोहिती करनेवाला, प्रतिदिन भीख माँगनेवाला तथा मुर्दे ढोनेवाला—ऐसे ब्राह्मण यत्नपूर्वक त्याज्य हैं। जिनका आचरण निन्दित हो, वे अधम द्विज श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पंक्तिमें बैठनेके अधिकारी नहीं हैं; अतः विद्वान् ब्राह्मण देवकार्य और पितृकार्य दोनोंमें पूर्वोक्त ब्राह्मणोंको सम्मिलित न करे।

प्रत्येक मासमें अमावास्या आनेपर श्राद्ध करना चाहिये। अष्टका तिथि, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, विषुवयोग, अयनारम्भके दिन तथा सामान्यतः सूर्यकी प्रत्येक संक्रान्तिके दिन श्राद्ध करना चाहिये। कृष्णपक्षमें आर्द्रा, मघा, रोहिणी आदि नक्षत्रोंमें श्राद्धके योग्य द्रव्य और ब्राह्मणका संयोग प्राप्त होनेपर तथा गजच्छाया, व्यतीपात, भद्रा और वैधृतियोगमें भी श्राद्ध करना चाहिये। वैशाखकी तृतीया, कार्तिक शुक्ला नवमी, माघकी पूर्णिमा और भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी—ये युगादि तिथियाँ मानी गयी हैं। माघमासकी सप्तमीको भगवान् सूर्य पहले-पहल रथपर आरूढ़ हुए, इसलिये उसे 'रथ-सप्तमी' कहते हैं। आश्विन शुक्ला नवमी, कार्तिककी द्वादशी, चैत्र और भादोंकी तृतीया, फाल्गुनकी अमावास्या, पौषकी एकादशी, आषाढ़की दशमी, माघकी सप्तमी, श्रावणकी कृष्णाष्टमी, आषाढ़, कार्तिक, फाल्गुन, चैत्र और ज्येष्ठकी पूर्णिमाएँ—ये मन्वन्तरकी आदि तिथियाँ हैं जो दानके पुण्यको अक्षय करनेवाली हैं। मन्वन्तरादि तिथिमें बारह प्रकारके श्राद्ध करने चाहिये—नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धिश्राद्ध, सपिण्डन-श्राद्ध, पार्वण-श्राद्ध, गोष्ठ-श्राद्ध, शुद्धि-श्राद्ध, कर्मांग-श्राद्ध, दैविकश्राद्ध, क्षयाह-श्राद्ध और तुष्टि-श्राद्ध। इन सबमें सांवत्सरिक (क्षयाह) श्राद्ध श्रेष्ठ माना गया है। प्रतिदिन किये जानेवाले श्राद्धको 'नित्य-श्राद्ध' कहते हैं। उसमें विश्वेदेवकी पूजा नहीं की जाती। यदि अन्नसे श्राद्ध करनेकी शक्ति न हो तो केवल जलसे भी नित्यश्राद्ध किया जाता है। एकोद्दिष्ट श्राद्धका नाम नैमित्तिक श्राद्ध है। अभीष्ट वस्तुकी सिद्धिके लिये कामना रखकर जो श्राद्ध किया जाता है, उसे काम्य-श्राद्ध कहते हैं। विवाह आदि उत्सवोंके अवसरपर जो श्राद्ध किया जाता है, वह वृद्धि-श्राद्ध कहलाता है। 'ये समाना०'—इत्यादि दो मन्त्रोंके द्वारा किये जानेवाले श्राद्धको 'सपिण्डन' कहते हैं। अमावास्या आदि पर्वोंपर किये जानेवाले श्राद्धको 'पार्वण' कहते हैं। गोशालामें जो श्राद्ध किया जाता है, वह गोष्ठश्राद्ध है। पापशुद्धिके लिये जो श्राद्ध किया जाता है, उसे 'शुद्धि' श्राद्ध कहते हैं। गर्भाधान, सोमयाग, सीमन्तोन्नयन तथा पुंसवन आदिमें जो श्राद्ध किया जाता है, वह कर्मांग-श्राद्ध है। देवताके उद्देश्यसे किये जानेवाले श्राद्धको 'दैविक श्राद्ध' कहते हैं। जो देशान्तरमें चला जाय, उसकी तुष्टिके लिये घीसे श्राद्ध करना चाहिये। इसे तुष्टि-श्राद्ध कहते हैं। बारह महीनेपर जो श्राद्ध किया जाता है, उसे क्षयाह अथवा सांवत्सरिक श्राद्ध कहते हैं। जो वर्षके अन्तमें क्षयाहके दिन पिता और माताका आदरपूर्वक श्राद्ध नहीं करते, उनकी की हुई पूजाको मैं नहीं ग्रहण करता। जो मनुष्य पिताकी क्षयाह-तिथिको ठीक-ठीक नहीं जानता हो, उसे माघ अथवा मार्गशीर्षकी अमावास्याको सांवत्सरिक श्राद्ध करना चाहिये।

~~ o ~~

१२८८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

श्राद्धविधि, सप्तशुद्धिका विचार, श्राद्धमें ग्राह्य एवं त्याज्यका निर्णय और सप्तार्चिषस्तोत्र

**महादेवजी कहते हैं—**अब मैं श्राद्धकी विधि बतलाता हूँ। श्राद्धके एक दिन पहले अपसव्य होकर पितरोंके प्रतिनिधिभूत ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे—'आपलोग पितृकार्य सम्पन्न करें और मुझपर प्रसन्न हों।' ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करनेके लिये अपनी जातिके विश्वस्त पुरुषोंको भेजना चाहिये। बिना फटा हुआ वस्त्र पवित्र माना गया है। यदि मूर्ख ब्राह्मण अपने सामने ही रहता हो और गुणवान् अपनेसे बहुत दूर बसता हो तो गुणवान्‌को भी श्राद्धका निमन्त्रण देना चाहिये, परंतु मूर्खको त्यागना नहीं चाहिये। जो अपने निकटवर्ती ब्राह्मणको पतित न होनेपर भी त्यागकर दूर रहनेवाले गुणवान्‌की पूजा करता है, वह नरकमें जाता है। वेद, विद्या और व्रतमें निष्णात श्रोत्रिय ब्राह्मण यदि घरपर आ जाय तो विधिपूर्वक उसका पूजन करके मनुष्य परम गतिको प्राप्त होता है। दोनों सन्ध्या, जप, भोजन, दन्तधावन, पितृकार्य, देवकार्य, मूत्रोत्सर्ग, मलोत्सर्ग, गुरुके समीप तथा यज्ञ—इन अवसरोंपर जो मौन रहता है, वह स्वर्गमें जाता है। यदि जप आदिमें किसी तरह मौन भंग हो जाय तो वैष्णव मन्त्रका उच्चारण और भगवान् विष्णुका स्मरण करना चाहिये। दान, स्नान, होम, भोजन और देवपूजनमें देवताओंके लिये सीधे कुश उपयोगमें लाये जाते हैं और पितरोंके लिये द्विगुणभुग्न कुश। उत्तरमुख होकर देवताओंका और दक्षिणमुख होकर पितरोंका कार्य करना चाहिये। अग्नि, भस्म, जौ और जलसे चिह्न बना देनेपर तथा चौखट बीचमें होनेपर भी पंक्तिदोष नहीं होता। इष्टश्राद्धमें क्रतु और दक्ष, वृद्धिश्राद्धमें सत्य और वसु, नैमित्तिक श्राद्धमें काल और काम, काम्य श्राद्धमें अध्व और विरोचन तथा पार्वण श्राद्धमें पुरूरवा एवं आर्द्रव नामके विश्वेदेवोंका आवाहन-पूजन बताया गया है। पलाशके पत्तेमें श्राद्ध करनेसे ब्रह्मतेजकी वृद्धि होती है। पीपलके पत्तेमें श्राद्धभोजन करनेवाला राजाओंका मान्य होता है। पाकड़के पत्तलमें श्राद्धभोजन करनेसे सब भूतोंपर प्रभुत्व प्राप्त होता है। वटके पत्तेमें भोजन करनेसे पुष्टि, प्रजा, वृद्धि, प्रज्ञा, धृति और स्मृतिकी प्राप्ति होती है। गम्भारीका पत्ता राक्षसोंका नाश करनेवाला और यशोदायक होता है। महुवेके पत्तेमें भोजन करनेसे उत्तम सौभाग्य प्राप्त होता है। अर्जुन वृक्षके पत्तेमें श्राद्ध करनेवाला सब अभीष्ट फलोंको प्राप्त कर लेता है। मदारके पत्तेमें श्राद्ध करनेसे उत्तम कान्ति और प्रकाशकी प्राप्ति होती है। बाँसके पात्रमें श्राद्ध करनेवाले पुरुषके खेत, बगीचे और पोखरेमें सदैव मेघ पानी बरसाते हैं। सोने-चाँदीके पात्रोंमें श्राद्ध करनेसे पूर्वोक्त सभी पत्रोंके फलकी प्राप्ति होती है। पलाश, अर्जुन, वट, पाकर, पीपल, विकंकत (कटाय), गूलर, बिल्व और चन्दन—ये यज्ञ-सम्बन्धी वृक्ष हैं। सरल, देवदार, साखू, खैर—ये वृक्ष समिधाके लिये प्रशस्त हैं। श्लेष्मातक, नक्तमाल्य, कैथ, सेमल, नीबू और बहेड़ा—ये वृक्ष श्राद्धकर्ममें निन्दित हैं।

जहाँ अनिष्ट शब्द सुनायी पड़ते हों जो बहुत रूखी और जीव-जन्तुओंसे भरी हो तथा जहाँ दुर्गन्ध फैल रही हो, ऐसी भूमिको श्राद्धकर्ममें त्याग दे। अंग, बंग, कलिंग, सिन्धुका उत्तर तट तथा जहाँ आश्रम-धर्म और वर्ण-धर्म नष्ट हो गये हों, ऐसे देश यत्नपूर्वक श्राद्धकर्ममें त्याग देने योग्य हैं। ब्राह्मण सत्ययुग, क्षत्रिय त्रेता, वैश्य द्वापर और शूद्र कलियुग माना गया है। विद्वान् पुरुष शुक्लपक्षके पूर्वाह्न और कृष्णपक्षके अपराह्नमें श्राद्ध करे। पितृकार्यमें रत्नि* बराबर कुश श्रेष्ठ माने गये हैं। मूलके पाससे कटे हुए कुश वेदीपर


