संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
* प्रभासखण्ड * । १३०३
करनेवाला मनुष्य फिर मर्त्यलोकमें जन्म नहीं लेता—मुक्त हो जाता है।
पार्वती! प्राची सरस्वतीके तटपर भगवान् पर्णादित्यका स्थान है। प्राचीन कालके त्रेतायुगकी बात है, पर्णाद नामके एक ब्राह्मणने प्रभासक्षेत्रमें आकर बड़ी कठोर तपस्या की। उन्होंने अत्यन्त भक्तिभावसे भगवान् सूर्यका आराधन तथा वेदोक्त स्तुतियोंद्वारा स्तवन किया। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने कहा—'सुव्रत ! मैं इस तपस्यासे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।'
ब्राह्मणने कहा—भगवन् ! आप प्रसन्न हो गये, यही मेरे लिये सबसे बड़ा वर और अभीष्ट मनोरथ है। देवेश्वर ! आपका दर्शन तो स्वप्नमें भी दुर्लभ है; तथापि यदि मुझे वर देना ही है तो मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप सदा इस स्थानपर निवास करें।
'एवमस्तु' कहकर भगवान् सूर्य अन्तर्धान हो गये। पर्णादके द्वारा स्थापित होनेके कारण वे पर्णादित्य कहलाये। पर्णाद जीवनभर उनकी आराधनामें लगे रहे। अन्तमें उन्हें सूर्यलोककी प्राप्ति हुई। जो भाद्रपदमासकी षष्ठीको वहाँ स्नान और पर्णादित्यका दर्शन करता है, वह कभी कोई कष्ट नहीं पाता।
गंगापथ नामक स्थानमें महान् स्रोतवाली गंगाजी और गंगेश्वर शिव हैं। जो वहाँ स्नान करके गंगेश्वरकी पूजा करता है, वह भयंकर पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य वैशाखकी पूर्णिमाको सरस्वती नदीमें स्नान करके वहीं चमसोद्भेद तीर्थमें पिण्डदान देता है, उसे गयासे कोटिगुना पुण्य प्राप्त होता है।
तदनन्तर सब पापोंका नाश करनेवाली तथा सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली सूर्यप्राचीकी यात्रा करे। वहाँ स्नान करके मनुष्य पाँच महापातकोंसे मुक्त हो जाता है।
ऋषितीर्थके समीप न्यंकुमती नदीके उत्तर तटपर ऋषियोंद्वारा पूजित त्रिलोचन लिंग है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। जो भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशीको वहाँ उपवास, रातमें जागरण तथा प्रातःकाल श्राद्ध एवं विधिवत् शिवकी पूजा करता है, वह शिवलोकमें निवास करता है।
ऋषितीर्थके समीप देविका नामक उत्तम क्षेत्र है, जो इच्छानुसार फल देनेवाला है। वहीं ऋषियों और सिद्धोंसे घिरा हुआ महासिद्ध वन है, जो भाँति-भाँतिके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त तथा पर्वतोंसे सुशोभित है।
देविकाके उत्तर तटपर मैं उमापतीश्वर नामसे निवास करता हूँ। वह क्षेत्र मुझे बहुत प्रिय है। पार्वती! वहाँ मेरा विग्रह उमा नामके तुम्हारे विग्रहसे संयुक्त है; इसलिये उमापति नामसे मेरी प्रसिद्धि हुई है। जो पौषमासकी अमावास्याको वहाँ श्राद्ध करता है, उसका वह श्राद्ध अक्षय होता है। बुद्धिमान् मनुष्य वहाँ गौ, भूमि, सुवर्ण तथा वस्त्रका दान करे। सब देवताओंने उस श्रेष्ठ नदीका आवाहन किया है, इस कारण वह पापनाशिनी देविका कही गयी है।
वहीं भगवान् भूधर (वाराह)-का दर्शन करना चाहिये। चारों वेद ही उनके चारों पैर हैं। यूप उनकी दाढ़ हैं। क्रतु उनके दाँत हैं। स्रुवा मुख है। अग्नि जिह्वा है। कुश रोम हैं। ब्रह्म मस्तक हैं। दिन और रात उनके नेत्र हैं। वेदांग कानोंके आभूषण हैं। इस प्रकार यज्ञमय वाराह भगवान् उस स्थानपर स्थित हैं। आश्विनमासकी अमावास्या तथा एकादशीको जब सूर्य कन्याराशिपर स्थित हों, गुड़युक्त पायस एवं गुड़युक्त हविष्य लेकर 'नमो वः पितरो रसाय' इत्यादि मन्त्रसे उसको तथा अन्य भोजन-सामग्रीको अभिमन्त्रित करे। 'तेजोऽसि शुक्रम्' इत्यादि मन्त्रसे घी और 'दधि क्राव्णो' इत्यादि मन्त्रसे दही अभिमन्त्रित करे। 'आप्यायस्व' इत्यादि मन्त्रके द्वारा दूध अभिमन्त्रित करके जितने व्यंजन और भक्ष्य-भोज्य पदार्थ हैं, उन सबको 'महान् इन्द्रेण' इत्यादि मन्त्रके द्वारा अर्पण करे। 'संवत्सर' इत्यादि मन्त्रके द्वारा जल अर्पण करे। इस प्रकार ब्राह्मण-भोजन कराकर वहाँ पिण्डदान देना चाहिये।
प्राचीन कालमें शमीमुख नामक एक ब्राह्मण
| १३०४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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था। उसके विशाख नामका एक पुत्र हुआ, जो बड़े भयंकर कर्म करनेवाला था। उसने एकमात्र माता-पिताकी सेवाको छोड़कर और कोई सत्कर्म कभी नहीं किया था। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् उसके माता-पिता बहुत वृद्ध हो गये और मृत्युके निकट पहुँचे। वे रोग आदिसे अत्यन्त व्याकुल थे। विशाख प्रतिदिन जंगलमें जाता और अपनी शक्तिका प्रयोग करके दूसरोंका धन लूट लाता। उसी धनसे वह अपने माता-पिता और पत्नीका पोषण करता था। एक समय उसी मार्गसे तीर्थयात्रापरायण सप्तर्षि जा रहे थे। उन्हें देखकर विशाखने डंडा उठाया और कठोर वचनोंद्वारा उन्हें घुड़कते हुए कहा—'ठहरो, ठहरो।' वे मुनि परम शान्त थे। ढेला, पत्थर और स्वर्णको समान समझते थे। शत्रु तथा मित्रके प्रति भी उनके मनमें समान भाव था और राग-द्वेषसे वे सर्वथा शून्य थे। उन्होंने आपसमें कहा—'हमलोगोंके साथ जो इसका दर्शन और सम्भाषण हुआ है, वह व्यर्थ न जाय—इसलिये इससे वार्तालाप करना चाहिये।'
ऐसा निश्चय करके अंगिराने कहा—तस्कर ! थोड़ी देरतक सावधान होकर मेरी बात सुनो। मैं तुम्हारे हितके लिये ही सच्ची बात कह रहा हूँ। पहले यह बताओ कि तुम्हारे घरमें किस गोत्रके कौन-कौन लोग रहते हैं ?
तस्कर बोला—मुने ! मेरे घरमें बूढ़े माता-पिता और मेरी सन्तानहीन पत्नी है और एक मैं हूँ। पाँचवाँ कोई नहीं है।
अंगिराने कहा—तुम पापसे जो धन कमाते हो, उससे उन सबकी पुष्टि हो रही है। अतः घर जाकर उन सबसे पूछो कि 'मैं पाप करता हूँ और सब लोग उस पापकी कमाई खाते हैं; अतः वह पाप किसको लगेगा ? और मेरा पाप कैसे शीघ्र छूटेगा ?'
मुनिके यों कहनेपर विशाख तुरंत अपने घर चला गया और मुनिकी कही हुई बातें अपने माता-पितासे उसने पूछीं। उसकी बात सुनकर माता-पिता बोले—'बेटा ! एक मनुष्य पाप करता है और उस पापकी कमाईको बहुत-से लोग भोगते हैं। भोगनेवाले तो छूट जाते हैं और कर्ता उस पापदोषसे लिप्त होता है। जो मन्दबुद्धि मानव कुटुम्बके लिये अशुभ कर्म करता है, उस पापीको निश्चय ही अपना आत्मा प्रिय नहीं है।'
माता-पिताकी बात सुनकर उसे मन-ही-मन कुछ भय हुआ और उसने निकट जाकर पिता-मातासे कहा—'मैं आपलोगोंके लिये ही पाप करता हूँ, अतः आप उसके किसी अंशका भोग करेंगे या नहीं ?'
पिता-माता बोले—बेटा ! जब हम पहली अवस्थामें थे, तब तुम हमारे द्वारा पालन करने योग्य थे और अब इस वृद्धावस्थामें तुमको ही हमारा पालन करना चाहिये। ब्रह्माजीने यही पिता-पुत्रका पारस्परिक धर्म बतलाया है। हमने तुम्हारे लिये जो शुभाशुभ कर्म किया है, उसको हम भोगेंगे और अब तुम जो शुभ या अशुभ कर्म करते हो, उसका भोग तुम्हींको करना पड़ेगा। अतः विद्वान् पुरुषको सदा शुभ कर्म ही करने चाहिये। चोरी, खेती, ब्याज, व्यापार अथवा नौकरी—कुछ भी करके तुम हमें प्रतिदिन भोजन देते हो। उसका दोष हमको नहीं लगता।
माता-पिताकी बात सुनकर विशाखाने पत्नीसे भी वही बात पूछी। उसने भी वही उत्तर दिया, जो माता-पिताने दिया था। इससे विशाखको बड़ा वैराग्य प्राप्त हुआ। वह बार-बार अपनी निन्दा करता हुआ बहुत दुःखी हुआ और बोला—'मुझ पापकर्मपरायण दुष्कर्मीको धिक्कार है। जो विवेकसे शून्य और सत्संगसे रहित है, जो विद्वान् पुरुषोंकी सेवा नहीं करता, वही पाप करता है। उस पापीको अपना आत्मा प्रिय नहीं है।'
इस प्रकार सोच-विचार करता हुआ वह ऋषिके समीप आया और मधुर वाणीमें आदरपूर्वक कहा—'मुने ! अब आप पधारिये। यह अपना कुशासन और कमण्डलु लीजिये। ये हैं आपके वल्कल, चीर और मृगचर्म। ये सब लेकर मेरा अपराध क्षमा कीजिये। मैं दीन हूँ, कृपण हूँ तथा सत्संगसे वंचित एवं मूर्ख हूँ। मुझे क्षमा कीजिये।
- प्रभासखण्ड * १३०५
आजसे मैं इस साधुनिन्दित, क्रूर एवं भयंकर कर्मसे निवृत्त हो गया। अब मुझे इस पापकर्मका कोई प्रायश्चित्त बताइये, जिससे आपकी कृपासे मैं पापसे मुक्त होऊँ।'
ऋषियोंने कहा—वत्स ! तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है। एकाग्रचित्त होकर सुनो। मैं तुम्हें गोपनीय बात बतलाऊँगा, उसे किसीके सामने कहना नहीं चाहिये। उसके जपसे तुम अवश्य पापमुक्त हो जाओगे। यह चार अक्षरवाला मन्त्र तुम उच्च स्वरसे जपते रहो, यह मनुष्योंके सब पापोंको हरनेवाला तथा स्वर्ग और मोक्ष देनेवाला है।
उनके यों कहनेपर विशाख प्रतिदिन उस मन्त्रका जप करने लगा और वे मुनि वहाँसे चले गये। विशाख गुरुभक्त था। देविकाके उत्तम तटपर उस मन्त्रका जप करते हुए उसे समाधि लग गयी। उसकी भूख-प्यास नष्ट हो गयी और शरीर शुद्ध हो गया। मन्त्र, तीर्थ, द्विज, देवता, दैवज्ञ, दवा और गुरु—इनमें जैसी जिसकी भावना होती है, उसको वैसी सिद्धि प्राप्त होती है। यह जीवात्मा स्वभावसे ही निर्मल परमात्माका स्वरूप है, उपाधिके संगसे विकारको प्राप्त होता है—जैसे स्फटिकमणि स्वरूपतः स्वच्छ है किंतु उपाधिवश उसमें भी भिन्न रंगोंकी प्रतीति होती है—जिस प्रकार भ्रमरी स्वयं तो वन्ध्या होती है, परंतु कहींसे छोटा-सा जीव-जन्तु पाकर उसे अपने स्थानपर ले आती है और ध्यानमग्न होकर अपने शिशुरूपसे उसका चिन्तन करती है, जिसके कारण उसीका ध्यान करके बढ़नेवाला वह जीव भी वैसा ही हो जाता है। यद्यपि वह जीव दूसरी योनिमें उत्पन्न हुआ रहता है, तथापि भ्रमरीके चिन्तनसे भ्रमररूप हो जाता है। यही सत्पुरुषोंके लिये दृष्टान्त है। जो गुरुसे उपदेश पाकर उसमें संदेह करता है, वह सिद्धिको नहीं पाता, जैसे भाग्यहीन पुरुषको निधि नहीं मिलती।
इस प्रकार मन्त्रजपमें संलग्न हो अमरत्वको प्राप्त हुए विशाख मुनिके सहस्रों वर्ष बीत गये। कुछ कालके पश्चात् वे बाँबीकी मिट्टीसे घिर गये। उन्हें इस बातका कुछ भी पता नहीं था। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् वे सप्तर्षि फिरसे उधर आ निकले और उस स्थानको देखकर एक-दूसरेसे कहने लगे—'यहीं वह भयानक आकारवाला तस्कर विशाख हमें मिला था, जिसने यहाँ आते ही हमारा सब कुछ लूट लिया था।' इस प्रकार वार्तालाप करते हुए महर्षियोंने बाँबीके भीतरसे आती हुई मन्त्रोच्चारणकी उत्तम ध्वनि सुनी। तब कौतूहलवश उन्होंने खनतीसे उस पर्वताकार वल्मीकको खोदा। उसके भीतर उसी चतुरक्षर मन्त्रका जप करता हुआ विशाख उन्हें दिखायी दिया। उसे समाधिमें स्थित जान योगसम्मत ओषधियोंको लेकर उन्होंने उसके सुप्त शरीरमें मर्दन किया। तब वह सजग होकर बोला—'महर्षियो ! अपना-अपना धन ले लीजिये, मुझ पापीने अज्ञानवश इसे छीन लिया था। अब आप यह सब लेकर तीर्थयात्राको जाइये, मैंने आपको मुक्त कर दिया। मेरे माता-पिता और पत्नीसे जाकर कह दीजिये कि विशाख सब प्रकारकी आसक्तियोंसे रहित हो गया। अब वह पहलेकी तरह आपलोगोंसे मिलना नहीं चाहता।'
सप्तर्षि बोले—मुने ! तुम्हें यहाँ रहते हुए बहुत वर्ष बीत गये। तुम्हारे माता-पिता, पत्नी तथा अन्य जो कुटुम्बी लोग थे, उन सबकी मृत्यु हो चुकी है। हमलोग दीर्घकालके पश्चात् इस स्थानपर आये हैं। अब तुम इस मन्त्र-जपके प्रभावसे सिद्ध हो गये हो। तुम एकाग्रतापूर्वक मन्त्रका चिन्तन करते हुए वल्मीकमें स्थित रहे हो। अतः इस भूतलपर 'वाल्मीकि' नामसे प्रसिद्ध होओगे। तुम्हारी जिह्वाके अग्रभागपर सरस्वती देवी स्वच्छन्द निवास करेंगी और तुम रामायण काव्यका निर्माण करके मोक्ष प्राप्त करोगे।
विशाख बोला—विप्रवरो ! आप प्रसन्न होकर गुरु दक्षिणा स्वीकार करें, जिससे मैं उऋण होकर महान् तपमें संलग्न होऊँ।
१३०६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
ऋषि बोले— ब्रह्मन्! तुम सिद्ध हो गये। यही हमारे लिये गुरुदक्षिणा है। तुम पुनः कोई मनोवांछित वर माँग लो।
वाल्मीकिजी बोले— यदि आपलोग मेरे ऊपर प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो बताइये, यहाँ देविका नदीके सुरम्य तटपर कौन-से देवता स्थित हैं, जो समस्त कामनाओं और फलोंके देनेवाले हैं?
