संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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‘ब्रह्माजीसे लेकर तृणपर्यन्त समस्त देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य तथा माता और मातामह आदि समस्त पितर मेरे दिये हुए जलमें तृप्त हों।’
इस प्रकार विधिपूर्वक तर्पण करके मनुष्य शास्त्रोक्त विधिसे पिण्डयुक्त श्राद्ध करे। पहले शास्त्रके ज्ञाता निर्दोष ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करके उन्हें अर्घ्य देकर इस प्रकार कहे—
कव्यवाडनलः सोमो यमश्चैवार्यमा तथा।
अग्निष्वात्ता बर्हिषदः सोमपाः पितृदेवताः॥
आगच्छन्तु महाभागाः युष्माभी रक्षितास्त्विह।
मदीयाः पितरो ये च कुले जाताः सनाभयः॥
तेषां पिण्डप्रदाताहमागतोऽस्मि पितामह॥
‘कव्यवाट् अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, बर्हिषद् और सोमप नामके पितृदेवताओ! आप सभी महाभाग यहाँ पधारें और आपके द्वारा सुरक्षित जो मेरे पितर, वंशज एवं सहोदर हों, वे भी यहाँ पदार्पण करें। पितामह! उन सबको पिण्डदान देनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ।’
यों कहकर फिर निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करे—
पिता पितामहश्चैव प्रपितामह एव तु।
माता पितामही चैव तथैव प्रपितामही॥
मातामहस्तत्पिता च प्रमातामहकादयः।
तेषां पिण्डो मया दत्तो ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु॥
ॐ नमो भगवते भर्त्रे सोमभौमेज्यरूपिणे।
‘पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, पितामही, प्रपितामही, मातामह, प्रमातामह तथा वृद्धप्रमातामह आदि जो पितर हैं, उनके लिये मेरे द्वारा दिया हुआ यह पिण्ड अक्षय्यरूपसे उपस्थित हो। सोम, मंगल और बृहस्पतिरूप भगवान् विश्वम्भरको नमस्कार है।’
इस प्रकार नमस्कार एवं पूजन करके गोष्पदके समीप अनाथ पितरोंके लिये पिण्डदान करे। उस समय निम्नांकित स्तुतिका पाठ करना चाहिये—
अस्मत्कुले मृता ये च गतिर्येषां न विद्यते।
रौरवे चान्धतामिस्रे कालसूत्रे च ये गताः॥
तेषामुद्धरणार्थाय इदं पिण्डं ददाम्यहम्।
अनन्तयातनासंस्थाः प्रेतलोकेषु ये गताः॥
पशुयोनिं गता ये च पक्षिकीटसरीसृपाः।
अथवा वृक्षयोनिस्थास्तेभ्यः पिण्डं ददाम्यहम्॥
येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु पिण्डदानेन सर्वदा॥
ये केचित् प्रेतरूपेण वर्तन्ते पितरो मम।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु पिण्डदानेन सर्वदा॥
दिव्यन्तरिक्षभूमिस्थाः पितरो बान्धवादयः।
मृता असंस्कृता ये च तेषां पिण्डस्तु मुक्तये॥
पितृवंशे मृता ये च मातृवंशे तथैव च।
गुरुश्वशुरबन्धूनां ये चान्ये बान्धवाः स्मृताः॥
ये मे कुले लुप्तपिण्डाः पुत्रदारविवर्जिताः।
क्रियालोपगता ये च जात्यन्धाः पङ्गवस्तथा॥
विरूपा आमगर्भाश्च ज्ञाताज्ञाताः कुले मम।
तेषां पिण्डो मया दत्तो ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु॥
प्रेतत्वात् पितरो मुक्ता भवन्तु मम शाश्वतम्।
यत् किञ्चिन्मधुसंमिश्रं गोक्षीरं घृतपायसम्॥
अक्षय्यमुपतिष्ठेत् तत् त्वस्मिंस्तीर्थे तु गोष्पदे।
‘हमारे कुलमें जो लोग मरे हैं किंतु जिनकी सद्गति नहीं हुई है, जो रौरव, अन्धतामिस्र और कालसूत्र आदि नरकोंमें पड़े हैं, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। जो अनन्त यातनाओंमें पड़े हैं, प्रेतलोकोंमें गये हुए हैं, पशु, पक्षी, कीट, सर्प अथवा वृक्षयोनिमें स्थित हैं, उन सबके लिये मैं यह पिण्ड देता हूँ। जो हमारे बान्धव नहीं हैं, जो हमारे बान्धव हैं अथवा जो अन्य जन्मोंमें बान्धव रहे हैं, वे सब इस पिण्डदानसे सदा तृप्त रहें। मेरे जो पितर प्रेतरूपमें विद्यमान हैं, वे सब इस पिण्डदानसे सदा तृप्त रहें। जो पितर तथा बान्धव आदि स्वर्ग, अन्तरिक्ष एवं भूलोकमें स्थित हैं, जिनका मरनेके बाद संस्कार नहीं हुआ है, यह पिण्ड उन सबको मुक्ति देनेवाला हो। जो मेरे पितृकुलमें, मातृकुलमें, गुरुकुल, श्वशुरकुल तथा बन्धुकुलमें रहे हैं तथा इनके अतिरिक्त भी जो बान्धव कहे