भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1340
  • प्रभासखण्ड * | १३११ ---|---

दीनका उद्धार कीजिये। भव! आप सबका कल्याण करनेवाले हैं। मेरा भी कल्याण कीजिये। जिनकी पूजा करके ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवता स्वर्गमें इच्छानुसार विहार करते हैं, उन वन्दनीय शिवकी शरणमें आकर मैं उन्हींकी स्तुति, उन्हींका गुणगान, उन्हींके नामका जप और उन्हींकी वन्दना करता हूँ।'

इस प्रकार स्तुति करके जब कुबेरजी चुप हुए, तब भगवान् शिवने उन्हें अपने मित्रका पद, दिक्पालका पद और देवताओंके धनाध्यक्षका पद—ये तीन वर प्रदान किये और कहा—'यह स्थान तुम्हारे ही नामपर कुबेरनगर कहलायेगा। तुमने इस स्थानसे पश्चिममें जो शिवलिंग स्थापित किया है, उसका जो पुरुष श्रीपंचमीके दिन विधिपूर्वक पूजन करेगा, उसके यहाँ सात पीढ़ियोंतक लक्ष्मी बराबर बनी रहेगी।'


भद्रकाली, कुबेर, ऋषितोया नदी, शृगालेश्वर तथा गुप्त प्रयागका माहात्म्य

**महादेवजी कहते हैं—**पार्वती! कुबेरस्थानसे उत्तर भागमें मनोवांछित वस्तुओंको देनेवाली महादेवी भद्रकालीका स्थान है। जो चैत्रमासकी तृतीयाको उनकी पूजा करता है, उसे सौभाग्य, विजय और लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है।

कुबेरस्थानसे नैर्ऋत्य भागमें साक्षात् कुबेरजी विराजमान हैं। जो पंचमी तिथिको भक्तिभावसे गन्ध, पुष्प तथा चन्दन आदिके द्वारा उनकी पूजा करता है, उसे विघ्नरहित अनुपम निधिकी प्राप्ति होती है। वहाँ कुण्डमें स्नान करनेसे ब्रह्महत्या-जैसे पापोंका नाश हो जाता है। उसके पूर्वभागमें बालार्केश्वर लिंग तथा उत्तर भागमें गयाक्षेत्रसहित अम्बिका स्थान है। उन दोनोंके दर्शनसे मनुष्य वाजपेय यज्ञका फल पाता और समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। कुबेरस्थानसे दस कोसकी दूरीपर पुष्कर नामका तीर्थ है। उससे अग्निकोणमें चौदह कोस दूर देवकुल नामक स्थान है, जहाँ देवताओंका समागम हुआ है, उसके पश्चिम भागमें ऋषितोया नदी है, जो समस्त पातकोंका नाश करनेवाली तथा ऋषियोंको प्रिय है। जो मनुष्य उसमें विधिवत् स्नान करके पितरोंका तर्पण करता है, वह सत्तर हजार वर्षोंतकके लिये पितरोंको तृप्त कर देता है; इतना ही नहीं, उसे सात जन्मोंके पापोंसे छुटकारा मिल जाता है।

परमपवित्र देवदारु-वनमें सहस्रों ऋषि निवास करते थे। वे सभी प्रतिदिन बावली, कुआँ और तड़ाग आदिमें स्नान करते थे। वहाँ रहते उन्हें बहुत वर्ष व्यतीत हो गये। उनके पुत्र-पौत्रोंकी संख्या बढ़ गयी और वे दारुकवनमें सब ओर फैलकर रहने लगे। एक दिन उन सबने एकत्र होकर परस्पर विचार किया कि 'हमलोग ब्रह्मलोकमें चलकर ब्रह्माजीकी प्रार्थना करें, जिससे यहाँ कोई नदी प्रकट हो।' ऐसा निश्चय करके वे तपोधन मुनि ब्रह्मलोकमें गये और वहाँ ब्रह्माजीकी अनेक प्रकारसे स्तुति करने लगे।

**ऋषि बोले—**ॐकारस्वरूप आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करनेवाले आपको बार-बार नमस्कार है। समस्त संसारकी रक्षा करनेवाले आप परमात्माको नमस्कार है और जगत्का संहार करनेवाले तथा ब्रह्मरूपधारी आपको नमस्कार है। पितामह! आपको नमस्कार है। सुरज्येष्ठ! आपको नमस्कार है।

उन ऋषियोंके इस प्रकार स्तवन करनेपर लोकपितामह ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए और बोले—'विप्रवरो! तुम्हारा स्वागत है। मैं इस दिव्य स्तोत्रसे बहुत संतुष्ट हूँ। तुम कोई उत्तम वर माँगो।'

**ऋषियोंने कहा—**सुरश्रेष्ठ! आप हमें स्नान