* कोहनसे कनिष्ठिका अंगुलितकके मापको रत्नि या अरत्नि कहते हैं।

  • प्रभासखण्ड * १२८९

आस्तरण करनेके लिये उत्तम होते हैं। इसी प्रकार साँवाँ, तिन्नी और दूर्वा भी श्रेष्ठ माने गये हैं। कुश सदैव पवित्र तथा श्राद्धकर्ममें आदरणीय हैं। ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवाले पुरुषको उन कुशोंपर ही पिण्डदान करना चाहिये।

ब्राह्मणोंको श्रद्धापूर्वक गर्म-गर्म अन्न भोजन कराना चाहिये। फल, फूल और पेय पदार्थोंको ठंडा ही दे। जो स्नेहवश ब्राह्मणोंके हाथमें नमक या व्यंजन परोसता है, अथवा लोहेके पात्रसे परोसता है उस भोजनको राक्षस खाते हैं, पितर उसे नहीं ग्रहण करते। ब्राह्मणोंके पात्रोंमें चुपचाप अन्न परोसकर संकल्प करना चाहिये। करछुल आदिमें जो अन्न हो, उससे उनका सम्बन्ध नहीं रहना चाहिये। जो ब्राह्मण सूअरकी भाँति पात्रमें मुँह लगाकर चप-चप करते हुए खाता है, अथवा जो हाथमें ही भोजन रखकर उसीमें मुँह लगाता है तथा जो भोजनके समय बातचीत करता है, उसके खाये हुए अन्नको पितर नहीं ग्रहण करते। दो वर्षके बछड़ेके मुखमें जो सुखपूर्वक समा सकें, उतने ही बड़े पिण्ड बनाने चाहिये-यह व्यासका कथन है। स्त्री श्राद्धके पात्रको न हटाये। ज्ञानहीन तथा व्रतरहित पुरुष भी भोजनपात्रको न हटाये। स्वयं पुत्र ही आकर पिताके श्राद्धमें उच्छिष्ट पात्रोंको उठाये। तीन पिण्डोंमेंसे एकको तो जलमें डुबो दे, दूसरा पत्नीको दे दे और तीसरेको अग्निमें होम दे—इस प्रकार पिण्डोंकी यह त्रिविध गति है।१

पितृश्राद्धमें छन्दोग (सामवेदी) ब्राह्मणको, वैश्वदेवश्राद्धमें वैष्णवको, पुष्टिकर्ममें अध्वर्यु (यजुर्वेदी)-को तथा शान्तिकर्ममें अथर्ववेदी ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। दैवश्राद्धमें दो अथर्ववेदी ब्राह्मणोंको पूर्वाभिमुख बिठाना चाहिये और पितृश्राद्धमें ऋग्वेदी, यजुर्वेदी तथा सामवेदी-इन तीन ब्राह्मणोंको उत्तराभिमुख बिठाना चाहिये। चमेली, बेला और श्वेतजूही आदि फूलोंका श्राद्धमें सदा ही उपयोग करे। जलसे पैदा होनेवाले सभी तरहके फूल और चम्पाका भी श्राद्धमें उपयोग करना उचित है। महुआ, हींग, कपूर, मिर्च, गुड़, सेंधा नमक और चाँदी-ये श्राद्धमें उत्तम हैं। ब्राह्मण, कम्बल, गौ, सूर्य, अग्नि, अतिथि, तिल, दर्भ और विहित काल-ये नौ कुतप माने गये हैं।

रजस्वला स्त्री चौथे दिन स्नान करके शुद्ध होती है। परंतु दैवकार्य और पितृकार्यके लिये वह पाँचवें दिन शुद्ध होती है।२ धन और ब्राह्मणके अभावमें, परदेशमें तथा पुत्रजन्मके समय अथवा जिसकी स्त्री रजस्वला हो, वह आमश्राद्ध करे-ब्राह्मणको कच्चा अन्न दे दे। साँपके काटे हुए, ब्राह्मणके मारे हुए, दाढ़वाले, सींगवाले तथा बिच्छू आदिके द्वारा मारे हुए और आत्मघात करनेवाले प्राणियोंका श्राद्ध न कराये। सब भाइयोंसे सलाह करके बिना बँटे हुए धनके द्वारा ज्येष्ठ भाईने जो श्राद्ध और दान किया हो, वह सबके द्वारा किया हुआ माना जाता है। प्रतिवर्ष माता-पिताकी क्षयाह तिथिको जो श्राद्ध किया जाता है, उसे मलमासमें नहीं करना चाहिये—ऐसा व्यासजीका वचन है। गर्भमें, ऋण लेने-देनेके व्यवहारमें, प्रेतकर्ममें, मृत्युमें, मासिक श्राद्धमें तथा वार्षिक श्राद्धमें मलमासकी गणना नहीं की जाती है। विवाह आदिके अवसरोंपर सौरमास, यज्ञ आदिमें सावनमास तथा वार्षिक श्राद्ध और पितृकार्यमें चान्द्रमास उत्तम माना गया है। जिस राशिपर सूर्यके स्थित रहते समय ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यकी मृत्यु हो जाती है, उसी राशिमें मृत्युतिथिको पितृकर्म करना चाहिये। वषट्कार (इन्द्रयाग), होम (देवयाग),


१- अप्स्वेकं प्लावयेत् पिण्डमेकं पत्न्यै निवेदयेत्। एकं वै जुहुयादग्नावेषा तु त्रिविधा गतिः॥
(स्क० पु०, प्र० ख० २००। ४४)
२- संशुद्धा स्याच्चतुर्थेऽह्नि स्नाता नारी रजस्वला। दैवे कर्मणि पित्र्ये च पञ्चमेऽहनि शुद्ध्यति ॥
(स्क० पु०, प्र० ख० २००। ५१)

१२९० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


पर्व (दर्श-पौर्णमास) तथा आग्रयण आदि कार्य मलमासमें भी करने योग्य हैं। अग्न्याधान, प्रतिष्ठा, यज्ञ, दान, व्रत, वेद-व्रत, वृषोत्सर्ग, चूडाकर्म तथा मांगलिक अभिषेक भी मलमासमें न करे। नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको मलमासमें यत्नपूर्वक करना चाहिये। इसी प्रकार तीर्थस्नान, गजच्छाया-स्नान और प्रेतश्राद्ध भी मलमासमें अवश्य करने योग्य है। जहाँ भोजन करनेवाले भाई-बन्धु और सगोत्र पुरुष नहीं उपलब्ध होते और अन्त्यज आदिसे श्राद्धभूमि घिर जाती है, वहाँ यह सब राक्षसी श्राद्धका लक्षण है। जो स्वयं श्राद्ध करके दूसरेके श्राद्धमें विह्वल होकर भोजन करता है, उसके पितर पिण्ड और तर्पणके लुप्त हो जानेसे नरकमें गिरते हैं।१

यज्ञ और श्राद्धके लिये न्यायपूर्वक ब्राह्मणको निमन्त्रण देकर जो किसी प्रकार उसे छोड़ देता है, वह पापात्मा शूकर-योनिको प्राप्त होता है। दैवश्राद्ध अथवा पितृश्राद्धमें जब अशौच हो जाय, तब उसकी निवृत्ति होनेपर ब्राह्मणोंको श्राद्धका दान देना चाहिये। श्राद्धकी समाप्ति होनेपर ब्राह्मणोंसे आशीर्वाद लेना चाहिये, इससे दीर्घायुकी प्राप्ति होती है। पहले ब्राह्मणके हाथमें जल देकर इस प्रकार प्रार्थना करे—

अपां मध्ये स्थिता देवाः सर्वमप्सु प्रतिष्ठितम्।
ब्राह्मणस्य करे न्यस्ताः शिवा आपो भवन्तु नः ॥

'देवता जलके भीतर निवास करते हैं। सब कुछ जलमें ही प्रतिष्ठित है। ब्राह्मणके हाथमें रखा हुआ जल हमारे लिये कल्याणकारी हो।'

तत्पश्चात् ब्राह्मणके हाथमें फूल देकर इस प्रकार प्रार्थना करे—

लक्ष्मीर्वसति पुष्पेषु लक्ष्मीर्वसति पुष्करे।
लक्ष्मीर्वसति वै सोमे सौमनस्यं सदास्तु मे ॥
'लक्ष्मी फूलोंमें निवास करती हैं। लक्ष्मी कमलमें निवास करती हैं और लक्ष्मी चन्द्रमामें वास करती हैं। मेरा मन सदा प्रसन्न रहे।'

तदनन्तर ब्राह्मणके हाथमें अक्षत देकर प्रार्थना करे—

अक्षतं चास्तु मे पुण्यं शान्तिः पुष्टिर्धृतिश्च मे।
यद्यच्छ्रेयस्करं लोके तत्तदस्तु सदा मम॥
'मेरा पुण्य अक्षय हो; मुझे शान्ति, पुष्टि और धृति प्राप्त हो। लोकमें जो कल्याणकारी वस्तुएँ हैं, वे सदा मुझे मिलती रहें।'

इसके बाद ब्राह्मणको दक्षिणा देकर प्रार्थना करे—

दक्षिणाः पान्तु सर्वत्र बहुदेयं तथास्तु नः।
'दक्षिणा सर्वत्र रक्षा करे और हमारे पास दान करनेके लिये बहुत सामग्री हो।'

सभी प्रार्थनाओंके उत्तरमें ब्राह्मण 'एवमस्तु' कहकर उनका अनुमोदन करे और यजमान मस्तक झुकाकर ब्राह्मणके आशीर्वादको शिरोधार्य करे। भोगकी इच्छा रखनेवाला पुरुष पिण्डको सदा अग्निमें डाले। सन्तानकी प्राप्तिके लिये मध्यम पिण्ड मन्त्रोच्चारणपूर्वक पत्नीको दे दे। उत्तम कान्ति चाहे तो सदा गौओंको ही पिण्ड खिला दे। यदि प्रज्ञा, यश और कीर्तिकी अभिलाषा हो तो सदा पिण्डको जलमें ही डाल दे। दीर्घ आयुकी चाह हो तो सब पिण्ड कौओंको खिला दे। कार्तिकेयजीके लोकमें जानेकी अभिलाषा हो तो मुर्गेको खिलाये अथवा दक्षिण दिशाकी ओर मुख करके सब पिण्ड आकाशमें ही फेंक दे। क्योंकि आकाश और दक्षिण दिशा पितरोंके स्थान हैं।२