ऋषि बोले— ब्रह्मन्! यह सामने जो अनेक शाखाओंके साथ फैला हुआ वृक्ष है, इसकी ओर देखो। इसके मूलस्थानमें ब्रह्माजीके अंशसे उत्पन्न भगवान् सूर्य स्थित हैं। कल्पके प्रारम्भकालसे ही उनकी यहाँ स्थिति है। वे ही इस क्षेत्रके देवता हैं, उनकी आराधना करो। यहाँ दो कोसतकका स्थान सूर्यक्षेत्र कहा गया है। यहाँ रहनेवालोंको निश्चय ही स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है।
उनकी बात सुनकर वाल्मीकिने भगवान् सूर्यकी आराधना की। इससे सन्तुष्ट होकर भगवान् सूर्यने कहा—'वर माँगो।'
वाल्मीकि बोले— देवेश्वर! आजसे आप यहाँ सदैव निवास करें।
सूर्यने कहा— विप्रवर! मूलस्थानमें निवास करनेवाला मैं आज तुमपर सन्तुष्ट हुआ हूँ, अतः यह क्षेत्र अब मूलस्थानके नामसे ही विख्यात होगा। जो लोग उत्तरायणमें यहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करेंगे, वे स्वर्गलोकमें जायँगे। विप्रवर! तिलमिश्रित जलसे यहाँ तर्पण करनेपर पितरोंको गयाश्राद्धके समान सन्तोष प्राप्त होगा। जो मानव भक्तिपूर्वक साग, मूल, फल, खली अथवा गुड़से यहाँ श्राद्ध करेंगे, वे परम मोक्षको प्राप्त होवेंगे। कीट, पतंग, पशु, पक्षी तथा मृग भी प्याससे पीड़ित हो यहाँके जलका स्पर्श करने मात्रसे परम गतिको प्राप्त होंगे। श्रावणमासकी पूर्णिमाको तुम्हारे स्नेहवश मैं यहाँ विशेषरूपसे निवास करूँगा। उस दिन जो यहाँके जलसे पितरोंका तर्पण करेगा, उसकी अठारह प्रकारकी कोढ़ तत्काल नष्ट हो जायगी। कपाल, औदुम्बर, मण्डल, विचर्चिका, ऋक्षजिह्व, कच्छु, किटिभ, सिध्म, अलस, विपादिका, दद्रु, शतारु, विस्फोटक, पुण्डरीक, काकण, पामा, चर्मदल और चर्म—ये अठारह प्रकारके कुष्ठ अवश्य दूर हो जायँगे, इसमें सन्देह नहीं है।
यों कहकर सूर्यदेव अन्तर्धान हो गये। वाल्मीकि मुनिने सूर्यदेवकी आराधना तथा रामायणकाव्यका निर्माण किया। अतः उस तीर्थमें सब यज्ञोंका फल देनेवाले सूर्यदेवका अवश्य दर्शन तथा इस सर्वपातकनाशिनी कथाका श्रवण करना चाहिये।
भगवान् सूर्यके अष्टोत्तरशतनामोंकी महिमा
महादेवजी कहते हैं— पार्वती! हिरण्याके पूर्वभागमें महर्षि च्यवनके द्वारा स्थापित परम उत्तम च्यवनादित्यका उत्तम स्थान है। मनुष्योंद्वारा विधिपूर्वक पूजित होनेपर वे समस्त अभीष्ट फलोंको देनेवाले हैं। जो मानव सप्तमी तिथिके दिन एक सौ आठ नामोंद्वारा श्रद्धापूर्वक उनकी स्तुति करता है, वह मनोवांछित फलको पाता है।
पूर्वकालमें महर्षि धौम्यने महात्मा युधिष्ठिरसे सूर्यदेवके जिन एक सौ आठ नामोंका वर्णन किया, उन्हें सुनो—सूर्य, अर्यमा, भग, त्वष्टा, पूषा, अर्क, सविता, रवि, गभस्तिमान्, अज, काल, मृत्यु, धाता, प्रभाकर, पृथ्वी, बल-तेज-आकाश-वायु-परायण, सोम, बृहस्पति, शुक्र, बुध, अंगारक, मंगल, इन्द्र, विवस्वान्, दीप्तांशु, शुचि, सौर्य, शनैश्वर, ब्रह्मा, रुद्र, विष्णु, स्कन्द, वैश्रवण, यम, वैद्युत, जाठराग्नि, ऐन्धन, तेजःपति, धर्मध्वज, वेदकर्ता, वेदांग, वेदवाहन, कृत
- प्रभासखण्ड * १३०७
(सत्ययुग), त्रेता, द्वापर, कलि, सर्वामराश्रय (अथवा संवत्सरात्मक), कला-काष्ठा-मुहूर्त-पक्ष-मास-अहः-निशा-संवत्सरकर, स्वच्छ, कालचक्र, विभावसु, पुरुष, शाश्वत, योगी, व्यक्त, अव्यक्त, सनातन, लोकाध्यक्ष, प्रजाध्यक्ष, विश्वकर्मा, तमोनुद, वरुण, सागर, अंशु, जीमूत, जीवन, अरिहा (शत्रुनाशक), भूताश्रय, भूतपति, सर्वभूतनिषेवित, स्रष्टा, संवर्तक, वह्नि, सर्वादिकर, अमल, अनन्त, कपिल, भानु, कामद, सर्वतोमुख, जय, विषाद, वरद, सर्वधातुनिषेवित, सम, सुवर्ण, भूतादि, शीघ्रग, प्राणधारक, धन्वन्तरि, धूमकेतु, आदिदेव, अदितिपुत, द्वादशात्मा, अरविन्दाक्ष, पिता, माता, पितामह, स्वर्गद्वार, प्रजाद्वार, मोक्षद्वार, त्रिविष्टप, देहकर्ता, प्रशान्तात्मा, विश्वात्मा, विश्वतोमुख, चराचरात्मा, सूक्ष्मात्मा तथा मैत्रशरीरान्वित।
ये कीर्तन करनेयोग्य अमित तेजस्वी भगवान् सूर्यके एक सौ आठ नाम महात्मा इन्द्रके द्वारा प्रकाशित हुए हैं। इन्द्रसे नारदको, नारदसे धौम्यको और धौम्यसे राजा युधिष्ठिरको इनका उपदेश प्राप्त हुआ है। राजा युधिष्ठिरने इन्हें पाकर सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लिया। जो एकाग्रचित्त होकर सूर्योदय कालमें इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह पुत्र, धन, रत्नराशि, पूर्व-जन्मकी स्मृति, स्मरण-शक्ति तथा मेधा (बुद्धि) प्राप्त कर लेता है। जो देवताओंमें श्रेष्ठ भगवान् सूर्यके इस स्तोत्रका एकाग्रचित्त होकर पाठ करता है, वह शोकरूपी दावानलसे मुक्त हो मनोवांछित फलोंको प्राप्त कर लेता हैं।
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महर्षि च्यवनकी कथा और च्यवनेश्वरकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! महर्षि भृगुके पुत्र च्यवन मुनिने प्रभासक्षेत्रमें जाकर बड़ी भारी तपस्या की। वे आसन लगाकर ठूंठकी भाँति अविचल भावसे बहुत समयतक एक ही स्थानपर बैठे रहे। वहाँ उनके शरीरपर सब ओरसे बाँबीकी मिट्टी जम गयी और उसके ऊपर लताएँ फैल गयीं। उस बाँबीमें सब ओर चींटियाँ फैल गयी थीं। इस प्रकार बाँबीसे घिरे हुए च्यवन मुनि मिट्टीकी मूर्तिकी भाँति वहाँ स्थिर होकर घोर तपस्यामें स्थित हो गये। तदनन्तर किसी समय राजा शर्याति तीर्थयात्राके प्रसंगसे श्रीसोमनाथजीका दर्शन करनेके लिये पापनाशक प्रभासक्षेत्रमें आये। राजाके सुकन्या नामकी एक कन्या थी, जो सखियोंसे घिरी हुई वहाँ वनमें घूमने लगी। घूमते-घूमते वह च्यवन मुनिकी बाँबीके समीप जा पहुँची। वहाँ उनके चमकते हुए नेत्रोंको देखकर उसने कौतूहलवश सोचा, यह क्या है? फिर उसने काँटेसे उन दोनों नेत्रोंको छेद दिया। नेत्रोंके बिंध जानेपर मुनिके कोपसे राजा शर्यातिके सैनिकोंका मल-मूत्र रुक गया। इससे सारी सेना बहुत दुःखी हुई। यह देख राजाको भी बड़ा दुःख हुआ। वे बोले—'आज किसने यहाँ महात्मा भार्गवका अपकार किया है, उसे तुमलोग शीघ्र बताओ?' सैनिकोंने उत्तर दिया, 'हमें किसी अपकार करनेवालेका पता नहीं है।' तब राजाने अपने सुहृदोंसे पूछा।
सैनिकोंको दुःखसे व्याकुल तथा पिताको चिन्तित देखकर सुकन्याने कहा—'पिताजी! मैं इस वनमें घूम रही थी। इतनेमें एक बाँबीके भीतरसे मुझे जुगनूकी भाँति चमकते हुए दो प्रकाश दिखायी पड़े। मैंने अज्ञानवश उन्हें बींध डाला।' यह सुनकर राजा शर्याति शीघ्र ही बाँबीके पास आये और उन्होंने तपोवृद्ध एवं वयोवृद्ध च्यवन मुनिका दर्शन किया। तदनन्तर वे हाथ जोड़कर सैनिकोंके कष्ट-निवारणके लिये प्रार्थना करते हुए बोले—'भगवन्! मेरी बालिकाने अज्ञानवश जो आपका अपराध किया है, उसके लिये क्षमा करें।'
| १३०८ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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इसके बाद महर्षिकी आज्ञासे शर्यातिने उन्हें अपनी कन्या ब्याह दी और स्वयं सेनाके साथ नगरको प्रस्थान किया। सुकन्या परम उत्तम तपस्वी पतिको पाकर प्रेमपूर्वक तपस्या और नियमसे रहती हुई उनकी सेवा करने लगी। मुनिके यहाँ जो अतिथि आते, उनका यथोचित सत्कार करके वह शीघ्र ही महर्षि च्यवनकी सेवामें संलग्न हो जाती थी।
कुछ कालके पश्चात् अश्विनीकुमार नामक देवता उस वनमें आये। उन्होंने सुन्दर दाँतोंवाली सुकन्याको स्नान करके जाते हुए देखा और उसके समीप जाकर कहा—'वामोरु! तुम किसकी स्त्री हो और इस वनमें किस लिये घूम रही हो?'
