संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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पिता, पितामह और प्रपितामह भी परम धन्य हैं, जिन्हें इस गोष्पद तीर्थमें श्राद्ध करके तुमने तार दिया।' यों कहकर वेनसहित सब पितर विमानपर बैठे और स्वर्गलोकको चले। जाते समय वेनने कहा—'राजन्! इधर मैं चार जन्म ले चुका। पहले जन्ममें कोढ़ी था, दूसरेमें पापी हुआ, तीसरेमें भी दुराचारी ही था और चौथेमें उच्छिष्ट-भोजी चाण्डाल हुआ। आज मैं सब पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकको जाता हूँ। महाभाग! अब तुम जाओ और चिरकालतक राज्य भोगो। पुत्रके द्वारा पितरोंके लिये जो कुछ किया जाता है, वह सब तुमने सफल कर दिया।'
पिताकी यह बात सुनकर राजा पृथु कुटुम्बियोंसहित बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने भूमि और सुवर्ण आदि दान देकर ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट किया। संसारमें कोई ऐसी देने योग्य वस्तु नहीं, जिसका उन्होंने वहाँ दान न किया हो। इस प्रकार पितरोंका प्रत्यक्ष दर्शन करानेवाला उस तीर्थका प्रभाव देखकर राजा अपनी राजधानीको चले गये। सारी पृथ्वीका राज्य भोगकर देहत्यागके पश्चात् उन्होंने दिव्य लोक प्राप्त किया।
गोष्पद तीर्थमें स्नान करके यत्नपूर्वक वेदज्ञ ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे और विधिपूर्वक श्राद्धमें उन्हें भोजन कराये। पितरोंकी तृप्ति चाहनेवाले पुरुषको वहाँ पिताका श्राद्ध अवश्य करना चाहिये। इसके लिये वहाँ किसी तिथि, नक्षत्र, पर्व और मास आदिका नियम नहीं है। वहाँ सदा श्रद्धायुक्त चित्तसे यात्रा करनी चाहिये। किसी विशेष कालका वहाँके लिये नियम नहीं है।
नारायणगृह तथा जालेश्वरलिंगकी महिमा, आपस्तम्ब और नाभागकी कथा, गौओं और संतोंका माहात्म्य
**महादेवजी कहते हैं—**पार्वती! गोष्पदके दक्षिण समुद्रतटपर नारायणगृह है, जिसमें साक्षात् विष्णु निवास करते हैं। वे सत्ययुगमें सुवर्णमय, त्रेतामें रत्नमय, द्वापरमें रजतमय और कलियुगमें प्रस्तरमय विग्रहमें रहते हैं। सरस्वतीके पश्चिम तटपर स्वयं श्रीहरिके द्वारा निर्मित चक्रतीर्थ है। उसमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्महत्याका नाश कर देता है। भगवान् विष्णु जब दैत्योंका विनाश करते हैं, तब विश्रामके लिये उस घरमें स्थित होते हैं। इसलिये इस भूतलपर वह नारायणगृहके नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ सत्ययुगमें भगवान् जनार्दनके नामसे प्रसिद्ध होते हैं, त्रेतामें उनका नाम मधुसूदन होता है, द्वापरमें उन्हें पुण्डरीकाक्ष कहते हैं और कलियुगमें वे नारायण कहलाते हैं। इस प्रकार चारों युगोंमें श्रीविष्णु धर्मकी स्थापना करके उस स्थानपर आते हैं। जो एकादशीको निराहार रहकर उन नारायणदेवका दर्शन करता है, वह मृत्युके पश्चात् उनके आनन्दमय अविनाशी धामको प्राप्त होता है।
न्यंकुमतीके किनारे उत्तम कुबेरनगर है। उससे अग्निकोणमें कोटीश्वरलिंग है। कुबेरसे पूर्व दिशामें बालार्केश्वर हैं और उत्तर दिशामें अम्बिकास्थान है। वहाँ कुण्डमें स्नान करनेसे ब्रह्महत्याका नाश होता है। बालार्केश्वर और अम्बिकाके दर्शनसे वाजपेय यज्ञका फल मिलता है। कुबेरनगरमें सैकड़ों तीर्थ और शिवलिंग हैं। उनका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
देविका नदीके तटपर जालेश्वरलिंग है, जिसके दर्शनसे ब्रह्महत्या नष्ट हो जाती है। पूर्वकालमें आपस्तम्ब नामके एक श्रेष्ठ महर्षि हो गये हैं। वे प्रभासक्षेत्रमें जाकर देविका नदीके जलके भीतर रहने लगे और वहाँ भगवान् शिवका ध्यान करते हुए काष्ठकी भाँति स्थित हो गये।