भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1332

* प्रभासखण्ड * । १३०३

करनेवाला मनुष्य फिर मर्त्यलोकमें जन्म नहीं लेता—मुक्त हो जाता है।

पार्वती! प्राची सरस्वतीके तटपर भगवान् पर्णादित्यका स्थान है। प्राचीन कालके त्रेतायुगकी बात है, पर्णाद नामके एक ब्राह्मणने प्रभासक्षेत्रमें आकर बड़ी कठोर तपस्या की। उन्होंने अत्यन्त भक्तिभावसे भगवान् सूर्यका आराधन तथा वेदोक्त स्तुतियोंद्वारा स्तवन किया। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् प्रसन्न होकर भगवान् सूर्यने कहा—'सुव्रत ! मैं इस तपस्यासे बहुत प्रसन्न हूँ। तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।'

ब्राह्मणने कहा—भगवन् ! आप प्रसन्न हो गये, यही मेरे लिये सबसे बड़ा वर और अभीष्ट मनोरथ है। देवेश्वर ! आपका दर्शन तो स्वप्नमें भी दुर्लभ है; तथापि यदि मुझे वर देना ही है तो मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप सदा इस स्थानपर निवास करें।

'एवमस्तु' कहकर भगवान् सूर्य अन्तर्धान हो गये। पर्णादके द्वारा स्थापित होनेके कारण वे पर्णादित्य कहलाये। पर्णाद जीवनभर उनकी आराधनामें लगे रहे। अन्तमें उन्हें सूर्यलोककी प्राप्ति हुई। जो भाद्रपदमासकी षष्ठीको वहाँ स्नान और पर्णादित्यका दर्शन करता है, वह कभी कोई कष्ट नहीं पाता।

गंगापथ नामक स्थानमें महान् स्रोतवाली गंगाजी और गंगेश्वर शिव हैं। जो वहाँ स्नान करके गंगेश्वरकी पूजा करता है, वह भयंकर पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य वैशाखकी पूर्णिमाको सरस्वती नदीमें स्नान करके वहीं चमसोद्भेद तीर्थमें पिण्डदान देता है, उसे गयासे कोटिगुना पुण्य प्राप्त होता है।

तदनन्तर सब पापोंका नाश करनेवाली तथा सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली सूर्यप्राचीकी यात्रा करे। वहाँ स्नान करके मनुष्य पाँच महापातकोंसे मुक्त हो जाता है।

ऋषितीर्थके समीप न्यंकुमती नदीके उत्तर तटपर ऋषियोंद्वारा पूजित त्रिलोचन लिंग है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। जो भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशीको वहाँ उपवास, रातमें जागरण तथा प्रातःकाल श्राद्ध एवं विधिवत् शिवकी पूजा करता है, वह शिवलोकमें निवास करता है।

ऋषितीर्थके समीप देविका नामक उत्तम क्षेत्र है, जो इच्छानुसार फल देनेवाला है। वहीं ऋषियों और सिद्धोंसे घिरा हुआ महासिद्ध वन है, जो भाँति-भाँतिके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त तथा पर्वतोंसे सुशोभित है।

देविकाके उत्तर तटपर मैं उमापतीश्वर नामसे निवास करता हूँ। वह क्षेत्र मुझे बहुत प्रिय है। पार्वती! वहाँ मेरा विग्रह उमा नामके तुम्हारे विग्रहसे संयुक्त है; इसलिये उमापति नामसे मेरी प्रसिद्धि हुई है। जो पौषमासकी अमावास्याको वहाँ श्राद्ध करता है, उसका वह श्राद्ध अक्षय होता है। बुद्धिमान् मनुष्य वहाँ गौ, भूमि, सुवर्ण तथा वस्त्रका दान करे। सब देवताओंने उस श्रेष्ठ नदीका आवाहन किया है, इस कारण वह पापनाशिनी देविका कही गयी है।

वहीं भगवान् भूधर (वाराह)-का दर्शन करना चाहिये। चारों वेद ही उनके चारों पैर हैं। यूप उनकी दाढ़ हैं। क्रतु उनके दाँत हैं। स्रुवा मुख है। अग्नि जिह्वा है। कुश रोम हैं। ब्रह्म मस्तक हैं। दिन और रात उनके नेत्र हैं। वेदांग कानोंके आभूषण हैं। इस प्रकार यज्ञमय वाराह भगवान् उस स्थानपर स्थित हैं। आश्विनमासकी अमावास्या तथा एकादशीको जब सूर्य कन्याराशिपर स्थित हों, गुड़युक्त पायस एवं गुड़युक्त हविष्य लेकर 'नमो वः पितरो रसाय' इत्यादि मन्त्रसे उसको तथा अन्य भोजन-सामग्रीको अभिमन्त्रित करे। 'तेजोऽसि शुक्रम्' इत्यादि मन्त्रसे घी और 'दधि क्राव्णो' इत्यादि मन्त्रसे दही अभिमन्त्रित करे। 'आप्यायस्व' इत्यादि मन्त्रके द्वारा दूध अभिमन्त्रित करके जितने व्यंजन और भक्ष्य-भोज्य पदार्थ हैं, उन सबको 'महान् इन्द्रेण' इत्यादि मन्त्रके द्वारा अर्पण करे। 'संवत्सर' इत्यादि मन्त्रके द्वारा जल अर्पण करे। इस प्रकार ब्राह्मण-भोजन कराकर वहाँ पिण्डदान देना चाहिये।

प्राचीन कालमें शमीमुख नामक एक ब्राह्मण