सुकन्याने प्रसन्न होकर कहा—आपलोग मुझे राजा शर्यातिकी पुत्री तथा महर्षि च्यवनकी पत्नी जानें।
अश्विनीकुमार बोले—तुम्हारे पिताने जान-बूझकर इन गतायु महर्षिके साथ तुम्हारा विवाह कैसे किया? च्यवनजी तुम्हारे पालन-पोषण और रक्षणमें तो सर्वथा असमर्थ हैं। अतः उन्हें छोड़कर तुम हम दोनोंमेंसे किसी एकको अपना पति बना लो।
उनके यों कहनेपर सुकन्या बोली—देवताओ! मैं अपने पतिदेव च्यवनमें पूर्णतः अनुरक्त हूँ। मेरे विषयमें आपलोग कोई ऐसी आशंका न करें।
तब अश्विनीकुमारोंने कहा—देवि! हम दोनों वैद्य हैं। तुम्हारे पतिको रूप और यौवनसे सम्पन्न कर देंगे। उसके बाद हम तीनोंमेंसे किसी एकको तुम अपना पति चुन लेना।
उन दोनोंकी यह बात सुनकर सुकन्या च्यवन मुनिके पास गयी और अश्विनीकुमारोंने जो कुछ कहा था, वह सब उसने कह सुनाया। उसकी बात सुनकर मुनिवर च्यवनने कहा—'अश्विनी-कुमारोंकी बातोंका आदर करो।' मुनिकी यह आज्ञा पाकर सुकन्या उन दिव्य रूपधारी देववैद्योंसे बोली—'आप दोनोंने मेरे पतिको तरुण बनानेके विषयमें जो कुछ कहा है, उसे शीघ्र पूरा करें।' वे बोले—'तुम्हारे पति इस तालाबमें प्रवेश करें।' तब मुनिवर च्यवनने दिव्य रूपकी अभिलाषासे शीघ्र ही उस तालाबमें प्रवेश किया, तत्पश्चात् अश्विनीकुमार भी उस जलके भीतर प्रविष्ट हुए। दो ही घड़ीमें वे तीनों उस सरोवरसे बाहर निकले। उनके रूप और वेष दिव्य थे। तीनों ही तरुण एवं दिव्य कुण्डलोंसे विभूषित थे। वे सब एकत्र होकर बोले—'शुभे! हममेंसे एकको वरण करो। सुकन्याने सबको एक समान रूपवाले देखकर अपने मन और बुद्धिसे निश्चय करके अपने पति च्यवन मुनिको पहचान लिया और एकमात्र उन्हींका वरण किया। अपनी पत्नीको पाकर तेजस्वी महर्षि च्यवन अश्विनीकुमारोंसे बोले—'आप दोनोंने कृपा करके मुझे दिव्य रूप तथा तरुण अवस्थासे संयुक्त किया और मुझे अपनी पत्नीकी प्राप्ति हुई, इसलिये मैं आप दोनोंको यज्ञभागका अधिकारी बनाऊँगा।' मुनिकी यह बात सुनकर अश्विनीकुमार प्रसन्नतापूर्वक चले गये।
तदनन्तर राजा शर्यातिने जब सुना कि महर्षि च्यवनको नयी अवस्था प्राप्त हुई है, तब वे बहुत प्रसन्न हुए और सेनाके साथ उनके आश्रमपर गये। पुत्री और जामाताको देवकुमारोंकी भाँति देखकर राजा शर्यातिके हर्षकी सीमा न रही। महर्षि च्यवनने रानीसहित महाराज शर्याति का पूर्ण सत्कार किया और समीप बैठकर वार्तालाप किया। बातचीतमें ही उन्होंने राजासे कहा—'राजन्! मैं आपसे यज्ञ कराऊँगा। आप सब सामग्री एकत्र करें।' राजा शर्याति इस प्रस्तावसे बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने शुभ मुहूर्तमें यज्ञमण्डप निर्माण कराया। उस मण्डपमें महर्षि च्यवनने राजासे यज्ञ प्रारम्भ कराया और उसमें अश्विनीकुमारोंके लिये सोमरसका भाग ग्रहण किया। इन्द्रने उन्हें ऐसा करनेसे रोका और कहा—'अश्विनीकुमार सोमरसके अधिकारी नहीं हैं, ऐसा मेरा निश्चित मत है। वे दोनों देवताओंके वैद्य हैं, अतः निन्दित माने गये हैं।'
- प्रभासखण्ड * १३०९
च्यवनने कहा—देवराज! आप अश्विनीकुमारोंको भी देवताओंकी ही कोटिमें समझें। ये दोनों महात्मा रूपसम्पदासे सम्पन्न और तेजस्वी हैं। इन्होंने इस समय मुझे अजर बनाया है।
इन्द्र बोले—ये दोनों वैद्य हैं और इच्छानुसार रूप धारण करके मर्त्यलोकमें विचरते रहते हैं; अतः देवताओंकी श्रेणीमें बैठकर सोमके अधिकारी कैसे हो सकते हैं?
इन्द्रके यों कहनेपर भी उनका अनादर करके च्यवन मुनिने अश्विनीकुमारोंके लिये भाग ग्रहण किया। यह देख इन्द्रने कहा—'यदि तुम मेरी अवहेलना करके इन वैद्योंके लिये सोमरसका भाग ग्रहण करोगे तो मैं तुम्हारे ऊपर भयंकर वज्रका प्रहार करूँगा।'
इन्द्रकी यह बात सुनकर च्यवनने एक बार उनकी ओर दृष्टिपात किया और अश्विनीकुमारोंके लिये सोमरसका भाग विधिपूर्वक निकाला। इसी समय इन्द्रने उनपर तुरंत वज्रका प्रहार किया, परंतु भृगुनन्दन च्यवनने वज्रसहित उनकी बाँह स्तम्भित कर दी। तदनन्तर मन्त्र पढ़कर अग्निमें आहुति डाली। मुनिके तपोबलसे उस समय महापराक्रमी महाकाय मद नामक महादैत्य उत्पन्न हुआ और क्रोधमें भरकर भयंकर सिंहनादसे सम्पूर्ण लोकोंको गुँजाता हुआ इन्द्रकी ओर दौड़ा।
मुँह बाये हुए कालकी भाँति उस दैत्यको आते देख इन्द्र भयसे पीड़ित हो गये और मुनिवर च्यवनको प्रणाम करके बोले—'भृगुनन्दन! आजसे ये दोनों अश्विनीकुमार सोमरसके अधिकारी होंगे। तपोधन! मुझपर आपका अकारण क्रोध न हो; जिस प्रकार आपने इन अश्विनीकुमारोंको सोमरसका अधिकारी बनाया है, उसी प्रकार मेरी रक्षाके लिये भी अपने बल-वीर्यको प्रकाशित करें। आजकी इस घटनासे सुकन्याके पिता राजा शर्यातिकी कीर्ति संसारमें अमर होगी। आप मुझपर कृपा करें।'
इन्द्रके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर मुनिवर च्यवनका क्रोध शान्त हो गया। इन्द्र उनकी आज्ञा ले शीघ्र वहाँसे चले गये। च्यवनने इन्द्रकी पूजा करके अश्विनीकुमारोंसहित सब देवताओंका पूजन किया तथा राजा शर्यातिका यज्ञ पूर्ण कराकर वे सुकन्यासहित इस वनमें विहार करने लगे। उनके द्वारा स्थापित च्यवनेश्वर लिंग महापातकोंका नाश करनेवाला है। जो विधिपूर्वक च्यवनेश्वरकी पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। यहाँ आश्विनमासकी पूर्णिमाको विधिपूर्वक श्राद्ध करे और ब्राह्मणोंको भोजन कराये। यों करनेसे कोटि तीर्थोंके सेवनका फल प्राप्त होता है।
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सुकन्यासरोवर, गोष्पदतीर्थ, गंगेश्वर, बालादित्य, पातालगंगा तथा कुबेरेश्वरकी महिमा; कुबेरके द्वारा शिवकी स्तुति
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! जहाँ च्यवन मुनिके साथ अश्विनीकुमारोंने स्नान किया था, वह जलाशय सुकन्या सरोवरके नामसे विख्यात है। जो नारी तृतीयाको उस सरोवरमें स्नान करती है, उसकी गृहस्थी सात हजार जन्मोंतक नष्ट नहीं होती और उसका पुत्र दरिद्र, अंगहीन, दीन तथा अंधा नहीं होता।
तदनन्तर न्यंकुमती नदीके तटपर जाकर परम उत्तम गोष्पदतीर्थमें गया-श्राद्ध करे। उसके बाद भगवान् वराहका दर्शन करके नारिगृहकी यात्रा करे। फिर मातृसुतकी पूजा करके सागरसंगममें स्नान करे, फिर न्यंकुमतीके तटपर जाकर मुनिवर अगस्त्यजीके क्षुधाहर नामक दिव्य आश्रमपर जाय। वह समस्त पातकोंका नाश करनेवाला है।
उसके पश्चिम भागमें उससे थोड़ी ही दूरपर गंगाजीके द्वारा स्थापित गंगेश्वर लिंग है। अगस्त्यजीके
१३१० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
आश्रममें गंगेश्वरका दर्शन करके स्नान, दान और जप आदि करनेसे मनुष्य सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है।
उस आश्रमसे थोड़ी दूर उत्तर दिशामें सूर्यदेवने बाल्यावस्थामें तपस्या की है। इससे उनका नाम बालादित्य हुआ। रविवारको उनका दर्शन करनेसे मनुष्य कोढ़ी नहीं होता और बालकोंको रोग-व्याधि नहीं सताते।
वहाँसे दक्षिणमें दो कोसकी दूरीपर सब पातकोंका नाश करनेवाली पातालगामिनी गंगा हैं, जिन्हें विश्वामित्रजीने स्नान करनेके लिये बुलाया था। उसमें स्नान करके मनुष्य सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। वहाँ गंगेश्वर, विश्वामित्रेश्वर तथा बालेश्वरका दर्शन करनेसे मनुष्यको सम्पूर्ण अभीष्ट फलोंकी प्राप्ति होती है।
शास्त्रज्ञान और शीलसे सम्पन्न धर्मात्मा कुबेरने न्यंकुमतीके पूर्व-तटपर एक शिवलिंग स्थापित किया, जो कुबेरेश्वरके नामसे विख्यात है। वहाँसे पश्चिम न्यंकुमतीके तटपर जो सोमनाथ महादेव हैं, उनकी पूजा करके कुबेरजीने इस प्रकार मेरा स्तवन किया—'जो यज्ञका मूल, तुम्बीके ऊँचे फलके समान आकृतिवाली तथा सौ कोटि ब्रह्माण्डोंमें स्थित है, ब्रह्माण्डवर्ती देवसमूह भी जिसका परिमाण नहीं जानते, महेश्वरकी वह कोई महामहिम लिंगमूर्ति सदा हमारी रक्षा करे। जो अजन्मा, पुराण, उपेन्द्र (विष्णु) के भी वन्दनीय तथा बड़े-बड़े राजाओंसे सेवित हैं, चन्द्रमा, सूर्य और अग्निके समान जिनके नेत्र हैं, जो अपनी ध्वजामें वृषभेन्द्र नन्दीका चिह्न धारण करनेवाले तथा प्रलय आदिके हेतु हैं, उन महादेवजीको मैं प्रणाम करता हूँ। जो सबके एकमात्र ईश्वर, देवताओंके एक ही बन्धु, योगसे प्राप्त होनेवाले, सम्पूर्ण विश्वके निवासस्थान, विस्मयके आधार, अनन्त शक्तिसम्पन्न, ज्ञानजनक तथा धैर्य आदि गुणोंके कारण सर्वोत्कृष्ट हैं अथवा जिनमें धैर्य आदि गुणोंकी अधिकता है, उन भगवान् शिवको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनके हाथोंमें पिनाक, पाश, अंकुश और त्रिशूल शोभा पाते हैं, जो मस्तकपर जटाजूट धारण करते हैं, जिनके शब्दोच्चारणकी ध्वनि मेघके समान गम्भीर