संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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इसके बाद महर्षिकी आज्ञासे शर्यातिने उन्हें अपनी कन्या ब्याह दी और स्वयं सेनाके साथ नगरको प्रस्थान किया। सुकन्या परम उत्तम तपस्वी पतिको पाकर प्रेमपूर्वक तपस्या और नियमसे रहती हुई उनकी सेवा करने लगी। मुनिके यहाँ जो अतिथि आते, उनका यथोचित सत्कार करके वह शीघ्र ही महर्षि च्यवनकी सेवामें संलग्न हो जाती थी।
कुछ कालके पश्चात् अश्विनीकुमार नामक देवता उस वनमें आये। उन्होंने सुन्दर दाँतोंवाली सुकन्याको स्नान करके जाते हुए देखा और उसके समीप जाकर कहा—'वामोरु! तुम किसकी स्त्री हो और इस वनमें किस लिये घूम रही हो?'
सुकन्याने प्रसन्न होकर कहा—आपलोग मुझे राजा शर्यातिकी पुत्री तथा महर्षि च्यवनकी पत्नी जानें।
अश्विनीकुमार बोले—तुम्हारे पिताने जान-बूझकर इन गतायु महर्षिके साथ तुम्हारा विवाह कैसे किया? च्यवनजी तुम्हारे पालन-पोषण और रक्षणमें तो सर्वथा असमर्थ हैं। अतः उन्हें छोड़कर तुम हम दोनोंमेंसे किसी एकको अपना पति बना लो।
उनके यों कहनेपर सुकन्या बोली—देवताओ! मैं अपने पतिदेव च्यवनमें पूर्णतः अनुरक्त हूँ। मेरे विषयमें आपलोग कोई ऐसी आशंका न करें।
तब अश्विनीकुमारोंने कहा—देवि! हम दोनों वैद्य हैं। तुम्हारे पतिको रूप और यौवनसे सम्पन्न कर देंगे। उसके बाद हम तीनोंमेंसे किसी एकको तुम अपना पति चुन लेना।
उन दोनोंकी यह बात सुनकर सुकन्या च्यवन मुनिके पास गयी और अश्विनीकुमारोंने जो कुछ कहा था, वह सब उसने कह सुनाया। उसकी बात सुनकर मुनिवर च्यवनने कहा—'अश्विनी-कुमारोंकी बातोंका आदर करो।' मुनिकी यह आज्ञा पाकर सुकन्या उन दिव्य रूपधारी देववैद्योंसे बोली—'आप दोनोंने मेरे पतिको तरुण बनानेके विषयमें जो कुछ कहा है, उसे शीघ्र पूरा करें।' वे बोले—'तुम्हारे पति इस तालाबमें प्रवेश करें।' तब मुनिवर च्यवनने दिव्य रूपकी अभिलाषासे शीघ्र ही उस तालाबमें प्रवेश किया, तत्पश्चात् अश्विनीकुमार भी उस जलके भीतर प्रविष्ट हुए। दो ही घड़ीमें वे तीनों उस सरोवरसे बाहर निकले। उनके रूप और वेष दिव्य थे। तीनों ही तरुण एवं दिव्य कुण्डलोंसे विभूषित थे। वे सब एकत्र होकर बोले—'शुभे! हममेंसे एकको वरण करो। सुकन्याने सबको एक समान रूपवाले देखकर अपने मन और बुद्धिसे निश्चय करके अपने पति च्यवन मुनिको पहचान लिया और एकमात्र उन्हींका वरण किया। अपनी पत्नीको पाकर तेजस्वी महर्षि च्यवन अश्विनीकुमारोंसे बोले—'आप दोनोंने कृपा करके मुझे दिव्य रूप तथा तरुण अवस्थासे संयुक्त किया और मुझे अपनी पत्नीकी प्राप्ति हुई, इसलिये मैं आप दोनोंको यज्ञभागका अधिकारी बनाऊँगा।' मुनिकी यह बात सुनकर अश्विनीकुमार प्रसन्नतापूर्वक चले गये।
तदनन्तर राजा शर्यातिने जब सुना कि महर्षि च्यवनको नयी अवस्था प्राप्त हुई है, तब वे बहुत प्रसन्न हुए और सेनाके साथ उनके आश्रमपर गये। पुत्री और जामाताको देवकुमारोंकी भाँति देखकर राजा शर्यातिके हर्षकी सीमा न रही। महर्षि च्यवनने रानीसहित महाराज शर्याति का पूर्ण सत्कार किया और समीप बैठकर वार्तालाप किया। बातचीतमें ही उन्होंने राजासे कहा—'राजन्! मैं आपसे यज्ञ कराऊँगा। आप सब सामग्री एकत्र करें।' राजा शर्याति इस प्रस्तावसे बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने शुभ मुहूर्तमें यज्ञमण्डप निर्माण कराया। उस मण्डपमें महर्षि च्यवनने राजासे यज्ञ प्रारम्भ कराया और उसमें अश्विनीकुमारोंके लिये सोमरसका भाग ग्रहण किया। इन्द्रने उन्हें ऐसा करनेसे रोका और कहा—'अश्विनीकुमार सोमरसके अधिकारी नहीं हैं, ऐसा मेरा निश्चित मत है। वे दोनों देवताओंके वैद्य हैं, अतः निन्दित माने गये हैं।'