भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1344
  • प्रभासखण्ड * [ १३१५ ]

मनुष्य कोटि यज्ञोंका फल तथा समस्त अभीष्ट वस्तुएँ प्राप्त कर लेता है। वहाँ ऋषियोंद्वारा स्थापित किये हुए बहुतसे शिवलिंग हैं। उनका दर्शन, स्पर्श और पूजन करके मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है। जहाँ क्षेत्रकी परिधिरूप मधुमती नामक स्थान है, वहाँ समुद्र-तटपर लिंगेश्वरदेव तथा सप्तकूप हैं। वहाँ श्राद्ध करके मनुष्य गयासे कोटिगुना फल पाता है।


तलस्वामी, शंखावर्त तीर्थ और गोष्पद तीर्थकी महिमा, वहाँ श्राद्धकी विधि तथा राजा पृथुके द्वारा पृथ्वीका दोहन

महादेवजी कहते हैं—मनुष्यको चाहिये कि वह तलस्वामी विष्णुका स्मरण करे, फिर 'सहस्रशीर्षा' मन्त्रसे तर्पण आदि करे। विधिवत् स्नान करके श्रीविष्णुको अर्घ्य दे। गन्ध, पुष्प, वस्त्र, अनुलेपन, मधु, इक्षुरस, कुंकुम, कपूर, खस तथा कस्तूरी आदि उपचारोंसे उनकी पूजा करे; फिर वस्त्रोंसे वेष्टित करके उत्तम नैवेद्य भोग लगाये। धर्मकथा-श्रवणपूर्वक रात्रिमें जागरण करे। वेदज्ञ श्रोत्रिय ब्राह्मणको सुवर्ण और दो वस्त्र दान करे। उस दिन उपवासपूर्वक श्रीविष्णुको नमस्कार करके रुक्मिणीजीका दर्शन करे। भक्तिभावसे यों करके मनुष्य अपने जन्मका फल पाता है। समस्त यज्ञों, दानों, तीर्थों और व्रतोंका भी फल पा लेता है। पितृवर्ग और मातृवर्गका भी उद्धार करता है तथा जन्मभरके किये हुए पापोंका नाश कर देता है।

वहाँसे पश्चिम न्यंकुमती नदीके उत्तम तटपर दक्षिण दिशाकी ओर शंखावर्त नामक तीर्थ है, जहाँ स्वयं प्रकट हुई अति उत्तम रक्तगर्भा 'चक्रांकित' शिला स्थित है। पूर्वकालमें सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णुने वेदोंका अपहरण करनेवाले शंखासुरको जहाँ मारा है, वह विष्णुक्षेत्र कहा गया है। उसीको शंखोदक तीर्थ भी कहते हैं। वह शंखाकार दिखायी देता है। उसमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है तथा शूद्रको भी लगातार सात जन्मोंतक ब्राह्मणयोनि प्राप्त होती है।

तत्पश्चात् गोष्पद तीर्थको जाय, जहाँ श्राद्ध करके मनुष्य गयासे सातगुना अधिक फल पाता है। वहीं श्राद्ध करके वेननन्दन पृथुने अपने पिताको पाप-योनिसे मुक्त किया था।

न्यंकुमती नदी परम पवित्र और महासिद्ध है। वह इस क्षेत्रकी सीमाके लिये लायी गयी है। सब पापोंका नाश करनेवाली वह नदी पर्णादित्यसे दक्षिण भागमें स्थित है। नारायणगृहसे उत्तर दिशामें थोड़ी ही दूरपर उसकी स्थिति है। उसीके भीतर विख्यात गोष्पद नामक तीर्थ है। गोष्पदके समीप थोड़ी ही दूरपर नागराज अनन्त स्वतः प्रकट हुए हैं, जो पृथ्वीपर उस तीर्थकी रक्षाके लिये नियुक्त किये गये हैं। नरकसे अत्यन्त भयभीत होनेवाले पितर पुत्रप्राप्तिकी इच्छा रखते हैं और कहते हैं—'हमारे वंशजोंमेंसे जो गोष्पदतीर्थकी यात्रा करेगा, वही हमारा उद्धार करनेवाला होगा।' गोष्पदतीर्थमें पुत्रको देखकर पितरोंके यहाँ उत्सव मनाया जाता है। खीर, मधु, सत्तू, आटा, तिल और अक्षत आदिसे वहाँ श्राद्ध करके मनुष्य अपने पितरोंको स्वर्गलोकमें भेज देता है। उस तीर्थमें श्रेष्ठ पुरुष नास्तिकका संग न करे। सब सामग्रियोंके सहित श्रद्धालु पुरुष आस्तिक मनुष्यके साथ उस तीर्थमें जाय और वहाँ पहुँचकर मन-ही-मन यह भावना करे कि मैं गया तीर्थमें आया हूँ। इस प्रकार जो ब्राह्मण प्रतिग्रहरहित होकर वहाँकी यात्रा करता है, उसे पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। वहाँ न्यंकुमती नदीमें स्नान करके पितरोंकी मुक्तिके लिये विधिपूर्वक श्राद्ध-तर्पण करे। तर्पणके समय इस प्रकार कहे—

ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः।
तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः ॥