है, जिनके सम्पूर्ण अंगोंकी कान्ति स्फटिक मणिके समान उज्ज्वल तथा कण्ठमें नीला चिह्न है, जो सहस्रों मूर्ति धारण करनेवाले विशिष्ट पुरुष हैं, उन भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन्हें संत पुरुष अक्षर, निर्गुण, अप्रमेय, ज्योतिर्मय, एक, दूरंगम (दूर गमन करनेवाले), जानने योग्य, अनिन्द्य, सबके हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान तथा परम पवित्र बतलाते हैं, उन भगवान् शंकरको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनका स्वरूप तेज-पुंजके समान है, जिनके मस्तकपर बालचन्द्रमा शोभा पाते हैं, जिनका भयानक मुख स्फुरित होता रहता है, जो कालके भी काल, मनोवांछित फलोंके दाता, आसक्तिरहित, धर्मासनपर स्थित तथा परा और अपरा दोनों प्रकृतियोंमें विराजमान हैं, उन भगवान् रुद्रदेवको मैं प्रणाम करता हूँ। जो इन्द्रियातीत, विश्वपालक, शत्रुविजयी, तीनों गुणोंसे परे, अजन्मा, निरीह, तपोमय, वेदमय, प्रजापालक तथा अनेक नामोंवाले इन्द्ररूप हैं, उन्हीं आप महेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो भूत और भविष्यके ज्ञाता महेश्वर हैं, योगवेत्ता मुनीश्वर सदा जिनका ध्यान करते रहते हैं, जो संसारबन्धनके काटनेवाले तथा नित्य मुक्तस्वरूप हैं, उन महादेवजीको मैं बारम्बार नमस्कार करता हूँ। जिन परम पुरुष परमात्माके अनुपम मुख, बल, प्रभाव और स्वभाव आदिका ज्ञान देवताओंको भी नहीं होता, उन अचिन्तनीय महिमावाले भगवान् वामदेवको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन उग्रमूर्ति भगवान् शिवकी आराधना करके अगस्त्यजीने समुद्रको पी लिया तथा राजा दिलीपने सम्पूर्ण मनोरथ प्राप्त कर लिये, उन विश्वयोनि भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। देवेन्द्रवन्द्य शम्भो! मुझ अनाथका उद्धार कीजिये। आप कृपालु एवं करुणामय हैं। उमेश! दुःखसागरमें डूबे हुए मुझ
- प्रभासखण्ड * | १३११ ---|---
दीनका उद्धार कीजिये। भव! आप सबका कल्याण करनेवाले हैं। मेरा भी कल्याण कीजिये। जिनकी पूजा करके ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवता स्वर्गमें इच्छानुसार विहार करते हैं, उन वन्दनीय शिवकी शरणमें आकर मैं उन्हींकी स्तुति, उन्हींका गुणगान, उन्हींके नामका जप और उन्हींकी वन्दना करता हूँ।'
इस प्रकार स्तुति करके जब कुबेरजी चुप हुए, तब भगवान् शिवने उन्हें अपने मित्रका पद, दिक्पालका पद और देवताओंके धनाध्यक्षका पद—ये तीन वर प्रदान किये और कहा—'यह स्थान तुम्हारे ही नामपर कुबेरनगर कहलायेगा। तुमने इस स्थानसे पश्चिममें जो शिवलिंग स्थापित किया है, उसका जो पुरुष श्रीपंचमीके दिन विधिपूर्वक पूजन करेगा, उसके यहाँ सात पीढ़ियोंतक लक्ष्मी बराबर बनी रहेगी।'
भद्रकाली, कुबेर, ऋषितोया नदी, शृगालेश्वर तथा गुप्त प्रयागका माहात्म्य
**महादेवजी कहते हैं—**पार्वती! कुबेरस्थानसे उत्तर भागमें मनोवांछित वस्तुओंको देनेवाली महादेवी भद्रकालीका स्थान है। जो चैत्रमासकी तृतीयाको उनकी पूजा करता है, उसे सौभाग्य, विजय और लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है।
कुबेरस्थानसे नैर्ऋत्य भागमें साक्षात् कुबेरजी विराजमान हैं। जो पंचमी तिथिको भक्तिभावसे गन्ध, पुष्प तथा चन्दन आदिके द्वारा उनकी पूजा करता है, उसे विघ्नरहित अनुपम निधिकी प्राप्ति होती है। वहाँ कुण्डमें स्नान करनेसे ब्रह्महत्या-जैसे पापोंका नाश हो जाता है। उसके पूर्वभागमें बालार्केश्वर लिंग तथा उत्तर भागमें गयाक्षेत्रसहित अम्बिका स्थान है। उन दोनोंके दर्शनसे मनुष्य वाजपेय यज्ञका फल पाता और समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। कुबेरस्थानसे दस कोसकी दूरीपर पुष्कर नामका तीर्थ है। उससे अग्निकोणमें चौदह कोस दूर देवकुल नामक स्थान है, जहाँ देवताओंका समागम हुआ है, उसके पश्चिम भागमें ऋषितोया नदी है, जो समस्त पातकोंका नाश करनेवाली तथा ऋषियोंको प्रिय है। जो मनुष्य उसमें विधिवत् स्नान करके पितरोंका तर्पण करता है, वह सत्तर हजार वर्षोंतकके लिये पितरोंको तृप्त कर देता है; इतना ही नहीं, उसे सात जन्मोंके पापोंसे छुटकारा मिल जाता है।
परमपवित्र देवदारु-वनमें सहस्रों ऋषि निवास करते थे। वे सभी प्रतिदिन बावली, कुआँ और तड़ाग आदिमें स्नान करते थे। वहाँ रहते उन्हें बहुत वर्ष व्यतीत हो गये। उनके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या बढ़ गयी और वे दारुकवनमें सब ओर फैलकर रहने लगे। एक दिन उन सबने एकत्र होकर परस्पर विचार किया कि 'हमलोग ब्रह्मलोकमें चलकर ब्रह्माजीकी प्रार्थना करें, जिससे यहाँ कोई नदी प्रकट हो।' ऐसा निश्चय करके वे तपोधन मुनि ब्रह्मलोकमें गये और वहाँ ब्रह्माजीकी अनेक प्रकारसे स्तुति करने लगे।
**ऋषि बोले—**ॐकारस्वरूप आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करनेवाले आपको बार-बार नमस्कार है। समस्त संसारकी रक्षा करनेवाले आप परमात्माको नमस्कार है और जगत्का संहार करनेवाले तथा ब्रह्मरूपधारी आपको नमस्कार है। पितामह! आपको नमस्कार है। सुरज्येष्ठ! आपको नमस्कार है।
उन ऋषियोंके इस प्रकार स्तवन करनेपर लोकपितामह ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए और बोले—'विप्रवरो! तुम्हारा स्वागत है। मैं इस दिव्य स्तोत्रसे बहुत संतुष्ट हूँ। तुम कोई उत्तम वर माँगो।'
**ऋषियोंने कहा—**सुरश्रेष्ठ! आप हमें स्नान
१३१२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
| करनेके लिये कोई पापनाशिनी नदी प्रदान कीजिये।<br><br>उनके यों कहनेपर ब्रह्माजीने वहाँ मूर्तिमती नदियोंकी ओर दृष्टिपात किया। उन्हें देखकर फिर कमण्डलुकी ओर दृष्टि डाली। तब वे सभी नदियाँ उनके कमण्डलुमें प्रवेश कर गयीं।<br><br>ब्रह्माजी बोले—महर्षियो! ये सब महापुण्यमयी नदियाँ कृपापूर्वक भूलोकमें जानेके लिये इस कमण्डलुमें प्रविष्ट हुई हैं। यदि इनमेंसे किसी एकको भेजूँ तो औरोंके मनमें क्रोध होगा; अतः इस कमण्डलुमें स्थित सभी नदियोंको मैं देवदारु-वनमें जानेके लिये छोड़ता हूँ।<br><br>यों कहकर ब्रह्माजीने उन सबको छोड़ दिया और कहा—'मैंने ऋषियोंकी प्रार्थनासे तोयरूपा इन नदियोंको स्नानके लिये दिया है, इसलिये इनसे प्रकट होनेवाली नदी ऋषितोया नामसे प्रसिद्ध होगी। इस प्रकार देवदारु-वनमें ऋषितोया नदीका आगमन हुआ है। पूर्ववाहिनी ऋषितोया नदी जहाँ समुद्रमें मिली हैं, वहाँ जो मनुष्य स्नान और जलपान करते हैं, वे धन्य हैं। वहाँ प्रातःकाल गंगा, पूर्वाह्न कालमें यमुना, मध्याह्नकालमें सहस्रों नदियोंके साथ सरस्वती, अपराह्नकालमें नर्मदा तथा सायाह्नकालमें सूर्यपुत्री तपती नदी बहती है। यों जानकर जो विद्वान् उसमें स्नान और विधिवत् श्राद्ध करता है, वह उसके फलका भागी होता है।<br><br>ऋषितोयाके पश्चिम दो कोस दूर शृगालेश्वर लिंग है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है। वहाँ गुप्त प्रयाग, माधवदेव तथा गंगा, यमुना और सरस्वती हैं। वहाँ स्नान, जलस्पर्श तथा पूजन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त | हो जाता है। वहाँ ब्रह्मकुण्ड, विष्णुकुण्ड तथा रुद्रकुण्ड हैं। इनके अतिरिक्त चौथा त्रिसंगम तीर्थ भी है, जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती तीनोंका संगम हुआ है। ब्रह्मकुण्डमें एक करोड़, वैष्णवकुण्डमें भी एक करोड़ और रुद्रकुण्डमें डेढ़ करोड़ तीर्थ हैं। पश्चिममें ब्रह्मकुण्ड, पूर्वमें वैष्णवकुण्ड और मध्यभागमें रुद्रकुण्ड है। जहाँ कुण्डके मध्यभागसे गंगाजी निकलकर सूर्यपुत्री यमुनासे मिली हैं, वहाँ संगम कहलाता है। इन दोनोंके सूक्ष्म अन्तरमें गुप्त सरस्वतीकी स्थिति मानी गयी है। इनके पास ही तीर्थराज प्रयाग है। जो मनुष्य माघमासमें सूर्यके मकरराशिपर स्थित रहते समय प्रातःकाल सूर्योदयकालमें यहाँ आकर स्नान करता है, वह एक स्नानसे मानसिक, द्वितीय स्नानसे वाचिक और तृतीय स्नानसे शारीरिक पापको नष्ट कर देता है। चौथे स्नानसे सांसर्गिक पाप, पाँचवें स्नानसे गुप्त पाप और छठे स्नानसे उपपातकोंका नाश करता है। इन कुण्डोंमें सात बारके स्नानसे मनुष्य अपने महापातकोंका भी नाश कर देता है। जो पूरे एक मासतक गुप्त प्रयागमें स्नान करता है, उसके फलको ब्रह्मा आदि देवता कोटि कल्पोंमें भी नहीं बता सकते। प्रभासमें जो कोई भी तीर्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा अत्यन्त प्रिय तथा सब पातकोंका नाश करनेवाला यही तीर्थ है। मैंने इस तीर्थकी रक्षाके लिये मातृकाओंको नियुक्त किया है। भाँति-भाँतिके नैवेद्योंसे यत्नपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये। जो कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको श्रद्धा-भक्तिके साथ वहाँ पितरोंका श्राद्ध करता है, वह पितृवर्ग और मातृवर्ग दोनोंका उद्धार कर देता है। |
