संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- प्रभासखण्ड * । १३२३
तदनन्तर उन विशुद्ध चित्तवाले महर्षिके प्रसादसे वे निषाद उनकी बात पूरी होते ही मत्स्योंसहित स्वर्गलोकमें चले गये। मछलियों और मछलीमारोंको इस प्रकार स्वर्गलोकमें जाते देख मन्त्रियों और सेवकोंसहित राजा नाभाग विस्मित होकर बोले—'कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको सदैव संतोकी सेवा करनी चाहिये। साधु पुरुष पुण्यतीर्थोंके जलके समान होते हैं। इस लोकमें यदि क्षणभर भी उनकी उपासना की जाय तो वह निष्फल नहीं होती। संतोंके साथ बैठना चाहिये। संतोंके साथ उत्तम कथा-वार्ता करनी चाहिये। जिस सभामें संत बैठे हों, वहाँ बैठना चाहिये। दुष्ट पुरुषोंके साथ कुछ भी नहीं करना चाहिये। संत समागमसे ही ये मत्स्य और मल्लाह पुण्यात्मा मनुष्योंकी भाँति स्वर्गलोकमें चले गये।'
तदनन्तर मुनिवर आपस्तम्ब और महामुनि लोमश राजा नाभागको नाना प्रकारके अभीष्ट वर माँगनेके लिये प्रेरित करने लगे। तब राजाने अत्यन्त दुर्लभ धर्मबुद्धिको वरण किया, अर्थात् यह वर माँगा कि मेरी बुद्धि सदा धर्ममें ही लगी रहे। वे दोनों मुनि 'तथास्तु' कहकर प्रसन्नतापूर्वक राजाकी प्रशंसा करते हुए बोले—'राजेन्द्र ! तुम धन्य हो, जो तुम्हारी बुद्धि धर्ममें लगी है। मनुष्यमात्रके लिये धर्म अत्यन्त दुर्लभ है। विशेषतः राजाओंके लिये तो वह परम दुर्लभ है। यदि राजा मदोन्मत्त होकर स्वधर्मका परित्याग न करे तो संसारमें उससे श्रेष्ठ कौन पुरुष होगा। राजाओंको सदा जन्म लेना पड़ता है—यह ध्रुव है। उन्हें सदा मोह होता—यह भी ध्रुव है और मोहसे नरककी प्राप्ति भी ध्रुव है। अतएव बुद्धिमान् पुरुष राज्यकी निन्दा करते हैं। विषय-लोलुप मनुष्य राज्यको अधिक महत्त्व देते हैं; किंतु मनीषी मानव उसीको नरकके समान देखते हैं, अतः महाराज ! यदि तुम अपने लिये सनातन गति चाहते हो तो कभी मद न करना; क्योंकि वह लोक-परलोक दोनोंका नाश करनेवाला है।'
यों कहकर वें दोनों महात्मा अपने-अपने आश्रमको चले गये। नाभागने भी वर पाकर प्रसन्नतापूर्वक नगरमें प्रवेश किया। पार्वती ! इस प्रकार देविका नदीका प्रभाव बताया गया। मुनीश्वर आपस्तम्बने वहाँ शिवलिंगकी स्थापना की। वे निषादोंके जालमें पड़े थे, इसलिये उनके द्वारा स्थापित शिवलिंगका नाम जालेश्वर हुआ। चैत्र शुक्ला त्रयोदशीको जो वहाँ पितरोंके लिये पिण्डदान करता है, उसके उस श्राद्धका कभी अन्त नहीं होता।
चन्द्रेश्वर, कपिलेश्वर तथा नलेश्वरकी महिमा
महादेवजी कहते हैं—पार्वती ! आशापुर विघ्नराजके स्थानसे दक्षिण एवं नैर्ऋत्यकोणमें थोड़ी ही दूरपर एक पापहारक चन्द्रेशलिंग है। वहीं अमृतकुण्ड और कुलकुण्ड भी हैं। जो उन कुण्डोंमें स्नान करके चन्द्रेश्वरकी पूजा करेगा, वह सहस्र वर्षोंतक तपस्या करनेका फल पायेगा। वहीं चन्द्रतड़ाग है, जिसका विस्तार सोलह धनुषका है।
वहाँसे परम उत्तम कपिलेश्वरलिंगका दर्शन करनेके लिये जाय। वह स्थान शशिभूषणसे पूर्व, कोटितीर्थसे पश्चिम, जरद्गवसे दक्षिण तथा समुद्रसे उत्तर है। यह कपिलक्षेत्र पुण्यहीन पुरुषोंके लिये दुर्लभ है। पूर्वकालमें महर्षि कपिलने वहाँ महेश्वरकी स्थापना करके दस हजार वर्षोंसे अधिक कालतक बड़ी भारी तपस्या की थी। उनके द्वारा वहाँ कपिलधारा नामकी दिव्य महानदी लायी गयी है। समुद्रमें आज भी उसका दर्शन होता है। जो कपिला नदीमें नहाकर कपिला गायका दान करता है, वह कोटि गोदानके फलका भागी होता है। यह सभी पापोंका एकमात्र प्रायश्चित्त बताया
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गया है। भादोंमासके कृष्णपक्षमें षष्ठी तिथिको यदि मंगलवार, रोहिणी नक्षत्र तथा व्यतीपात योग हो तो वह कपिला-षष्ठी कही जाती है। उस दिन कपिलक्षेत्रमें, अर्कस्थलमें तथा शुभ कपिलासंगममें मिट्टी और तिलोंके द्वारा स्नान करके सन्ध्या-वन्दन एवं जपके पश्चात् मनुष्य रक्तचन्दनमिश्रित जल एवं कनेरके फूलसे भगवान् सूर्यको अर्घ्य दे। अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है—
नमस्त्रैलोक्यनाथाय उद्भासितजगत्त्रय।
तेजोरश्मे नमस्तुभ्यं गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥
‘त्रिलोकीनाथ भगवान् सूर्यको नमस्कार है। तीनों लोकोंको प्रकाशित करनेवाले तेजोरश्मे! आपको नमस्कार है। बार-बार नमस्कार है। यह अर्घ्य ग्रहण कीजिये।’
तत्पश्चात् सूर्यदेवकी परिक्रमा करके कपिलेश्वरजीकी पूजा करे।
कपिलेश्वरसे ईशान तथा उत्तर दिशामें जरद्गवके द्वारा स्थापित जरद्गवेश्वरलिंग है। वहीं देवनदी अंशुमती बहती है। उसमें विधिपूर्वक स्नान करके जो पिण्डदान देता है, वह सौ कोटिसे भी अधिक वर्षोंतक पितरोंको तृप्त रखता है। चन्दन, पुष्प, पंचामृत तथा गुग्गुलकी धूपसे जरद्गवेश्वरकी पूजा करनी चाहिये। उन्हें दण्डवत्-प्रणाम तथा उनकी स्तुति भी करनी चाहिये। उनके समीप नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंद्वारा ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। वहाँ एक ब्राह्मणको भोजन करानेसे कोटि ब्राह्मण-भोजन करानेका पुण्य होता है।
जरद्गवसे पूर्वदिशामें एक सौ अस्सी धनुषकी दूरीपर हाटकेश्वरलिंग है। वहीं दमयन्तीके पति राजा नलने नलेश्वर शिवकी स्थापना की है। उसका दर्शन और विधिपूर्वक पूजन करके मनुष्य कलिदोषसे छुटकारा पाता और युद्धमें विजयी होता है।
राजा गज और भद्रमुनिका संवाद, विभिन्न तीर्थोंकी महिमा और दामोदर-माहात्म्य
महादेवजी कहते हैं—पार्वती! स्वर्गकी इच्छा रखनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जिनके देवदुर्लभ दिव्य जलका सेवन करते हैं, उन गंगाजीके मुनिजनसेवित परममनोहर पवित्र तटपर गज नामके एक बलवान् राजा राज-काज छोड़कर स्नानके लिये आये। उनकी सती-साध्वी पतिव्रता पत्नी भी उनके साथ वहाँ आयी। दोनों दम्पति गंगाजीके किनारे रहने लगे। इस प्रकार वहाँ रहते हुए उनके दस हजार वर्ष बीत गये। तदनन्तर महायशस्वी भद्रमुनि जप-होमपरायण अनेक ब्राह्मणोंके साथ वहाँ आये। उन्होंने गंगाजीमें स्नान करके अपने शरीरका मल नष्ट किया, फिर समस्त भूत-प्राणियोंकी तृप्तिके लिये जल देकर भगवान् जनार्दनकी पूजा की। फिर ज्यों ही वे नदीके तटपर डेरा डालने लगे, त्यों ही उनकी दृष्टि राजा गजपर पड़ी। राजाने भी उन सबको देखा और आगे जाकर कहा—‘पूजनीय महर्षियो! आपलोग मेरे घर पधारें। मेरी यशस्विनी पत्नी संगताके हाथसे पूजा ग्रहण करके जहाँ आपकी इच्छा हो, उस पुण्य पथपर जाइयेगा।’
राजाके इस प्रकार अनुरोध करनेपर वे महर्षि उनके भवनमें पधारे। उनको विचित्र आसन देकर राजाने उनके आगे हाथ जोड़े और भद्र मुनिसे कहा—‘मुने! यह पृथ्वी धन-धान्यसे परिपूर्ण है, नगरी, पुरी, पर्वत, समुद्र, सरिता, सरोवर, ग्राम, गोकुल, श्रेष्ठ मनुष्य, रत्न तथा आकर आदिसे सुशोभित है। भोगमें आसक्त होकर परम ज्ञानसे विमुख रहनेवाले पुरुषोंके लिये इसका त्याग कठिन है। भोग-सम्पन्न पृथ्वी ही महाभयानक संसारमें पुनरावृत्ति करानेवाली
- प्रभासखण्ड * १३२५
है। यहीं बार-बार पुरुष गिरते हैं। अतः जिस दान और तपस्याके अनुष्ठानसे मनुष्य निर्मल स्वर्गलोकको पाता है, उसका उपदेश कीजिये।'
भद्र बोले-राजेन्द्र ! जो अपने भीतर विराजमान सच्चिदानन्दघन परमात्माको नहीं देखते, उनके लिये बाह्य तीर्थ जलसे भरे हुए जलाशयमात्र हैं और देवता पत्थर एवं मिट्टीकी मूर्तिमात्र हैं। यदि परमात्मतत्त्वका ज्ञान है, तभी तीर्थों और देवताओंके चिन्मय स्वरूपका दर्शन होता है। इस भूतलपर अनेक तीर्थ हैं, बहुत-से पुण्यमय देवमन्दिर हैं, बहुतेरी पुण्यसलिला पवित्र नदियाँ तथा पावन जलवाले समुद्र हैं। यह पृथ्वी स्थान-स्थानमें पग-पगपर बहुत पुण्य देनेवाली है। कृष्ण, विष्णु, हृषीकेश, शंखी, गदी, चतुर्भुज, महाबाहु, प्रभासवासी, दैत्यसूदन, वाराह, वामन, नरसिंह, बल, अर्जुन, श्रीराम, परशुराम, बलराम, पुरुषोत्तम, पुण्डरीकाक्ष, गदापाणि, राघव, शत्रुदमन, गोविन्द, जय, भूधर, जनार्दन, सुरेश, श्रीधर, हरि, योगीश्वर, कपिलेश्वरनाथ, श्वेतद्वीपपति, बदरिकाश्रमवासी नर-नारायण, पद्मनाभ, सुनाभ, हयग्रीव, द्विजनाथ, धरानाथ, शार्ङ्गपाणि, दामोदर, जगन्नाथ तथा सर्वपापहारी हरि—ये ही देवाधिदेव श्रीविष्णुके स्थान हैं। इनमेंसे जहाँ भी मनुष्य जाते हैं, वहीं सब पातकोंसे मुक्त हो जाते हैं। गंगा, यमुना, गोदावरी, शतद्रु, विन्ध्या, पयोधा, वरदा, चर्मण्वती, सरयू, गण्डकी, चन्द्रभागा, विपाशा, तथा शोणा—ये और दूसरी भी बहुत-सी सरिताएँ पुण्यमयी हैं। हिमवान् पर्वत भी पुण्य तीर्थ है। इन सबके नामोंका उच्चारण करनेमात्रसे समस्त पाप रसातलको चले जाते हैं। अगहनमें कान्यकुब्ज तीर्थमें निवास करके स्त्री और पुरुष शोकमुक्त होते हैं तथा स्वर्गलोकमें जाते