चन्द्रग्रहणके सिवा और कभी रात्रिमें श्राद्ध न करे। चन्द्रग्रहणका दर्शन होनेपर शीघ्र सर्वस्व


१- श्राद्धं कृत्वा परश्राद्धे यस्तु भुङ्क्ते स विह्वलः। पतन्ति पितरस्तस्य लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥
(स्क० पु०, प्र० ख० २००। ६३-६४)
२- पिण्डमग्नौ सदा दद्याद्भोगार्थी सततं नरः। प्रजार्थं पत्न्यै वै दद्यान्मध्यमं मन्त्रपूर्वकम् ॥
उत्तमां द्युतिमन्विच्छेदगोषु नित्यं प्रदापयेत्। प्रज्ञामिच्छेद्यशः कीर्तिमप्सु नित्यञ्च प्रक्षिपेत् ॥

  • प्रभासखण्ड * १२९१

लगाकर भी रात्रिमें श्राद्ध करे। ग्रहणके समय श्राद्ध न करनेवाला कष्ट पाता है और जो श्राद्ध करता है, वह अपने पापसे उसी प्रकार तर जाता है, जैसे जहाज समुद्रके पार होता है। काला उड़द, तिल, जौ, अगहनीका चावल, महायव, व्रीहियव तथा काले और सफेद तिल श्राद्धकर्ममें सदा ग्राह्य हैं। बेल, आँवला, मुनक्का, कटहल, आमड़ा, अनार, केला, सामयिक साग और मूँग आदि वस्तुएँ श्राद्ध-कर्ममें उत्तम मानी गयी हैं। मसूर, सौंफ और कुसुम्भके फूल श्राद्धमें सदैव वर्जित हैं। लहसुन, गाजर, प्याज, पिण्डमूल, मोरट और बड़ी मूली—ये सब श्राद्धमें वर्जित हैं। इनके सम्पर्कसे श्राद्ध व्यर्थ हो जाता है और दाता नरकमें पड़ता है। प्रातःकालसे लेकर सन्ध्यातक पंद्रह मुहूर्त होते हैं। उनमें तीन मुहूर्तका प्रातःकाल, फिर तीन मुहूर्तका संगवकाल, उसके बाद तीन मुहूर्तका मध्याह्नकाल, फिर उतनेका ही अपराह्नकाल तथा शेष तीन मुहूर्तका सायाह्नकाल कहा गया है। यही पाँचवाँ दिनांश है। प्रातःकालसे लेकर रोहिणतक मनुष्य श्राद्ध करे। रोहिण मुहूर्तका उल्लंघन न करे। दिनके आठवें मुहूर्तको कुतप और नवेंको रोहिण कहते हैं। एकोद्दिष्ट श्राद्ध मध्याह्नमें करना चाहिये। केवल जातकर्म-संस्कारके समय उसे प्रातःकाल किया जा सकता है। पितरोंके लिये पृथक् और विश्वेदेवोंके लिये पृथक् श्राद्ध करे। श्राद्ध करके ब्राह्मणोंको विदा करे। उसके बाद बलिवैश्वदेव कर्म करे। यदि आग प्रज्वलित न हो और उसमें धुआँ उठता हो तो उसमें हवन करनेवाला यजमान अपने पुत्रके साथ अन्धा हो जाता है। जहाँ दुर्गन्धयुक्त, काले और नीले रंगकी अग्नि पृथ्वीपर प्राप्त हो, वहाँ पराजय होती है—यों जानना चाहिये। जिसमें लपटें उठती हों, जिसकीज्वालामें कुछ पीला रंग दिखायी देता हो, जो घृत और सुवर्णके समान देदीप्यमान हो तथा जिसकी लपट प्रदक्षिण भावसे उठ रही हो, वह अग्नि सम्पूर्ण कर्मोंको सिद्ध करनेवाली होती है। चन्दन, अगुरु, तमाल, खस, पद्मक, धूप, गुग्गुल तथा लोहबानकी धूप श्रेष्ठ मानी गयी है। कमल, उत्पल, सुगन्धित फूल तथा श्वेत रंगके पुष्प श्राद्धमें श्रेष्ठ माने गये हैं। जौ, सुमना, झिंर्टी, रक्तक और कुरण्टक—ये सभी फूल श्राद्धकर्ममें सदैव वर्जित हैं। सोने, चाँदी और ताँबेके पात्र पितरोंके पात्र कहे जाते हैं। श्राद्धमें चाँदीकी चर्चा और दर्शन भी पुण्यदायक है। चाँदीका समीप होना, दर्शन अथवा दान राक्षसोंका विनाश करनेवाला, यशोदायक तथा पितरोंको तारनेवाला होता है।<br><br>अब मैं अमृत-मन्त्रका उपदेश करता हूँ—<br>देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।<br>नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः॥<br>‘देवता, पितर, महायोगी, स्वधा और स्वाहा—इन सबको नित्य बारंबार नमस्कार है।'<br><br>श्राद्धके आदि और अन्तमें इस मन्त्रका तीन-तीन बार जप करना चाहिये। ब्राह्मणोंद्वारा सदैव पूजित होनेपर यह मन्त्र अश्वमेध यज्ञका फल देता है। पिण्डदानके समय भी एकाग्रचित्त होकर इस मन्त्रको जपे। इससे पितर प्रसन्न होते हैं तथा राक्षस भाग जाते हैं।<br><br>अब मैं सप्तार्चिष स्तोत्र कहता हूँ। जो मूर्तिरहित और मूर्तिमान् हैं, जिनका तेज सब ओर उदीप्त है, जो सर्वत्र व्यापक और दिव्य दृष्टिवाले हैं, उन पितरोंको मैं सदा नमस्कार करता हूँ। जो इन्द्र आदि देवताओं तथा दक्ष और कश्यपके भी नेता हैं एवं सप्तर्षियों और पितरोंके भी नायक हैं, सबकी अभिलाषा पूर्ण

प्रार्थयन्दीर्घमायुश्च वायसेभ्यः प्रदापयेत् । कुमारलोकमन्विच्छन् कुक्कुटेभ्यः प्रदापयेत् ॥
आकाशे गमयेद्वापि स्थितो वा दक्षिणामुखः । पितॄणां स्थानमाकाशं दक्षिणा चैव दिक् तथा ॥
(स्क० पु०, प्र० ख० २००। ७३–७६)

१२९२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करनेवाले उन पितरोंको मैं नमस्कार करता हूँ। जो मनु आदि सब मनुष्यों तथा सूर्य और चन्द्रमाके भी माननीय पितर हैं, उन सबको मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। जो नक्षत्रों, ग्रहों, वायु, अग्नि, आकाश और पृथ्वीके भी पिता हैं, उन सबको मैं हाथ जोड़कर नमस्कार करता हूँ। सातों लोकोंमें रहनेवाले सातों पितरोंको नमस्कार है, नमस्कार है। योगदृष्टिवाले स्वयम्भू ब्रह्माको नमस्कार करते हैं। यह सप्तार्चिष स्तोत्र ब्रह्मर्षिगणोंसे पूजित, परम पवित्र तथा समस्त राक्षसोंका विनाशक है। इस प्रकार इस स्तोत्रका तीन बार जप करे। जो श्रद्धालु, जितेन्द्रिय तथा एकाग्रचित्त होकर बड़ी श्रद्धाके साथ प्रतिदिन इस सप्तार्चिष स्तोत्रका जप करता है, वह सात समुद्रोंवाली पृथ्वीका एकमात्र राजा होता है। जो इस श्राद्धकल्पका नित्य पाठ करता है, वह पंक्तिपावन है, वही अठारह विद्याओंका पारंगत विद्वान् माना गया है। पितर लोग प्रसन्न होकर मनुष्योंको प्रज्ञा, पुष्टि, स्मृति, मेधा, राज्य तथा आरोग्य प्रदान करते हैं। पार्वती! इस प्रकार सरस्वती और समुद्रके संगमपर मनुष्यको विधिपूर्वक श्राद्ध करना चाहिये।


परायी वस्तुके अपहरण और प्रतिग्रहके दोष

महादेवजी कहते हैं— जो मनुष्य अमावास्याको दूसरेका अन्न खाता है, उसका महीनेभरका किया हुआ पुण्य अन्नदाताको मिल जाता है। अयनारम्भके दिन पराया अन्न भोजन करे तो छः महीनोंका और विषुवकालमें परान्न भोजन करनेपर तीन मासका पुण्य चला जाता है। यदि चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके अवसरपर मनुष्य भोजन करे तो बारह वर्षोंसे एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है।* संक्रान्तिके दिन दूसरेका अन्न ग्रहण करनेपर महीनेभरसे अधिक समयका पुण्य चला जाता है। आद्य श्राद्ध (एकादशाह-श्राद्ध)-में परान्न भोजन करनेपर तीन वर्षका पुण्य चला जाता है। मासिक श्राद्धमें भोजन करनेपर आठ वर्षका और छमाही श्राद्धमें भोजन करनेसे आधे वर्षका पुण्य नष्ट होता है। जो अस्थि-संचयन-श्राद्धमें दूसरेका अन्न खाता है, उसका जन्मभरका पुण्य चला जाता है। जो मरे हुए मनुष्यकी शय्याका दान लेता है, जो वेदाध्ययनको बेचता है तथा जो ब्राह्मणका धन हड़प लेता है, ऐसे लोगोंकी शुद्धि कभी नहीं होती। एक माशा सुवर्ण, एक गाय अथवा आधी अंगुल भूमि भी जो चुराता है, वह प्रलयकालतक नरकमें रहता है। ब्रह्महत्या, मदिरापान, दरिद्रके धनका अपहरण, गुरुपत्नीगमन तथा सुवर्णकी चोरी—ये पाप स्वर्गमें बैठे हुए पुरुषको भी नीचे गिरा देते हैं। चिताके काष्ठसमूहका और वेद बेचनेवाले ब्राह्मणका स्पर्श करके स्नान करना चाहिये। वेद बेचनेवाला पुरुष द्रव्यके लिये जितने वेदाक्षरोंका उपयोग करता है, उतनी बाल-हत्याओंको प्राप्त होता है। जो वेदकी शिक्षा लेकर उसके बदलेमें ब्राह्मणको दान देता है, वह पहले नरकमें जाता है। उसके बाद वह ब्राह्मण भी नरकमें गिरता है। वेदज्ञ ब्राह्मण भी यदि बलिवैश्वदेव नहीं करते तथा अग्निहोत्र आदि गृह्यकर्मसे अलग रहते हैं, उन्हें शूद्र ही जानना चाहिये। जिन ब्राह्मणोंने अध्ययन नहीं किया है, जो अग्निहोत्रसे रहित तथा अपने आचारसे हीन हैं, वे सभी