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- प्रभासखण्ड * १३१३
माधव, शृगालेश्वर, त्रिपथगा, गोपालस्वामी, उत्तरार्क, मरुद्देवी आदि विविध तीर्थ और देवविग्रहोंके सेवनकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! उसके दक्षिण भागमें थोड़ी ही दूरपर शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् माधव विराजमान हैं। जो शुक्लपक्षकी एकादशीको स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनकर गन्ध, पुष्प और अनुलेपनके द्वारा भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। जो विष्णुकुण्डमें स्नान करके माधवकी पूजा करता है, वह श्रीहरिके परमधाममें जाता है।
वहाँसे उत्तर दिशामें कुछ वायव्यकोणकी ओर शृगालेश्वर लिंग है। महातेजस्वी इन्द्र, वरुण, कुबेर, यमराज, अग्नि, आदित्य, वसु तथा समस्त लोकपालोंने उस महालिंगकी आराधना की है। जो शृगालेश्वरका पूजन करेंगे, उनके कुलमें कोई निर्धन नहीं होगा। जो मनुष्य अमावास्या तिथिको यहाँ आकर स्नान करके क्रोधरहित हो विधिपूर्वक पितरोंका श्राद्ध करता है, उसके पितर प्रलयकालतक तृप्त रहते हैं। इस क्षेत्रका विस्तार एक मीलतक है। उसमें जो मृत्युको प्राप्त होते हैं, उन्हें उत्तम गतिकी प्राप्ति होती है। जो अनशन-व्रत ग्रहण करके इस तीर्थमें प्राणोंका त्याग करते हैं, वे परमेश्वरमें लीन हो जाते हैं।
शृगालेश्वरसे ईशानकोणमें सात धनुषकी दूरीपर त्रिपथगा गंगा हैं। उसके जलमें उत्पन्न होनेवाली मछलियाँ इस कलियुगमें भी तीन नेत्रोंवाली देखी जाती हैं। वहाँ स्नान करके मनुष्य पाँच महापातकोंसे मुक्त हो जाता है।
चण्डीशसे पूर्व भागमें बीस धनुषपर गोपाल-स्वामीका स्थान है; जो माघमासमें गोपालस्वामी श्रीहरिका दर्शन, पूजन तथा वहाँ रात्रिमें जागरण करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। वहाँसे उत्तर दिशामें आठ धनुषपर वकुलस्वामी सूर्यदेवका स्थान है। जो मनुष्य रविवारयुक्त सप्तमीमें वहाँ जागरण करता है, वह सभी अभीष्ट वस्तुओंको पाता और स्वर्गलोकमें पूजित होता है।
वहाँसे वायव्यकोणमें सोलह धनुषपर उत्तरार्क नामसे प्रसिद्ध भगवान् सूर्य विराजमान हैं। वहाँ रथसप्तमीको उपवास करके मनुष्य सब रोगोंसे मुक्त हो जाता है। वहीं देवकुलसे आग्नेयकोणमें दो कोस दूर समुद्रके सुरम्य तटपर परम उत्तम ऋषितीर्थ है। वहाँ पत्थरकी आकृतिवाले ऋषिलोग आज भी देखे जाते हैं, जो सब पातकोंका नाश करनेवाले हैं।
वहाँसे पश्चिम दिशामें आधे कोसपर मरुद्देवी हैं, जो मरुद्गणोंके द्वारा पूजित तथा समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली हैं। मनुष्यको चाहिये कि समस्त कामनाओंकी सिद्धिके लिये महानवमी और सप्तमी तिथिको गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंद्वारा यत्नपूर्वक उनकी पूजा करे।
देवकुलसे पूर्वमें दस कोसपर शबरस्थानमें क्षेमादित्य नामसे प्रसिद्ध सूर्यदेवका स्थान है। उनका दर्शन करके मनुष्य क्षेम तथा अर्थसिद्धिका भागी होता है। रविवारयुक्त सप्तमीको पूजित होनेपर वे समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देते हैं।
देवकुण्डसे उत्तर और भास्करसे दक्षिण कण्टकशोधिनी देवीका स्थान है। जो मनुष्य अष्टमी तथा नवमीके दिन उनकी पूजा करता है, उसको राक्षसों और पिशाचोंसे भय नहीं होता और वह उत्तम सिद्धिको पाता है।
उससे पूर्वदिशामें थोड़ी ही दूरपर ब्राह्मणोंद्वारा स्थापित ब्रह्मेश्वर लिंग है। जो ऋषितोयाके जलमें स्नान करके उसका पूजन करता है, वह ब्राह्मण जडतासे रहित एवं वेदज्ञ होता है। भगवती चण्डीके गणोंद्वारा वह स्थान सुरक्षित है। मैंने सीमासहित वह स्थान ब्राह्मणोंको दे दिया है।
१३१४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
स्थलकेश्वरसे पूर्व दिशामें कुछ आग्नेयकोणकी ओर विश्वकर्माद्वारा स्थापित दो महापुण्यमय लिंग हैं। विश्वकर्मा जब नगरका निर्माण करनेके लिये वहाँ आये, उस समय उन्होंने पहले शिवलिंगकी स्थापना की। तत्पश्चात् पुनः नगर-निर्माणका कार्य प्रारम्भ किया। विवाह और गृहप्रतिष्ठा आदि प्रत्येक कार्यके आदि और अन्तमें उन दोनों लिंगोंकी पूजा करके मनुष्य तत्काल सिद्धिको पाता है।
वहाँसे दक्षिण भागमें समस्त पातकोंका नाश करनेवाले दुर्गादित्य नामक सूर्यदेवके समीप जाय। जो रविवारयुक्त सप्तमीमें उनका पूजन करता है, उसके सब दुःख और अनेक प्रकारके कुष्ठ नष्ट हो जाते हैं।
वहाँसे दक्षिण भागमें ऋषितोयाके तटपर सोमेश्वरलिंग है, जिसका नाम पहले भूतेश्वर था। सोमेश्वरका दर्शन-पूजन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। वहाँसे उत्तर भागमें कुछ वायव्यकोणकी ओर सिद्धिदायक विनायक विराजमान हैं। जिन कुबेरको मैंने अपना सखा बताया है, वे ही गणनाथरूपसे इस स्थानमें लोगोंको सिद्धि प्रदान करनेके लिये स्थित हैं। जो मंगलवारयुक्त चतुर्थीको लड्डूसहित नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंद्वारा उनकी विधिपूर्वक पूजा करता है, उसे निश्चय ही सिद्धि प्राप्त होती है।
तदनन्तर ऋषितोयाके तटपर स्थित सर्वविघ्न-नाशक विनायकका दर्शन करनेके लिये जाय। वे साक्षात् त्रिपुरान्तक शिव हैं और गजरूप धारण करके महाक्षेत्र प्रभासमें ऊँचे स्थानपर अपने कोटिगणोंके साथ स्थित हैं। अतः निर्विघ्नतापूर्वक यात्राकी सिद्धिके लिये गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंद्वारा उनका पूजन करना चाहिये। योगक्षेमकी सिद्धिके लिये उनकी यात्राका महोत्सव भी करना चाहिये। वहाँसे उत्तर महाकालेश्वरदेव हैं, जो उस पुरके अधिष्ठाता रौद्ररूपधारी भैरव हैं। पूर्णमासी और अमावास्याको इनकी महापूजा करनी चाहिये। जो महोदय तीर्थमें स्नान करके महाकालका दर्शन करता है, वह सात हजार जन्मोंतक संसारमें धनाढ्य होता है।
वहाँसे ईशानकोणमें महोदय तीर्थ है। उसमें विधिपूर्वक स्नान करके जो देवताओं और पितरोंका तर्पण करता है, उसे प्रतिग्रहजनित दोषसे भय नहीं होता। उस तीर्थकी रक्षाके लिये महाकालके उत्तर भागमें मेरी प्रेरणासे मातृकाएँ रहती हैं। वहाँ स्नान करके मनुष्य पहले उन मातृकाओंकी ही पूजा करे। वहाँसे वायव्यकोणमें संगमेश्वर लिंग है और उससे भी पूर्वदिशामें पापनाशिनी कुण्डिका है, जहाँ बडवानलसहित सरस्वतीजी आयी हैं। जो कुण्डिकामें स्नान करके संगमेश्वरका पूजन करता है, उसका सहस्र जन्मोंतक लक्ष्मी, पुत्र तथा प्रियजनोंसे कभी वियोग नहीं होता। वह जन्मसे लेकर मृत्युतकके समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।
उस स्थानसे तीन योजन उत्तर तप्तोदकस्वामी हैं, जहाँ भगवान् विष्णुने युद्ध करके दैत्यराज तलका वध किया था। जो मानव तप्तकुण्डमें स्नान करके तलस्वामीकी पूजा तथा स्नान करता है, वह करोड़ों यात्राओंका फल पाता है। उससे पूर्वदिशामें कालमेधलिंगरूपी क्षेत्रपाल हैं। अष्टमी और चतुर्दशीको विस्तारपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये। वे कलियुगमें कल्पवृक्षके समान मनोवांछित फल देनेवाले हैं।
वहाँसे दक्षिण भागमें पचीस धनुषके अन्तरपर सब पापोंका नाश करनेवाली रुक्मिणीदेवी स्थित हैं। तप्तोदक कुण्डमें स्नान करके रुक्मिणीजीकी पूजा करे। इससे सात जन्मोंतक स्त्रियोंकी गृहस्थी भंग नहीं होती। बलभद्रसे पूर्वदिशामें एक श्रेष्ठ नदी है, जहाँ दुर्वासेश्वरलिंग प्रतिष्ठित है। जो अमावास्याको उस नदीमें स्नान करके पिण्ड देता है, वह सौ कोटि कल्पोंसे अधिक कालतकके लिये पितरोंको तृप्त कर देता है। वहाँ दुर्वासेश्वर शिवका विधिपूर्वक पूजन करके
- प्रभासखण्ड * [ १३१५ ]
मनुष्य कोटि यज्ञोंका फल तथा समस्त अभीष्ट वस्तुएँ प्राप्त कर लेता है। वहाँ ऋषियोंद्वारा स्थापित किये हुए बहुतसे शिवलिंग हैं। उनका दर्शन, स्पर्श और पूजन करके मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है। जहाँ क्षेत्रकी परिधिरूप मधुमती नामक स्थान है, वहाँ समुद्र-तटपर लिंगेश्वरदेव तथा सप्तकूप हैं। वहाँ श्राद्ध करके मनुष्य गयासे कोटिगुना फल पाता है।
तलस्वामी, शंखावर्त तीर्थ और गोष्पद तीर्थकी महिमा, वहाँ श्राद्धकी विधि तथा राजा पृथुके द्वारा पृथ्वीका दोहन