हैं। यदि पौषमासकी पूर्णमासीको अर्बुदाचल (आबू)-में निवास करे तो मनुष्य पितरोंके साथ अरबों वर्षोंतक स्वर्गलोकमें आनन्द भोगता है। यदि गयामें माघमासकी पूर्णिमाको मनुष्य पितरोंका श्राद्ध करे तो वह भगवान् विष्णुके परमधाममें जाता है। जो फाल्गुनकी पूर्णिमाको एक रात हिमालयपर निवास करता है, वह श्रीहरिके उत्तम लोकमें जाता है। जो मनीषी पुरुष चैत्रकी पूर्णिमाको प्रभासक्षेत्रमें श्राद्ध करते हैं, वे अपने कुलमें उत्पन्न हुए पुरुषोंके साथ इस मर्त्यलोकमें जन्म नहीं लेते—मुक्त हो जाते हैं। जो वैशाखकी पूर्णिमाको अवन्तीपुरीके जलप्रिय तीर्थमें जल पीते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो ज्येष्ठकी पूर्णिमाको त्रिकूपमें श्राद्ध करते हैं, वे वैकुण्ठमें जाते हैं। श्रावणकी अमावास्या तथा पूर्णिमाको पूर्वसागरमें स्नान, दान, तप और श्राद्ध करनेवाला पुरुष शोकमुक्त हो जाता है। जो भाद्रपदमासमें प्रभासमें शशिभूषणका पूजन करता है, वह देवस्वरूप हो जाता है। जो आश्विनमासमें चन्द्रभागाके तटपर श्राद्ध और स्नान करता है, वह स्वर्गलोकमें निवास पाता है। जो अष्टाक्षर मन्त्र (ॐ नमो नारायणाय)-का जप करते हुए चार भुजाधारी नारायणका ध्यान करता है, वह वैकुण्ठधाममें जाता है। सब महीनोंमें कार्तिक श्रेष्ठ है, कार्तिकमें भी भीष्मपंचक श्रेष्ठ है, उसमें भी दामोदर-तीर्थके जलमें द्वादशी तिथिका स्नान और भी श्रेष्ठ है। दामोदरमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। दामोदर-तीर्थमें जिनकी जहाँ कहीं भी मृत्यु हो गयी है, वे श्रीहरिके श्रीविग्रहमें निवास करते हैं, संसारमें कभी जन्म नहीं लेते। सोमनाथके समीप उदयान्त नामक महान् पर्वत है; उसके पश्चिम भागमें रैवत पर्वत है, जहाँ कांचनशेखरा नदी बहती है। उस पर्वतमें लाल, सफेद, नील और कृष्ण धातुएँ हैं। उसमें कुछ पत्थर हाथीके समान आकारवाले हैं और दूसरे सुवर्णके सदृश हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा शूद्रोंके सेवक उस पर्वतका सदा सेवन करते हैं। बहुत-से पक्षी वहाँ चहकते रहते हैं। पशु-पक्षी, सर्प तथा कीट, पतंग आदि जो भी जीव वहाँ कालवश मृत्युको प्राप्त होते हैं, वे उत्तम विमानपर आरूढ़ हो
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भगवान् विष्णुके धामको जाते हैं। उपर्युक्त नदी धरती फोड़कर पातालसे आयी है। इन्द्रने भी स्वर्गसे यहाँ आकर उत्तम यज्ञ किया और अतिशय उत्तम पद पाकर व्याधिहीन स्वर्गलोककी उपलब्धि की। कार्तिकमें राजा बलिने भी वहाँ आकर बहुत-से दान दिये हैं। हरिश्चन्द्र, शिबि, नल, नहुष, नाभाग तथा अम्बरीष आदिने भी वहाँ दुष्कर कर्म किये हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके वस्त्र, छत्र तथा रसमिश्रित अन्न दान करके वे विष्णुलोकमें गये, जहाँसे फिर इस मर्त्यलोकमें पुनरावृत्ति नहीं होती। जो उस तीर्थमें ब्राह्मणोंको भक्तिपूर्वक पत्र, पुष्प, फल और जल दान करता है, वह जलशायी भगवान् श्रीहरिको प्राप्त होता है। जो भूखसे पीड़ित मनुष्यके लिये वहाँ एक पसर या मुट्ठीभर भी अन्न देता है, वह श्रेष्ठ विमानपर चढ़कर चन्द्रलोकसे भी ऊपर जाता है। दामोदरके आगे एक मासतक उपवास करनेपर मनुष्य दामोदरनगर (वैकुण्ठधाम)-को जाता है, जहाँसे फिर नहीं लौटता। जो दामोदरके आगे पाँच पत्थरका मन्दिर बनवाता है, वह भगवान् श्रीहरिके धाममें जाता है। जो स्त्री भगवान्का सुन्दर मन्दिर बनवाती है, वह विष्णुधामको जाती है। जो एक हजार पत्थरोंका बहुत सुन्दर मन्दिर बनवाता है, वह परब्रह्मको प्राप्त होता है। जो दामोदर-मन्दिरपर पचरंगी ध्वजा फहराता है, वह उसके तन्तुओंके बराबर दिव्य वर्षोंतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। वहाँसे दो कोसपर वस्त्रपथ नामक उत्तम क्षेत्र है, जिसका दर्शन करनेसे सब पाप नष्ट हो जाते हैं और पुनरावृत्तिरहित परम धामकी प्राप्ति होती है। स्त्री या पुरुष, जो भी संसारबन्धनका नाश करनेवाले शिवका पूजन करते हैं, वे शिवलोकमें पूजित होते हैं।
भद्रकी यह बात सुनकर राजा गज कार्तिककी पूर्णिमाका तीर्थकृत्य करनेके लिये ऋग्, यजु और सामवेदके ज्ञाता ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणों, क्षात्रधर्मपरायण क्षत्रियों, दानपरायण वैश्यों तथा सेवाकुशल शूद्रोंको साथ लेकर उस तीर्थमें आये और अनेक प्रकारके दान दे अग्निमें होम करके अग्निष्टोम तथा अश्वमेध आदि यज्ञोंका अनुष्ठान किया। उस तीर्थमें कितने ही पुरुष गायत्री-मन्त्रका जप करते और कुछ लोग मन-ही-मन सावित्री एवं सरस्वतीका ध्यान करते थे। कितने ही ब्राह्मण ब्रह्माजीके द्वारा संकलित पवित्र वैदिक सूक्तोंका पाठ करते और दूसरे लोग द्वादशाक्षर (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्रका जप करते थे। सब शास्त्रोंको देखकर और बार-बार उनपर विचार करके एकमात्र यही सिद्धान्त स्थिर किया गया है कि सदा भगवान् नारायणका ध्यान करना चाहिये।^१ महादेवजीके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो गिरते हुएकी रक्षा करे। चन्द्रमा और सूर्य आदि ग्रह बार-बार जाकर लौट आते हैं, परंतु द्वादशाक्षर मन्त्रका चिन्तन करनेवाले भक्तजन आज भी नहीं लौटते।^२ जिसने 'हरि' इन दो अक्षरोंका एक बार भी उच्चारण कर लिया, उसने मोक्षधामतक पहुँचनेके लिये मानो कमर कस ली है।^३ एकभक्त व्रत, नक्तव्रत, अयाचितव्रत और उपवासव्रत—ये तथा और भी जो व्रत हैं, उनका भगवान् दामोदरके आगे अनुष्ठान करके मनुष्य कृतकृत्य हो जाते हैं। राजा गज ऋषियोंके साथ वहाँ बैठे हुए वार्तालाप कर ही रहे थे कि इतनेमें वहाँ सहस्रों विमान आ गये। वे पत्नी तथा देशवासियोंसहित विमानपर आरूढ़ हो अनामय पदको प्राप्त हुए। जो मानव सदा इस प्रसंगको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर विष्णुधामको जाता है।
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१- आलोक्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः। इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा॥ (स्क० पु०, प्र० ख० ३१७। १४)
२- गत्वा गत्वा निवर्तन्ते चन्द्रसूर्यादयो ग्रहाः। अद्यापि न निवर्तन्ते द्वादशाक्षरचिन्तकाः॥ (स्क० पु०, प्र० ख० ३१७। १६)
३- सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम्। बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति॥ (स्क० पु०, प्र० ख० ३१७। १८)
* प्रभासखण्ड * । १३२७
तीर्थमें पूजन, श्राद्ध और दानकी महिमा; गृहस्थके लिये आचरणीय शिष्टाचार, दान एवं श्राद्धका उपदेश
सारस्वत मुनि कहते हैं—जो गंगाजल, मधु, घृत, कुंकुम, अगर, चन्दन, गुग्गल, बिल्वपत्र, गूमका फूल आदि आवश्यक वस्तुओंका भार कंधेपर रखकर पैदल तीर्थयात्रा करता है और तीर्थमें स्नान करके शिव, विष्णु तथा ब्रह्माजीका दर्शन करता एवं उन्हें पूजा चढ़ाता है, वह सब बन्धनोंसे मुक्त हो प्रलयकालपर्यन्त भगवान् शिवका पार्षद बना रहता है। जो स्त्री, पुत्र, मित्र, भाई तथा सज्जन पुरुषोंके साथ तीर्थयात्रा करता है तथा तीर्थमें वहाँके प्रधान देवताका चिन्तन करता है, वह उत्तम गतिको पाता है। सुन्दर देवमूर्तिका निर्माण करके उसे रथपर स्थापित करे। फिर चन्दन, अगर, कपूर, कुंकुम, भाँति-भाँतिके पुष्प, धूप, दीप, गीत, नृत्य और वाद्य आदिके द्वारा उसकी पूजा करे। जो यों करता है, वह जन्मभरके पापोंको भस्म करके तेजोमय, सर्वव्यापी तथा विश्वकी उत्पत्ति करनेवाले भगवान् पुराणपुरुषका दर्शन करता और मुक्त हो जाता है। तीर्थमें स्नान करके सन्ध्यावन्दन, श्राद्ध-तर्पण आदि करनेके विषयमें ब्राह्मणकी आज्ञा लेनी चाहिये और उसकी बात माननी चाहिये। तदनन्तर दर्भ, तिल और हविष्यान्नका श्रद्धापूर्वक प्रयोग करना चाहिये। तीर्थमें अगस्त्य, भृंगराज एवं कमलके पुष्प, कपूर, अगर, चन्दन, कुंकुम और तुलसीदल आदिको संकल्पपूर्वक चढ़ानेपर अनन्त पुण्यकी प्राप्ति होती है। तीर्थभूमिमें ताम्बूल, फल, नैवेद्य, तिल, कुशा और जलके साथ बिल्वके बराबर पिण्ड देना चाहिये। अमावास्या, पूर्णिमा, माता-पिताकी निधन-तिथि, गजच्छाया और त्रयोदशी तिथिको एवं श्राद्धयोग्य द्रव्य और श्रेष्ठ ब्राह्मण प्राप्त होनेपर पितरोंके ऋणसे मुक्त होनेके लिये घरपर श्राद्ध करना चाहिये। सागरगामिनी नदीके तटपर श्राद्ध किया जाय तो घरसे सौगुना अधिक फल होता है। मनुष्य यदि प्रभास, पुष्कर, गया, पिण्डतारक प्रयाग, गोमती, भव तथा दामोदरके सम्मुख एवं नर्मदा आदि तीर्थोंमें श्राद्ध करे तो उसके पितर सब पापोंसे मुक्त हो उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं और श्राद्धकर्ता भी उत्तम सन्तान पाकर तथा उत्तम भोग भोगकर अन्तमें दिव्य विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकको जाता है।