* अमावास्यां नरा ये तु परान्नमुपभुञ्जते। तेषां मासकृतं पुण्यमन्नदातुः प्रदाप्यते ॥
षण्माससमये भुङ्क्ते त्रीन्मासान् विषुवे स्मृतम्। वर्षार्द्धादशभिश्चैव यत्पुण्यं समुपाजितम् ॥
तत् सर्वं विलयं याति भुक्त्वा सूर्येन्दुसम्प्लवे।
(स्क० पु०, प्र० ख० २००। ११–१३)

* प्रभासखण्ड *१२९३
शूद्रजातिके हैं। जो क्षयाहके दिन श्रद्धापूर्वक पिताका श्राद्ध नहीं करता, वह मनुष्य द्विज होनेपर भी शूद्रके ही समान है। जो ब्राह्मण मृतक-श्राद्ध, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, गजच्छाया* और सूतकमें भोजन करता है, उसके साथ शूद्रोचित बर्ताव करे। ब्रह्मचारी, संन्यासी, शिल्पी तथा यज्ञदीक्षित पुरुषको एवं यज्ञ, विवाह तथा सत्रमें कभी सूतक नहीं लगता। शिल्पी, नट, दूत और सूदखोर ब्राह्मणोंके साथ शूद्रोचित बर्ताव करना चाहिये। जो निषिद्ध कर्मोंमें संलग्न, पाखण्डी, दुष्कर्मी और पापाचारी हो, वह ब्राह्मण शूद्रके समान माना गया है। बिना स्नान किये भोजन करनेवाला विष्ठा भोजन करता है। बिना जप किये खानेवाला पीब और रक्त खाता है। बिना हवन किये आहार करनेवाला कीड़े खाता है और देवता, अतिथि आदिको दिये बिना भोजन करनेवाला पुरुष मानो मदिरा पीता है। राजाका अन्न तेज हर लेता है। शूद्रका अन्न ब्रह्मतेजको नष्ट कर देता है। सुनारका अन्न आयु और चमारका अन्न यश ले लेता है। कारीगरका अन्न सन्तानका नाश करता है। धोबीका अन्न बलको क्षीण करता है। किसी समूह या संस्थाका अन्न तथा वेश्याका अन्न स्वर्ग आदि पुण्यलोकोंसे भ्रष्ट कर देता है। वैद्यका अन्न पीब, व्यभिचारिणी स्त्रीका अन्न वीर्य, अधिक व्याज लेनेवालेका विष्ठा और हथियार बेचनेवालेका अन्न मलके समान त्याज्य है। ब्राह्मण मांस, लाख और नमक बेचनेसे तत्काल पतित हो जाता है और दूध बेचनेसे तीन दिनमें शूद्रके समान हो जाता है। रसको रससे बदलना चाहिये,किंतु रस देकर नमक नहीं लेना चाहिये। पके अन्नको कच्चे अन्नसे बदला जा सकता है। तिलको उसीके बराबर धान्यसे बदलना चाहिये। जो ब्राह्मण तिलोंसे भोजन, उबटन और दानसे भिन्न कोई दूसरा व्यापार आदि कर्म करता है, वह कीड़ा होकर अपने पितरोंके साथ कुत्तेकी विष्ठामें डूबता है। पूआ, सुवर्ण, गौ, घोड़ा, पृथ्वी और तिलका दान लेनेवाला ब्राह्मण यदि विद्वान् न हो तो वह उसे ग्रहण करके काष्ठकी भाँति जल जाता है। दानमें लिया हुआ सुवर्ण आयुका तथा रत्न अपने शरीर, पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, दौहित्र तथा कुलमें होनेवाले अन्य पुरुषोंका नाश कर देता है। पाँच योजनके भीतर भी यदि अपने गुरुका आगमन सुनायी पड़े तो उनकी उपेक्षा न करे। मनुष्य सदा सत्पात्रको ही दान दे। जो कहीं दान दिया जाता हुआ देखकर लोभवश उसे माँगने लगे तो विद्वान् पुरुष उसे दान न दे; क्योंकि लोलुपता या चपलता अच्छी नहीं होती। यदि ब्राह्मण रसका विक्रय त्याग दे तो उसे सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। मांसका त्याग करनेसे सन्तानकी आयु बढ़ती है। चीर और वल्कल धारण करनेसे वस्त्र और आभूषण प्राप्त होते हैं, सच बोलनेसे मनुष्य स्वर्गमें क्रीड़ा करता है। अहिंसाधर्मके पालनसे आरोग्य और दान देनेसे यशकी प्राप्ति होती है। ब्राह्मणकी सेवा करनेसे राज्य तथा द्विजत्व प्राप्त होते हैं। देवताओंकी सेवासे मनुष्य दिव्य रूप पाता है। अन्नदानसे सम्पूर्ण अभीष्ट भोगोंकी प्राप्ति होती है।

$\sim\sim\circ\sim\sim$


* ज्योतिषका एक योग जो उस समय होता है, जब कृष्ण त्रयोदशीके दिन चन्द्रमा मघा नक्षत्रमें और सूर्य हस्त नक्षत्रमें हो—यह योग श्राद्धके लिये अच्छा माना जाता है।

१२९४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


उत्तम-अधम जन्म, व्यर्थ और सफल दान, सुपात्रके लक्षण, विद्धा एकादशीके दोष तथा द्रव्याभावमें श्राद्धकी विधि

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! चार प्रकारके जन्म और सोलह प्रकारके दान व्यर्थ हैं तथा चार प्रकारके जन्म उत्तम और सोलह प्रकारके दान महादान हैं। अब इनका विवरण सुनो। (१) कुपुत्रोंका जन्म व्यर्थ है। (२) जो धर्मसे बहिष्कृत हैं, (३) जो परदेशमें जाते हैं तथा (४) जो सदा परस्त्रियोंमें आसक्त रहते हैं, उनका जन्म भी व्यर्थ है। १. जो दूसरेके यहाँ भोजन करते हैं और (२) परस्त्री-लम्पट हैं, उनको दिया हुआ दान व्यर्थ है। (३) एक बार देनेसे इन्कार करके फिर जो दान दिया जाता है, वह भी व्यर्थ है। (४) आरूढ़-पतित (संन्यासी होकर फिर गृहस्थ होनेवाले)-को दिया हुआ दान तथा (५) अन्यायोपार्जित धनका दान भी व्यर्थ है। (६) ब्रह्महत्यारे, (७) पतित, (८) चोर, (९) गुरुको प्रसन्न न रखनेवाले (१०) कृतघ्न, (११) ग्राम-पुरोहित, (१२) अधम ब्राह्मण, (१३) शूद्रा स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मण, (१४) वेदविक्रेता, (१५) जिसकी स्त्रीका किसी जार पुरुषसे सम्बन्ध हो तथा (१६) जो स्त्रीके अधीन रहता हो, ऐसे ब्राह्मणोंको दिये हुए दान असफल होते हैं। इस तरह ये सोलह प्रकारके दान व्यर्थ हैं।

अब जिनका जन्म उत्तम है, उनका परिचय सुनो। (१) जो अपने माता-पिताके उत्तम पुत्र हैं, (२) सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं, (३) परदेशमें नहीं जाते और (४) परायी स्त्रियोंसे विमुख हैं—इन चार प्रकारके मानवोंका जन्म श्रेष्ठ है। (१) गौ, (२) सुवर्ण, (३) चाँदी, (४) रत्न, (५) विद्या, (६) तिल, (७) कन्या, (८) हाथी, (९) घोड़ा, (१०) शय्या, (११) वस्त्र, (१२) भूमि, (१३) अन्न, (१४) दूध, (१५) छत्र तथा (१६) आवश्यक सामग्रियों-सहित गृह—इन सोलह प्रकारकी वस्तुओंके दानको महादान कहते हैं।

इसलिये शठता छोड़कर श्रद्धा और विधिके साथ उत्तम देशमें, उत्तम कालमें और उत्तम पात्रको न्यायोपार्जित धनका दान देना चाहिये। जो वेदाध्ययनसे सम्पन्न, योगनिष्ठ, शान्त, पुराणका ज्ञाता, पापसे डरनेवाला, स्त्रियोंके प्रति क्षमाभाव रखनेवाला, धर्मात्मा, गौओंको आश्रय देनेवाला तथा सदाचारसे युक्त हो, उसीको दानका उत्तम पात्र कहते हैं। सत्य, इन्द्रियसंयम, तप, शौच, सन्तोष, ईर्ष्याका न होना, सरलता, ज्ञान, मनःसंयम, दया और दान—ये सद्गुण ही सुपात्रके लक्षण हैं।* जो ऐसे श्रेष्ठ पात्रको समान बछड़ेवाली, चाँदीके खुर और सोनेके सींगवाली, सर्वगुणसम्पन्न एक गाय भी दान करता है, वह मेरे लोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो मानव ऐसी गायको दानमें देता है, वह उत्तम गतिको प्राप्त होता है। उसके ऊपर मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ। जो गाय क्रोध करनेवाली, दुष्ट, दुर्बल, रोगिणी तथा मूल्य न देकर लायी गयी हो, उसका दान नहीं करना चाहिये। जो अतिथियोंका प्रेमी, मनको वशमें रखनेवाला, अग्निहोत्री तथा धनके अभावसे कष्ट पानेवाला श्रोत्रिय ब्राह्मण हो, उसे दी हुई एक गाय भी अधिक गुणवाली होती है। जो ज्ञान-दुर्बल ब्राह्मण गायको बेचता है, वह गोदान लेनेका अधिकारी नहीं है, उसे ब्राह्मण नहीं मानना चाहिये। गाय, घर, शरण तथा कन्या—ये वस्तुएँ अनेक पुरुषोंको नहीं देनी चाहिये—इनमेंसे एक वस्तु एक ही व्यक्तिको देनी चाहिये।


