भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1343

१३१४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


स्थलकेश्वरसे पूर्व दिशामें कुछ आग्नेयकोणकी ओर विश्वकर्माद्वारा स्थापित दो महापुण्यमय लिंग हैं। विश्वकर्मा जब नगरका निर्माण करनेके लिये वहाँ आये, उस समय उन्होंने पहले शिवलिंगकी स्थापना की। तत्पश्चात् पुनः नगर-निर्माणका कार्य प्रारम्भ किया। विवाह और गृहप्रतिष्ठा आदि प्रत्येक कार्यके आदि और अन्तमें उन दोनों लिंगोंकी पूजा करके मनुष्य तत्काल सिद्धिको पाता है।

वहाँसे दक्षिण भागमें समस्त पातकोंका नाश करनेवाले दुर्गादित्य नामक सूर्यदेवके समीप जाय। जो रविवारयुक्त सप्तमीमें उनका पूजन करता है, उसके सब दुःख और अनेक प्रकारके कुष्ठ नष्ट हो जाते हैं।

वहाँसे दक्षिण भागमें ऋषितोयाके तटपर सोमेश्वरलिंग है, जिसका नाम पहले भूतेश्वर था। सोमेश्वरका दर्शन-पूजन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। वहाँसे उत्तर भागमें कुछ वायव्यकोणकी ओर सिद्धिदायक विनायक विराजमान हैं। जिन कुबेरको मैंने अपना सखा बताया है, वे ही गणनाथरूपसे इस स्थानमें लोगोंको सिद्धि प्रदान करनेके लिये स्थित हैं। जो मंगलवारयुक्त चतुर्थीको लड्डूसहित नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंद्वारा उनकी विधिपूर्वक पूजा करता है, उसे निश्चय ही सिद्धि प्राप्त होती है।

तदनन्तर ऋषितोयाके तटपर स्थित सर्वविघ्न-नाशक विनायकका दर्शन करनेके लिये जाय। वे साक्षात् त्रिपुरान्तक शिव हैं और गजरूप धारण करके महाक्षेत्र प्रभासमें ऊँचे स्थानपर अपने कोटिगणोंके साथ स्थित हैं। अतः निर्विघ्नतापूर्वक यात्राकी सिद्धिके लिये गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंद्वारा उनका पूजन करना चाहिये। योगक्षेमकी सिद्धिके लिये उनकी यात्राका महोत्सव भी करना चाहिये। वहाँसे उत्तर महाकालेश्वरदेव हैं, जो उस पुरके अधिष्ठाता रौद्ररूपधारी भैरव हैं। पूर्णमासी और अमावास्याको इनकी महापूजा करनी चाहिये। जो महोदय तीर्थमें स्नान करके महाकालका दर्शन करता है, वह सात हजार जन्मोंतक संसारमें धनाढ्य होता है।

वहाँसे ईशानकोणमें महोदय तीर्थ है। उसमें विधिपूर्वक स्नान करके जो देवताओं और पितरोंका तर्पण करता है, उसे प्रतिग्रहजनित दोषसे भय नहीं होता। उस तीर्थकी रक्षाके लिये महाकालके उत्तर भागमें मेरी प्रेरणासे मातृकाएँ रहती हैं। वहाँ स्नान करके मनुष्य पहले उन मातृकाओंकी ही पूजा करे। वहाँसे वायव्यकोणमें संगमेश्वर लिंग है और उससे भी पूर्वदिशामें पापनाशिनी कुण्डिका है, जहाँ बडवानलसहित सरस्वतीजी आयी हैं। जो कुण्डिकामें स्नान करके संगमेश्वरका पूजन करता है, उसका सहस्र जन्मोंतक लक्ष्मी, पुत्र तथा प्रियजनोंसे कभी वियोग नहीं होता। वह जन्मसे लेकर मृत्युतकके समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।

उस स्थानसे तीन योजन उत्तर तप्तोदकस्वामी हैं, जहाँ भगवान् विष्णुने युद्ध करके दैत्यराज तलका वध किया था। जो मानव तप्तकुण्डमें स्नान करके तलस्वामीकी पूजा तथा स्नान करता है, वह करोड़ों यात्राओंका फल पाता है। उससे पूर्वदिशामें कालमेधलिंगरूपी क्षेत्रपाल हैं। अष्टमी और चतुर्दशीको विस्तारपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये। वे कलियुगमें कल्पवृक्षके समान मनोवांछित फल देनेवाले हैं।

वहाँसे दक्षिण भागमें पचीस धनुषके अन्तरपर सब पापोंका नाश करनेवाली रुक्मिणीदेवी स्थित हैं। तप्तोदक कुण्डमें स्नान करके रुक्मिणीजीकी पूजा करे। इससे सात जन्मोंतक स्त्रियोंकी गृहस्थी भंग नहीं होती। बलभद्रसे पूर्वदिशामें एक श्रेष्ठ नदी है, जहाँ दुर्वासेश्वरलिंग प्रतिष्ठित है। जो अमावास्याको उस नदीमें स्नान करके पिण्ड देता है, वह सौ कोटि कल्पोंसे अधिक कालतकके लिये पितरोंको तृप्त कर देता है। वहाँ दुर्वासेश्वर शिवका विधिपूर्वक पूजन करके