संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1334, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड * १३०५
आजसे मैं इस साधुनिन्दित, क्रूर एवं भयंकर कर्मसे निवृत्त हो गया। अब मुझे इस पापकर्मका कोई प्रायश्चित्त बताइये, जिससे आपकी कृपासे मैं पापसे मुक्त होऊँ।'
ऋषियोंने कहा—वत्स ! तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है। एकाग्रचित्त होकर सुनो। मैं तुम्हें गोपनीय बात बतलाऊँगा, उसे किसीके सामने कहना नहीं चाहिये। उसके जपसे तुम अवश्य पापमुक्त हो जाओगे। यह चार अक्षरवाला मन्त्र तुम उच्च स्वरसे जपते रहो, यह मनुष्योंके सब पापोंको हरनेवाला तथा स्वर्ग और मोक्ष देनेवाला है।
उनके यों कहनेपर विशाख प्रतिदिन उस मन्त्रका जप करने लगा और वे मुनि वहाँसे चले गये। विशाख गुरुभक्त था। देविकाके उत्तम तटपर उस मन्त्रका जप करते हुए उसे समाधि लग गयी। उसकी भूख-प्यास नष्ट हो गयी और शरीर शुद्ध हो गया। मन्त्र, तीर्थ, द्विज, देवता, दैवज्ञ, दवा और गुरु—इनमें जैसी जिसकी भावना होती है, उसको वैसी सिद्धि प्राप्त होती है। यह जीवात्मा स्वभावसे ही निर्मल परमात्माका स्वरूप है, उपाधिके संगसे विकारको प्राप्त होता है—जैसे स्फटिकमणि स्वरूपतः स्वच्छ है किंतु उपाधिवश उसमें भी भिन्न रंगोंकी प्रतीति होती है—जिस प्रकार भ्रमरी स्वयं तो वन्ध्या होती है, परंतु कहींसे छोटा-सा जीव-जन्तु पाकर उसे अपने स्थानपर ले आती है और ध्यानमग्न होकर अपने शिशुरूपसे उसका चिन्तन करती है, जिसके कारण उसीका ध्यान करके बढ़नेवाला वह जीव भी वैसा ही हो जाता है। यद्यपि वह जीव दूसरी योनिमें उत्पन्न हुआ रहता है, तथापि भ्रमरीके चिन्तनसे भ्रमररूप हो जाता है। यही सत्पुरुषोंके लिये दृष्टान्त है। जो गुरुसे उपदेश पाकर उसमें संदेह करता है, वह सिद्धिको नहीं पाता, जैसे भाग्यहीन पुरुषको निधि नहीं मिलती।
इस प्रकार मन्त्रजपमें संलग्न हो अमरत्वको प्राप्त हुए विशाख मुनिके सहस्रों वर्ष बीत गये। कुछ कालके पश्चात् वे बाँबीकी मिट्टीसे घिर गये। उन्हें इस बातका कुछ भी पता नहीं था। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् वे सप्तर्षि फिरसे उधर आ निकले और उस स्थानको देखकर एक-दूसरेसे कहने लगे—'यहीं वह भयानक आकारवाला तस्कर विशाख हमें मिला था, जिसने यहाँ आते ही हमारा सब कुछ लूट लिया था।' इस प्रकार वार्तालाप करते हुए महर्षियोंने बाँबीके भीतरसे आती हुई मन्त्रोच्चारणकी उत्तम ध्वनि सुनी। तब कौतूहलवश उन्होंने खनतीसे उस पर्वताकार वल्मीकको खोदा। उसके भीतर उसी चतुरक्षर मन्त्रका जप करता हुआ विशाख उन्हें दिखायी दिया। उसे समाधिमें स्थित जान योगसम्मत ओषधियोंको लेकर उन्होंने उसके सुप्त शरीरमें मर्दन किया। तब वह सजग होकर बोला—'महर्षियो ! अपना-अपना धन ले लीजिये, मुझ पापीने अज्ञानवश इसे छीन लिया था। अब आप यह सब लेकर तीर्थयात्राको जाइये, मैंने आपको मुक्त कर दिया। मेरे माता-पिता और पत्नीसे जाकर कह दीजिये कि विशाख सब प्रकारकी आसक्तियोंसे रहित हो गया। अब वह पहलेकी तरह आपलोगोंसे मिलना नहीं चाहता।'
सप्तर्षि बोले—मुने ! तुम्हें यहाँ रहते हुए बहुत वर्ष बीत गये। तुम्हारे माता-पिता, पत्नी तथा अन्य जो कुटुम्बी लोग थे, उन सबकी मृत्यु हो चुकी है। हमलोग दीर्घकालके पश्चात् इस स्थानपर आये हैं। अब तुम इस मन्त्र-जपके प्रभावसे सिद्ध हो गये हो। तुम एकाग्रतापूर्वक मन्त्रका चिन्तन करते हुए वल्मीकमें स्थित रहे हो। अतः इस भूतलपर 'वाल्मीकि' नामसे प्रसिद्ध होओगे। तुम्हारी जिह्वाके अग्रभागपर सरस्वती देवी स्वच्छन्द निवास करेंगी और तुम रामायण काव्यका निर्माण करके मोक्ष प्राप्त करोगे।
विशाख बोला—विप्रवरो ! आप प्रसन्न होकर गुरु दक्षिणा स्वीकार करें, जिससे मैं उऋण होकर महान् तपमें संलग्न होऊँ।