* सत्यं दमस्तपः शौचं सन्तोषोऽनैर्ष्यमार्जवम्। ज्ञानं शमो दया दानमेतत्पात्रस्य लक्षणम्॥
(स्क० पु०, प्र० ख० २०२। १८। १९)

* प्रभासखण्ड * । १२९५

यदि एकादशी दशमीसे विद्ध हो और द्वादशीका क्षय हो गया हो, तो उस दिन नक्त-व्रत करे। उस दिन उपवासका विधान नहीं है। जो एकादशीमें उपवास करके त्रयोदशीको पारण करता है, उसकी बारह द्वादशियोंका फल नष्ट हो जाता है। उपवास और श्राद्धके दिन काष्ठसे दन्तधावन न करे। दर्श, पौर्णमास तथा पिताका वार्षिक श्राद्ध पूर्वविद्धा तिथिमें ही करना चाहिये; जो ऐसा नहीं करता, वह नरकमें पड़ता है। उसकी सन्तानकी हानि बतायी गयी है और वह दुर्भाग्यको प्राप्त होता है।*

द्रव्यके अभावमें एक ही ब्राह्मणके द्वारा छः पिण्डवाला श्राद्ध करे। उसमें पिता आदिके लिये छः अर्घ्य स्थापित करके उन्हें विधिपूर्वक निवेदन करे। ब्राह्मणके हाथमें जो अन्न जाता है, उसे पिता भोजन करते हैं, मुखमें पितामह खाते हैं, तालुभागमें स्थित होकर प्रपितामह उस अन्नको ग्रहण करते हैं। ब्राह्मणके कण्ठमें मातामह, हृदयमें प्रमातामह और नाभिमें वृद्ध प्रमातामह स्थित होकर अन्न ग्रहण करते हैं। ब्राह्मण न मिले तो कुशका ब्राह्मण बनाकर रखे (और उसके सन्निधानमें श्राद्ध-कार्य पूर्ण करे) यह सभी पुराणोंसे उनका सार निकालकर कहा गया है। जो नास्तिक चुगलखोर और वेदोंका निन्दक हो, उसे इसका उपदेश नहीं देना चाहिये।


मार्कण्डेयेश्वर आदि विविध लिंगोंकी महिमा

महादेवजी कहते हैं—पार्वती ! तदनन्तर महर्षि मार्कण्डेयजीके द्वारा स्थापित परम उत्तम मार्कण्डेयेश्वरके समीप जाय। उनका स्थान सावित्रीसे पूर्व दिशामें थोड़ी ही दूरपर है। पूर्वकालमें महर्षि मार्कण्डेय एक विख्यात महात्मा हुए हैं। पद्मयोनि ब्रह्माजीके प्रसादसे उन्हें अजरता और अमरता प्राप्त हो चुकी है। वे प्रभासक्षेत्रमें गये और वहाँ शिवजीकी स्थापना तथा पूजा करके दक्षिण ओर स्थित हो पद्मासन लगाकर ध्यानमग्न हो गये। ध्यानमें ही उनके दस हजार अरब युग बीत गये; परंतु मुनीश्वर मार्कण्डेय नहीं जगे। इस दीर्घकालमें हवासे उड़ी हुई धूलके द्वारा धीरे-धीरे वहाँके मन्दिर, शिवलिंग और स्थान आदिका लोप हो गया। तत्पश्चात् किसी समय मुनि जब समाधिसे जगे, तब उन्होंने सारा शिवमन्दिर धूलसे आच्छादित देखा। फिर वे मिट्टी खोदकर वहाँसे बाहर निकले और वहाँ शिवकी पूजाके लिये एक बहुत बड़ा द्वार बनवाया। जो मनुष्य उसमें प्रवेश करके वहाँ भगवान् शिवका पूजन करता है, वह मेरे परम धामको प्राप्त होता है।

मार्कण्डेयेश्वरसे उत्तर दिशामें पाँच धनुषकी दूरीपर पुलस्त्येश्वरका स्थान है। उनका दर्शन और पूजन करके मनुष्य अपने सात जन्मोंका पाप नष्ट कर डालता है।

वहाँसे नैर्ऋत्यकोणमें आठ धनुषके अन्तरपर ऋत्वीश्वर शिव हैं, उनका भक्तिभावसे पूजन करना चाहिये। वे बड़े-बड़े यज्ञोंके फल देनेवाले हैं। उनका दर्शन करके मानव पुण्डरीक-यज्ञका फल पाता है। उसे सात जन्मोंतक दरिद्रता और दुःखकी प्राप्ति नहीं होती।

ऋत्वीश्वरसे पूर्व दिशामें सोलह धनुष दूर कश्यपेश्वर लिंग है, जो महापातकोंका नाश


* दर्शञ्च पौर्णमासञ्च पितुः सांवत्सरं दिनम्। पूर्वविद्धमकुर्वाणो नरकं प्रतिपद्यते ॥
हानिश्च संततेः प्रोक्ता दौर्भाग्यं हि समाप्नुयात् ॥
(स्क० पु०, प्र० ख० २०३। ४२-४३)

१२९६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करनेवाला है। कश्यपेश्वरका दर्शन करके मनुष्य धनवान् और पुत्रवान् होता है तथा सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है।

कश्यपेश्वरसे ईशानकोणमें आठ धनुष दूर कौशिकेश्वर शिव हैं, जो बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाले हैं। उनका दर्शन-पूजन करके मानव मनोवांछित फल पाता है।

मार्कण्डेयेश्वरसे बीस धनुष दक्षिण ओर कुमार कार्तिकेयद्वारा स्थापित लिंग है। उसके आगे एक कूप है। उसमें स्नान करके जो कुमारेश्वर शिवका पूजन करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त होकर स्वामी कार्तिकेयजीके लोकमें जाता है।

मार्कण्डेयेश्वरसे उत्तर दिशामें पंद्रह धनुष दूर गौतमेश्वर नामक उत्तम लिंग है। उस लिंगकी विधिपूर्वक पूजा करके मनुष्य पाँच पातकोंसे छूट जाता है।

वहाँसे पश्चिम भागमें सोलह धनुषपर देवराजेश्वर लिंग है, जिसकी स्थापना देवराज इन्द्रने की है। जो मनुष्य उनकी पूजा करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। वहींपर मनुजीके द्वारा स्थापित मानवेश्वर लिंग है। जो उसकी पूजा करता है, वह पातकोंसे मुक्त होता है। सब लोक शिवममय हैं और सब कुछ शिवमें ही प्रतिष्ठित है। इसलिये जो अपना कल्याण चाहे वह भगवान् शिवके ही नामोंका जप करे। ब्रह्मा आदि सब देवता, राजा, महर्षि, मनुष्य और मुनि—ये सभी लोग शिवलिंगका पूजन करते हैं। शिवलिंगकी स्थापना करनेवाला मानव ब्रह्महत्या, बालहत्या तथा अन्य पातकोंका शिवजीके तेजसे नाश करता है।

वहाँसे दक्षिण दिशामें वृषध्वजेश्वर नामक शिव हैं। वे ही अव्यक्त अविनाशी अक्षर ब्रह्म हैं, जिससे परे कुछ भी नहीं है। उनका न आदि है, न अन्त है। वे योगिगम्य हैं। सर्वाश्चर्यमय हैं। बुद्धिसे ग्रहण करनेयोग्य तथा निरामय हैं। उनके सब ओर हाथ, पैर, नेत्र, सिर और मुख हैं। उन्हींको मृड और स्थाणु आदि नामोंसे पुकारते हैं। राजा मरुत्त, पृथु, भरत, शशविन्दु, गय, शिबि, राम, अम्बरीष, मान्धाता, दिलीप, भगीरथ, सुहोत्र, रन्तिदेव, ययाति और सगर—ये भाग्यशाली राजा प्रभासक्षेत्रमें आये और वृषध्वजेश्वरकी यज्ञोंद्वारा आराधना करके स्वर्गलोकमें चले गये। देवि! मैं सच कहता हूँ, हितकी बात कहता हूँ और बार-बार इसको दुहराता हूँ—इस विनाशशील असार संसारमें केवल शिवकी आराधना ही सार है। जिसने भगवान् शिवका दर्शन किया है, वह धन्य है।


गौतम और प्रेतका संवाद, प्रेतोंका उद्धार तथा प्रेततीर्थकी उत्पत्ति

महादेवजी कहते हैं—पूर्वकालकी बात है, उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि गौतम भृगुकच्छसे प्रभासक्षेत्रमें आये। वे परम पवित्र उत्तरायणमें श्रीसोमनाथजीका दर्शन करनेकी इच्छासे वहाँ पधारे थे। सोमेश्वरका दर्शन तथा सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करके गौतमजी प्रभासमें ही तीर्थभ्रमण करने लगे। घूमते-घूमते गात्रच्छेद तीर्थमें गये। उसकी सीमापर पहुँचते ही उन्हें वैष्णव वन दिखायी दिया, जो भगवान् विष्णुको बहुत ही प्रिय है। उस वनमें सौ धनुषतक फैला हुआ पुरुषोत्तम क्षेत्र है। वहाँ सीमापर पहुँचकर उन्होंने महाभयंकर विशालकाय पाँच प्रेतोंको देखा, जो बड़े-बड़े वृक्षोंपर बैठे हुए थे। उनके केश ऊपरकी ओर उठे हुए थे। उन प्रेतोंको देखकर वे भयसे थर्रा उठे। फिर भी धैर्य धारण करके देरतक कुछ सोच-विचारकर उन्होंने पूछा—'अहो! यह विकराल देह धारण करनेवाले तुमलोग कौन हो?'

