भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1346
  • प्रभासखण्ड * १३१७

गये हैं, मेरे कुलमें जिनके लिये पिण्डदान आदि क्रियाएँ नहीं हुई हैं, जो स्त्री और पुत्रसे रहित हैं, जिनके श्राद्ध आदि कर्मोंका लोप हो गया है, जो जन्मसे अन्धे, पंगु तथा विकृत रूपवाले रहे हैं, जो कच्चे गर्भकी अवस्थामें ही मर गये हैं—इस प्रकार मेरे कुलमें जो ज्ञात अथवा अज्ञात पूर्वज मृत्युको प्राप्त हुए हैं, उन सबके लिये मैंने यह पिण्ड दिया है। यह अक्षय होकर उन सबको प्राप्त हो। मेरे सभी पितर सदाके लिये प्रेतभावसे मुक्त हो जायें। इस गोष्पद तीर्थमें जो कुछ भी मधुमिश्रित गोदुग्ध, घृत और खीर आदि दिया गया है, वह सब पूर्वोक्त सभी पितरोंको अक्षय होकर प्राप्त हो।'

तदनन्तर श्राद्धकर्ता वहाँ वेदमन्त्रोंका स्वाध्याय करे। सब पुराण सुनाये। ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य तथा रुद्र-सम्बन्धी नाना प्रकारके स्तोत्रोंका पाठ करे। ऐन्द्रसूक्त, सोमसूक्त, पवमानसूक्त, बृहत्साम, रथन्तरसाम, ज्येष्ठसाम, शान्तिकाध्याय, मधुब्राह्मण तथा मण्डल-ब्राह्मणका भी यथासम्भव पाठ करे। ये सब स्तोत्र पितरोंको प्रसन्न करनेवाले हैं। इस प्रकार न्यंकुमती नदीमें स्नान करके उत्तम गोष्पद तीर्थमें विधिवत् पिण्डदान करनेके पश्चात् पुनः निम्नांकित मन्त्रका पाठ करे—

साक्षिणः सन्तु मे देवा ब्रह्माद्या ऋषिपुङ्गवाः।
मयेदं तीर्थमासाद्य पितॄणां निष्कृतिः कृता॥
आगतोऽस्मि इदं तीर्थं पितृकार्ये सुरोत्तमाः।
भवन्तु साक्षिणः सर्वे मुक्तश्चाहमृणत्रयात्॥

'ब्रह्मा आदि देवता और श्रेष्ठ मुनिवर साक्षी रहें। मैंने इस तीर्थमें आकर पितरोंका ऋण चुकाया है। श्रेष्ठ देवताओ! मैं पितृकार्यके लिये इस तीर्थमें आया हूँ। आज मैं तीनों ऋणोंसे मुक्त हो गया, इस बातके आप सभी लोग साक्षी रहें।'

इस प्रकार उत्तम गोष्पद तीर्थकी परिक्रमा करके ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे और पिण्डोंका नदीमें विसर्जन कर दे। वृद्धि-श्राद्धमें मातासे आरम्भ करके और गयामें पितासे प्रारम्भ करके श्राद्ध करना चाहिये। इस तीर्थमें श्राद्ध और पिण्डदान करनेवाला पुरुष अपने पितरोंको विष्णुलोकमें पहुँचा देता हैं। गोष्पद तीर्थमें जो एक ब्राह्मणको भोजन कराता है, उसे कोटि ब्राह्मणोंको भोजन देनेका पुण्य मिलता है।

पूर्वकालमें वेन नामक राजा हो गया है। वह मृत्युकी कन्याका पुत्र था। अतः मातामहके दोषसे उसमें भी क्रूरतापूर्ण विचार आ गया। उसने अपने धर्मको पीछे छोड़कर पापमें मन लगाया। वेद-शास्त्रोंका उल्लंघन करके वह अधर्ममें तत्पर हो गया। उसका विनाशकाल उपस्थित था; इसलिये उसकी ऐसी बुद्धि हुई कि 'मैं ही सब यज्ञों और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके द्वारा स्तवन और पूजन करने योग्य हूँ।' इस निश्चयके द्वारा धर्मका उल्लंघन करके वह प्रजाजनोंको पीड़ा देने लगा। उसका यह बर्ताव देख मरीचि आदि महर्षि कुपित होकर बोले—'वेन! तुम अधर्म न करो। तुम जो कुछ करते हो, वह सनातन धर्म नहीं है। तुमने राजसिंहासनपर बैठते समय पहले यह प्रतिज्ञा की है कि 'मैं प्रजाजनोंका पालन करूँगा।' परंतु अब इसके विपरीत आचरण करते हो।'

महर्षियोंके यों कहनेपर दुर्बुद्धि वेन हँसकर बोला—'मेरे सिवा कौन धर्मकी सृष्टि करनेवाला है। पराक्रम, शास्त्रज्ञान, तपस्या और सत्यके द्वारा मेरी समानता करनेवाला इस भूतलपर कौन है। तुमलोग मुझे धर्मकी उत्पत्तिका स्थान समझो। मैं चाहूँ तो इस पृथ्वीको जला सकता हूँ, संसारकी सृष्टि कर सकता हूँ और सबका संहार भी कर सकता हूँ।'

गर्व और उद्दण्डतासे मोहित हुए वेनको जब वे किसी प्रकार समझानेमें सफल न हुए, तब सभी महर्षियोंने कुपित हो अथर्ववेदीय आभिचारिक मन्त्रके प्रयोगसे महाबली वेनको मारकर उसकी बायीं भुजाका मन्थन किया। उससे एक छोटा-सा काले रंगका पुरुष पैदा हुआ। वह भयभीत हो हाथ जोड़कर सामने खड़ा हो गया। उसकी