संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1336, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड * १३०७
(सत्ययुग), त्रेता, द्वापर, कलि, सर्वामराश्रय (अथवा संवत्सरात्मक), कला-काष्ठा-मुहूर्त-पक्ष-मास-अहः-निशा-संवत्सरकर, स्वच्छ, कालचक्र, विभावसु, पुरुष, शाश्वत, योगी, व्यक्त, अव्यक्त, सनातन, लोकाध्यक्ष, प्रजाध्यक्ष, विश्वकर्मा, तमोनुद, वरुण, सागर, अंशु, जीमूत, जीवन, अरिहा (शत्रुनाशक), भूताश्रय, भूतपति, सर्वभूतनिषेवित, स्रष्टा, संवर्तक, वह्नि, सर्वादिकर, अमल, अनन्त, कपिल, भानु, कामद, सर्वतोमुख, जय, विषाद, वरद, सर्वधातुनिषेवित, सम, सुवर्ण, भूतादि, शीघ्रग, प्राणधारक, धन्वन्तरि, धूमकेतु, आदिदेव, अदितिपुत, द्वादशात्मा, अरविन्दाक्ष, पिता, माता, पितामह, स्वर्गद्वार, प्रजाद्वार, मोक्षद्वार, त्रिविष्टप, देहकर्ता, प्रशान्तात्मा, विश्वात्मा, विश्वतोमुख, चराचरात्मा, सूक्ष्मात्मा तथा मैत्रशरीरान्वित।
ये कीर्तन करनेयोग्य अमित तेजस्वी भगवान् सूर्यके एक सौ आठ नाम महात्मा इन्द्रके द्वारा प्रकाशित हुए हैं। इन्द्रसे नारदको, नारदसे धौम्यको और धौम्यसे राजा युधिष्ठिरको इनका उपदेश प्राप्त हुआ है। राजा युधिष्ठिरने इन्हें पाकर सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लिया। जो एकाग्रचित्त होकर सूर्योदय कालमें इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह पुत्र, धन, रत्नराशि, पूर्व-जन्मकी स्मृति, स्मरण-शक्ति तथा मेधा (बुद्धि) प्राप्त कर लेता है। जो देवताओंमें श्रेष्ठ भगवान् सूर्यके इस स्तोत्रका एकाग्रचित्त होकर पाठ करता है, वह शोकरूपी दावानलसे मुक्त हो मनोवांछित फलोंको प्राप्त कर लेता हैं।
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महर्षि च्यवनकी कथा और च्यवनेश्वरकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! महर्षि भृगुके पुत्र च्यवन मुनिने प्रभासक्षेत्रमें जाकर बड़ी भारी तपस्या की। वे आसन लगाकर ठूंठकी भाँति अविचल भावसे बहुत समयतक एक ही स्थानपर बैठे रहे। वहाँ उनके शरीरपर सब ओरसे बाँबीकी मिट्टी जम गयी और उसके ऊपर लताएँ फैल गयीं। उस बाँबीमें सब ओर चींटियाँ फैल गयी थीं। इस प्रकार बाँबीसे घिरे हुए च्यवन मुनि मिट्टीकी मूर्तिकी भाँति वहाँ स्थिर होकर घोर तपस्यामें स्थित हो गये। तदनन्तर किसी समय राजा शर्याति तीर्थयात्राके प्रसंगसे श्रीसोमनाथजीका दर्शन करनेके लिये पापनाशक प्रभासक्षेत्रमें आये। राजाके सुकन्या नामकी एक कन्या थी, जो सखियोंसे घिरी हुई वहाँ वनमें घूमने लगी। घूमते-घूमते वह च्यवन मुनिकी बाँबीके समीप जा पहुँची। वहाँ उनके चमकते हुए नेत्रोंको देखकर उसने कौतूहलवश सोचा, यह क्या है? फिर उसने काँटेसे उन दोनों नेत्रोंको छेद दिया। नेत्रोंके बिंध जानेपर मुनिके कोपसे राजा शर्यातिके सैनिकोंका मल-मूत्र रुक गया। इससे सारी सेना बहुत दुःखी हुई। यह देख राजाको भी बड़ा दुःख हुआ। वे बोले—'आज किसने यहाँ महात्मा भार्गवका अपकार किया है, उसे तुमलोग शीघ्र बताओ?' सैनिकोंने उत्तर दिया, 'हमें किसी अपकार करनेवालेका पता नहीं है।' तब राजाने अपने सुहृदोंसे पूछा।
सैनिकोंको दुःखसे व्याकुल तथा पिताको चिन्तित देखकर सुकन्याने कहा—'पिताजी! मैं इस वनमें घूम रही थी। इतनेमें एक बाँबीके भीतरसे मुझे जुगनूकी भाँति चमकते हुए दो प्रकाश दिखायी पड़े। मैंने अज्ञानवश उन्हें बींध डाला।' यह सुनकर राजा शर्याति शीघ्र ही बाँबीके पास आये और उन्होंने तपोवृद्ध एवं वयोवृद्ध च्यवन मुनिका दर्शन किया। तदनन्तर वे हाथ जोड़कर सैनिकोंके कष्ट-निवारणके लिये प्रार्थना करते हुए बोले—'भगवन्! मेरी बालिकाने अज्ञानवश जो आपका अपराध किया है, उसके लिये क्षमा करें।'