संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1350, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड * १३२१
तदनन्तर एक समय मछलियोंसे जीविका चलानेवाले धीवर वहाँ आये। उन्होंने वहाँ एक महाजाल बिछाकर उसे बलपूर्वक बाहरकी ओर खींचा। जालके साथ आपस्तम्बजी भी खिंच आये। तपस्यासे उद्दीप्त उन महर्षिको देखकर सब केवट भयसे व्याकुल हो उठे और चरणोंमें मस्तक रखकर उन्हें प्रणाम करके बोले—'मुने ! हमने अनजानमें यह पाप कर डाला है; आप कृपा करके हमें क्षमा कर दें और इस समय आपका जो प्रिय कार्य हो, उसे करनेके लिये आज्ञा दीजिये।' मुनिने देखा अज्ञानवश यहाँ बहुत बड़ा संहार किया गया है; तथापि वे बड़े भारी क्षमाशील थे। उन्होंने दुखी होकर कहा—'यदि ज्ञानियोंका भी चित्त केवल अपने ही लाभमें रत है, ज्ञानी भी यदि स्वार्थका आश्रय लेकर ही ध्यान करते हैं, तब इस संसारके दुःखातुर प्राणी कहाँ सुख पायेंगे। जो मनुष्य एकान्ततः दुःख भोगना चाहता है, उसे मुमुक्षु पुरुष पापीसे भी पापी कहते हैं। मैं कौन-सा ऐसा उपाय करूँ, जिससे समस्त दुःखी प्राणियोंके अन्तःकरणमें प्रविष्ट होकर उनके सब दुःखोंको अकेला ही भोगूँ? यदि मेरा कोई शुभकर्म है तो वह दीन-दुःखी प्राणियोंको प्राप्त हो और उन सबने जो दुष्कर्म किया हो, वह सब-का-सब मुझे मिल जाय। संसारके अंधे, दीन-दुखी, अंगहीन, अनाथ तथा रोगी मनुष्योंको देखकर जिसके हृदयमें दया नहीं आती, वह मेरे विचारसे राक्षस है। जो समर्थ होकर भी प्राण-संकटमें पड़े हुए भयविह्वल प्राणियोंकी रक्षा नहीं करता, वह पाप भोगता है। अतः मैं इन दीन-दुःखी भयभीत जन्तुओंको छोड़कर एक पग भी कहीं नहीं जाऊँगा। फिर स्वर्गलोककी तो बात ही क्या है।'
महर्षिकी यह बात सुनकर वे मल्लाह बहुत घबराये। उन्होंने वहाँका सब वृत्तान्त राजा नाभागसे जाकर कहा। नाभाग भी यह समाचार सुनकर ब्रह्मनन्दन आपस्तम्बजीको देखनेके लिये तुरंत वहाँ आये। उनके साथ मन्त्री और पुरोहित भी थे। उन देवकल्प मुनिका भलीभाँति पूजन करके राजाने कहा—'भगवन् ! बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?'
आपस्तम्बजीने कहा—ये दुःखसे जीविका चलानेवाले केवट मुझको और इन जलजन्तुओंको जलसे निकालनेके कारण बड़े भारी परिश्रमसे थक गये हैं। इनके परिश्रमका जो उचित मूल्य समझो, वह दे दो।
नाभाग बोले—भगवन् ! मैं निषादोंको इनके परिश्रमका मूल्य एक लाख स्वर्णमुद्रा दूँगा।
आपस्तम्बने कहा—राजन् ! तुम्हें मुझे एक लाखके मूल्यसे नहीं बाँधना चाहिये। मेरे योग्य जो मूल्य हो, वह दो। अपने मन्त्रियोंके साथ सलाह कर लो।
नाभाग बोले—द्विजश्रेष्ठ ! इन निषादोंको एक करोड़ मूल्य दे दिया जाय। यदि यह भी उचित मूल्य न हो तो और भी दिया जा सकता है।
आपस्तम्बने कहा—राजन् ! मैं एक करोड़ या इससे अधिक मूल्यमें बेचनेयोग्य नहीं हूँ। मेरे योग्य मूल्य दो। जाओ, ब्राह्मणोंके साथ सलाह कर लो।
नाभाग बोले—मेरा आधा या समूचा राज्य निषादोंको दे दिया जाय। मैं इसे ठीक मूल्य समझता हूँ। आपकी क्या राय है ?
आपस्तम्बने कहा—भूपाल ! तुम्हारा आधा या समूचा राज्य भी मेरे योग्य नहीं है। मेरे योग्य मूल्य दो। समझमें न आये तो ऋषियोंके साथ विचार करो।
आपस्तम्बजीका यह वचन सुनकर राजा नाभाग अपने मन्त्री और पुरोहितोंके साथ दुःखसे आतुर एवं चिन्तित हो गये। इसी समय महातपस्वी महर्षि लोमश वहाँ आ गये और राजा नाभागसे बोले—'तुम डरो मत, मैं मुनिको सन्तुष्ट कर लूँगा।'
नाभाग बोले—महाभाग ! इन महात्मा मुनिका मूल्य बताइये और कुल, कुटुम्ब एवं बन्धु-