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद आदि, माया, मात्सर्य, चुगली, अविवेक, अविचार, अहंकार, स्वच्छन्दता, चपलता, लोलुपता, अन्यायसाधन, आयास, प्रमाद, द्रोह, दुस्साहस, आलस्य, दीर्घसूत्रता, परस्त्रीगमन, अत्यधिक आहार, सर्वथा आहारका त्याग, शोक तथा चोरी इत्यादि दोषोंको त्यागकर जो घरमें सदाचारपूर्वक रहता है, वह मनुष्य इस भूमिका, देशका तथा नगरका भूषण है। वह श्रीमान्, विद्वान् तथा कुलीन है और वही सब पुरुषोंसे श्रेष्ठ है। काम आदिके कारण कोई भी घरमें दोषोंका त्याग नहीं कर पाता। जिसने दोषोंका परित्याग कर दिया है, उसीके द्वारा स्नान, सन्ध्या, जप, होम, श्राद्ध-तर्पण तथा देवपूजा आदि सत्कर्म सम्पन्न होते हैं। प्रयाग, कुरुक्षेत्र, सरस्वती नदी, समुद्र, गया, रुद्रपद, नर-नारायणका आश्रम, प्रभास, पुष्कर, कृष्ण-गोमती, पिण्डतारक, वस्त्रापथ, पुण्यगिरि, दामोदर, भीमेश्वरी, नर्मदा, स्कन्दतीर्थ, रामेश्वर आदि, उज्जयिनी, महाकाल, काशी, कलिंग और मथुरा—इन तीर्थोंकी मनुष्य यदि एक बार भी यात्रा कर लेता है तो वह ब्रह्महत्या आदि समस्त दोषोंसे मुक्त हो जाता है। गंगा आदि नदियाँ जो समुद्रमें मिली हैं, उनमें पग-पगपर पुण्यकी निधिरूप अनेक तीर्थ हैं, जिनके स्मरणमात्रसे ही सब पापोंका नाश हो जाता है। कामभोगमें आसक्त चित्तवाले जो मूढ़ मानव स्त्रियोंमें रमते रहते हैं,
१३२८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
उनकी यह विपरीत धारणा है कि सुन्दरी स्त्रियोंका शरीर अपने अपवित्र शरीरसे कोई भिन्न वस्तु है। वे मुक्ति-मार्गसे भ्रष्ट होकर पशुयोनिमें जन्म लेते हैं। जो मानव पुष्ट शरीर और नीरोग युवावस्था पाकर गंगा आदि तीर्थोंमें नहीं जाते, वे ज्ञानशून्य खल जीते-जी भी मरे हुएके समान हैं। पहले शुभ और अशुभ कर्मोंका बन्धन काटकर फिर कल्याणमय मोक्ष पानेकी इच्छा करे। यदि ऐसा न हो सके तो मनुष्योंको सदा शुभ कर्म ही करना चाहिये। प्रतिदिन उठकर स्नान करे। उसके बाद भगवान् विष्णु और शिवकी पूजामें संलग्न हो। सदा सच बोले। सबका हित करे। अपनी शक्तिके अनुसार दान दे। परनिन्दासे डरे। परायी स्त्रियोंसे दूर रहे। सुवर्णकी चोरी, पृथ्वीका अपहरण और ब्राह्मणके धनका त्याग करे। ब्राह्मण, स्त्री, राजा, बालक, वृद्ध, तपस्वी, पिता-माता तथा गुरुजन—इनका मनसे भी कभी अप्रिय न करे। देश-कालका ज्ञान तथा पात्र और अपात्रका विवेक रखना चाहिये। गृहस्थ पुरुष याचकोंको छाया, तृण, अन्न, वस्त्र, मट्ठा, अग्नि, ईंधन, काँजी, औषध और शाक दे। एकादशी, पूर्णिमा, चतुर्दशी, अष्टमी, अमावास्या, व्यतीपात, संक्रान्ति, ग्रहण, वैधृति, पिता-माताकी निधन-तिथि, युगादि-तिथि और मन्वादि तिथिको अपने घरमें श्राद्ध, दान एवं कीर्तन आदिका उत्सव मनाना चाहिये। अथवा उक्त तिथियोंको तीर्थमें जाना चाहिये; क्योंकि वहाँ घरसे सौ गुना फल होता है। गृहस्थ पुरुष इन्द्रियोंको वशमें करे। मदिरा पीना और जूआ खेलना छोड़ दे। विवादमें जाना और युद्ध करना यत्नपूर्वक त्याग दे। स्नान, दान, जप, होम, देवपूजन और ब्राह्मणभोजन आदि पुण्यकर्म यदि उक्त तिथियोंमें विधिपूर्वक किये जायें तो वे सब अक्षय होते हैं। किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको एक भी गौ अवश्य दान करे, जो वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित, दूध देनेवाली, बछड़ेवाली और तरुणी (नयी) हो। जो एक भी गाय ब्राह्मणको दान करता है, वह सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। जब यमदूत किसी पुरुषको बाँधकर उसे यमलोकके मार्गसे ले जाते हैं, उस समय दानमें दी हुई नन्दा गौ वहाँ आकर उसे अपने पुत्रकी भाँति देखती है और यमदूतोंको अपने हुंकारसे जीतकर दाताको साथ ले शिवलोकमें पहुँचा देती है। यदि अपने आहारमेंसे चौथाई भाग सिद्धान्न निकालकर दान किया जाता है तो दाता पुरुष निश्चय ही ध्रुवलोकमें जाता है। यदि प्रतिदिन अपने आहारके बराबर अन्न गौओंको गोग्रासके रूपमें दिया जाता है, उसे देनेवाला पुरुष शिवलोकमें जाता है। ओखली, चक्की, चूल्हा और झाडू आदिके द्वारा जो पाप बन जाता है, उस पापको गृहस्थ पुरुष प्रतिदिन भिक्षा देकर धोता है। एक ग्रास अन्नकी भिक्षा होती है। जहाँ उतनी भिक्षा प्रतिदिन दी जाती है, उसी घरको घर समझना चाहिये। दूसरा घर श्मशान-सा दिखायी देता है। घर, अन्न, जल सिद्धान्न, छाता, जूता, कमण्डलु, अँगूठी और वस्त्र दान करके मनुष्य स्वर्गमें जाता है। जो थके हुएको सवारी देता, प्यासेको पानी पिलाता और भूखसे पीड़ित मनुष्यको अन्न देता है, वह विमानद्वारा स्वर्गलोकमें जाता है। अपनी शक्तिके अनुसार सदा घृतयुक्त भोजन देना चाहिये; क्योंकि प्राण अन्नमय है, अतः उसे पाकर प्राणी सन्तुष्ट होते हैं। संसारमें भूखकी पीड़ा ही सबसे बड़ी पीड़ा है। उसकी दवा है अन्न। अन्नसे ही वह पीड़ा शान्त होती है। इसलिये अन्नदान उत्तम है। अन्न, वस्त्र, फल, जल, मट्ठा, शाक, घृत, मधु, पत्र, पुष्प, जूता, गुदड़ी, छड़ी, कमण्डलु, छाता, पात्र, विद्या, पुस्तक, देवपूजा, कन्या, कुश, यज्ञोपवीत, बीज, ओषधि, गृह, रत्न, क्षेत्र, यज्ञपात्र, योगपट्ट, पादुका, काला मृगचर्म, बुद्धिदान, धर्मोपदेश तथा धर्मकथा—इन सबके द्वारा सदैव दान करते रहना चाहिये। उससे महान् कल्याण होता है और दाता सब पापोंका नाश करके शिवलोकमें जाता है। श्राद्धमें
* प्रभासखण्ड *
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कुलीन, वेदज्ञ, क्रोधरहित, स्नानशील तथा अपने देशके अनुकूल सदाचारमें तत्पर गृहस्थ ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। श्राद्धके एक दिन पहले निष्काम, लोभरहित एवं नीरोग ब्राह्मणोंको निमन्त्रण देना चाहिये; किंतु गाँवभरकी पुरोहिती करते हों, उनको नहीं। उन निमन्त्रित ब्राह्मणोंके आगे विधिपूर्वक पिण्डदान करना चाहिये। बिना श्रद्धाके किया हुआ श्राद्ध दूसरेके किये हुएके समान निष्फल होता है। अतः क्रोध त्यागकर श्रद्धापूर्वक श्राद्धका अनुष्ठान करना चाहिये। श्राद्धकर्ममें बलिवैश्वदेवके अन्तमें वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, पथिक एवं तीर्थसेवी अतिथिका सत्कार करना चाहिये। गृहस्थोंको चाहिये कि वे अपनी शक्तिके अनुसार संन्यासियोंका सदा ही पूजन करें।
राजा बलिके राज्यकी प्रशंसा, नारदजीका बलिको राजाके कर्तव्यका उपदेश, उत्पात-शान्तिके लिये बलिके द्वारा यज्ञका प्रारम्भ
महाबलवान् भगवान् नृसिंहने हिरण्यकशिपुको मारकर त्रिलोकीका राज्य इन्द्रको दे दिया। हिरण्यकशिपुके कुलमें बलि पैदा हुए। वे बड़े बलवान् थे। उन्होंने इस पृथ्वीका एकछत्र शासन किया। उनके राज्यमें सारी पृथ्वी बिना जोते-बोये ही अन्न पैदा करती और हरी-भरी खेतीसे सुशोभित होती थी। वृक्षोंमें सुगन्धित पुष्प और रसीले फल लगते थे। वृक्षोंमें तनेके ऊपरतककी डालियोंमें फल लगते थे। उनके पत्ते-पत्तेमें मधु भरा रहता था। सभी ब्राह्मण चारों वेदोंके ज्ञाता होते थे। क्षत्रिय युद्धकलामें कुशल, वैश्य गोसेवापरायण तथा शूद्र द्विजमात्रकी सेवामें तत्पर होते थे। सब लोग दरिद्रता, दुःख और अकालमृत्युके भयसे मुक्त हो दीर्घजीवी होते थे। रातमें प्रत्येक भूभागमें दीपकोंका इतना प्रकाश होता कि रात्रि भी दिनके समान जान पड़ती थी। जैसे देवता देवलोकमें सुखपूर्वक विहार करते हैं, उसी प्रकार मनुष्य भूलोकमें सानन्द विचरण करते थे। पृथ्वी स्वर्गरूप हो गयी थी और वहीं राजा बलि राज्य करते थे। देवताओं और दानवोंमें परस्पर युद्ध नहीं होता था।
एक समयकी बात है नारदजी राजा बलिके भवनमें पधारे। बलिने उन्हें आसन, पाद्य और अर्घ्य देकर उनका पूजन किया, फिर सब दैत्य और दानव बैठे। उस समय शुक्राचार्यसहित बलिने नारदजीसे कहा—'देवर्षे ! यह राज्य, यह पत्नी, ये मेरे पुत्र और मैं बलि सब आपकी सेवामें प्रस्तुत हैं। इनमें जिससे आपका जो कार्य हो, उसे कहिये।'
नारदजीने कहा—राजन् ! जो ब्राह्मण यजमानकी भक्तिसे ही सन्तुष्ट हो जाते हैं, वे 'भूमिदेव' कहे गये हैं। तुमने मेरा भलीभाँति पूजन किया, इससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। मुझे धनसे कोई प्रयोजन नहीं है। मैं तुम्हारे राज्यसे, तुम्हारे, यज्ञ, दान और व्रतोंसे परम सन्तुष्ट हूँ। बले ! मैं देखता हूँ, देवताओंद्वारा तुम्हारा कुछ अप्रिय कार्य किया गया है। तुमसे भलीभाँति पूजित होनेपर भी देवराज इन्द्र सन्तुष्ट नहीं हो रहे हैं। मैंने सुना है, देवताओंके प्रयत्नसे भूतलपर तुम्हारे राज्यका उच्छेद होगा। यह सुनकर तुम्हें जो उचित प्रतीत हो, वह शीघ्र करो।
राजा बलिने पूछा—प्रभो ! राजा किन गुणोंसे राज्य करता है, यह बताइये। दान सत्पात्रको देना चाहिये या अपात्रको?
