भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1347, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1347

१३१८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


ओर देखकर मुनियोंने कहा—'निषीद (बैठ जाओ)।' इससे वह निषाद कहलाया और निषादवंशका प्रवर्तक हुआ। उससे तुम्बर और खस आदि अन्य जो धीवर जातियाँ उत्पन्न हुईं, उन्होंने विन्ध्यगिरिको अपना निवास स्थान बनाया; फिर उन महर्षियोंने वेनके दाहिने हाथको अरणीकी भाँति मथा। इससे सूर्य और अग्निकी भाँति पृथु पैदा हुए। उनका शरीर बड़ा तेजस्वी था। उन्होंने लोकरक्षाके लिये आजगव नामक धनुष, सर्पोंके समान बाण, खड्ग तथा कवच धारण किया। उनके प्रकट होनेपर सब प्राणी हर्षमें भर गये। वेन स्वर्गलोकको चला गया। तदनन्तर नदियाँ और समुद्र भाँति-भाँतिके रत्न लेकर राजा पृथुका अभिषेक करनेके लिये उपस्थित हुए। ऋषियों और देवताओंके साथ भगवान् ब्रह्माजी भी आये। आंगिरस देवताओंने प्रतापी राजा पृथुको राजपदपर अभिषिक्त किया। उनके राज्यमें पृथ्वी बिना जोते-बोये ही अन्न पैदा करती थी। चिन्तन करनेमात्रसे ही मन्त्र सिद्ध हो जाते थे। सभी गौएँ कामधेनु थीं और वृक्षोंके एक-एक पत्तेसे मधुकी प्राप्ति होती थी। राजा पृथुको देखकर प्रसन्न हुए महर्षियोंने प्रजाजनोंसे कहा—'ये वेननन्दन राजा पृथु तुम सब लोगोंको जीविका प्रदान करेंगे।' यह सुनकर प्रजाओंने महाभाग पृथुका स्तवन किया और कहा—'आप महर्षियोंके कथनानुसार हमारे लिये आजीविकाकी व्यवस्था करें।' तब बलवान् राजा पृथुने प्रजाकी रक्षाकी इच्छासे धनुष-बाण लेकर पृथ्वीपर आक्रमण किया। पृथ्वी उनके भयसे थर्रा उठी और गायका रूप धारण करके भागी। पृथुने भी उसका पीछा किया। अन्तमें वह उन्हींकी शरणमें आयी और हाथ जोड़कर बोली—'राजन्! मेरे बिना तुम प्रजाको कैसे धारण करोगे? मेरे ऊपर ही सम्पूर्ण लोक स्थित हैं। मैं ही इस जगत्‌को धारण करती हूँ। मेरे बिना सारी प्रजा नष्ट हो जायगी। अतः तुम्हें मेरा वध नहीं करना चाहिये। महीपते! क्रोध छोड़ो। मैं तुम्हारी आज्ञाके अनुकूल चलूँगी। तुम्हें धर्मका त्याग नहीं करना चाहिये।'

पृथ्वीकी यह बात सुनकर धर्मात्मा एवं उदार राजा पृथुने अपने क्रोधको रोका और इस प्रकार कहा—'जो अपने या पराये एकके हितके लिये स्वार्थवश बहुत-से प्राणियोंका वध करता है, उसे पाप लगता है। यदि किसी एकको मार देनेसे बहुत लोग सुखी हो जाते हों तो उसके मारनेपर पातक नहीं लगता। अतः वसुन्धरे! यदि तू मेरी आज्ञासे संसारका हित नहीं करेगी तो मैं प्रजाके लिये तेरा वध कर डालूँगा। मेरी आज्ञाके विपरीत चलनेवाली तुझ वसुधाको बाणोंसे मारकर मैं स्वयं अपने शरीरको विशाल बनाकर समस्त प्रजाको धारण करूँगा; अतः तू मेरी आज्ञासे समस्त प्रजाको जीविका प्रदान कर; क्योंकि ऐसा करनेमें तू समर्थ है।'

राजा पृथुके इस प्रकार कहनेपर पृथ्वीने उत्तर दिया—'राजन्! मैं यह सब करूँगी। तुम मेरे लिये बछड़ेकी कल्पना करो। जिसके प्रति वत्सल होकर मैं दूधके रूपमें अन्न प्रदान करूँ। इसके सिवा मुझे समतल बनाओ, जिससे मैं अपने दूधको सर्वत्र फैला सकूँ।'

तब राजा पृथुने धनुषकी कोटिसे पर्वतों और शिलाखण्डोंको उखाड़कर एक जगह किया और चाक्षुष मनुको बछड़ा बनाकर उन्होंने अपने हाथमें अन्नोंको दुहा। तदनन्तर चन्द्रमा बछड़ा हुए, बृहस्पति दुहनेवाले बने, गायत्री आदि छन्द दुग्धपात्र हुए और तपस्या एवं सनातन ब्रह्म उन्हें दुग्धरूपमें प्राप्त हुआ। फिर इन्द्र आदि देवताओंने सुवर्णमय पात्र लेकर इस पृथ्वीको दुहा। उस समय इन्द्र बछड़ा और सूर्य दुहनेवाले हुए। उनका दूध अमृतमय था। इसी प्रकार पितरोंने भी चाँदीके पात्रमें अपनी तृप्तिके लिये सुधारूप दुग्धका दोहन किया। उनके लिये वैवस्वत मनु बछड़ा और अन्तक दुहनेवाले थे। असुरोंने लोहेके पात्रमें मायाशक्तिका दोहन किया। उस समय दूध