  • प्रभासखण्ड * १२९७

प्रेतोंने कहा—महामना! हमलोग प्रेत हैं और इस तीर्थको श्रेष्ठ एवं पुण्यमय सुनकर बहुत दूरसे यहाँ आये हैं; परंतु हमें इसके भीतर प्रवेशकी आज्ञा नहीं मिलती। कुछ अदृश्य दूतोंने हमें मार-मारकर जर्जर कर दिया है। हममेंसे एक यह लेखक है, दूसरा रोहक है, तीसरा शीघ्रग है, चौथा सूचक है और पाँचवाँ मैं सबसे बड़ा पापी हूँ। मेरा नाम पर्युषित है।

गौतमने पूछा—तुमलोग तो प्रेतयोनिमें पड़े हुए हो? फिर तुम्हारे ये लेखक आदि नाम कैसे हुए?

प्रेत बोले—इसके पास जब कोई ब्राह्मण याचना करने आता, तब यह पृथ्वीपर कुछ लिखने लगता था। उसे 'हाँ' या 'ना' कुछ भी उत्तर नहीं देता था। इसीलिये यह लेखक नामसे सूचित हुआ है। हमारा यह दूसरा साथी किसी याचक ब्राह्मणको देखते ही भयसे महलकी छतपर चढ़ जाता था, इसीलिये इसका नाम 'रोहक' (चढ़नेवाला) हुआ। इस तीसरे पापीने राजासे बहुतेरे ब्राह्मणोंके विषयमें यह सूचना दी (चुगली खायी) कि ये तो बड़े धनाढ्य हैं। अतः इसकी सूचक नामसे ही प्रसिद्धि हुई। ये चौथे महाशय ब्राह्मणोंद्वारा याचना करनेपर प्रतिदिन भागकर शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ जाते थे, किसीको कुछ भी नहीं देते थे। अतः इन्हें 'शीघ्रग' कहा गया है। मैं ब्राह्मणोंको सदा पर्युषित (बासी) कदन्न देता था और स्वयं मिष्ठान्नोंसे ही पेट भरता था, इसलिये मैं 'पर्युषित' नामसे भूतलपर प्रसिद्ध हुआ।

गौतमने पूछा—संसारमें कोई भी प्राणी बिना भोजनके नहीं रहते; अतः बताओ, तुमलोग क्या आहार करते हो?

प्रेतोंने कहा—द्विजश्रेष्ठ! जहाँ भोजनके समय आपसमें कलह होने लगता है, वहाँ उस अन्नके रसको हम ही खाते हैं। जहाँ मनुष्य बिना लिपी-पुती धरतीपर खाते हैं, जहाँ ब्राह्मण शौचाचारसे भ्रष्ट होते हैं, वहाँ हमको भोजन मिलता है। जो पैर धोये बिना खाता है, जो दक्षिणकी ओर मुँह करके भोजन करता है अथवा जो सिरमें वस्त्र लपेटकर भोजन करता है, उसके उस अन्नको सदा प्रेत ही खाते हैं।* जहाँ रजस्वला स्त्री, चाण्डाल और सूअर श्राद्धके अन्नपर दृष्टि डाल देते हैं, वह अन्न हम प्रेतोंका ही भोजन होता है। जिस घरमें सदा जूठन पड़ा रहे, निरन्तर कलह होता रहे और बलिवैश्वदेव न किया जाता हो, वहाँ हम प्रेतलोग भोजन करते हैं।

ब्राह्मणने पूछा—कैसे घरोंमें तुम्हारा प्रवेश नहीं होता? यह बात मुझे सत्य-सत्य बताओ।

प्रेत बोले—ब्रह्मन्! जिस घरमें बलिवैश्वदेव होनेसे धुएँकी बत्ती उठती दिखायी देती है, उसमें हमारा प्रवेश नहीं होता। जिस घरमें सबेरे चौका लग जाता है तथा वेदमन्त्रोंकी ध्वनि होती रहती है, वहाँकी किसी वस्तुपर हमारा अधिकार नहीं होता।

गौतमने पूछा—किस कर्मके परिणामसे मनुष्य प्रेत भावको प्राप्त होता है?

प्रेत बोले—जो धरोहर हड़प लेते हैं, झूठे मुँह यात्रा करते हैं तथा गौओं और ब्राह्मणोंकी हत्या करनेवाले हैं, वे प्रेतयोनिको प्राप्त होते हैं। जो दूसरोंकी चुगली खानेमें लगे रहते हैं, झूठी गवाही देते और न्यायके पक्षमें नहीं रहते, वे मरनेपर प्रेत होते हैं। जो सूर्यकी ओर मुँह करके थूक, खँखार और मल-मूत्र त्याग करते हैं, वे प्रेतशरीर प्राप्त करके दीर्घकालतक उसीमें स्थित रहते हैं। गौओं, ब्राह्मणों तथा रोगियोंको जब कुछ दिया जाता हो, उस समय जो न देनेकी सलाह देते हैं, वे भी प्रेत ही होते हैं। यदि शूद्रका अन्न पेटमें रहते हुए ब्राह्मणकी मृत्यु हो जाय तो वह अत्यन्त भयंकर प्रेत होता है। विप्रवर! जो अमावास्या तिथिमें मदोन्मत्त होकर हलमें तीन बैलोंको जोतता है, वह मनुष्य प्रेत होता है। जो


* अप्रक्षालितपादस्तु यो भुङ्क्ते दक्षिणामुखः। यो वेष्टितशिरा भुङ्क्ते प्रेता भुञ्जन्ति नित्यशः ॥ (स्क० पु०, प्र० ख० २१६ । ४१)

१२९८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


विश्वासघाती, ब्रह्महत्यारा, स्त्री-वध करनेवाला, गोघाती, गुरुघाती और पितृहत्या करनेवाला है, वह मनुष्य भी प्रेत होता है। मरनेपर जिसके लिये सोलह एकोद्दिष्ट नहीं किये गये हैं, उसको भी प्रेतयोनिकी प्राप्ति होती है।

गौतमने पूछा—किस कर्मके परिणामसे मनुष्य प्रेतयोनिमें नहीं पड़ता, वह सब मुझसे कहो।

प्रेतोंने कहा—जो तीर्थयात्रामें तत्पर, देवपूजा-परायण तथा सदा ब्राह्मण-भक्त रहता है, वह प्रेत नहीं होता। जो प्रतिदिन शास्त्र सुनता, नित्य पण्डितोंकी सेवा करता और वृद्ध पुरुषोंसे अपना सन्देह पूछता है, वह प्रेत नहीं होता। जो पवित्र गयातीर्थमें जाकर श्राद्ध करता है, उसके वंशमें कोई प्रेत नहीं होता। इसीलिये हम बड़ी दूरसे यहाँ शीघ्रतापूर्वक आये हैं, परंतु इस पुण्यक्षेत्रमें प्रवेश नहीं कर पाते। इस प्रेतशरीरसे हमारा मन खिन्न हो गया है। अतः महाभाग! आप ही प्रयत्नपूर्वक हमलोगोंके आश्रय होइये।

गौतमने पूछा—तुम्हारा उद्धार किस प्रकार होगा?

प्रेत बोले—प्रभो! आप वैष्णव-क्षेत्रमें जाकर हमारे नाम और गोत्रका उच्चारण करके श्राद्ध कीजिये। इससे हमारी मुक्ति हो जायगी।

यह सुनकर दयार्द्र गौतमने वैष्णव-क्षेत्रमें जाकर उन सबोंके लिये पृथक्-पृथक् श्राद्ध किया। वे जिस-जिसका श्राद्ध करते थे, वह-वह रात्रिको स्वप्नमें आकर दर्शन देता और कहता—'विप्रवर! आपके प्रसादसे मैं प्रेतयोनिसे मुक्त हो गया। आपका कल्याण हो, अब मैं जाता हूँ। मेरे लिये विमान उपस्थित हुआ है।' यों कहकर प्रत्येक प्रेत चल देता था। इस प्रकार उन्होंने चार प्रेतोंका तो उद्धार कर दिया। पाँचवें दिन उन्होंने पर्युषितके लिये विधिपूर्वक श्राद्ध किया। तदनन्तर रातको स्वप्नमें उन्हें पर्युषित दिखायी दिया, जो लंबी-लंबी साँसें खींचता हुआ दीनतापूर्ण वाणीमें बोल रहा था—'विप्रवर! मुझ भाग्यहीन पापीका उद्धार नहीं हुआ। मेरे द्वारा यही सबसे बड़ा पाप हुआ कि मैंने धन बढ़ाया।'

गौतमने पूछा—प्रेत! तुम्हारा उद्धार अब किस प्रकार होगा? अब शीघ्र बताओ।

पर्युषित बोला—ब्रह्मन्! आप मेरा पुनः श्राद्ध कीजिये।

उसके यों कहनेपर गौतमने उसके लिये उत्तरायणमें पुनः श्राद्ध किया। तदनन्तर रातको स्वप्नमें उसने आकर दर्शन दिया और कहा—'विप्रवर! मैं आपके प्रसादसे प्रेत-योनिसे छूट गया। आपका कल्याण हो, मैं जाता हूँ। मुझे देवत्व प्राप्त हुआ है, अतः मुझमें वर देनेकी शक्ति आ गयी है; इसलिये मुझसे कोई शुभ वर ग्रहण कीजिये। क्योंकि ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा व्रतभंग करनेवाले पुरुषोंके लिये साधु पुरुषोंने प्रायश्चित्त बताया है; किंतु कृतघ्नके लिये कोई भी प्रायश्चित्त नहीं बतलाया गया है।'

गौतमने कहा—यदि तुम मुझे वर देनेमें समर्थ हो तो जिस स्थानमें मैंने तुम सब प्रेतोंको देखा है, वहाँ मैं आश्रम बनाकर तपस्या करूँगा। वहाँ जो मनुष्य भक्तिपूर्वक स्नान और देवताओंका तर्पण करके पितरोंके उद्देश्यसे विधिवत् श्राद्ध करे, वह आपके प्रसादसे कभी प्रेत-योनिमें न आये। उसके वंशमें भी कभी कोई प्रेत न हो।