महादेवजी कहते हैं—मनुष्यको चाहिये कि वह तलस्वामी विष्णुका स्मरण करे, फिर 'सहस्रशीर्षा' मन्त्रसे तर्पण आदि करे। विधिवत् स्नान करके श्रीविष्णुको अर्घ्य दे। गन्ध, पुष्प, वस्त्र, अनुलेपन, मधु, इक्षुरस, कुंकुम, कपूर, खस तथा कस्तूरी आदि उपचारोंसे उनकी पूजा करे; फिर वस्त्रोंसे वेष्टित करके उत्तम नैवेद्य भोग लगाये। धर्मकथा-श्रवणपूर्वक रात्रिमें जागरण करे। वेदज्ञ श्रोत्रिय ब्राह्मणको सुवर्ण और दो वस्त्र दान करे। उस दिन उपवासपूर्वक श्रीविष्णुको नमस्कार करके रुक्मिणीजीका दर्शन करे। भक्तिभावसे यों करके मनुष्य अपने जन्मका फल पाता है। समस्त यज्ञों, दानों, तीर्थों और व्रतोंका भी फल पा लेता है। पितृवर्ग और मातृवर्गका भी उद्धार करता है तथा जन्मभरके किये हुए पापोंका नाश कर देता है।
वहाँसे पश्चिम न्यंकुमती नदीके उत्तम तटपर दक्षिण दिशाकी ओर शंखावर्त नामक तीर्थ है, जहाँ स्वयं प्रकट हुई अति उत्तम रक्तगर्भा 'चक्रांकित' शिला स्थित है। पूर्वकालमें सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णुने वेदोंका अपहरण करनेवाले शंखासुरको जहाँ मारा है, वह विष्णुक्षेत्र कहा गया है। उसीको शंखोदक तीर्थ भी कहते हैं। वह शंखाकार दिखायी देता है। उसमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है तथा शूद्रको भी लगातार सात जन्मोंतक ब्राह्मणयोनि प्राप्त होती है।
तत्पश्चात् गोष्पद तीर्थको जाय, जहाँ श्राद्ध करके मनुष्य गयासे सातगुना अधिक फल पाता है। वहीं श्राद्ध करके वेननन्दन पृथुने अपने पिताको पाप-योनिसे मुक्त किया था।
न्यंकुमती नदी परम पवित्र और महासिद्ध है। वह इस क्षेत्रकी सीमाके लिये लायी गयी है। सब पापोंका नाश करनेवाली वह नदी पर्णादित्यसे दक्षिण भागमें स्थित है। नारायणगृहसे उत्तर दिशामें थोड़ी ही दूरपर उसकी स्थिति है। उसीके भीतर विख्यात गोष्पद नामक तीर्थ है। गोष्पदके समीप थोड़ी ही दूरपर नागराज अनन्त स्वतः प्रकट हुए हैं, जो पृथ्वीपर उस तीर्थकी रक्षाके लिये नियुक्त किये गये हैं। नरकसे अत्यन्त भयभीत होनेवाले पितर पुत्रप्राप्तिकी इच्छा रखते हैं और कहते हैं—'हमारे वंशजोंमेंसे जो गोष्पदतीर्थकी यात्रा करेगा, वही हमारा उद्धार करनेवाला होगा।' गोष्पदतीर्थमें पुत्रको देखकर पितरोंके यहाँ उत्सव मनाया जाता है। खीर, मधु, सत्तू, आटा, तिल और अक्षत आदिसे वहाँ श्राद्ध करके मनुष्य अपने पितरोंको स्वर्गलोकमें भेज देता है। उस तीर्थमें श्रेष्ठ पुरुष नास्तिकका संग न करे। सब सामग्रियोंके सहित श्रद्धालु पुरुष आस्तिक मनुष्यके साथ उस तीर्थमें जाय और वहाँ पहुँचकर मन-ही-मन यह भावना करे कि मैं गया तीर्थमें आया हूँ। इस प्रकार जो ब्राह्मण प्रतिग्रहरहित होकर वहाँकी यात्रा करता है, उसे पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। वहाँ न्यंकुमती नदीमें स्नान करके पितरोंकी मुक्तिके लिये विधिपूर्वक श्राद्ध-तर्पण करे। तर्पणके समय इस प्रकार कहे—
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः।
तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः ॥
१३१६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
‘ब्रह्माजीसे लेकर तृणपर्यन्त समस्त देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य तथा माता और मातामह आदि समस्त पितर मेरे दिये हुए जलमें तृप्त हों।’
इस प्रकार विधिपूर्वक तर्पण करके मनुष्य शास्त्रोक्त विधिसे पिण्डयुक्त श्राद्ध करे। पहले शास्त्रके ज्ञाता निर्दोष ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करके उन्हें अर्घ्य देकर इस प्रकार कहे—
कव्यवाडनलः सोमो यमश्चैवार्यमा तथा।
अग्निष्वात्ता बर्हिषदः सोमपाः पितृदेवताः॥
आगच्छन्तु महाभागाः युष्माभी रक्षितास्त्विह।
मदीयाः पितरो ये च कुले जाताः सनाभयः॥
तेषां पिण्डप्रदाताहमागतोऽस्मि पितामह॥
‘कव्यवाट् अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, बर्हिषद् और सोमप नामके पितृदेवताओ! आप सभी महाभाग यहाँ पधारें और आपके द्वारा सुरक्षित जो मेरे पितर, वंशज एवं सहोदर हों, वे भी यहाँ पदार्पण करें। पितामह! उन सबको पिण्डदान देनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ।’
यों कहकर फिर निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करे—
पिता पितामहश्चैव प्रपितामह एव तु।
माता पितामही चैव तथैव प्रपितामही॥
मातामहस्तत्पिता च प्रमातामहकादयः।
तेषां पिण्डो मया दत्तो ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु॥
ॐ नमो भगवते भर्त्रे सोमभौमेज्यरूपिणे।
‘पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, प्रमातामह तथा वृद्धप्रमातामह आदि जो पितर हैं, उनके लिये मेरे द्वारा दिया हुआ यह पिण्ड अक्षय्यरूपसे उपस्थित हो। सोम, मंगल और बृहस्पतिरूप भगवान् विश्वम्भरको नमस्कार है।’
इस प्रकार नमस्कार एवं पूजन करके गोष्पदके समीप अनाथ पितरोंके लिये पिण्डदान करे। उस समय निम्नांकित स्तुतिका पाठ करना चाहिये—
अस्मत्कुले मृता ये च गतिर्येषां न विद्यते।
रौरवे चान्धतामिस्रे कालसूत्रे च ये गताः॥
तेषामुद्धरणार्थाय इदं पिण्डं ददाम्यहम्।
अनन्तयातनासंस्थाः प्रेतलोकेषु ये गताः॥
पशुयोनिं गता ये च पक्षिकीटसरीसृपाः।
अथवा वृक्षयोनिस्थास्तेभ्यः पिण्डं ददाम्यहम्॥
येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु पिण्डदानेन सर्वदा॥
ये केचित् प्रेतरूपेण वर्तन्ते पितरो मम।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु पिण्डदानेन सर्वदा॥
दिव्यन्तरिक्षभूमिस्थाः पितरो बान्धवादयः।
मृता असंस्कृता ये च तेषां पिण्डस्तु मुक्तये॥
पितृवंशे मृता ये च मातृवंशे तथैव च।
गुरुश्वशुरबन्धूनां ये चान्ये बान्धवाः स्मृताः॥
ये मे कुले लुप्तपिण्डाः पुत्रदारविवर्जिताः।
क्रियालोपगता ये च जात्यन्धाः पङ्गवस्तथा॥
विरूपा आमगर्भाश्च ज्ञाताज्ञाताः कुले मम।
तेषां पिण्डो मया दत्तो ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु॥
प्रेतत्वात् पितरो मुक्ता भवन्तु मम शाश्वतम्।
यत् किञ्चिन्मधुसंमिश्रं गोक्षीरं घृतपायसम्॥
अक्षय्यमुपतिष्ठेत् तत् त्वस्मिंस्तीर्थे तु गोष्पदे।
‘हमारे कुलमें जो लोग मरे हैं किंतु जिनकी सद्गति नहीं हुई है, जो रौरव, अन्धतामिस्र और कालसूत्र आदि नरकोंमें पड़े हैं, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। जो अनन्त यातनाओंमें पड़े हैं, प्रेतलोकोंमें गये हुए हैं, पशु, पक्षी, कीट, सर्प अथवा वृक्षयोनिमें स्थित हैं, उन सबके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। जो हमारे बान्धव नहीं हैं, जो हमारे बान्धव हैं अथवा जो अन्य जन्मोंमें बान्धव रहे हैं, वे सब इस पिण्डदानसे सदा तृप्त रहें। मेरे जो पितर प्रेतरूपमें विद्यमान हैं, वे सब इस पिण्डदानसे सदा तृप्त रहें। जो पितर तथा बान्धव आदि स्वर्ग, अन्तरिक्ष एवं भूलोकमें स्थित हैं, जिनका मरनेके बाद संस्कार नहीं हुआ है, यह पिण्ड उन सबको मुक्ति देनेवाला हो। जो मेरे पितृकुलमें, मातृकुलमें, गुरुकुल, श्वशुरकुल तथा बन्धुकुलमें रहे हैं तथा इनके अतिरिक्त भी जो बान्धव कहे
- प्रभासखण्ड * १३१७
गये हैं, मेरे कुलमें जिनके लिये पिण्डदान आदि क्रियाएँ नहीं हुई हैं, जो स्त्री और पुत्रसे रहित हैं, जिनके श्राद्ध आदि कर्मोंका लोप हो गया है, जो जन्मसे अन्धे, पंगु तथा विकृत रूपवाले रहे हैं, जो कच्चे गर्भकी अवस्थामें ही मर गये हैं—इस प्रकार मेरे कुलमें जो ज्ञात अथवा अज्ञात पूर्वज मृत्युको प्राप्त हुए हैं, उन सबके लिये मैंने यह पिण्ड दिया है। यह अक्षय होकर उन सबको प्राप्त हो। मेरे सभी पितर सदाके लिये प्रेतभावसे मुक्त हो जायें। इस गोष्पद तीर्थमें जो कुछ भी मधुमिश्रित गोदुग्ध, घृत और खीर आदि दिया गया है, वह सब पूर्वोक्त सभी पितरोंको अक्षय होकर प्राप्त हो।'
तदनन्तर श्राद्धकर्ता वहाँ वेदमन्त्रोंका स्वाध्याय करे। सब पुराण सुनाये। ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य तथा रुद्र-सम्बन्धी नाना प्रकारके स्तोत्रोंका पाठ करे। ऐन्द्रसूक्त, सोमसूक्त, पवमानसूक्त, बृहत्साम, रथन्तरसाम, ज्येष्ठसाम, शान्तिकाध्याय, मधुब्राह्मण तथा मण्डल-ब्राह्मणका भी यथासम्भव पाठ करे। ये सब स्तोत्र पितरोंको प्रसन्न करनेवाले हैं। इस प्रकार न्यंकुमती नदीमें स्नान करके उत्तम गोष्पद तीर्थमें विधिवत् पिण्डदान करनेके पश्चात् पुनः निम्नांकित मन्त्रका पाठ करे—
साक्षिणः सन्तु मे देवा ब्रह्माद्या ऋषिपुङ्गवाः।
मयेदं तीर्थमासाद्य पितॄणां निष्कृतिः कृता॥
आगतोऽस्मि इदं तीर्थं पितृकार्ये सुरोत्तमाः।
भवन्तु साक्षिणः सर्वे मुक्तश्चाहमृणत्रयात्॥
'ब्रह्मा आदि देवता और श्रेष्ठ मुनिवर साक्षी रहें। मैंने इस तीर्थमें आकर पितरोंका ऋण चुकाया है। श्रेष्ठ देवताओ! मैं पितृकार्यके लिये इस तीर्थमें आया हूँ। आज मैं तीनों ऋणोंसे मुक्त हो गया, इस बातके आप सभी लोग साक्षी रहें।'
