संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1342, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड * १३१३
माधव, शृगालेश्वर, त्रिपथगा, गोपालस्वामी, उत्तरार्क, मरुद्देवी आदि विविध तीर्थ और देवविग्रहोंके सेवनकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! उसके दक्षिण भागमें थोड़ी ही दूरपर शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् माधव विराजमान हैं। जो शुक्लपक्षकी एकादशीको स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनकर गन्ध, पुष्प और अनुलेपनके द्वारा भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। जो विष्णुकुण्डमें स्नान करके माधवकी पूजा करता है, वह श्रीहरिके परमधाममें जाता है।
वहाँसे उत्तर दिशामें कुछ वायव्यकोणकी ओर शृगालेश्वर लिंग है। महातेजस्वी इन्द्र, वरुण, कुबेर, यमराज, अग्नि, आदित्य, वसु तथा समस्त लोकपालोंने उस महालिंगकी आराधना की है। जो शृगालेश्वरका पूजन करेंगे, उनके कुलमें कोई निर्धन नहीं होगा। जो मनुष्य अमावास्या तिथिको यहाँ आकर स्नान करके क्रोधरहित हो विधिपूर्वक पितरोंका श्राद्ध करता है, उसके पितर प्रलयकालतक तृप्त रहते हैं। इस क्षेत्रका विस्तार एक मीलतक है। उसमें जो मृत्युको प्राप्त होते हैं, उन्हें उत्तम गतिकी प्राप्ति होती है। जो अनशन-व्रत ग्रहण करके इस तीर्थमें प्राणोंका त्याग करते हैं, वे परमेश्वरमें लीन हो जाते हैं।
शृगालेश्वरसे ईशानकोणमें सात धनुषकी दूरीपर त्रिपथगा गंगा हैं। उसके जलमें उत्पन्न होनेवाली मछलियाँ इस कलियुगमें भी तीन नेत्रोंवाली देखी जाती हैं। वहाँ स्नान करके मनुष्य पाँच महापातकोंसे मुक्त हो जाता है।
चण्डीशसे पूर्व भागमें बीस धनुषपर गोपाल-स्वामीका स्थान है; जो माघमासमें गोपालस्वामी श्रीहरिका दर्शन, पूजन तथा वहाँ रात्रिमें जागरण करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। वहाँसे उत्तर दिशामें आठ धनुषपर वकुलस्वामी सूर्यदेवका स्थान है। जो मनुष्य रविवारयुक्त सप्तमीमें वहाँ जागरण करता है, वह सभी अभीष्ट वस्तुओंको पाता और स्वर्गलोकमें पूजित होता है।
वहाँसे वायव्यकोणमें सोलह धनुषपर उत्तरार्क नामसे प्रसिद्ध भगवान् सूर्य विराजमान हैं। वहाँ रथसप्तमीको उपवास करके मनुष्य सब रोगोंसे मुक्त हो जाता है। वहीं देवकुलसे आग्नेयकोणमें दो कोस दूर समुद्रके सुरम्य तटपर परम उत्तम ऋषितीर्थ है। वहाँ पत्थरकी आकृतिवाले ऋषिलोग आज भी देखे जाते हैं, जो सब पातकोंका नाश करनेवाले हैं।
वहाँसे पश्चिम दिशामें आधे कोसपर मरुद्देवी हैं, जो मरुद्गणोंके द्वारा पूजित तथा समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली हैं। मनुष्यको चाहिये कि समस्त कामनाओंकी सिद्धिके लिये महानवमी और सप्तमी तिथिको गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंद्वारा यत्नपूर्वक उनकी पूजा करे।
देवकुलसे पूर्वमें दस कोसपर शबरस्थानमें क्षेमादित्य नामसे प्रसिद्ध सूर्यदेवका स्थान है। उनका दर्शन करके मनुष्य क्षेम तथा अर्थसिद्धिका भागी होता है। रविवारयुक्त सप्तमीको पूजित होनेपर वे समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देते हैं।
देवकुण्डसे उत्तर और भास्करसे दक्षिण कण्टकशोधिनी देवीका स्थान है। जो मनुष्य अष्टमी तथा नवमीके दिन उनकी पूजा करता है, उसको राक्षसों और पिशाचोंसे भय नहीं होता और वह उत्तम सिद्धिको पाता है।
उससे पूर्वदिशामें थोड़ी ही दूरपर ब्राह्मणोंद्वारा स्थापित ब्रह्मेश्वर लिंग है। जो ऋषितोयाके जलमें स्नान करके उसका पूजन करता है, वह ब्राह्मण जडतासे रहित एवं वेदज्ञ होता है। भगवती चण्डीके गणोंद्वारा वह स्थान सुरक्षित है। मैंने सीमासहित वह स्थान ब्राह्मणोंको दे दिया है।