भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1341

१३१२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करनेके लिये कोई पापनाशिनी नदी प्रदान कीजिये।<br><br>उनके यों कहनेपर ब्रह्माजीने वहाँ मूर्तिमती नदियोंकी ओर दृष्टिपात किया। उन्हें देखकर फिर कमण्डलुकी ओर दृष्टि डाली। तब वे सभी नदियाँ उनके कमण्डलुमें प्रवेश कर गयीं।<br><br>ब्रह्माजी बोले—महर्षियो! ये सब महापुण्यमयी नदियाँ कृपापूर्वक भूलोकमें जानेके लिये इस कमण्डलुमें प्रविष्ट हुई हैं। यदि इनमेंसे किसी एकको भेजूँ तो औरोंके मनमें क्रोध होगा; अतः इस कमण्डलुमें स्थित सभी नदियोंको मैं देवदारु-वनमें जानेके लिये छोड़ता हूँ।<br><br>यों कहकर ब्रह्माजीने उन सबको छोड़ दिया और कहा—'मैंने ऋषियोंकी प्रार्थनासे तोयरूपा इन नदियोंको स्नानके लिये दिया है, इसलिये इनसे प्रकट होनेवाली नदी ऋषितोया नामसे प्रसिद्ध होगी। इस प्रकार देवदारु-वनमें ऋषितोया नदीका आगमन हुआ है। पूर्ववाहिनी ऋषितोया नदी जहाँ समुद्रमें मिली हैं, वहाँ जो मनुष्य स्नान और जलपान करते हैं, वे धन्य हैं। वहाँ प्रातःकाल गंगा, पूर्वाह्न कालमें यमुना, मध्याह्नकालमें सहस्रों नदियोंके साथ सरस्वती, अपराह्नकालमें नर्मदा तथा सायाह्नकालमें सूर्यपुत्री तपती नदी बहती है। यों जानकर जो विद्वान् उसमें स्नान और विधिवत् श्राद्ध करता है, वह उसके फलका भागी होता है।<br><br>ऋषितोयाके पश्चिम दो कोस दूर शृगालेश्वर लिंग है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है। वहाँ गुप्त प्रयाग, माधवदेव तथा गंगा, यमुना और सरस्वती हैं। वहाँ स्नान, जलस्पर्श तथा पूजन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्तहो जाता है। वहाँ ब्रह्मकुण्ड, विष्णुकुण्ड तथा रुद्रकुण्ड हैं। इनके अतिरिक्त चौथा त्रिसंगम तीर्थ भी है, जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती तीनोंका संगम हुआ है। ब्रह्मकुण्डमें एक करोड़, वैष्णवकुण्डमें भी एक करोड़ और रुद्रकुण्डमें डेढ़ करोड़ तीर्थ हैं। पश्चिममें ब्रह्मकुण्ड, पूर्वमें वैष्णवकुण्ड और मध्यभागमें रुद्रकुण्ड है। जहाँ कुण्डके मध्यभागसे गंगाजी निकलकर सूर्यपुत्री यमुनासे मिली हैं, वहाँ संगम कहलाता है। इन दोनोंके सूक्ष्म अन्तरमें गुप्त सरस्वतीकी स्थिति मानी गयी है। इनके पास ही तीर्थराज प्रयाग है। जो मनुष्य माघमासमें सूर्यके मकरराशिपर स्थित रहते समय प्रातःकाल सूर्योदयकालमें यहाँ आकर स्नान करता है, वह एक स्नानसे मानसिक, द्वितीय स्नानसे वाचिक और तृतीय स्नानसे शारीरिक पापको नष्ट कर देता है। चौथे स्नानसे सांसर्गिक पाप, पाँचवें स्नानसे गुप्त पाप और छठे स्नानसे उपपातकोंका नाश करता है। इन कुण्डोंमें सात बारके स्नानसे मनुष्य अपने महापातकोंका भी नाश कर देता है। जो पूरे एक मासतक गुप्त प्रयागमें स्नान करता है, उसके फलको ब्रह्मा आदि देवता कोटि कल्पोंमें भी नहीं बता सकते। प्रभासमें जो कोई भी तीर्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा अत्यन्त प्रिय तथा सब पातकोंका नाश करनेवाला यही तीर्थ है। मैंने इस तीर्थकी रक्षाके लिये मातृकाओंको नियुक्त किया है। भाँति-भाँतिके नैवेद्योंसे यत्नपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिये। जो कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको श्रद्धा-भक्तिके साथ वहाँ पितरोंका श्राद्ध करता है, वह पितृवर्ग और मातृवर्ग दोनोंका उद्धार कर देता है।

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