इस प्रकार उत्तम गोष्पद तीर्थकी परिक्रमा करके ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे और पिण्डोंका नदीमें विसर्जन कर दे। वृद्धि-श्राद्धमें मातासे आरम्भ करके और गयामें पितासे प्रारम्भ करके श्राद्ध करना चाहिये। इस तीर्थमें श्राद्ध और पिण्डदान करनेवाला पुरुष अपने पितरोंको विष्णुलोकमें पहुँचा देता हैं। गोष्पद तीर्थमें जो एक ब्राह्मणको भोजन कराता है, उसे कोटि ब्राह्मणोंको भोजन देनेका पुण्य मिलता है।
पूर्वकालमें वेन नामक राजा हो गया है। वह मृत्युकी कन्याका पुत्र था। अतः मातामहके दोषसे उसमें भी क्रूरतापूर्ण विचार आ गया। उसने अपने धर्मको पीछे छोड़कर पापमें मन लगाया। वेद-शास्त्रोंका उल्लंघन करके वह अधर्ममें तत्पर हो गया। उसका विनाशकाल उपस्थित था; इसलिये उसकी ऐसी बुद्धि हुई कि 'मैं ही सब यज्ञों और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके द्वारा स्तवन और पूजन करने योग्य हूँ।' इस निश्चयके द्वारा धर्मका उल्लंघन करके वह प्रजाजनोंको पीड़ा देने लगा। उसका यह बर्ताव देख मरीचि आदि महर्षि कुपित होकर बोले—'वेन! तुम अधर्म न करो। तुम जो कुछ करते हो, वह सनातन धर्म नहीं है। तुमने राजसिंहासनपर बैठते समय पहले यह प्रतिज्ञा की है कि 'मैं प्रजाजनोंका पालन करूँगा।' परंतु अब इसके विपरीत आचरण करते हो।'
महर्षियोंके यों कहनेपर दुर्बुद्धि वेन हँसकर बोला—'मेरे सिवा कौन धर्मकी सृष्टि करनेवाला है। पराक्रम, शास्त्रज्ञान, तपस्या और सत्यके द्वारा मेरी समानता करनेवाला इस भूतलपर कौन है। तुमलोग मुझे धर्मकी उत्पत्तिका स्थान समझो। मैं चाहूँ तो इस पृथ्वीको जला सकता हूँ, संसारकी सृष्टि कर सकता हूँ और सबका संहार भी कर सकता हूँ।'
गर्व और उद्दण्डतासे मोहित हुए वेनको जब वे किसी प्रकार समझानेमें सफल न हुए, तब सभी महर्षियोंने कुपित हो अथर्ववेदीय आभिचारिक मन्त्रके प्रयोगसे महाबली वेनको मारकर उसकी बायीं भुजाका मन्थन किया। उससे एक छोटा-सा काले रंगका पुरुष पैदा हुआ। वह भयभीत हो हाथ जोड़कर सामने खड़ा हो गया। उसकी
१३१८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
ओर देखकर मुनियोंने कहा—'निषीद (बैठ जाओ)।' इससे वह निषाद कहलाया और निषादवंशका प्रवर्तक हुआ। उससे तुम्बर और खस आदि अन्य जो धीवर जातियाँ उत्पन्न हुईं, उन्होंने विन्ध्यगिरिको अपना निवास स्थान बनाया; फिर उन महर्षियोंने वेनके दाहिने हाथको अरणीकी भाँति मथा। इससे सूर्य और अग्निकी भाँति पृथु पैदा हुए। उनका शरीर बड़ा तेजस्वी था। उन्होंने लोकरक्षाके लिये आजगव नामक धनुष, सर्पोंके समान बाण, खड्ग तथा कवच धारण किया। उनके प्रकट होनेपर सब प्राणी हर्षमें भर गये। वेन स्वर्गलोकको चला गया। तदनन्तर नदियाँ और समुद्र भाँति-भाँतिके रत्न लेकर राजा पृथुका अभिषेक करनेके लिये उपस्थित हुए। ऋषियों और देवताओंके साथ भगवान् ब्रह्माजी भी आये। आंगिरस देवताओंने प्रतापी राजा पृथुको राजपदपर अभिषिक्त किया। उनके राज्यमें पृथ्वी बिना जोते-बोये ही अन्न पैदा करती थी। चिन्तन करनेमात्रसे ही मन्त्र सिद्ध हो जाते थे। सभी गौएँ कामधेनु थीं और वृक्षोंके एक-एक पत्तेसे मधुकी प्राप्ति होती थी। राजा पृथुको देखकर प्रसन्न हुए महर्षियोंने प्रजाजनोंसे कहा—'ये वेननन्दन राजा पृथु तुम सब लोगोंको जीविका प्रदान करेंगे।' यह सुनकर प्रजाओंने महाभाग पृथुका स्तवन किया और कहा—'आप महर्षियोंके कथनानुसार हमारे लिये आजीविकाकी व्यवस्था करें।' तब बलवान् राजा पृथुने प्रजाकी रक्षाकी इच्छासे धनुष-बाण लेकर पृथ्वीपर आक्रमण किया। पृथ्वी उनके भयसे थर्रा उठी और गायका रूप धारण करके भागी। पृथुने भी उसका पीछा किया। अन्तमें वह उन्हींकी शरणमें आयी और हाथ जोड़कर बोली—'राजन्! मेरे बिना तुम प्रजाको कैसे धारण करोगे? मेरे ऊपर ही सम्पूर्ण लोक स्थित हैं। मैं ही इस जगत्को धारण करती हूँ। मेरे बिना सारी प्रजा नष्ट हो जायगी। अतः तुम्हें मेरा वध नहीं करना चाहिये। महीपते! क्रोध छोड़ो। मैं तुम्हारी आज्ञाके अनुकूल चलूँगी। तुम्हें धर्मका त्याग नहीं करना चाहिये।'
पृथ्वीकी यह बात सुनकर धर्मात्मा एवं उदार राजा पृथुने अपने क्रोधको रोका और इस प्रकार कहा—'जो अपने या पराये एकके हितके लिये स्वार्थवश बहुत-से प्राणियोंका वध करता है, उसे पाप लगता है। यदि किसी एकको मार देनेसे बहुत लोग सुखी हो जाते हों तो उसके मारनेपर पातक नहीं लगता। अतः वसुन्धरे! यदि तू मेरी आज्ञासे संसारका हित नहीं करेगी तो मैं प्रजाके लिये तेरा वध कर डालूँगा। मेरी आज्ञाके विपरीत चलनेवाली तुझ वसुधाको बाणोंसे मारकर मैं स्वयं अपने शरीरको विशाल बनाकर समस्त प्रजाको धारण करूँगा; अतः तू मेरी आज्ञासे समस्त प्रजाको जीविका प्रदान कर; क्योंकि ऐसा करनेमें तू समर्थ है।'
राजा पृथुके इस प्रकार कहनेपर पृथ्वीने उत्तर दिया—'राजन्! मैं यह सब करूँगी। तुम मेरे लिये बछड़ेकी कल्पना करो। जिसके प्रति वत्सल होकर मैं दूधके रूपमें अन्न प्रदान करूँ। इसके सिवा मुझे समतल बनाओ, जिससे मैं अपने दूधको सर्वत्र फैला सकूँ।'
तब राजा पृथुने धनुषकी कोटिसे पर्वतों और शिलाखण्डोंको उखाड़कर एक जगह किया और चाक्षुष मनुको बछड़ा बनाकर उन्होंने अपने हाथमें अन्नोंको दुहा। तदनन्तर चन्द्रमा बछड़ा हुए, बृहस्पति दुहनेवाले बने, गायत्री आदि छन्द दुग्धपात्र हुए और तपस्या एवं सनातन ब्रह्म उन्हें दुग्धरूपमें प्राप्त हुआ। फिर इन्द्र आदि देवताओंने सुवर्णमय पात्र लेकर इस पृथ्वीको दुहा। उस समय इन्द्र बछड़ा और सूर्य दुहनेवाले हुए। उनका दूध अमृतमय था। इसी प्रकार पितरोंने भी चाँदीके पात्रमें अपनी तृप्तिके लिये सुधारूप दुग्धका दोहन किया। उनके लिये वैवस्वत मनु बछड़ा और अन्तक दुहनेवाले थे। असुरोंने लोहेके पात्रमें मायाशक्तिका दोहन किया। उस समय दूध
- प्रभासखण्ड * | १३१९ ---|---:
दुहनेवाला द्विमूर्धा और बछड़ा विरोचन था। उस मायारूप दूधसे ही दैत्य आज भी मायावी हैं। नागोंने तक्षकको बछड़ा बनाकर तूँबेके पात्रमें विषरूपी दूध दुहा। उस समय वासुकि दोग्धा थे। इसीलिये सर्प बड़े विषैले होते हैं। यक्षों और पुण्यजनोंने कुबेरको बछड़ा बनाकर कच्चे पात्रमें अन्तर्धान-शक्तिका दोहन किया। उनके दोग्धा थे रजतनाग। राक्षसों और पिशाचोंने भी पृथ्वीसे कपालरूपी पात्रमें रक्तमय दूधका दोहन किया। उनकी ओरसे सुमाली बछड़ा था और ब्रह्मोपेत कुबेर दोग्धा। गन्धर्वों और अप्सराओंने चित्ररथको बछड़ा बनाकर कमलके पात्रमें उत्तम गन्धका दोहन किया। मुनिपुत्र रुचि उनकी ओरसे दोग्धा हुए थे। पर्वतोंने पृथ्वीसे मूर्तिमयी ओषधियों तथा भाँति-भाँतिके रत्नोंको दुहा। उनका बछड़ा हिमालय, दुहनेवाला मेरुगिरि तथा पात्र हिमालय था। वृक्ष और लता आदि वनस्पतियोंने पलाशका पात्र लेकर पृथ्वीको दुहा। कटनेपर पुनः अंकुरित हो जाना, यही उनका दूध था। खिला हुआ शालवृक्ष उनका दोग्धा और पाकड़का वृक्ष उनका बछड़ा था।
इस प्रकार समस्त लोकोंके हितके लिये राजा पृथुने सबका धारण-पोषण करनेवाली इस पृथ्वीका दोहन किया। उन्होंने धर्मसे भूतलवासियोंका रंजन किया, इसलिये उन्हें 'राजा' कहा गया। तभीसे इस पृथ्वीपर राजा शब्दकी प्रसिद्धि हुई।
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पृथुके गोष्पद तीर्थमें श्राद्ध-यज्ञ करनेसे वेनको स्वर्गप्राप्ति
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! राज्य पाकर राजा पृथुने सोचा, 'मेरे पिता बड़े अधर्मी थे, उन्होंने यज्ञ आदिका उच्छेद कर डाला था; अतः उन्हें किस लोककी प्राप्ति हुई है, इसका ज्ञान मुझे कैसे हो? वे ब्राह्मणोंके द्वारा मारे गये हैं। उनकी क्रिया किस प्रकार करनी चाहिये?' इस प्रकार सोच-विचारमें पड़े हुए राजा पृथुके समीप देवर्षि नारद आये। राजाने उन्हें आसन देकर प्रणाम किया और पूछा—'भगवन्! आप सब संसारके शुभ-अशुभको जानते हैं, मेरे पिता बड़े दुराचारी और देवताओं तथा ब्राह्मणोंके निन्दक थे। उन्हें शुभ या अशुभ—किस स्थानकी प्राप्ति हुई है?'
उन्हें शुभ या अशुभ किस स्थानकी प्राप्ति हुई है, नारदजीने दिव्य दृष्टिसे यह जानकर कहा—'राजन्! जहाँ जल और वृक्षोंसे रहित मरुप्रदेश है, वहाँ म्लेच्छोंके बीचमें उत्पन्न होकर तुम्हारे पिता यक्ष्मा और कुष्ठ रोगसे पीड़ित हैं।'
नारदजीकी यह बात सुनकर राजा पृथुने विचार किया कि 'संसारमें पुत्र वही कहलाता है, जो पिताका उद्धार करे। मेरे द्वारा किस प्रकार पिताजी पापमुक्त हो सकेंगे?' यह सोचकर उन्होंने पुनः नारदजीसे पूछा—'भगवन्! किस कर्मसे मेरे पिताकी मुक्ति होगी?'
