संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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था। उसके विशाख नामका एक पुत्र हुआ, जो बड़े भयंकर कर्म करनेवाला था। उसने एकमात्र माता-पिताकी सेवाको छोड़कर और कोई सत्कर्म कभी नहीं किया था। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् उसके माता-पिता बहुत वृद्ध हो गये और मृत्युके निकट पहुँचे। वे रोग आदिसे अत्यन्त व्याकुल थे। विशाख प्रतिदिन जंगलमें जाता और अपनी शक्तिका प्रयोग करके दूसरोंका धन लूट लाता। उसी धनसे वह अपने माता-पिता और पत्नीका पोषण करता था। एक समय उसी मार्गसे तीर्थयात्रापरायण सप्तर्षि जा रहे थे। उन्हें देखकर विशाखने डंडा उठाया और कठोर वचनोंद्वारा उन्हें घुड़कते हुए कहा—'ठहरो, ठहरो।' वे मुनि परम शान्त थे। ढेला, पत्थर और स्वर्णको समान समझते थे। शत्रु तथा मित्रके प्रति भी उनके मनमें समान भाव था और राग-द्वेषसे वे सर्वथा शून्य थे। उन्होंने आपसमें कहा—'हमलोगोंके साथ जो इसका दर्शन और सम्भाषण हुआ है, वह व्यर्थ न जाय—इसलिये इससे वार्तालाप करना चाहिये।'
ऐसा निश्चय करके अंगिराने कहा—तस्कर ! थोड़ी देरतक सावधान होकर मेरी बात सुनो। मैं तुम्हारे हितके लिये ही सच्ची बात कह रहा हूँ। पहले यह बताओ कि तुम्हारे घरमें किस गोत्रके कौन-कौन लोग रहते हैं ?
तस्कर बोला—मुने ! मेरे घरमें बूढ़े माता-पिता और मेरी सन्तानहीन पत्नी है और एक मैं हूँ। पाँचवाँ कोई नहीं है।
अंगिराने कहा—तुम पापसे जो धन कमाते हो, उससे उन सबकी पुष्टि हो रही है। अतः घर जाकर उन सबसे पूछो कि 'मैं पाप करता हूँ और सब लोग उस पापकी कमाई खाते हैं; अतः वह पाप किसको लगेगा ? और मेरा पाप कैसे शीघ्र छूटेगा ?'
मुनिके यों कहनेपर विशाख तुरंत अपने घर चला गया और मुनिकी कही हुई बातें अपने माता-पितासे उसने पूछीं। उसकी बात सुनकर माता-पिता बोले—'बेटा ! एक मनुष्य पाप करता है और उस पापकी कमाईको बहुत-से लोग भोगते हैं। भोगनेवाले तो छूट जाते हैं और कर्ता उस पापदोषसे लिप्त होता है। जो मन्दबुद्धि मानव कुटुम्बके लिये अशुभ कर्म करता है, उस पापीको निश्चय ही अपना आत्मा प्रिय नहीं है।'
माता-पिताकी बात सुनकर उसे मन-ही-मन कुछ भय हुआ और उसने निकट जाकर पिता-मातासे कहा—'मैं आपलोगोंके लिये ही पाप करता हूँ, अतः आप उसके किसी अंशका भोग करेंगे या नहीं ?'
पिता-माता बोले—बेटा ! जब हम पहली अवस्थामें थे, तब तुम हमारे द्वारा पालन करने योग्य थे और अब इस वृद्धावस्थामें तुमको ही हमारा पालन करना चाहिये। ब्रह्माजीने यही पिता-पुत्रका पारस्परिक धर्म बतलाया है। हमने तुम्हारे लिये जो शुभाशुभ कर्म किया है, उसको हम भोगेंगे और अब तुम जो शुभ या अशुभ कर्म करते हो, उसका भोग तुम्हींको करना पड़ेगा। अतः विद्वान् पुरुषको सदा शुभ कर्म ही करने चाहिये। चोरी, खेती, ब्याज, व्यापार अथवा नौकरी—कुछ भी करके तुम हमें प्रतिदिन भोजन देते हो। उसका दोष हमको नहीं लगता।
माता-पिताकी बात सुनकर विशाखाने पत्नीसे भी वही बात पूछी। उसने भी वही उत्तर दिया, जो माता-पिताने दिया था। इससे विशाखको बड़ा वैराग्य प्राप्त हुआ। वह बार-बार अपनी निन्दा करता हुआ बहुत दुःखी हुआ और बोला—'मुझ पापकर्मपरायण दुष्कर्मीको धिक्कार है। जो विवेकसे शून्य और सत्संगसे रहित है, जो विद्वान् पुरुषोंकी सेवा नहीं करता, वही पाप करता है। उस पापीको अपना आत्मा प्रिय नहीं है।'
इस प्रकार सोच-विचार करता हुआ वह ऋषिके समीप आया और मधुर वाणीमें आदरपूर्वक कहा—'मुने ! अब आप पधारिये। यह अपना कुशासन और कमण्डलु लीजिये। ये हैं आपके वल्कल, चीर और मृगचर्म। ये सब लेकर मेरा अपराध क्षमा कीजिये। मैं दीन हूँ, कृपण हूँ तथा सत्संगसे वंचित एवं मूर्ख हूँ। मुझे क्षमा कीजिये।