संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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ऋषि बोले— ब्रह्मन्! तुम सिद्ध हो गये। यही हमारे लिये गुरुदक्षिणा है। तुम पुनः कोई मनोवांछित वर माँग लो।
वाल्मीकिजी बोले— यदि आपलोग मेरे ऊपर प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो बताइये, यहाँ देविका नदीके सुरम्य तटपर कौन-से देवता स्थित हैं, जो समस्त कामनाओं और फलोंके देनेवाले हैं?
ऋषि बोले— ब्रह्मन्! यह सामने जो अनेक शाखाओंके साथ फैला हुआ वृक्ष है, इसकी ओर देखो। इसके मूलस्थानमें ब्रह्माजीके अंशसे उत्पन्न भगवान् सूर्य स्थित हैं। कल्पके प्रारम्भकालसे ही उनकी यहाँ स्थिति है। वे ही इस क्षेत्रके देवता हैं, उनकी आराधना करो। यहाँ दो कोसतकका स्थान सूर्यक्षेत्र कहा गया है। यहाँ रहनेवालोंको निश्चय ही स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है।
उनकी बात सुनकर वाल्मीकिने भगवान् सूर्यकी आराधना की। इससे सन्तुष्ट होकर भगवान् सूर्यने कहा—'वर माँगो।'
वाल्मीकि बोले— देवेश्वर! आजसे आप यहाँ सदैव निवास करें।
सूर्यने कहा— विप्रवर! मूलस्थानमें निवास करनेवाला मैं आज तुमपर सन्तुष्ट हुआ हूँ, अतः यह क्षेत्र अब मूलस्थानके नामसे ही विख्यात होगा। जो लोग उत्तरायणमें यहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करेंगे, वे स्वर्गलोकमें जायँगे। विप्रवर! तिलमिश्रित जलसे यहाँ तर्पण करनेपर पितरोंको गयाश्राद्धके समान सन्तोष प्राप्त होगा। जो मानव भक्तिपूर्वक साग, मूल, फल, खली अथवा गुड़से यहाँ श्राद्ध करेंगे, वे परम मोक्षको प्राप्त होवेंगे। कीट, पतंग, पशु, पक्षी तथा मृग भी प्याससे पीड़ित हो यहाँके जलका स्पर्श करने मात्रसे परम गतिको प्राप्त होंगे। श्रावणमासकी पूर्णिमाको तुम्हारे स्नेहवश मैं यहाँ विशेषरूपसे निवास करूँगा। उस दिन जो यहाँके जलसे पितरोंका तर्पण करेगा, उसकी अठारह प्रकारकी कोढ़ तत्काल नष्ट हो जायगी। कपाल, औदुम्बर, मण्डल, विचर्चिका, ऋक्षजिह्व, कच्छु, किटिभ, सिध्म, अलस, विपादिका, दद्रु, शतारु, विस्फोटक, पुण्डरीक, काकण, पामा, चर्मदल और चर्म—ये अठारह प्रकारके कुष्ठ अवश्य दूर हो जायँगे, इसमें सन्देह नहीं है।
यों कहकर सूर्यदेव अन्तर्धान हो गये। वाल्मीकि मुनिने सूर्यदेवकी आराधना तथा रामायणकाव्यका निर्माण किया। अतः उस तीर्थमें सब यज्ञोंका फल देनेवाले सूर्यदेवका अवश्य दर्शन तथा इस सर्वपातकनाशिनी कथाका श्रवण करना चाहिये।
भगवान् सूर्यके अष्टोत्तरशतनामोंकी महिमा
महादेवजी कहते हैं— पार्वती! हिरण्याके पूर्वभागमें महर्षि च्यवनके द्वारा स्थापित परम उत्तम च्यवनादित्यका उत्तम स्थान है। मनुष्योंद्वारा विधिपूर्वक पूजित होनेपर वे समस्त अभीष्ट फलोंको देनेवाले हैं। जो मानव सप्तमी तिथिके दिन एक सौ आठ नामोंद्वारा श्रद्धापूर्वक उनकी स्तुति करता है, वह मनोवांछित फलको पाता है।
पूर्वकालमें महर्षि धौम्यने महात्मा युधिष्ठिरसे सूर्यदेवके जिन एक सौ आठ नामोंका वर्णन किया, उन्हें सुनो—सूर्य, अर्यमा, भग, त्वष्टा, पूषा, अर्क, सविता, रवि, गभस्तिमान्, अज, काल, मृत्यु, धाता, प्रभाकर, पृथ्वी, बल-तेज-आकाश-वायु-परायण, सोम, बृहस्पति, शुक्र, बुध, अंगारक, मंगल, इन्द्र, विवस्वान्, दीप्तांशु, शुचि, सौर्य, शनैश्वर, ब्रह्मा, रुद्र, विष्णु, स्कन्द, वैश्रवण, यम, वैद्युत, जाठराग्नि, ऐन्धन, तेजःपति, धर्मध्वज, वेदकर्ता, वेदांग, वेदवाहन, कृत