नारदजीने कहा—जो राजा छत्तीस गुणोंसे सम्पन्न होकर राज्य करता है, वही राज्यका फल पाता है। राजा पापरहित हो सब धर्मोंका प्रेमपूर्वक अनुष्ठान करते हुए आस्तिक बना रहे। गुप्तरूपसे अर्थका साधन करे, कामनाओंको त्याग दे और उद्दण्डतासे दूर रहे। प्रिय वचन बोले, किंतु कभी दीन न हो। शूरवीर होकर रहे, परंतु डींग न
१३३० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मारे। दाता हो, परंतु कुपात्रके यहाँ धनकी वर्षा न करे। धृष्ट होकर रहे, किंतु निष्ठुर न हो। दुष्टोंसे सन्धि और भाई-बन्धुओंसे विरोध न करे। दुष्ट पुरुषसे गुप्तचरका काम न ले। किसीको सताकर अपना स्वार्थ सिद्ध न करे। अर्थको समझे। जहाँ आपत्तिमें पड़ा हो, वहाँ अपने गुणोंका बखान न करे। साधु पुरुषोंसे विरोध न करे। असाधु पुरुषोंका आश्रय न ले। अच्छी तरह जाँच-पड़ताल किये बिना किसीको दण्ड न दे। गुप्त मन्त्रणाको प्रकाशित न करे। लोभी पुरुषोंको दान न दे। अपकारियोंपर विश्वास न करे। स्त्रीको अत्यन्त गुप्त रखे। बलवान् राजा दूसरोंके अपराध क्षमा करे। स्त्रीका अत्यन्त सेवन न करे। प्रिय तथा हितकर भोजन करे, अहितकर नहीं। जो चोर न हो, ऐसे मनुष्यका सत्कार करे। निष्कपट भावसे गुरुकी सेवा करे। देवताकी पूजा दिखावेके लिये न करे। अनिन्दित लक्ष्मीकी इच्छा करे। स्वार्थ त्यागकर सेवा करे। कार्यदक्ष तथा समयका ज्ञाता हो। बातचीत करते हुए भोजन न करे। किसीपर अनुग्रह करते हुए उसपर आक्षेप न करे। समझ-बूझकर प्रहार करे, शत्रुओंको मारकर शेष न रहने दे। अकस्मात् क्रोध न करे। अपराधियोंके प्रति भी मृदु व्यवहार करे। इस प्रकार आचरण करनेसे राज्य सुस्थिर होता है। यदि कल्याण चाहते हो तो योगके द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करो। तपस्या, स्वाध्याय, दान, तीर्थयात्रा तथा आश्रमवास—ये सब आत्मज्ञानकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं। तुम्हें संसारकी ओरसे वैराग्य रखना और ब्राह्मणोंका पूजन करना चाहिये। नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान तथा भगवान् नारायणका चिन्तन करना चाहिये। राजन्! मैं प्रसंगवश यहाँ आ गया था, अब जाता हूँ।
यों कहकर नारदजी चले गये। तत्पश्चात् दैत्योंको अपशकुन दिखायी देने लगे। रातको सियारिनें उनके नगरमें प्रवेश करके विकृत स्वरमें रोती थीं। दूषित शब्द करनेवाले कौए दिन-रात नगरमें आते-जाते थे। भयंकर विषवाले काले साँप घरोंमें घूमते थे। कौए, गीध, और बगले पागल-से होकर नगरके ऊपर मँडराते थे। स्त्रियों, गौओं और हिरनियोंके गर्भ उलटे पैदा होते थे। गौओंके दूधमें घी नहीं निकलता था। तिलमें तेल नहीं होता था। देशवासी मनुष्य प्रतिदिन आपसमें लड़ते थे। मेघ कुपित होकर असमयमें अधिक जलकी वर्षा करते थे। बादल बहुत गरजते और ओलोंकी वर्षा करते थे। भूकम्प होता और दिशाओंमें आग लगती थी। गाँवोंमें उल्लुओंके शब्द गूँजते रहते थे और झुंड-के-झुंड कुत्ते एकत्र होकर मुँह ऊँचे करके रातभर रोया करते थे। राजा बलिके राज्यका विनाश आ पहुँचा था। दिनमें पुच्छलतारेका उदय होता। सूर्यमण्डल कीलोंसे घिरा हुआ दिखायी देता। आकाश घड़ोंसे व्याप्त होनेके कारण उसमें चन्द्रमाका प्रकाश नहीं प्रतीत होता था। रोहिणी नक्षत्रका वेध हुआ, जो प्रलयकालमें हुआ करता था। दिनमें तारे गिने जाते थे। भूमि, स्त्री, गाय और मृगियोंमें बीजोंका उलट-फेर होने लगा। मन्त्रीलोग गुप्त मन्त्रणामें सम्मिलित होकर फिर फूट जाते थे। उस समय घीकी आहुति देनेपर भी आग प्रज्वलित नहीं होती थी। प्रचण्ड आँधी चलती थी। बवंडरसे वृक्ष जोर-जोरसे झूमते थे। सेनाओंमें ध्वजाएँ जलती थीं। आकाश धूलसे धूसरित हो जाता था। ये तथा और भी बहुत-से उत्पात राजा बलिके यहाँ होने लगे। वामनजीका अवतार हो जानेपर दैत्योंके घरमें भयंकर विवाद और स्वप्नदर्शन होता था। जब दैत्यराज बलि कवच धारण करके यात्रा करते, तब सेनासहित उनके सामने ऐसे-ऐसे अपशकुन उपस्थित होते थे, जिनके होनेपर यात्रा करनेवाला पुरुष अपने घरको कुशलपूर्वक नहीं लौटता। जब वे घरपर रहते तथा राज्य करते, तब उनके शरीरको सुख नहीं मिलता। सब अंग टूटता और सिरमें दर्द होने लगता। वे ज्वरग्रस्त होनेके कारण न सुखसे सोते, न खाते और न पीते ही थे। लोग रातको भोजन नहीं करते। क्योंकि सब प्रकारकी
- प्रभासखण्ड * १३३१
व्याधियोंसे व्याकुल थे।
जगत्की यह विपरीत दशा देख बलिका चित्त व्याकुल हो उठा। वे अत्यन्त दुःखी हो ब्राह्मणोंके साथ बैठकर विचार करने लगे कि यह क्या है। बलिने पराभक्तिसे युक्त हो अपने गुरुको बुलाकर सभामें बैठाया और कुशल-समाचार पूछा और कहा—'गुरुदेव! यह सम्पूर्ण जगत् विपरीत दशाको प्राप्त हुआ है। इसका कारण बताइये।'
शुक्राचार्य बोले—राजन्! उत्पात-शान्तिके लिये ब्राह्मणों और क्षत्रियोंके साथ एक द्वादशवार्षिक यज्ञ करो, जिसमें सर्वस्वकी दक्षिणा दी जाती हो। ऋषि, ब्राह्मण, मुनि और ब्रह्मचारी जो दूर-दूर रहनेवाले हैं, वे सब इस महायज्ञमें पधारें। नगरसे पूर्व दिशामें यज्ञमण्डप बनाना चाहिये। जिसकी जैसी रुचि हो, वैसी वस्तु उसे दानमें देनी चाहिये।
'यही करूँगा' यह कहकर राजा बलि शीघ्र ही यज्ञ प्रारम्भ करनेको उद्यत हुए और यज्ञकर्ममें कुशल समस्त ब्राह्मणोंको बुलाकर बोले—'मुझे यज्ञकी दीक्षा लेकर सर्वस्वकी दक्षिणा देनी है। इसमें ब्राह्मणोंके याचना करनेपर उन्हें सदा सब कुछ देनेपर तत्पर रहना चाहिये। मैं किसीके याचना करनेपर अपने पुत्र, मित्र तथा इस शरीरको भी दे डालूँगा। इस यज्ञमें मुझे ब्राह्मणोंके लिये सदा दान करना चाहिये। किसीके मना करनेपर भी मुझे रुकना नहीं है। दान देनेका निश्चय मैंने पूर्णरूपसे कर लिया है। अनेक योजन विस्तृत दिव्य मण्डप बनवाकर उसमें सबको दान, भोजन और वस्त्र दिये जायँ।'
सप्तर्षिगण आकाशसे भूतलपर आये। सब देवता भी उपस्थित हुए। पृथ्वीपर जो श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, वे भी पधारे। क्षत्रिय, नट, नर्तक और याचक भी आये। वेदमन्त्रोंकी ध्वनिके साथ गीत और वाद्यका भी शब्द होने लगा। 'दीजिये, दीजिये' की याचनाका शब्द तीनों लोकोंको बधिर किये देता था। 'न दो या थोड़ा दो' की बात किसीके मुँहसे नहीं निकलती थी। जो जिस वस्तुको माँगता, उसे वही दी जाती थी। कोई ऐसा ब्राह्मण नहीं था, जो वहाँ बहुत याचना करे। स्वतः दिये जानेपर भी ब्राह्मणलोग भोजन और वस्त्रतक नहीं लेते थे। क्योंकि वे सब लोग राजा बलिके राज्यसे ही बहुत सन्तुष्ट थे। धन लेकर क्या करते।
इस प्रकार सर्वस्वकी दक्षिणासे युक्त वह महान् यज्ञ प्रारम्भ हुआ। वहाँ कोई नाचते, कोई गाते, कोई पाठ और स्तुति करते थे। ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, सूर्य, चन्द्र आदि देवता आहुतियों और मन्त्रोंसे अत्यन्त प्रसन्न किये गये। कुछ लोग यजमान राजा बलिकी प्रशंसा करते और कुछ लोग आचार्यकी। कोई होताके गुण गाता और कोई परिचारकके। दैत्य सब कुछ सुनते और राजा बलिके आगे जाकर कहते थे। बलि प्रसन्न होकर सबको मुँहमाँगी वस्तुएँ देते थे।
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देवर्षि नारदका वामनजीको मत्स्य आदि अवतारोंका वृत्तान्त सुनाना, नृसिंहावतार एवं प्रह्लादकी कथा
महादेवजी कहते हैं—एक समय देवर्षि नारद वामनजीके समीप गये और उनके वृत्तान्त पूछनेपर इस प्रकार बोले—'प्रभो! मैं स्वर्गलोकसे यहाँ आया हूँ। प्रतिदिन सूर्यके गमनागमन ब्रह्माका दिन पूरा होता है। दिनके अन्तमें रात होती है और ब्रह्माजीकी रात्रिमें सब देवताओंका नाश हो जाता है। फिर मर्त्यलोककी तो बात ही क्या कहूँ, जहाँ प्रतिदिन लोगोंकी मृत्यु होती है। आकाश धुएँसे आच्छादित हो गया है। सब देवता राजा बलिके घर गये हैं। सप्तर्षिगण तथा ब्राह्मण और ब्रह्मचारी भी वहीं पहुँचे हैं। हाहा, हूहू, तुम्बुरु, पर्वत, अप्सराएँ तथा गन्धर्वगण—
१३३२
* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
ये सब लोग राजा बलिके भवनमें गये हैं। बलि उत्पातकी शान्तिके लिये यज्ञ करते हैं। मैं भी उन्हींके यहाँ यज्ञ देखनेके लिये जाना चाहता हूँ। सुना है, राजा बलि एक कम एक सहस्र यज्ञ कर चुके हैं। उस एकके भी पूरा हो जानेपर सम्पूर्ण लोकोंपर दैत्योंका अधिकार हो जायगा। वहाँ यह प्रतिज्ञा करके यज्ञ आरम्भ किया गया है कि ब्राह्मणोंको जिसकी जो इच्छा होगी, वही वस्तु दी जायगी। बलिका कहना है कि 'किसीके मना करनेपर भी ब्राह्मणको मुँहमाँगी वस्तु अवश्य दी जायगी। मेरी बात सत्य होगी। मैं अपने सेवकों, प्यारे पुत्रों, सम्पूर्ण राज्य तथा अपने-आपको भी माँगनेपर दे दूँगा। मेरा यज्ञ व्यर्थ न होने पाये। उनकी इस अहंकारपूर्ण बातसे मेरे सिरमें दर्द होने लगा है। भला, इस प्रकार प्रतिज्ञा करके कैसे यह यज्ञ पूर्ण होगा? आप ही उस यज्ञके विध्वंसमें कारण होंगे, यह जानकर मैं आपके पास आया हूँ। आप इस समय ऐसी चेष्टा करें, जिससे वह यज्ञ पूरा न हो।'
वामनजीने कहा—महर्षे ! मुझे यह बताओ कि मैं कौन हूँ? मेरी क्या शक्ति है? मैं किस कारणसे यज्ञकी पूर्तिमें विघ्न उपस्थित करूँगा? जब इस यज्ञमें सब देवता पधारे हैं, सभी ऋषि और ब्राह्मणलोक भी सम्मिलित हुए हैं, तब यह व्यर्थ कैसे होगा?
