भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1338, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1338
  • प्रभासखण्ड * १३०९

च्यवनने कहा—देवराज! आप अश्विनीकुमारोंको भी देवताओंकी ही कोटिमें समझें। ये दोनों महात्मा रूपसम्पदासे सम्पन्न और तेजस्वी हैं। इन्होंने इस समय मुझे अजर बनाया है।

इन्द्र बोले—ये दोनों वैद्य हैं और इच्छानुसार रूप धारण करके मर्त्यलोकमें विचरते रहते हैं; अतः देवताओंकी श्रेणीमें बैठकर सोमके अधिकारी कैसे हो सकते हैं?

इन्द्रके यों कहनेपर भी उनका अनादर करके च्यवन मुनिने अश्विनीकुमारोंके लिये भाग ग्रहण किया। यह देख इन्द्रने कहा—'यदि तुम मेरी अवहेलना करके इन वैद्योंके लिये सोमरसका भाग ग्रहण करोगे तो मैं तुम्हारे ऊपर भयंकर वज्रका प्रहार करूँगा।'

इन्द्रकी यह बात सुनकर च्यवनने एक बार उनकी ओर दृष्टिपात किया और अश्विनीकुमारोंके लिये सोमरसका भाग विधिपूर्वक निकाला। इसी समय इन्द्रने उनपर तुरंत वज्रका प्रहार किया, परंतु भृगुनन्दन च्यवनने वज्रसहित उनकी बाँह स्तम्भित कर दी। तदनन्तर मन्त्र पढ़कर अग्निमें आहुति डाली। मुनिके तपोबलसे उस समय महापराक्रमी महाकाय मद नामक महादैत्य उत्पन्न हुआ और क्रोधमें भरकर भयंकर सिंहनादसे सम्पूर्ण लोकोंको गुँजाता हुआ इन्द्रकी ओर दौड़ा।

मुँह बाये हुए कालकी भाँति उस दैत्यको आते देख इन्द्र भयसे पीड़ित हो गये और मुनिवर च्यवनको प्रणाम करके बोले—'भृगुनन्दन! आजसे ये दोनों अश्विनीकुमार सोमरसके अधिकारी होंगे। तपोधन! मुझपर आपका अकारण क्रोध न हो; जिस प्रकार आपने इन अश्विनीकुमारोंको सोमरसका अधिकारी बनाया है, उसी प्रकार मेरी रक्षाके लिये भी अपने बल-वीर्यको प्रकाशित करें। आजकी इस घटनासे सुकन्याके पिता राजा शर्यातिकी कीर्ति संसारमें अमर होगी। आप मुझपर कृपा करें।'

इन्द्रके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर मुनिवर च्यवनका क्रोध शान्त हो गया। इन्द्र उनकी आज्ञा ले शीघ्र वहाँसे चले गये। च्यवनने इन्द्रकी पूजा करके अश्विनीकुमारोंसहित सब देवताओंका पूजन किया तथा राजा शर्यातिका यज्ञ पूर्ण कराकर वे सुकन्यासहित इस वनमें विहार करने लगे। उनके द्वारा स्थापित च्यवनेश्वर लिंग महापातकोंका नाश करनेवाला है। जो विधिपूर्वक च्यवनेश्वरकी पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। यहाँ आश्विनमासकी पूर्णिमाको विधिपूर्वक श्राद्ध करे और ब्राह्मणोंको भोजन कराये। यों करनेसे कोटि तीर्थोंके सेवनका फल प्राप्त होता है।

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सुकन्यासरोवर, गोष्पदतीर्थ, गंगेश्वर, बालादित्य, पातालगंगा तथा कुबेरेश्वरकी महिमा; कुबेरके द्वारा शिवकी स्तुति

महादेवजी कहते हैं—पार्वती! जहाँ च्यवन मुनिके साथ अश्विनीकुमारोंने स्नान किया था, वह जलाशय सुकन्या सरोवरके नामसे विख्यात है। जो नारी तृतीयाको उस सरोवरमें स्नान करती है, उसकी गृहस्थी सात हजार जन्मोंतक नष्ट नहीं होती और उसका पुत्र दरिद्र, अंगहीन, दीन तथा अंधा नहीं होता।

तदनन्तर न्यंकुमती नदीके तटपर जाकर परम उत्तम गोष्पदतीर्थमें गया-श्राद्ध करे। उसके बाद भगवान् वराहका दर्शन करके नारिगृहकी यात्रा करे। फिर मातृसुतकी पूजा करके सागरसंगममें स्नान करे, फिर न्यंकुमतीके तटपर जाकर मुनिवर अगस्त्यजीके क्षुधाहर नामक दिव्य आश्रमपर जाय। वह समस्त पातकोंका नाश करनेवाला है।

उसके पश्चिम भागमें उससे थोड़ी ही दूरपर गंगाजीके द्वारा स्थापित गंगेश्वर लिंग है। अगस्त्यजीके

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