नारदजीने कहा—राजन्! प्रधान-प्रधान तीर्थोंकी यात्रा करो। इससे तुम्हारे पिताका मोक्ष होगा।
नारदजीका यह वचन सुनकर राजा पृथुने राज्यका सारा भार मन्त्रीके ऊपर रख दिया और स्वयं तीर्थसेवनके लिये निकले। अनेक तीर्थोंकी यात्रा करके वे प्रभासक्षेत्रमें आये। उस तीर्थका माहात्म्य जाननेवाले ब्राह्मणोंको आगे करके महाराज पृथु न्यंकुमती नदीके समीप गये। वहाँ ब्राह्मणोंने उन्हें प्रेतशिलामें स्थित पदरूप तीर्थका दर्शन कराया। उस विमल तीर्थका दर्शन करके राजाके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। उन्होंने यज्ञोंकी सिद्धिके लिये कुण्डों, वेदियों तथा मण्डपोंका निर्माण किया। तदनन्तर पर्याप्त दक्षिणावाला यज्ञ विधिपूर्वक प्रारम्भ हुआ। राजा पृथुको तेजस्वी पितरोंने प्रत्यक्ष दर्शन दिया और श्राद्ध ग्रहण करके सन्तुष्ट होकर कहा—'राजन्! तुम धन्य हो, पुण्यस्वरूप हो और हम तीनों—तुम्हारे
१३२० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
पिता, पितामह और प्रपितामह भी परम धन्य हैं, जिन्हें इस गोष्पद तीर्थमें श्राद्ध करके तुमने तार दिया।' यों कहकर वेनसहित सब पितर विमानपर बैठे और स्वर्गलोकको चले। जाते समय वेनने कहा—'राजन्! इधर मैं चार जन्म ले चुका। पहले जन्ममें कोढ़ी था, दूसरेमें पापी हुआ, तीसरेमें भी दुराचारी ही था और चौथेमें उच्छिष्ट-भोजी चाण्डाल हुआ। आज मैं सब पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकको जाता हूँ। महाभाग! अब तुम जाओ और चिरकालतक राज्य भोगो। पुत्रके द्वारा पितरोंके लिये जो कुछ किया जाता है, वह सब तुमने सफल कर दिया।'
पिताकी यह बात सुनकर राजा पृथु कुटुम्बियोंसहित बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने भूमि और सुवर्ण आदि दान देकर ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट किया। संसारमें कोई ऐसी देने योग्य वस्तु नहीं, जिसका उन्होंने वहाँ दान न किया हो। इस प्रकार पितरोंका प्रत्यक्ष दर्शन करानेवाला उस तीर्थका प्रभाव देखकर राजा अपनी राजधानीको चले गये। सारी पृथ्वीका राज्य भोगकर देहत्यागके पश्चात् उन्होंने दिव्य लोक प्राप्त किया।
गोष्पद तीर्थमें स्नान करके यत्नपूर्वक वेदज्ञ ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे और विधिपूर्वक श्राद्धमें उन्हें भोजन कराये। पितरोंकी तृप्ति चाहनेवाले पुरुषको वहाँ पिताका श्राद्ध अवश्य करना चाहिये। इसके लिये वहाँ किसी तिथि, नक्षत्र, पर्व और मास आदिका नियम नहीं है। वहाँ सदा श्रद्धायुक्त चित्तसे यात्रा करनी चाहिये। किसी विशेष कालका वहाँके लिये नियम नहीं है।
नारायणगृह तथा जालेश्वरलिंगकी महिमा, आपस्तम्ब और नाभागकी कथा, गौओं और संतोंका माहात्म्य
**महादेवजी कहते हैं—**पार्वती! गोष्पदके दक्षिण समुद्रतटपर नारायणगृह है, जिसमें साक्षात् विष्णु निवास करते हैं। वे सत्ययुगमें सुवर्णमय, त्रेतामें रत्नमय, द्वापरमें रजतमय और कलियुगमें प्रस्तरमय विग्रहमें रहते हैं। सरस्वतीके पश्चिम तटपर स्वयं श्रीहरिके द्वारा निर्मित चक्रतीर्थ है। उसमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्महत्याका नाश कर देता है। भगवान् विष्णु जब दैत्योंका विनाश करते हैं, तब विश्रामके लिये उस घरमें स्थित होते हैं। इसलिये इस भूतलपर वह नारायणगृहके नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ सत्ययुगमें भगवान् जनार्दनके नामसे प्रसिद्ध होते हैं, त्रेतामें उनका नाम मधुसूदन होता है, द्वापरमें उन्हें पुण्डरीकाक्ष कहते हैं और कलियुगमें वे नारायण कहलाते हैं। इस प्रकार चारों युगोंमें श्रीविष्णु धर्मकी स्थापना करके उस स्थानपर आते हैं। जो एकादशीको निराहार रहकर उन नारायणदेवका दर्शन करता है, वह मृत्युके पश्चात् उनके आनन्दमय अविनाशी धामको प्राप्त होता है।
न्यंकुमतीके किनारे उत्तम कुबेरनगर है। उससे अग्निकोणमें कोटीश्वरलिंग है। कुबेरसे पूर्व दिशामें बालार्केश्वर हैं और उत्तर दिशामें अम्बिकास्थान है। वहाँ कुण्डमें स्नान करनेसे ब्रह्महत्याका नाश होता है। बालार्केश्वर और अम्बिकाके दर्शनसे वाजपेय यज्ञका फल मिलता है। कुबेरनगरमें सैकड़ों तीर्थ और शिवलिंग हैं। उनका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
देविका नदीके तटपर जालेश्वरलिंग है, जिसके दर्शनसे ब्रह्महत्या नष्ट हो जाती है। पूर्वकालमें आपस्तम्ब नामके एक श्रेष्ठ महर्षि हो गये हैं। वे प्रभासक्षेत्रमें जाकर देविका नदीके जलके भीतर रहने लगे और वहाँ भगवान् शिवका ध्यान करते हुए काष्ठकी भाँति स्थित हो गये।
- प्रभासखण्ड * १३२१
तदनन्तर एक समय मछलियोंसे जीविका चलानेवाले धीवर वहाँ आये। उन्होंने वहाँ एक महाजाल बिछाकर उसे बलपूर्वक बाहरकी ओर खींचा। जालके साथ आपस्तम्बजी भी खिंच आये। तपस्यासे उद्दीप्त उन महर्षिको देखकर सब केवट भयसे व्याकुल हो उठे और चरणोंमें मस्तक रखकर उन्हें प्रणाम करके बोले—'मुने ! हमने अनजानमें यह पाप कर डाला है; आप कृपा करके हमें क्षमा कर दें और इस समय आपका जो प्रिय कार्य हो, उसे करनेके लिये आज्ञा दीजिये।' मुनिने देखा अज्ञानवश यहाँ बहुत बड़ा संहार किया गया है; तथापि वे बड़े भारी क्षमाशील थे। उन्होंने दुखी होकर कहा—'यदि ज्ञानियोंका भी चित्त केवल अपने ही लाभमें रत है, ज्ञानी भी यदि स्वार्थका आश्रय लेकर ही ध्यान करते हैं, तब इस संसारके दुःखातुर प्राणी कहाँ सुख पायेंगे। जो मनुष्य एकान्ततः दुःख भोगना चाहता है, उसे मुमुक्षु पुरुष पापीसे भी पापी कहते हैं। मैं कौन-सा ऐसा उपाय करूँ, जिससे समस्त दुःखी प्राणियोंके अन्तःकरणमें प्रविष्ट होकर उनके सब दुःखोंको अकेला ही भोगूँ? यदि मेरा कोई शुभकर्म है तो वह दीन-दुःखी प्राणियोंको प्राप्त हो और उन सबने जो दुष्कर्म किया हो, वह सब-का-सब मुझे मिल जाय। संसारके अंधे, दीन-दुखी, अंगहीन, अनाथ तथा रोगी मनुष्योंको देखकर जिसके हृदयमें दया नहीं आती, वह मेरे विचारसे राक्षस है। जो समर्थ होकर भी प्राण-संकटमें पड़े हुए भयविह्वल प्राणियोंकी रक्षा नहीं करता, वह पाप भोगता है। अतः मैं इन दीन-दुःखी भयभीत जन्तुओंको छोड़कर एक पग भी कहीं नहीं जाऊँगा। फिर स्वर्गलोककी तो बात ही क्या है।'
महर्षिकी यह बात सुनकर वे मल्लाह बहुत घबराये। उन्होंने वहाँका सब वृत्तान्त राजा नाभागसे जाकर कहा। नाभाग भी यह समाचार सुनकर ब्रह्मनन्दन आपस्तम्बजीको देखनेके लिये तुरंत वहाँ आये। उनके साथ मन्त्री और पुरोहित भी थे। उन देवकल्प मुनिका भलीभाँति पूजन करके राजाने कहा—'भगवन् ! बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?'
आपस्तम्बजीने कहा—ये दुःखसे जीविका चलानेवाले केवट मुझको और इन जलजन्तुओंको जलसे निकालनेके कारण बड़े भारी परिश्रमसे थक गये हैं। इनके परिश्रमका जो उचित मूल्य समझो, वह दे दो।
नाभाग बोले—भगवन् ! मैं निषादोंको इनके परिश्रमका मूल्य एक लाख स्वर्णमुद्रा दूँगा।
आपस्तम्बने कहा—राजन् ! तुम्हें मुझे एक लाखके मूल्यसे नहीं बाँधना चाहिये। मेरे योग्य जो मूल्य हो, वह दो। अपने मन्त्रियोंके साथ सलाह कर लो।
नाभाग बोले—द्विजश्रेष्ठ ! इन निषादोंको एक करोड़ मूल्य दे दिया जाय। यदि यह भी उचित मूल्य न हो तो और भी दिया जा सकता है।
आपस्तम्बने कहा—राजन् ! मैं एक करोड़ या इससे अधिक मूल्यमें बेचनेयोग्य नहीं हूँ। मेरे योग्य मूल्य दो। जाओ, ब्राह्मणोंके साथ सलाह कर लो।
नाभाग बोले—मेरा आधा या समूचा राज्य निषादोंको दे दिया जाय। मैं इसे ठीक मूल्य समझता हूँ। आपकी क्या राय है ?
आपस्तम्बने कहा—भूपाल ! तुम्हारा आधा या समूचा राज्य भी मेरे योग्य नहीं है। मेरे योग्य मूल्य दो। समझमें न आये तो ऋषियोंके साथ विचार करो।
आपस्तम्बजीका यह वचन सुनकर राजा नाभाग अपने मन्त्री और पुरोहितोंके साथ दुःखसे आतुर एवं चिन्तित हो गये। इसी समय महातपस्वी महर्षि लोमश वहाँ आ गये और राजा नाभागसे बोले—'तुम डरो मत, मैं मुनिको सन्तुष्ट कर लूँगा।'
नाभाग बोले—महाभाग ! इन महात्मा मुनिका मूल्य बताइये और कुल, कुटुम्ब एवं बन्धु-
१३२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
बान्धवोंसहित मुझ सेवककी इनके कोपसे रक्षा कीजिये। ये साक्षात् भगवान् रुद्र हैं। चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंको भस्म कर सकते हैं। फिर मुझ विषयासक्त मानवकी तो बिसात ही क्या है।
लोमशजीने कहा—महाराज! तुम तो स्तुत्य हो, ये द्विजश्रेष्ठ भी सम्पूर्ण जगत्के लिये पूजनीय हैं और गौएँ दिव्य होती हैं; अतः इनके मूल्यमें एक गौ दे दो।
यह सुनकर राजा नाभाग मन्त्री और पुरोहितोंसहित बहुत प्रसन्न हुए और आपस्तम्ब मुनिसे बोले—'भगवन्! उठिये, उठिये। अब मैंने निस्सन्देह आपको खरीद लिया। मुनिश्रेष्ठ! यह गौ ही आपका योग्यतम मूल्य है।'
आपस्तम्बने कहा—राजन्! लो, अब मैं अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक उठता हूँ। अबकी बार तुमने ठीक मूल्यपर मुझे खरीदा है। मैं गौओंसे बढ़कर परम पवित्र मूल्य दूसरा कुछ नहीं देखता। गौओंकी परिक्रमा तथा निरन्तर पूजा करनी चाहिये। वे मंगल-निकेतन हैं, स्वयम्भू ब्रह्माजीने इन गौओंकी दिव्य सृष्टि की है। ब्राह्मणोंके स्थान, गृह तथा देवताओंके मन्दिर भी जिनके गोबरसे शुद्ध होते हैं, उन गौओंसे बढ़कर दूसरा कौन प्राणी है। गौओंका मूत्र, गोबर, दूध, दही और घी—ये पाँचों पवित्र हैं और सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करते हैं।
निम्नांकित मन्त्रका सदा जप करना चाहिये—
गावो ममाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च।
गावो मे हृदये चैव गवां मध्ये वसाम्यहम्॥
'गौएँ मेरे आगे रहें। गौएँ सदा मेरे पीछे भी रहें। गौएँ मेरे हृदयमें रहें। मैं सदा गौओंके बीचमें निवास करूँ।'
जो मनुष्य पवित्र एवं जितेन्द्रिय होकर इस विशुद्ध मन्त्रका जप करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और स्वर्गलोकमें जाता है। प्रतिदिन गौओंको भक्तिपूर्वक ग्रास समर्पित करना चाहिये। जो उन्हें गोग्रास दिये बिना स्वयं भोजन करता है, वह दुर्गति को प्राप्त होता है। जो प्रतिदिन गोग्रास देता है, वह उतनेसे ही अग्निहोत्र, पितृतर्पण और देवपूजन—सब कुछ कर लेता है। गोग्रास देनेका मन्त्र इस प्रकार है—
सौरभेयी जगत्पूज्या देवी विष्णुपदे स्थिता।
सर्वमेतन्मया दत्तं मया दत्तं प्रतीच्छतु॥
'सम्पूर्ण जगत्के लिये पूजनीय सौरभेयी देवी भगवान् विष्णुके गोलोकधाममें स्थित हैं। मैंने यह सब अन्न उनकी सेवामें समर्पित किया है। मेरे दिये हुए इस आहारको वे ग्रहण करें।'
गोपुत्रों (बैलों)-की रक्षा करनेसे, गौओंको सहलाने और खुजलानेसे तथा दुर्बल एवं पीड़ितोंकी रक्षा करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। आदि, मध्य और अन्त—तीनों कालोंमें गौओंकी स्थिति बतायी गयी है। वे देवताओंके दूध, घी एवं अमृतकी सदा रक्षा करती हैं; इसलिये उनका दान करना चाहिये। उनकी नित्य पूजा करनी चाहिये। वे स्वर्गमें पहुँचानेके लिये सीढ़ीके तुल्य बतायी गयी हैं।
इस प्रकार गौओंका उत्तम माहात्म्य सुनकर वे निषाद महात्मा आपस्तम्बके चरणोंमें प्रणाम करके बोले—'संतोंका वार्तालाप, दर्शन, स्पर्श, कीर्तन तथा स्मरण—ये सभी निश्चय ही पवित्र करनेवाले हैं—ऐसी बात सुनी गयी है। मुने! हमारे साथ आपने सम्भाषण किया और हमें आपका दर्शन प्राप्त हुआ। अब हमपर अनुग्रह कीजिये और हमारी दी हुई यह गौ ग्रहण कीजिये।'
आपस्तम्ब बोले—निषादो! यह मैं तुमसे गोदान लेता हूँ। तुम पापरहित होकर जलसे निकाले हुए इन मत्स्योंके साथ ही स्वर्गलोकको जाओ। प्रतिग्रहरूप निन्दित कर्मसे भी दूसरे प्राणियोंकी प्रसन्नताका कार्य करके यदि मैं नरकमें पडूँगा तो उसे भी स्वर्ग ही समझूँगा। मैंने मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा जो कुछ भी पुण्यकर्म किया हो, उससे समस्त दुःखातुर प्राणी शुभ गतिको प्राप्त हों।