नारदजी बोले—प्रभो ! एक समय ब्रह्माजीने भगवान् विष्णुसे कहा—'हरे! वेदोंके बिना मैं सृष्टि कैसे करूँगा? वेद नष्ट हो गये हैं, उनको मैं नहीं जानता। क्या वे किसी स्थानपर स्थित हैं या नीचे चले गये हैं? मुझमें जलके भीतर जानेकी शक्ति नहीं है। आपको दस अवतार धारण करके सृष्टिकी रक्षा करनी चाहिये। अतः आप जलचर मत्स्य हों और शीघ्र ही वेदोंको ढूँढ़ लाकर मुझे देनेकी कृपा करें।' उनके यों कहनेपर श्रीहरिने जलमें मत्स्यरूप धारण किया और वेदोंको लाकर ब्रह्माजीको लौटा दिया। तत्पश्चात् किसी समय ब्रह्माजीने पुनः प्रार्थना की—'प्रभो! आप कच्छपरूप ग्रहण करके मन्दराचलको पीठपर धारण करें। समुद्र-मन्थनसे प्रकट होकर लक्ष्मीजी आपका वरण करेंगी।' ब्रह्माजीके यों कहनेपर आप श्रीहरिने कच्छपरूप धारण किया। समुद्र-मन्थनके समय आपका वह अद्भुत चरित्र मैंने अपनी आँखों देखा। तदनन्तर एकार्णवके जलमें डूबकर जब पृथ्वी रसातलको चली गयी और कहीं दिखायी न दी, तब ब्रह्माजीसे प्रेरित होकर आपने महावराहका रूप धारण किया और नीचे जाकर अपनी दाढ़ोंके अग्रभागपर पृथ्वीको उठाया; फिर जलके ऊपर ले आकर पृथ्वीको यथास्थान रख दिया। वह आपका परम मनोहर तृतीय अवतार था, जिसके द्वारा आपने पर्वतोंसहित पृथ्वीको स्थापित किया। अब आपके अत्यन्त भयंकर नृसिंह-अवतारकी, जो चौथा है, कथा कहता हूँ। अदितिके पुत्र आदित्य (देवता) कहलाते हैं और दितिके पुत्र दैत्य। पूर्वकालमें दितिके दो महाबली पुत्र हुए थे। एकका नाम हिरण्यकशिपु था और दूसरेका हिरण्याक्ष। स्वर्गलोकमें देवता रहते थे और पातालमें दैत्यों तथा दानवोंका राज्य था। हिरण्यकशिपु रसातलमें राज्य करता था। देवताओं और दानवोंने मिलकर मनुके पुत्रोंको पृथ्वीके राज्यपर स्थापित किया था। हिरण्यकशिपुने यह व्यवस्था तोड़ दी और उसने युद्धमें इन्द्रको परास्त करके सात द्वीपोंवाली पृथ्वी तथा अमरावतीपुरीको भी अपने अधिकारमें कर लिया। सब भोगोंपर अधिकार करके वह असुर अपने पुत्र और पौत्रोंके साथ राज्य भोगने लगा। उसने तपस्याके द्वारा ब्रह्माजीको संतुष्ट किया और ब्रह्माजीने उसे मुँहमाँगा वर देनेको स्वीकार किया। उस दैत्यने इस प्रकार वर माँगा—'सुरश्रेष्ठ ! मुझे अमरत्व प्रदान कीजिये। देवताओं और मनुष्योंसे किसी प्रकार भी मेरी मृत्यु न हो। यदि मृत्यु हो ही तो ऐसे पुरुषसे हो, जिसका स्वरूप कुछ सिंहका और कुछ मनुष्यका हो, जो समूची पृथ्वीको धारण
- प्रभासखण्ड * | १३३३ ---|---
करनेवाला हो। उसके थपेड़ोंसे विदीर्ण होकर मैं पृथ्वीपर मृत्युको प्राप्त होऊँ।'
'एवमस्तु' कहकर ब्रह्माजी चले गये। दैत्यराज हिरण्यकशिपु भी अपने स्थानको गया। कुछ काल व्यतीत हो जानेपर उसके मनमें देवताओंके प्रति बड़ा भारी वैर हुआ। वह सोचने लगा—'देवता मेरा क्या कर लेंगे। विष्णुसे मेरा क्या प्रयोजन है तथा रुद्र भी मेरा क्या बिगाड़ लेंगे। समस्त यज्ञोंद्वारा सदा मेरी ही आराधना होनी चाहिये।' उस दैत्यका बर्ताव तो ऐसा था, परंतु उसके पुत्र प्रह्लाद श्रीहरिकी स्तुति करते थे। जिनसे उसकी मृत्यु होनेवाली थी, उन्हीं भगवान् विष्णुका वे चिन्तन करने लगे। जब उन्हें दूसरी बातें पढ़ायी जाती थीं, तब भी वे 'हरि हरि'का ही कीर्तन करते थे। 'जो चार भुजाओंसे सुशोभित, शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले, पीताम्बरधारी, कौस्तुभमणिसे उद्भासित तथा सम्पूर्ण जगत्के एकमात्र स्वामी हैं, जो स्मरण करनेमात्रसे ही मोक्ष देते हैं, उन भगवान् विष्णुका मैं सदा स्मरण करता हूँ'—उनकी इस बातसे दैत्य कुपित हो उठा और दूसरे दैत्योंसे बोला—'मेरे इस दुष्ट पुत्रको तुमलोग हाथी, सर्प, जल और अग्निद्वारा मार डालो।'
प्रह्लाद बोले—दैत्यराज! हाथीमें भी विष्णु हैं, सर्पमें भी विष्णु हैं, जलमें भी विष्णु हैं और स्थलमें भी विष्णु हैं। तुममें और मुझमें भी वे ही विराजमान हैं। विष्णुके बिना यह दैत्योंका समुदाय भी नहीं है।
सदा प्रह्लादको मारनेकी चेष्टा की जाती थी, तो भी उनकी मृत्यु नहीं होती थी। यह देख हिरण्यकशिपुकी छाती क्रोधाग्निसे जलती रहती थी। तब उसने पुत्रको स्वयं ही दण्ड देनेके लिये उसके मुँहपर तलवार तान दी और कठोर वचनोंसे डाँटते हुए उसे मार डालनेका उद्योग किया। वह बोला—'अरे बालक! तुझे धिक्कार है। तू नारायणकी स्तुति करता है, बार-बार मेरे शत्रुके गुण गाता है; अतः इस श्रेष्ठ तलवारसे मैं अभी तेरा सिर उड़ाये देता हूँ। मैं ही विष्णु, मैं ही ब्रह्मा, मैं ही रुद्र, इन्द्र और वरदाता प्रभु हूँ। तू अपने पिताको छोड़कर दूसरेकी स्तुति क्यों करता है।'
बालक प्रह्लाद जब पिताकी इच्छाके अनुसार नहीं पढ़ सके और अपने पिताकी स्तुति भी नहीं कर सके, तब गुरुजीने छड़ीसे मारकर प्रह्लादको पुनः पढ़ाना प्रारम्भ किया।
प्रह्लाद बोले—जिन सर्वव्यापी श्रीहरिने चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंको उत्पन्न किया, बढ़ाया और फिर सबका शमन किया है, उन्हींकी मैं स्तुति करता हूँ। वे ही श्रीविष्णु मुझपर प्रसन्न हों। ब्रह्माजी भी विष्णु हैं। शिव भी विष्णु ही हैं। इन्द्र, वायु, यम और अग्नि भी विष्णु हैं। प्रकृति आदि चौबीस तत्त्व और उनके साक्षी पचीसवें पुरुष भी विष्णु ही हैं। वे ही पिताजीके, गुरुजीके तथा मेरे शरीरमें भी स्थित हैं। यह जाननेपर भी कोई मरणधर्मा प्राणी श्रीहरिके सिवा दूसरे नीच मनुष्योंकी स्तुति कैसे कर सकता है।
गुरुजीने कहा—शिष्य! यह तो बता, मनुष्योंमें नीच कौन है?
प्रह्लादजीने कहा—पुत्र-जन्म आदिके समय, मृत्युके समय तथा शुभ अवसरोंमें जिसके मुखसे 'हरि' इन दो अक्षरोंका उच्चारण नहीं होता, वही मनुष्योंमें अधम है। भय, राजकुलसे समागम, युद्ध, व्याधि, स्त्रीसंग, विपत्ति, यात्रा तथा मृत्युके समय जो इस पृथ्वीपर रहते हुए श्रीहरिको भूलकर माता-पिताका स्मरण करते हैं, वे मूर्ख मानव मनुष्योंमें अधम हैं। मेरे तो न माता है, न पिता है, न स्वजन है, न सेवक है; श्रीहरिके बिना मेरा कोई नहीं है। आपको जो उचित जान पड़े, वह बर्ताव कीजिये।
इस तरहकी बातोंसे दैत्यको बड़ा क्रोध हुआ और वह मारनेके लिये समीप आया। इतनेमें ही प्रह्लादकी माताने आकर पुत्रको आँचलसे ढक लिया और उसके भाई, स्वजन तथा बहिन—ये सभी आकर कहने लगे—'भैया! तू 'हरि, हरि' मत बोल। मैं तेरी माता हूँ। यह बहिन है, ये भाई
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हैं तथा ये स्वजन लोग हैं। हम सब तुम्हारे पिताका सम्मान करते हैं; इसीलिये हम बहुत दिनोंतक यहाँ जीवित रह सकते हैं। (अतः तुम्हें भी इनका आदर करना चाहिये)।'
प्रह्लाद बोले—प्रकृति मेरी माता है। बुद्धि मेरी बहिन है। जिसको मैं कहा जाता है, वह अहंकार है। पंचतन्मात्राओंके समुदाय मेरे सहोदर भाई हैं, जो मेरे साथ ही जाते हैं। इनको उत्पन्न करनेवाला जो पचीसवाँ पुरुष है, वही मेरा पिता है। परमात्मा श्रीहरि ही अन्तर्यामी इस शरीरमें स्थित हैं। यदि उनका सम्मान किया जाय तो वे हृदयमें दर्शन देते हैं। उनका चरण ही अणिमा आदि आठों सिद्धियोंका स्थान है। आपलोगोंके लिये राज्य ही अभीष्ट वस्तु है; परंतु जहाँ भगवान् विष्णुका पूजन (आदर) नहीं होता, वह राज्य मुझे तिनकेके समान प्रतीत होता है। ब्रह्मा, रुद्र, अनल आदिके रूपमें जिनका प्रत्यक्ष दर्शन होता है, जो बिना किसी आधारके ही सर्वत्र विचरते हैं, वे ही भगवान् विष्णु हैं। ये जो आकाशमें स्थित और ध्रुवसे बँधे हुए सम्पूर्ण ग्रह दृष्टिगोचर होते हैं, वे सब भगवान् विष्णुके ही वचनसे पृथ्वीपर नहीं गिरते। फिर प्रलयकालमें वे ही सबका विनाश करते हैं। ऐसा विचार करके मुझे आप लोगोंसे मृत्युका भय नहीं है।
प्रह्लादकी यह बात पूरी होते ही उनके पिताने उन्हें लात मारकर कहा—'कहाँ है तेरा हरि? पहले मैं उसीको मारता हूँ। उसके बाद 'हरि, हरि'की रट लगानेवाले तुझ दुष्टका भी वध कर डालूँगा।'
प्रह्लादने कहा—पृथ्वी आदि पाँचों भूत भगवान् विष्णुके ही स्वरूप हैं। वे ही स्थल और जलमें हैं। अधिक कहनेसे क्या लाभ, यह सम्पूर्ण जगत् विष्णुमय ही है। तृण, काष्ठ, गृह, क्षेत्र, द्रव्य और देह—सबमें श्रीहरि स्थित हैं। वे ज्ञानयोगसे जाने जाते हैं, इस चर्मचक्षुसे नहीं देखे जाते। भगवान् विष्णु सब सुनते हैं, सब जानते हैं और सब कुछ करते हैं।
प्रह्लादके यों कहनेपर हिरण्यकशिपु सहसा सिंहासन छोड़कर खड़ा हो गया। उसने दृढ़तापूर्वक कमर कस ली और म्यानसे चमचमाती हुई तलवार खींचकर प्रह्लादको थप्पड़ मारकर कहा—'अब तू अपने विष्णुका स्मरण कर ले। मैं अभी उज्ज्वल कुण्डलोंसे सुशोभित तेरा मस्तक पृथ्वीपर गिरा दूँगा, जैसे वृक्षसे पका फल गिराया जाता है। यदि जीवित रहना चाहता है तो इस खम्भेसे अपने विष्णुको निकालकर दिखा।'
प्रह्लादजी भय छोड़कर पद्मासन लगा धरतीपर बैठ गये और कंधा नीचे करके श्वासको ऊपर रोककर हृदयमें भगवान् श्रीहरिका ध्यान करते हुए मरनेके लिये तैयार हो गये। प्रभो! उस समय मैंने एक आश्चर्यकी बात देखी—आकाशसे फूलोंकी एक माला नीचे आयी और स्वयं ही प्रह्लादजीके गलेमें पड़ गयी। इतनेमें ही खम्भेसे एक भयंकर आवाज हुई, जिसे सुनकर सब लोग क्षुब्ध हो गये और मन-ही-मन सोचने लगे, 'क्या यह पृथ्वी पातालमें धँस जायगी अथवा क्या स्वर्गलोक टूटकर पृथ्वीपर गिर पड़ेगा अथवा प्रह्लादका सिर इस दैत्यके खड्गसे कटकर पृथ्वीपर तो नहीं गिर जायगा?' इसी समय खम्भेसे बड़ा भयानक सिंहनाद हुआ। उस शब्दसे मूर्च्छित होकर सब दैत्य पृथ्वीपर गिर पड़े। हिरण्यकशिपुके हाथसे ढाल और तलवार भी गिर गयी। वह सोचने लगा, 'यह क्या है?' जब सिर ऊँचा करके वह देखने लगा, तब भगवान् विष्णुपर उसकी दृष्टि पड़ी। नीचेसे मनुष्यकी आकृति और ऊपरसे भयंकर सिंहका स्वरूप! दाढ़ोंके कारण विकराल मुख, मानो वे आकाशको चाट लेंगे। शरीर तेजसे प्रज्वलित हो रहा था। मुखसे भयानक कटकटकी ध्वनि हो रही थी, मानो गरजता हुआ बादल मूर्तिमान् हो गया हो। गर्दनके बाल ऊपरकी ओर उठे हुए थे। देवता और दैत्य सबके लिये उनकी ओर देखना कठिन था। उन्हें देखकर वह दैत्य पुनः पृथ्वीपर गिर पड़ा। नृसिंहजीने उसके बाल पकड़कर आकाशमें सौ बार उसे घुमाया और पृथ्वीपर पटक दिया, परंतु ब्रह्माजीके वरके प्रभावसे उस दैत्यकी मृत्यु
- प्रभासखण्ड * | १३३५ ---|---
नहीं हुई। तब भगवान्ने हिरण्यकशिपुको घुटनोंपर सुलाकर उसकी छाती चीर डाली। देवता जय-जयकार करने लगे। चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें शान्ति छा गयी।
हिरण्यकशिपुकी मृत्युके पश्चात् विष्णुभक्त प्रह्लादजी दैत्योंके राजा बनाये गये। उन्होंने बहुत वर्षोंतक भूमण्डलका राज्य किया। उनके अनेक पुत्र हुए, जिनमें विरोचन ज्येष्ठ थे। विरोचनसे बलिके जन्म हुआ। बलिके उत्पन्न होनेके पश्चात् विरोचनने एकान्तमें योग-साधन करके श्रीहरिके तत्त्वका ज्ञान प्राप्त किया और राज्य त्यागकर वे पर्वतशिखरपर चले गये। श्रीहरिने उनके शरीरको कल्पान्तस्थायी कर दिया। तदनन्तर ‘हममेंसे कौन राजा होगा?' इस प्रश्नको लेकर दैत्यों और दानवोंमें बड़ा विवाद हुआ। तब प्रह्लादजीने आकर एक व्यवस्था की। उन्होंने कहा—'जो समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, दीर्घायु, अतिशय बलवान्, यज्ञशील, सदा आनन्दयुक्त, अधिक पुत्रोंवाला तथा अत्यन्त दुर्जय हो, जो देवताओंके साथ अकारण युद्ध न करे और भगवान् विष्णुको सर्वोपरि, अजेय शक्तिके रूपमें जाने, जिसकी संग्राममें मृत्यु न हो, जो सर्वस्व दक्षिणामें दे देनेवाला हो, अपनी बात कभी व्यर्थ न होने देता हो तथा सब पुत्रोंमें जो अपनी स्वाभाविक श्रीके द्वारा अधिक शोभा पाता हो, उस व्यक्तिको जब गुरुदेव शुक्राचार्य राज्यपदपर अभिषिक्त कर दें, तब वही सब दैत्योंका राजा हो। राजा होने योग्य कौन है—इसके निर्णयमें गुरुदेव ही प्रमाण हैं।' यों कहकर प्रह्लादजी चले गये। तदनन्तर दैत्य दानव एकमत होकर उस व्यवस्थाका पालन करने लगे। शुक्राचार्यजीने राजा बलिको ही गुणोंमें अधिक देखकर तथा प्रह्लादके सभी गुण बलिमें विद्यमान हैं—यों समझकर उन्हींको दैत्योंका राजा बनाया।
वामनजी! मुझे युद्ध देखनेके लिये बड़ी उत्कण्ठा रहती है। ब्राह्मणको युद्ध करते देख मुझे बड़ा हर्ष होता है। आप भी ब्राह्मणके रूपमें प्रकट हुए हैं; अतः बताइये, कब युद्ध करेंगे?
