भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1348
  • प्रभासखण्ड * | १३१९ ---|---:

दुहनेवाला द्विमूर्धा और बछड़ा विरोचन था। उस मायारूप दूधसे ही दैत्य आज भी मायावी हैं। नागोंने तक्षकको बछड़ा बनाकर तूँबेके पात्रमें विषरूपी दूध दुहा। उस समय वासुकि दोग्धा थे। इसीलिये सर्प बड़े विषैले होते हैं। यक्षों और पुण्यजनोंने कुबेरको बछड़ा बनाकर कच्चे पात्रमें अन्तर्धान-शक्तिका दोहन किया। उनके दोग्धा थे रजतनाग। राक्षसों और पिशाचोंने भी पृथ्वीसे कपालरूपी पात्रमें रक्तमय दूधका दोहन किया। उनकी ओरसे सुमाली बछड़ा था और ब्रह्मोपेत कुबेर दोग्धा। गन्धर्वों और अप्सराओंने चित्ररथको बछड़ा बनाकर कमलके पात्रमें उत्तम गन्धका दोहन किया। मुनिपुत्र रुचि उनकी ओरसे दोग्धा हुए थे। पर्वतोंने पृथ्वीसे मूर्तिमयी ओषधियों तथा भाँति-भाँतिके रत्नोंको दुहा। उनका बछड़ा हिमालय, दुहनेवाला मेरुगिरि तथा पात्र हिमालय था। वृक्ष और लता आदि वनस्पतियोंने पलाशका पात्र लेकर पृथ्वीको दुहा। कटनेपर पुनः अंकुरित हो जाना, यही उनका दूध था। खिला हुआ शालवृक्ष उनका दोग्धा और पाकड़का वृक्ष उनका बछड़ा था।

इस प्रकार समस्त लोकोंके हितके लिये राजा पृथुने सबका धारण-पोषण करनेवाली इस पृथ्वीका दोहन किया। उन्होंने धर्मसे भूतलवासियोंका रंजन किया, इसलिये उन्हें 'राजा' कहा गया। तभीसे इस पृथ्वीपर राजा शब्दकी प्रसिद्धि हुई।

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पृथुके गोष्पद तीर्थमें श्राद्ध-यज्ञ करनेसे वेनको स्वर्गप्राप्ति

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! राज्य पाकर राजा पृथुने सोचा, 'मेरे पिता बड़े अधर्मी थे, उन्होंने यज्ञ आदिका उच्छेद कर डाला था; अतः उन्हें किस लोककी प्राप्ति हुई है, इसका ज्ञान मुझे कैसे हो? वे ब्राह्मणोंके द्वारा मारे गये हैं। उनकी क्रिया किस प्रकार करनी चाहिये?' इस प्रकार सोच-विचारमें पड़े हुए राजा पृथुके समीप देवर्षि नारद आये। राजाने उन्हें आसन देकर प्रणाम किया और पूछा—'भगवन्! आप सब संसारके शुभ-अशुभको जानते हैं, मेरे पिता बड़े दुराचारी और देवताओं तथा ब्राह्मणोंके निन्दक थे। उन्हें शुभ या अशुभ—किस स्थानकी प्राप्ति हुई है?'

उन्हें शुभ या अशुभ किस स्थानकी प्राप्ति हुई है, नारदजीने दिव्य दृष्टिसे यह जानकर कहा—'राजन्! जहाँ जल और वृक्षोंसे रहित मरुप्रदेश है, वहाँ म्लेच्छोंके बीचमें उत्पन्न होकर तुम्हारे पिता यक्ष्मा और कुष्ठ रोगसे पीड़ित हैं।'

नारदजीकी यह बात सुनकर राजा पृथुने विचार किया कि 'संसारमें पुत्र वही कहलाता है, जो पिताका उद्धार करे। मेरे द्वारा किस प्रकार पिताजी पापमुक्त हो सकेंगे?' यह सोचकर उन्होंने पुनः नारदजीसे पूछा—'भगवन्! किस कर्मसे मेरे पिताकी मुक्ति होगी?'

नारदजीने कहा—राजन्! प्रधान-प्रधान तीर्थोंकी यात्रा करो। इससे तुम्हारे पिताका मोक्ष होगा।

नारदजीका यह वचन सुनकर राजा पृथुने राज्यका सारा भार मन्त्रीके ऊपर रख दिया और स्वयं तीर्थसेवनके लिये निकले। अनेक तीर्थोंकी यात्रा करके वे प्रभासक्षेत्रमें आये। उस तीर्थका माहात्म्य जाननेवाले ब्राह्मणोंको आगे करके महाराज पृथु न्यंकुमती नदीके समीप गये। वहाँ ब्राह्मणोंने उन्हें प्रेतशिलामें स्थित पदरूप तीर्थका दर्शन कराया। उस विमल तीर्थका दर्शन करके राजाके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। उन्होंने यज्ञोंकी सिद्धिके लिये कुण्डों, वेदियों तथा मण्डपोंका निर्माण किया। तदनन्तर पर्याप्त दक्षिणावाला यज्ञ विधिपूर्वक प्रारम्भ हुआ। राजा पृथुको तेजस्वी पितरोंने प्रत्यक्ष दर्शन दिया और श्राद्ध ग्रहण करके सन्तुष्ट होकर कहा—'राजन्! तुम धन्य हो, पुण्यस्वरूप हो और हम तीनों—तुम्हारे