पर्युषित बोला—विप्रवर! तुम वहाँ जाकर आश्रम बनाओ। इससे तुम्हें उत्तम सिद्धि प्राप्त होगी। जो मानव श्रद्धा-भक्तिसे यहाँ श्राद्ध करेंगे, वे पितरोंसहित विमानमें बैठकर स्वर्गको जायँगे। उनमेंसे कोई प्रेत नहीं होगा। स्थिरबुद्धिवाले विद्वानोंने मैत्रीको सात पदवाली बताया है। तुम्हारा यह पवित्र आश्रम सब पापोंका नाशक और समस्त दुःखोंका निवारक होगा। यह स्थान मेरे नामपर प्रेततीर्थ कहलाये।

'एवमस्तु' कहकर गौतमजी चले गये। तदनन्तर वेदोक्त मार्गसे उन्होंने सब कार्य सम्पन्न किया।

$\sim\sim\circ\sim\sim$

  • प्रभासखण्ड * १२१९

नरकेश्वरका माहात्म्य

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! इन्द्रेश्वरसे उत्तर दिशामें समस्त पापोंका नाश करनेवाले नरकेश्वरदेव विराजमान हैं। प्राचीन कालकी बात है, भूतलमें विख्यात मथुरा नामकी नगरीमें देवशर्मा नामक एक विद्वान् ब्राह्मण रहता था, जो अगस्त्यगोत्रमें उत्पन्न तथा दरिद्रतासे पीड़ित था। उस नगरमें उसी रूप और अवस्थासे युक्त एक दूसरा भी वेदज्ञ ब्राह्मण था, जो उसी गोत्रमें उत्पन्न हुआ था। नाम भी उसका वही था। किसी समय यमराजने अपने दूतसे कहा—'तुम मथुरापुरीको जाओ और देवशर्माको ले आओ।' दूत गया और नामकी समानतासे उस दारिद्र्य-पीड़ित देवशर्माको ले आया। उसे देखकर यमराजने कहा—'विप्रवर! आप शीघ्र लौट जाइये। दूत नामकी समानतासे तुम्हें ले आया है।' ब्राह्मण बोले—'भगवन्! मैं घर नहीं लौटूँगा। जीवनभरकी दरिद्रतासे वहाँ भी मैं तंग आ गया था। अब जो शेष आयु है, उसे यहाँ आपके समीप ही बिता दूँगा।'

यमराज बोले—ब्रह्मन्! यहाँ कोई असमयमें नहीं आता और समय पूरा होनेपर कोई पृथ्वीपर क्षणभर भी जीवित नहीं रहता। पृथ्वीपर न कोई मेरा मित्र है न शत्रु। यदि उसका समय पूरा नहीं हुआ है तो सैकड़ों बाणोंसे घायल होनेपर भी मनुष्यकी मृत्यु नहीं होती और आयु पूर्ण हो जानेपर कुशाग्रसे बिंधनेपर भी वह जीवित नहीं रहता। अतः द्विजश्रेष्ठ! जबतक तुम्हारा शरीर जला न दिया जाय, तबतक लौट जाओ।

ब्राह्मणने कहा—देव! साधु पुरुषोंका, विशेषतः आपका दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता। अतः मैं पूछता हूँ कि ये जो अत्यन्त भयंकर नरक दिखायी देते हैं, इनमें किस कर्मसे मनुष्यको जाना पड़ता है? इन नरकोंकी कितनी संख्याएँ हैं?

यमराजने कहा—विप्रवर! मेरे लोकमें बहुत-से नरक हैं। इनमेंसे कुछ प्रधान हैं और कुछ उन्हींकी शाखाएँ हैं। जिनको तुम मेरे सेवकोंद्वारा यन्त्रमें पीड़ित देख रहे हो, ये पापी और कृतघ्न हैं। इन्होंने आसक्त होकर परायी स्त्रियोंपर कुदृष्टि डाली है और जिन्हें तुम कुम्भीपाकमें डाला हुआ देखते हो, ये सब झूठी गवाही देनेवाले और घूसखोर हैं। ये जो लोहेके तपाये हुए खम्भोंका आलिंगन कर रहे हैं, इन दुरात्माओंने परायी स्त्रियोंके साथ रमण किया है। जो दुष्ट गोघाती तथा देवताओं और ब्राह्मणोंके निन्दक रहे हैं, वे ही ये कुठारसे काटे जाते हैं। जिन्हें सियार, भेड़िये और लोहमुख जन्तु खा रहे हैं तथा ये जो भूखसे पीड़ित होकर अपना ही मांस खाते हैं, इन्होंने कभी अन्न-दान नहीं किया है। जो लोग सदा गौओं और ब्राह्मणोंके विनाशके लिये यत्नशील रहे हैं, वे ही ये रक्त, पीब और चर्बी भक्षण कर रहे हैं। इसी प्रकार विविध पापोंका फल भोग करानेके लिये भिन्न-भिन्न नरक हैं। जो प्रभासक्षेत्रमें जाकर नरकेश्वर शिवका दर्शन करता है, उसे कभी नरक नहीं देखना पड़ता। नरकेश्वरकी स्थापना स्वयं मैंने ही की है।

यह सुनकर वह ब्राह्मण अपने घरको लौट गया और धर्मराजके वचनका स्मरण करके प्रभासक्षेत्रमें जा जीवनभर नरकेश्वरकी आराधनामें संलग्न हो उत्तम सिद्धिको प्राप्त हुआ। इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके भक्तिपूर्वक नरकेश्वरका दर्शन करना चाहिये। अतिपातकोंसे युक्त मनुष्य भी उनके दर्शनसे नरकमें नहीं पड़ता। आश्विनकृष्णा चतुर्दशीको जो वहाँ विधिपूर्वक श्राद्ध करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है।

o

१३०० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

संवर्तेश्वर, बलभद्रेश्वर, दशाश्वमेधिक तीर्थ, शतमेधादि लिंग तथा दुर्वासादित्यका माहात्म्य

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! इन्द्रेश्वरसे पश्चिम और अर्कस्थलसे पूर्व संवर्तेश्वर लिंग है। पुष्करिणीके जलमें स्नान करके उनका दर्शन करनेसे मनुष्य दस अश्वमेध यज्ञोंका फल पाता है। उसके पूर्वभागमें और पापमोचन तीर्थसे नैर्ऋत्यकोणमें मेघेश्वर नामसे विख्यात शिवलिंग है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है। अनावृष्टिका भय होनेपर वहीं वारुणी शान्ति करानी चाहिये तथा वहाँकी पृथ्वीको जलमें डुबाये। जहाँ प्रतिदिन मेघोंद्वारा स्थापित मेघेश्वर लिंगका पूजन होता है, वहाँ अनावृष्टिका भय नहीं होता।

गात्रोत्सर्ग तीर्थसे उत्तर बलभद्रजीके द्वारा स्थापित महापापहारी शिवलिंग है। जो मानव तृतीया और रेवती नक्षत्रके योगमें भक्तिभावसे चन्दन, पुष्प आदि उपचारोंद्वारा बलभद्रेश्वर लिंगका पूजन करता है, वह योगीश्वरका पद पाता है।

प्राचीन कालमें राजा भरतने पुण्यमय प्रभासक्षेत्रमें आकर परम उत्तम दस अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। उसमें सोमपान करके सहस्र नेत्रोंवाले इन्द्र पूर्ण तृप्त हुए थे। अन्न और पानसे दीनजन तथा दक्षिणासे ब्राह्मणलोग तृप्त हुए थे। तदनन्तर सब देवता प्रसन्न होकर राजा भरतसे बोले—'महाबाहो! तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।'

राजा बोले—जो मनुष्य यहाँ आकर भक्ति-पूर्वक स्नान करे, उसे दस अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त हो।

देवताओंने कहा—राजन्! भूतपर यह स्थान दशाश्वमेधिक नामसे विख्यात होगा।

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! तबसे सब पापोंका नाश करनेवाला वह तीर्थ पृथ्वीपर दशाश्वमेधिक नामसे विख्यात हुआ। ऐन्द्रवारुण स्थानसे लेकर गोमुखतक और गोमुखसे आश्वमेधिक तीर्थतक विद्वानोंने शिवक्षेत्र बताया है। वहाँ मृत्युको प्राप्त होनेपर मनुष्य शिवलोकमें आनन्दित होता है।

वहीं शतमेध, सहस्रमेध और कोटिमेध नामके क्रमशः तीन लिंग हैं। दक्षिण दिशामें शतमेध लिंग है, जो सौ यज्ञोंका फल देनेवाला है। प्राचीन कालमें कार्तवीर्यने वहीं शिवलिंगकी स्थापना करके सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। मध्यमें जो कोटिमेध लिंग है, वहाँ साक्षात् ब्रह्माजीने ही महालिंगकी स्थापना करके एक करोड़ यज्ञ किये थे। उसके उत्तर भागमें सहस्रमेध लिंग है, जिसकी स्थापना करके देवराज इन्द्रने सहस्र यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। जो पंचामृत रस, जल, गन्ध और पुष्प आदिद्वारा विधिसे उस लिंगत्रयकी पूजा करता है, वह उन तीनों शिवलिंगोंके नामवाले यज्ञोंका फल पाता है।

वहीं दुर्वासादित्यका स्थान है, जहाँ मुनिवर दुर्वासाने हजार वर्षोंतक तप किया और निराहार रहकर सूर्यनारायणकी आराधना की थी। तब भगवान् सूर्यने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—'सुव्रत! वर माँगो।' दुर्वासाजी बोले—'भगवन्! यहाँ मेरे द्वारा आपकी जो सुन्दर प्रतिमा स्थापित की गयी है, उसमें आप तबतक निवास करें, जबतक यह पृथ्वी स्थिर है। आपकी पुत्री यमुनाजी भी यहाँ रहें और आपके महाबली पुत्र धर्मराजजी भी यहाँ निवास करें।'

सूर्यदेवने कहा—महामुने! तुमने जो कुछ माँगा है, वह तो होगा ही; उसके सिवा गंगा आदि कोटि तीर्थोंका और भी यहाँ निवास होगा। देवताओंसहित मैं सदा यहाँ स्थित रहूँगा। दुर्वासादित्यका दर्शन करनेसे यहाँ सब प्राणी कोटि यज्ञोंका फल पायेंगे।