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वामनजीका बलिसे तीन पग भूमि ग्रहण करना तथा गंगा और वामनस्थलीकी महिमा, प्रभासखण्डका उपसंहार
वामनजीने हँसकर कहा—ठीक है, ठीक है। तुम्हारी इच्छा पूरी होगी। फिर मैं जमदग्निनन्दन परशुरामके रूपमें प्रकट होकर भगवान् शिवको गुरु बनाऊँगा और बहुत-से क्षत्रियोंके साथ कार्तवीर्य अर्जुनका वध करूँगा। आगे चलकर महाबली रावण लंकाका राजा होगा। वह अपने अत्याचारोंके कारण जब तीनों लोकोंके लिये कण्टकरूप कहा जाने लगेगा, तब मैं दशरथ और कौसल्याका पुत्र 'राम' होकर भाइयोंके साथ अवतार लूँगा। विश्वामित्रजीके यज्ञमण्डपमें जाऊँगा। ताड़काको मारकर सुबाहुको यमलोक पठाऊँगा। इस प्रकार यज्ञ पूर्ण करके सीताके स्वयंवरमें जाऊँगा और शंकरजीका धनुष भंग करके सीताके साथ विवाह करूँगा। तत्पश्चात् अयोध्याका राज्य छोड़कर चौदह वर्षोंके लिये वनमें चला जाऊँगा। वहाँ पहले मुझे सीता-हरणका दुःख प्राप्त होगा। इससे भी पहले मैं लक्ष्मणद्वारा राक्षसी शूर्पणखाकी नाक और कान कटवा दूँगा। फिर चौदह हजार राक्षसोंसहित खर, दूषण तथा त्रिशिराका वध करूँगा। मृगरूपधारी मारीच राक्षसको मौतके घाट उतारूँगा। तदनन्तर रावणद्वारा मेरी पत्नी सीताका अपहरण होगा। सीताकी रक्षाके लिये प्राण दे देनेवाले जटायुका दाह-संस्कार करके सुग्रीवसे मित्रता जोडूंगा। बालिको मारकर नल आदि वानरोंके सहयोगसे समुद्रपर पुल बाँधूँगा। लंकापर घेरा डाल दूँगा और सब राक्षसोंका संहार करूँगा। विभीषणको लंकाका राज्य दूँगा, फिर अयोध्या आकर वहाँका अकण्टक राज्य
| १३३६ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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भोगकर काल और दुर्वासाके अद्भुत चरित्रद्वारा प्रेरित हो पुत्रको राज्य दे भाइयोंके साथ सशरीर परमधामको जाऊँगा। द्वापर आनेपर जब बहुत-से असुर-भावापन्न क्षत्रियोंके भारसे आक्रान्त हो यह पृथ्वी रसातल जानेको उद्यत हो जायगी, तब मैं उसकी दुर्दशा नहीं देख सकूँगा। मथुराके राजा कंसको मारकर शिशुपालको भी परास्त करूँगा और समस्त असुरोंका संहार करके पृथ्वीका भार उतारूँगा। कलियुग आनेपर थोड़े जलवाले बादल होंगे, गौएँ बहुत कम दूध देंगी, दूधमें घी और मनुष्योंमें सत्यका अभाव होगा, लोकमें चोरोंका उपद्रव बढ़ जायगा, सब लोग रोगसे पीड़ित होंगे और किसीको अपना रक्षक नहीं पायेंगे। उस समय मैं बुद्धरूपमें अवतार लूँगा। उसके बाद जब नदियाँ क्षीण हो छोटी हो जायँगी, उनकी धारा पीछेकी ओर बहने लगेगी तथा कार्तिकमें ही वे सूख जायँगी, एकादशी और शिवरात्रिका व्रत बंद हो जायगा, उस समय कलियुगमें ऐसे-ऐसे बर्ताव होंगे, जो पहलेके तीन युगोंमें कभी नहीं हुए थे। बेटा माता-पिताको त्यागकर पत्नीकी सेवामें लग जायगा; न कोई गुरु होगा; न सेवक, कोई किसीकी सेवा नहीं करेगा। कलियुग इस पृथ्वीपर ज्यों-ज्यों अपने रोगका विस्तार करता जायगा; त्यों-त्यों सब लोग एकाकार होते जायँगे। सब कुछ म्लेच्छोंद्वारा दूषित होगा। लोग स्नान और सन्ध्या छोड़ देंगे। उस समय मैं कल्कि नाम विख्यात ब्राह्मण होऊँगा और म्लेच्छोंका संहार करके याज्ञवल्क्यजीको पुरोहित बनाकर म्लेच्छवधका प्रायश्चित्त करनेके लिये यज्ञ करूँगा। नारदजी ! इस प्रकार जो मेरे अवतार होंगे, उनमें युद्धका अवसर आयेगा। इस समय देवतालोग राजा बलिके साथ युद्ध नहीं करेंगे। दैत्यराज बलि मेरा यजन करते हैं; वे महात्मा पुरुष हैं, अतः मेरे द्वारा मारनेयोग्य नहीं हैं। उन्होंने महान् यज्ञका प्रारम्भ करके सर्वस्व-दानका नियम ग्रहण किया है।
यों कहकर वामनजी नगरमें गये और एक घरसे दूसरे घरको देखते हुए प्रतिदिन ब्राह्मणोंके घरोंपर भिक्षा माँगने लगे। वे प्रतिदिन स्नान और वेदाध्ययन करते और द्विजोंके घरोंमें भिक्षा एवं भोजन पाते थे। चौराहोंपर तथा सुन्दर मन्दिरोंमें ठहरते थे। वहाँ बहुत लोग उन्हें घेरे रहते थे। उनके कंधे मोटे और ठोढ़ी बड़ी थी। वे सिर हिला-हिलाकर ताल दे-दे नाचते और अत्यन्त मनोहर स्वरमें गाते थे। ब्राह्मणोंकी सभाओंमें वे चारों वेदोंका उच्चारण करते थे। वामनजीका स्वरूप बड़ा सुन्दर था। दैत्यों तथा ब्राह्मणोंके बालक उन्हें दिन-रात घेरे रहते थे। वे सब ब्रह्मचारी वामनको यज्ञमण्डपमें ले गये और बोले—'तुम अपनी कुटी बनानेके लिये कोई स्थान राजा बलिसे माँग लो। विद्वान् ब्राह्मणका इस नगरमें सदा आदर किया जाता है।' सब मनुष्य उनसे अनुरोध करने लगे—'वामनजी ! आप सदा दैत्यराज बलिके नगरमें निवास करें।' 'बहुत अच्छा' कहकर वामनजीने यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया। उस समय मण्डपके द्वारपर बड़ा कोलाहल हुआ। वामनजी अनेक ब्राह्मणोंके साथ वहाँ खड़े होकर वेदमन्त्रोंका उच्चारण करने लगे। वेदमन्त्रोंका वह महान् घोष समूचे मण्डपमें छा गया। पहलेसे भीतर गये हुए दैत्यों ने दैत्यराज बलिको सूचित किया—'देव! एक वामन ब्रह्मचारी यज्ञमें आपका दर्शन करनेके लिये आये हैं। आप उन्हें भीतर ले आनेके लिये द्वारपालको आज्ञा दें।'
एक मुखसे चारों वेदोंके उच्चारणकी ध्वनि सुनकर राजा बलिको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे द्वारपालसे बोले—"इन्हें आदरपूर्वक भीतर ले आओ, मैं इनकी पूजा करूँगा और इन्हें जिस वस्तुकी इच्छा होगी, वही दूँगा। मुझे वे बातें याद हैं, जो गुरुजीने सिखायी थीं—'कोई वेदमय पात्र होता है, कोई तपोमय। जो भी पात्र तुम्हारे पास आवेगा, वही तुम्हें तार देगा।' यज्ञ आरम्भ होनेपर मुझे सत्पात्रके लिये अवश्य दक्षिणा देनी चाहिये।"
बलिकी यह बात सुनकर गुरु शुक्राचार्यने उन्हें रोका और कहा—'राजन् ! वामनको भीतर
- प्रभासखण्ड * १३३७
न बुलाओ, सब ब्राह्मणोंका पूजन यज्ञमण्डपके द्वारपर ही करना चाहिये। दीन, अन्ध, कृपण, बधिर, वामन, कुब्ज तथा रोगी—ये सब द्वारपर ही पूजनेयोग्य हैं। आप द्वारपर ही जाकर सोने, चाँदी और वस्त्रोंसे वामनका सत्कार करें। चार पुरुषोंका जन्म व्यर्थ है और सोलह प्रकारके दान भी व्यर्थ हैं—जिनके पुत्र नहीं है, जो धर्मसे बहिष्कृत हैं, जो दूसरेके घर भोजन करते हैं तथा जो परायी स्त्रियोंमें आसक्त हैं। इन चार प्रकारके मनुष्योंका जन्म व्यर्थ माना गया है। अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको अन्यायोपार्जित धनका दान नहीं करना चाहिये। जो ब्राह्मण नहीं हैं, जिनका विवाह नहीं हुआ है, जो पतित हैं, सन्ध्याहीन हैं, चोर हैं, जो गुरुको प्रसन्न नहीं रख सकते, पिता-माताकी सेवासे विमुख हैं, ब्राह्मणोंमें अधम हैं, शूद्र स्त्रीसे संपर्क रखते हैं, वेद-विक्रेता, कृतघ्न, ग्रामपुरोहित (अथवा गाँव-गाँव भीख माँगनेवाले) हैं, जिन्हें स्त्रीने वशीभूत कर रखा है, जो साँप पकड़नेवाले हैं तथा दूसरोंकी निन्दामें रत रहते हैं, उन सबको दिया हुआ दान व्यर्थ होता है।'
राजा बलिने कहा—गुरुदेव! आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। जो कोई भी वेदोंका स्वाध्याय करता है, वह ब्राह्मण मेरे लिये विष्णुके समान आदरणीय है। घरपर श्रोत्रिय ब्राह्मणके आनेपर उसके सत्कारमें विलम्ब नहीं करना चाहिये। उठकर उसका स्वागत करे, मीठे वचन बोले और चरण धोकर यथाशक्ति उसे भोजन दे। यही गृहस्थका धर्म है। यदि वामनजी मेरे यज्ञमण्डपसे बिना पूजा प्राप्त किये ही लौट जायँगे तो सर्वस्व दक्षिणाके संकल्पसे किया जानेवाला यह सम्पूर्ण यज्ञ व्यर्थ हो जायगा।
यह बातचीत हो ही रही थी कि वामनजी दैत्यराज बलिके समीप बुलाकर लाये गये। उनका पिंगल शरीर तेजसे सूर्यकी भाँति प्रज्वलित हो रहा था। विष्णुस्वरूप वामनजीको आते देख राजा बलि उठकर उनके सम्मुख गये और प्रणाम करके आगे खड़े हो इस प्रकार बोले—'मैं धन्य हूँ, जिसके यज्ञमें विष्णुके समान ब्राह्मणका शुभागमन हुआ है।' यों कहकर बलि उन्हें मध्यवेदीके समीप ले गये। उन्हें बैठनेको आसन दिया। पाद्य, आचमनीय और अर्घ्य अर्पण किया। चन्दन, धूप और गन्ध आदिके द्वारा उनकी पूजा करके सामने खड़े हो उन्हें मधुपर्क और गौ निवेदन की। वामनजीने मधुपर्कको सूँघकर गायको प्रणाम किया। बलिने कहा—'विप्रवर! आपका स्वागत है।' वामनजी बोले—'राजन्! तुम्हारा कल्याण हो; मैं याचक होकर आया हूँ, मुझे दान दो।' बलिने कहा—'प्रभो! बताइये, आपको क्या दिया जाय?' वामन बोले—'दैत्यराज! भूमि दो।' बलिने कहा—'प्रभो! कितनी भूमि दूँ?' वामन बोले—'राजन्! मुझे कुटी बनानेके लिये तीन पग भूमि दीजिये।' बलिने कहा—'मैंने आपको तीन पग भूमि दी।' वामन बोले—'मैंने तुम्हारा यह दान ग्रहण किया।'
इसी बीचमें शुक्राचार्य बोल उठे—'इन्हें दान न दो। ये सनातन विष्णु हैं।' तब बलिने कहा—'गुरुदेव! यदि ऐसी बात है तो इनसे बढ़कर दानका उत्तम पात्र और कौन हो सकता है।' यों कहकर बलिने सव्यभावसे दाहिने हाथमें कुश और अक्षत लिये; परंतु गुरुजीने न तो संकल्प पढ़ा और न वामनके हाथमें जल ही गिरवाया। यह देख सारे ऋषि, होता, सभासद, बहुत-से ब्राह्मण, दैत्य तथा राजाके स्त्री-पुत्र और बन्धु-बान्धव आश्चर्यचकित हो उठे और कहने लगे—'दत्तम्' (दिया) तथा 'गृहीतम्' (लिया) यह वाणीद्वारा दोनों ओरसे कह दिये जानेपर भी गुरुजी संकल्पके लिये जल क्यों नहीं छोड़ते हैं। वामनजीके हाथमें कल्याणके निमित्त ही जल दिया जाना चाहिये। वाणीद्वारा जो दान दे दिया गया, उसे क्रियाद्वारा निष्पन्न क्यों नहीं किया जाता? गुरुजी यजमानको नरकमें घसीट रहे हैं।
यह सब सुनकर शुक्राचार्यने कहा—'राजन्! ये वामन साक्षात् विष्णु हैं। दैवयोगसे तुम्हें देखनेके लिये आये हैं। पता नहीं दान लेकर
१३३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
ये तुम्हारा प्रिय करेंगे या अप्रिय।' तब बलिने कहा—'गुरुदेव! मेरी बात सुनिये। मैं इन्द्र हूँ, साक्षात् भगवान् विष्णु ही ब्राह्मण हैं और देनेयोग्य द्रव्य सूर्यदेवताका स्वरूप है। जब साक्षात् विष्णु ही यहाँ उपस्थित हैं, तब उनकी प्रीतिके लिये मुझे यह दान क्यों नहीं देना चाहिये?' यों कहकर बलिने वामनके हाथमें संकल्पका जल दे दिया। तब वामनजी चतुर्भुज रूप धारण करके बढ़ने लगे। उनके बढ़ते हुए स्वरूपको देखकर ब्राह्मण, ऋषि और देवता उनकी स्तुति करने लगे—'देव! आपकी जय हो; अनन्त! आपकी जय हो; सर्वव्यापी विष्णुदेव! आपकी जय हो; अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो; मत्स्यरूपधारी हरे! आपकी जय हो; कूर्मावतार! आपकी जय हो। पृथ्वीको उठानेवाले वाराह! आपको नमस्कार है। नरसिंह! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। जमदग्निनन्दन परशुराम! आपको नमस्कार है। लक्ष्मणसहित श्रीराम! आपकी जय हो। कृष्ण! जगन्नाथ! देवकीनन्दन! आपकी जय हो। बुद्ध और कल्कि को मैं प्रणाम करता हूँ।'
इस प्रकार सब नर-नारी भगवान्की स्तुति करते थे। देवर्षि नारद और सनकादि योगी भी उनके गुण गाते थे। भगवान् विष्णुने दो ही पगोंमें समस्त ब्रह्माण्डको माप लिया, तीसरेके लिये स्थान न रहा। उस समय देवता, दानव, मनुष्य, गन्धर्व, नाग तथा राक्षसों ने भी भगवान् विष्णुके चरणोंका पूजन और उनका स्तवन किया। गन्धर्वोंने उनके गुण गाये। भगवान् जब अपने चरणको समेटने लगे, उस समय उसके आघातसे ब्रह्माण्ड फूट गया और उससे बाहरका जल वहाँ प्रकट हो गया। वही जल भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई गंगा है। जो ब्रह्माण्डके शिरोभागसे निकली है। गंगा देवी त्रिभुवनको पवित्र करनेवाली हैं। साक्षात् भगवान् शंकरने अपने मस्तकपर उन्हें धारण किया है। वे स्वर्गलोकमें स्वर्धुनीके नामसे पूजित होती हैं और भूलोकमें आनेपर 'गां (भूमिं) गता' इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'गंगा' कहलाती हैं तथा जब वे पातालमें आयीं तब त्रिपथगाके नामसे प्रसिद्ध हुईं। गंगाजीके स्मरणमात्रसे सब पापोंका नाश हो जाता है। उनके दर्शनसे सम्पूर्ण अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। उनके जलमें स्नान करनेमात्रसे सात जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। जो गंगाजीमें स्नान करके देवी, विष्णु तथा शिवकी पूजा करता है, वह इन्द्रलोकको लाँघकर श्रीविष्णुके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। श्रीविष्णुके चरणोदकरूप गंगाका जल पीकर, उसमें स्नान करके तथा उसे प्रणाम करके मन और इन्द्रियोंका पूर्ण संयम रखनेवाला पुरुष मोक्षको प्राप्त होता है। एकादशीको उपवास करके मनुष्य मुक्ति पाते हैं। जो शुद्ध भावसे युक्त हो परमात्मचिन्तनमें स्थित होते हैं, जनसमुदायके स्थानोंसे विरक्त रहते हैं, वे संसार-बन्धनका उच्छेद करके परम गतिको प्राप्त होते हैं।
महादेवजी कहते हैं—देवि! प्रतिज्ञाकी पूर्ति न कर सकनेके कारण वामनजीने जो बलिका निग्रह किया, उससे देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। तत्पश्चात् भगवान्ने राजा बलिपर अनुग्रह किया और उन्हें पाताललोकमें भेजकर स्वयं वामनस्थलीमें निवास करनेका विचार किया। वहाँ उन्होंने पंचाग्नि-साधन किया और 'वामनपुरी' बसायी। विश्वकर्माद्वारा बनायी हुई वह पुरी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दी गयी। वह पुरी भद्रा नदीके किनारे स्थित है। मधुमतीमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं। वृद्ध प्रभासमें उन सबका विस्तार बताया गया है। भगवान् विष्णु वामनस्थलीमें स्थित हुए। राजा बलि पाताललोकमें रहने लगे, मधुमतीमें सब कामनाओं और फलोंके दाता भगवान् माधव विराजमान हैं। पार्वती! इस प्रकार मैंने तुमसे बारह योजन विस्तृत प्रभासक्षेत्रका वर्णन किया, जो स्मरण करनेमात्रसे सब सिद्धियोंको देनेवाला है।
~~ ० ~~ प्रभासखण्ड सम्पूर्ण ~~ ० ~~
* प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३३९
श्रीद्वारका-माहात्म्य
भगवान्के परमधाम पधारनेपर महर्षियोंका ब्रह्माजीकी आज्ञासे प्रह्लादजीके समीप जाना और प्रश्न करना
श्रीशौनकजीने पूछा—सूतजी! अनेक प्रकारके पाखण्डोंसे भरे हुए इस भयंकर कलिकालमें हम भगवान् मधुसूदनको किस प्रकार प्राप्त कर सकेंगे?
सूतजीने कहा—महर्षियो! दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी महाराज जब परमधामको चले गये, उसके दीर्घकालके पश्चात् द्वापरमें जब दुष्ट राजाओंके भारसे यह पृथ्वी पीड़ित होने लगी, उस समय साक्षात् भगवान् विष्णु देवताओंका कार्य सिद्ध करने एवं पृथ्वीका भार उतारनेके लिये वसुदेवजीके कुलमें अवतीर्ण हुए। फिर वे नन्दके व्रजमें गये। वहाँ उनके द्वारा पूतनाका नाश हुआ। तृणावर्त मारा गया। दहीसे भरा हुआ छकड़ा उलट दिया गया। कालियनागका दमन और प्रलम्बासुरका संहार हुआ। तत्पश्चात् श्रीकृष्णने अपने हाथसे गोवर्धन पर्वतको उठाकर इन्द्रके कोपसे गोकुलकी रक्षा की। उनका गौओंके इन्द्रपदपर अभिषेक हुआ और इन्द्रका अहंकार दूर किया गया। फिर भगवान्ने रासक्रीड़ा की। उसके बाद केशी दानव मारा गया। फिर वे अक्रूरके कहनेसे मथुरापुरीमें गये। वहाँ भी श्रीकृष्णने कुबलयापीड हाथी और मल्लराज चाणूरको मौतके घाट उतारा। दैत्योंके स्वामी भोजराज कंसको भी मार गिराया। उग्रसेनको मथुराका राजा बनाया। जरासन्धकी असंख्य भयंकर सेनाका संहार किया। युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें शिशुपालका भी वध किया। उसके बाद महाभारत-युद्ध आरम्भ होकर समाप्त हो गया। इस प्रकार पृथ्वीका बहुत बड़ा भार उतर गया। तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण समस्त यदुवंशियोंको तीर्थयात्राके लिये प्रभासक्षेत्रमें ले आये। वहाँ उनमें परस्पर कलह आरम्भ हो गया और उस महाभयंकर कलहाग्निमें समस्त यादववंश जलकर भस्म हो गया। तब भगवान् विष्णु वहीं अस्त्र-शस्त्रोंका त्याग करके अश्वत्थ वृक्षकी जड़का सहारा लेकर भूमिपर जा बैठे। इतनेहीमें एक बहेलियेने बाण मारा और उनके चरणमें घाव हो गया। इसे ही निमित्त बनाकर भगवान् श्रीकृष्ण परमधामको चले गये। इसके बाद अर्जुन द्वारकामें आये और यदुकुलकी स्त्रियों तथा बालकोंको लेकर जब बाहर निकले, तब समुद्रने सब ओरसे यदुपुरीको डुबो दिया। श्रीहरिके मन्दिरका निर्माण कराकर वज्र इन्द्रप्रस्थ चले गये। इस प्रकार द्वापर बीत गया और महाभयानक कलिकाल आ पहुँचा। सद्धर्म क्षीण होने लगा। अधर्म प्रबल हो गया। वेदवादका बहिष्कार होने लगा। वर्ण और आश्रमधर्मका ह्रास हुआ तथा धर्मका एक ही चरण शेष रह गया। जब ऐसी अवस्था प्राप्त हुई, तब समस्त वनवासी महर्षि परस्पर मिलकर मन्त्रणा करने लगे। उस मन्त्रणामें गर्ग, च्यवन, गालव, असित, देवल, धौम्य तथा उद्दालक आदि अनेक महर्षि सम्मिलित थे। वे आपसमें इस प्रकार बोले—'अहो! देखो तो सही, पृथ्वीपर प्रत्येक दिशामें कलियुगका साम्राज्य हो गया है। सब ओर लुटेरों और डाकुओंसे प्रजाको बड़ा कष्ट हो रहा है। सत्य और सरलता आदि सद्गुणोंका त्याग करके प्रायः लोग पापमें प्रवृत्त हो रहे हैं। ऐसी दशामें हमें भगवान् विष्णुकी प्राप्ति कैसे होगी? भवसागरमें पड़े हुए हमलोगोंका
| १३४० | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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कौन उद्धार करेगा? भगवान् पुण्डरीकाक्षके बिना इस कलियुगमें हम कैसे रहेंगे?'