यों कहकर भगवान् सूर्यने अपनी कन्या और पुत्रका स्मरण किया। यमुनाजी पाताल फोड़कर

* प्रभासखण्ड * १३०१

वहाँ प्रकट हुईं तथा कालदण्डधारी यमराज भी भगवान् सूर्यके निकट उपस्थित हुए।

सूर्यदेव बोले—धर्म! तुम और यमुना कोटि तीर्थोंके साथ यहाँ निवास करो। तुम्हें यहाँ रहकर पापी प्राणियोंकी भी यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये।

यों कहकर श्रीसूर्यदेव अन्तर्धान हो गये। दुर्वासाजीने अपने आश्रमकी ओर दृष्टिपात किया तो देखा, वहाँ पातालसे यमुना प्रकट हो गयीं और उस क्षेत्रमें साक्षात् यमराज भी स्वरूप धारण करके दृष्टिगोचर हुए। आदित्यसे दक्षिण और दुन्दुभिसे पूर्वभागमें यमुनाकुण्ड है। दुन्दुभि वहाँके क्षेत्रपाल हैं, जिनका शब्द दुन्दुभि-ध्वनिके समान होता है। वैशाखमासमें उस कुण्डमें स्नान करके मनुष्य भक्तिभावसे दुर्वासादित्यकी पूजा करे। जो उस महाकुण्डमें स्नान करके पितरोंका तर्पण करता है, उसके पितर दस वर्षतक तृप्त रहते हैं। वहाँ पिण्ड देनेसे पितरोंकी एक सौ आठ पीढ़ियाँ पुष्ट होती हैं, साथ ही नरकमें गिरे हुए पितरोंका तत्काल उद्धार हो जाता है। माघमासके शुक्लपक्षमें सप्तमी तिथिको जो मानव अपने मनको संयममें रखते हुए दुर्वासादित्यकी पूजा करता है, वह ब्रह्महत्यासे छूट जाता है। जो वहाँ दुर्वासादित्यके समीप सहस्र नामोंका पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। दुर्वासादित्यका दर्शन सब बालकोंपर लगे हुए ग्रहों और राक्षसोंका निवारण तथा महान् पापपुंजोंका शमन करनेवाला है। जो वहाँ क्षेत्रपाल दुन्दुभिका पूजन करता है, वह पशु-सम्पत्ति, पुत्र, बुद्धि तथा लक्ष्मीसे सम्पन्न होता है। सूर्यदेवका वह क्षेत्र एक कोसतक फैला हुआ है। जो सूर्यदेवके प्रति भक्तिभावसे रहित है, उसे उस क्षेत्रमें नहीं प्रवेश करना चाहिये।

~~ ० ~~

नागरादित्य, पिंगा नदी, संगमेश्वर तथा गंगेश्वरकी महिमा

महादेवजी कहते हैं—समस्त यादवोंका संहार हो जानेपर केवल वज्र शेष रह गये थे। वे अपनी आयुके शेष भागमें अपने पुत्र महद्वलक यादवोंके राज्यपर अभिषिक्त करके प्रभासक्षेत्रमें आये। यहाँ उन्होंने एक शिवलिंग स्थापित किया, जो व्रजेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ। राजा वज्रने नारदजीके उपदेशसे दीर्घकालतक पापनाशक प्रभासक्षेत्रमें तपस्या की और परम सिद्धिको प्राप्त किया। जो मनुष्य जाम्बवतीके जलमें स्नान करके व्रजेश्वरकी पूजा करता और वहाँ यादवस्थलके समीप ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह सहस्र गोदानोंका फल पाता है।

हिरण्याके समीप नागरादित्यका स्थान है। नागरादित्य सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। द्वारकामें निघ्नके पुत्र सत्राजित् हो गये हैं। उन्होंने यहाँ भगवान् सूर्यकी आराधना की और भगवान्ने संतुष्ट होकर उन्हें स्यमन्तकमणि प्रदान की, जो प्रतिदिन आठ भार सोना देती थी। उसे देकर भगवान् भानुने पुनः सत्राजित्को वर माँगनेके लिये प्रेरित किया। तब सत्राजित्ने कहा—'प्रभो! आप इस पुण्य आश्रममें सदा निवास करें।' 'एवमस्तु' कहकर सूर्यदेव अन्तर्धान हो गये। सत्राजित्ने वहाँ सूर्यदेवकी दिव्य प्रतिमा स्थापित की और प्रभास नगरके ब्राह्मणोंको वृत्ति देकर उन्हें सेवा-पूजाका भार समर्पित किया। अतः नागर ब्राह्मणोंके नामपर ही उसका नाम नागरादित्य हुआ। जो हिरण्या नदीके जलमें स्नान करके नागरादित्यका पूजन करता है, वह सूर्यलोकमें पूजित होता है। जब शुक्लपक्षकी सप्तमीको सूर्यकी संक्रान्ति हो, तब उसे महाजया सप्तमी कहते हैं। उसमें किये हुए स्नान, दान, जप, होम तथा देवताओं और पितरोंका पूजन—ये सभी कोटिगुना फल देनेवाले होते हैं। जो उस समय नागरादित्यके समीप एक ब्राह्मणको भोजन

१३०२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

कराता है, उसे एक करोड़ ब्राह्मण-भोजन करानेका फल होता है। विकर्तन, विवस्वान्, मार्तण्ड, भास्कर, रवि, लोकप्रकाशक, श्रीमान्, लोकचक्षु, ग्रहेश्वर, लोकसाक्षी, त्रिलोकेश, कर्ता, हर्ता, तमिस्रहा (अन्धकार-नाशक), तपन, तापन, शुचि, सप्ताश्ववाहन, गभस्तिहस्त (किरणरूप हाथवाले), ब्रह्मा तथा सर्वदेवनमस्कृत—यह इक्कीस नामोंवाला नागरादित्यका स्तोत्र है। इसे स्तवराज कहते हैं। यह शरीरको आरोग्य तथा पुष्टि प्रदान करनेवाला है। महादेवि! जो दोनों सन्ध्याओंके समय इस स्तोत्रसे नागरादित्यकी स्तुति करता है, वह मनोवांछित फल पाता है।

ऋषितीर्थसे पश्चिम पातकोंका नाश करनेवाली पिंगा नदी है, जो समुद्रमें मिली है। उसके जलका स्पर्श करनेसे मनुष्य रूपवान् होता है। एक समय दक्षिण भारतके रहनेवाले कुछ महर्षि सोमनाथजीका दर्शन करनेकी इच्छासे प्रभासक्षेत्रमें आये और एक नदीके किनारे ठहर गये। वे काले रंगके और कुरूप थे, किंतु वहाँ स्नान आदि करनेसे कामदेवके समान रूपवान् हो गये। तब उन सबने आश्चर्यचकित होकर कहा—'इसमें स्नान करके हम सब लोग पिंगल (गौरवर्ण) को प्राप्त हुए हैं, इसलिये आजसे इसका नाम पिंगा होगा। जो लोग भक्तिपूर्वक इसमें स्नान करेंगे, उनके वंशमें कोई कुरूप न होगा। पिंगाके दर्शनसे मनुष्यको पितृमेध यज्ञका फल प्राप्त होगा। यहाँ स्नान करनेसे दूना और तर्पणसे चौगुना पुण्य होगा। जो यहाँ श्राद्ध करेगा, उसे असंख्य फलकी प्राप्ति होगी।'

पूर्वकालमें उद्दालक नामके एक महातपस्वी महर्षि प्रभासक्षेत्रमें रहते थे। उन्होंने सरस्वती-पिंगा-संगमके समीपकी भूमिपर बड़ी भारी तपस्या की। उनकी भक्तिके प्रभावसे उनके आगे ही एक शिवलिंग प्रकट हुआ और आकाशवाणी हुई—'महाबाहु उद्दालक! मेरी बात सुनो, आजसे इस शिवलिंगमें मेरा नित्य निवास होगा। यह संगमपर प्रकट हुआ है, इसलिये इसका नाम संगमेश्वर होगा। इस लोकप्रसिद्ध संगममें स्नान करके जो मनुष्य संगमेश्वरका दर्शन करेगा, वह उत्तम गतिको प्राप्त होगा।'

इस आकाशवाणीको सुनकर महर्षि उद्दालक दिन-रात आलस्य छोड़कर संगमेश्वरकी आराधना करने लगे। तदनन्तर देहत्यागके पश्चात् वे मेरे महेश्वरधामको चले गये।

संगमेश्वरसे पश्चिम त्रिभुवनविख्यात गंगेश्वर लिंग है। भगवान् श्रीकृष्णने परम धाम पधारते समय स्नान करनेके लिये वहाँ गंगाजीका आवाहन किया। गंगाने शिवभक्तिपरायण होकर वहाँ शिवलिंग स्थापित किया। गंगेश्वरका दर्शन करनेसे गंगास्नानका फल होता है।

o

नन्दादित्य, पर्णादित्य, गंगेश्वर, सूर्यप्राची, त्रिलोचनलिंग, देविका, उमापतीश्वर, भूधरवराह तथा मूलस्थानगत सूर्यकी महिमा, वाल्मीकिजीकी पूर्वकथा

महादेवजी कहते हैं—तदनन्तर एकाग्रचित्त होकर नन्दादित्यका दर्शन करनेके लिये जाय। पूर्वकालमें नन्द नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो चुके हैं, जो सब लोगोंको सुख देनेवाले थे। उन धर्मज्ञ नरेशके शासनकालमें दुर्भिक्ष, रोग, व्याधि, अकालमृत्यु तथा अनावृष्टिका भय किसीको नहीं था। कुछ कालके अनन्तर पूर्वकर्मोंके फलसे राजाका शरीर बड़े भारी कुष्ठरोगसे व्याप्त हो गया। इससे उन्हें बड़ा वैराग्य हुआ और उन्होंने प्रभासमें नदीके तटपर देवाधिदेव भगवान् सूर्यकी स्थापना की। इससे वे रोगसे मुक्त हो गये। वहाँ स्नान और श्राद्ध-तर्पण करके नन्दादित्यका दर्शन