इस प्रकार जब वे तपस्वी महर्षि दुखी एवं चिन्तित हो रहे थे, उस समय महर्षि उद्दालकने उन सबसे कहा—'मुनिवरो! हमलोग शीघ्र ही ब्रह्मलोकमें चलें और ब्रह्माजीसे पूछें, कलियुगमें भगवान् विष्णुकी स्थिति कहाँ है? क्योंकि कलिकालमें भगवान्के बिना संसारमें कौन रहेगा।'
उनकी बात सुनकर सब महर्षियोंने एक स्वरसे 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा' कहकर ब्रह्माजीके निकट प्रस्थान किया। वहाँ ब्रह्माजीका दर्शन करके उनके चरणोंमें प्रणाम किया और इस प्रकार स्तुति की—'कमलोद्भव! आपको नमस्कार है। अक्षय! अविनाशी! चतुरानन! आपको नमस्कार है। संसारकी सृष्टि करनेवाले! आपको नमस्कार है। पितामह! आपको नमस्कार है।'
मुनियोंके इस प्रकार स्तवन करनेपर ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए। फिर पाद्य और अर्घ्यसे उन मुनिवरोंका सत्कार करके उन्होंने पूछा—'पुत्रो! तुम्हारे आगमनका क्या प्रयोजन है? तुम लोगोंके पुत्र, शिष्य, अग्नि और भाई-बन्धु तो कुशलसे हैं न?'
ऋषियोंने पूछा—भगवन्! आपके प्रसादसे सर्वत्र कुशल है। आप सम्पूर्ण देवताओंके गुरु हैं। आपका दर्शन पाकर हमें तपस्याका सम्पूर्ण फल मिल गया। अब हम अपने आनेका कारण बतलाते हैं। सत्ययुग आदि तीन युग व्यतीत हो गये। अब भयंकर कलियुग प्राप्त हुआ है। इस समय पृथ्वीपर भगवान् विष्णु कहाँ हैं? जिनका दर्शन करके हम बन्धनरहित हो परम मुक्ति प्राप्त कर सकें।
ब्रह्माजीने कहा—तुमलोग पाताललोकमें जाओ और वहाँ दैत्योंमें श्रेष्ठ प्रह्लादजीसे पूछो। उन्हें कलियुगमें भगवान्के रहनेके स्थानका पता होगा। वे तुमसे सब कुछ बता देंगे।
ब्रह्माजीकी बात सुनकर उन तपस्वी महात्माओंने उन्हें प्रणाम किया और प्रह्लादजीकी प्रशंसा करते हुए वे दैत्यराजके नगरमें गये। उन्हें दूरसे ही आते देख राजा बलि और प्रह्लादजीने उठकर उनकी अगवानी की और पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क एवं गौ देकर उनका यथावत् पूजन किया। तत्पश्चात् प्रसन्न चित्तसे हाथ जोड़कर कहा—'महाभाग महात्माओ! आपका स्वागत है। आजका प्रभात हमारे लिये बड़ा उत्तम था, जो कि आपका दर्शन प्राप्त हुआ। कहिये, मैं आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ?'
इस प्रकार दैत्यराज प्रह्लादके द्वारा सत्कार किये जानेपर वे महर्षि बोले—'भगवान्के प्रिय भक्त प्रह्लादजी! आप इस भवसागरसे हमारे रक्षक होइये। इस भयंकर कलिकालमें भगवान् विष्णुके बिना हमलोग कैसे रह सकेंगे। इस युगमें अधर्मने सनातन धर्मपर विजय पायी है। झूठने सत्यको तथा शूद्रोंने ब्राह्मणोंको परास्त किया है। राजाका रूप धारण करके आये हुए म्लेच्छ ब्राह्मणोंको सता रहे हैं। वर्णाश्रम-धर्मका ह्रास हो गया है। वेदोक्त मार्ग लुप्त होता जा रहा है। ऐसे समयमें भगवान् विष्णु कहाँ हैं? जहाँ ज्ञान, ध्यान और इन्द्रियनिग्रहके बिना भी भगवान्की प्राप्ति हो, उस गूढ़ स्थानका पता हमें बताइये। दैत्यराज! आप हमारे सुहृद् हैं, मार्गदर्शक हैं, अतः कृपा करके बताइये, भगवान् विष्णु कहाँ विराज रहे हैं?'
इस प्रकार उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके पूछनेपर दैत्यराज प्रह्लादने उन्हें मस्तक झुकाया और देवताओंसहित ब्रह्माजी एवं परमात्माको नमस्कार करके उत्तर देना आरम्भ किया।
$\sim\sim\circ\sim\sim$
- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य *
१३४१
द्वारकाकी महिमा, वहाँकी यात्रा और उसमें योग देनेका माहात्म्य, गोमती और चक्रतीर्थकी उत्पत्ति एवं महिमा, सनकादिकोंपर भगवान्की कृपा
श्रीप्रह्लादजी बोले— महर्षियो! आप सम्पूर्ण देवताओं, दैत्यों, दानवों तथा राक्षसोंके भी पूजनीय हैं। आप पूजनीय महापुरुषोंकी आज्ञा तथा भगवान् विष्णुके प्रसादसे मैं भगवान्के स्थानका परिचय देता हूँ—पश्चिम समुद्रके तटपर जो कुशस्थलीपुरी है, जिसका निर्माण पहले राजा कुशके द्वारा हुआ है, जहाँ गोमती नदी बहती है और समुद्रमें मिली है, वही द्वारावतीपुरी कहलाती है। उसे आनर्ता भी कहते हैं। उसीमें सोलह कलाओं तथा बारह मूर्तियोंसे युक्त विश्वात्मा भगवान् विष्णु निवास करते हैं। जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। वही परम धाम है, वही परमपद है। वह द्वारकापुरी धन्य है, जहाँ शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले चतुर्भुज श्रीकृष्ण विद्यमान हैं। वहाँ जानेसे कलिकालके मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर लेंगे। जहाँ गोमती नदी बहती हैं, जहाँ भगवान् विष्णुकी त्रिविक्रम मूर्ति है, उस द्वारकापुरीमें जाकर चक्रतीर्थमें स्नान करनेवाले मनुष्य मोक्ष प्राप्त करेंगे। जब भगवान् श्रीकृष्ण प्रभासक्षेत्रमें परमधामको पधारे, तब कलासहित वे उस त्रिविक्रम मूर्तिमें स्थित हुए, अतः ब्राह्मणो! इस कलिकालमें भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकाके सिवा अन्यत्र नहीं मिल सकते। यदि आपको श्रीकृष्णसे मिलनेकी इच्छा हो तो शीघ्र वहीं जाइये।
ऋषि बोले— भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ तथा उत्तम मार्ग दिखानेवाले प्रह्लादजी! आपको धन्यवाद है। आज हमने आपके द्वारा उस रहस्यको जान लिया, जिसे आपके सिवा दूसरा कोई नहीं जानता है। अब यह बताइये कि द्वारकापुरीमें जानेसे क्या फल होता है? वहाँ श्रीकृष्ण-दर्शनसे किस फलकी प्राप्ति होती है? द्वारकामें कौन-कौनसे तीर्थ और देवता हैं।
प्रह्लादजीने कहा— ब्राह्मणो! जब मनुष्य द्वारका जानेका विचार मनमें लाता है, उसी समय उसके पितर नरकसे मुक्त हो हर्षके गीत गाने लगते हैं। मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णके मार्गमें जितने पग आगे चलता है, उसे पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। जो मानव श्रीकृष्णपुरीकी यात्राके लिये दूसरोंको प्रेरणा देता है, वह निःसन्देह विष्णुधाममें जाता है। जो द्वारका अथवा मथुरा जानेवाले मनुष्यको धन देता है, वह भगवद्धाममें आनन्दक्रीड़ा करता है। उस मार्गमें थके हुए शरीरवाले मनुष्यको जो सवारी देता है, वह मनुष्य हंसयुक्त विमानसे स्वर्गमें जाता है। जो यात्रामें जाते हुए भूखे पुरुषको मध्याह्नकालमें अन्न देता है, वह गयाश्राद्धसे होनेवाले पुण्यको पाता है। वहाँ पितरोंकी अक्षय तृप्ति होती है। जो द्वारका जानेवाले यात्रीको पहननेके लिये जूते देता है, वह मानव भगवान् श्रीकृष्णके प्रसादसे हाथीपर बैठकर चलता है। जो द्वारका जानेवालेके मार्गमें विघ्न खड़ा करता है, वह मूढ एक कल्पतक रौरव नरकमें डूबा रहता है। जो द्वारकाके मार्गमें टिके हुए पुरुषको कमण्डलु देता है, उसे एक हजार पौंसला चलानेका फल होता है। जो उस तीर्थके मार्गमें जाते हुए पुरुषसे भगवान् विष्णुकी कथा-वार्ता एवं संगीत सुनता है अथवा उसे दान देता है, उससे बढ़कर धन्य मनुष्य कोई नहीं है। द्वारकामें देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णका मन्दिर कैलास-शिखरके समान ऊँचा और श्वेत बादलोंकी भाँति उज्ज्वल है। जो उसका दर्शन करता है, वह मनुष्योंमें श्रेष्ठ है। दूरसे ही फहराती हुई ध्वजा-पताकाके साथ भगवन्मन्दिरका सुवर्णमय कलश देखकर जो सवारीको त्याग देता और धरतीपर लोटकर उसे प्रणाम करता है, उसके पंचसूनाजनित पाप,
| १३४२ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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अन्यान्य, भयंकर पाप, मार्गमें पैरोंसे दबकर मरे हुए कृमि-कीट और पतंग आदिके वधसे होनेवाले, परान्न-भोजन, परकीय जलपान तथा स्पर्शसे होनेवाले पाप—ये सभी उस भगवत्क्षेत्रके दर्शनसे नष्ट हो जाते हैं। द्वारकाके यात्रीको चाहिये कि वह मार्गमें विष्णुसहस्रनाम, भीष्मस्तवराज अथवा गजेन्द्रमोक्षका पाठ करते हुए धीरे-धीरे चले। भगवान्के अनेक अवतारोंकी लीला-कथाका गान करते हुए सदा हर्षमें भरा रहे और पवित्रभावसे यात्रा करे। पहले बिना पैर धोये ही भगवान् गणेशको नमस्कार करे। इससे सब विघ्नोंका नाश होता है। जो पहले बड़े भैया बलरामजीको प्रणाम करके नीलकमलदलके समान श्याम वर्णवाले देवकीनन्दन श्रीकृष्णको प्रणाम करता है, वह उनके दर्शनमात्रसे बाल, कुमार तथा युवावस्थामें किये हुए समस्त पापोंका नाश कर देता है। इतना ही नहीं, सहस्रों जन्मोंके मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए उसके जितने भी पाप हैं, सब नष्ट हो जाते हैं। एक हजार भार सुवर्णदान करनेसे जो फल मिलता है, उससे कोटि गुना फल द्वारकामें श्रीकृष्णके मुखका दर्शन करनेसे मिल जाता है। कमलके समान नेत्रोंवाले देवेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण तथा द्वारकाकी रक्षा करनेवाले महर्षि दुर्वासाजीको गरुड़सहित प्रणाम करके द्वारकापुरीके उत्तम द्वारपर आवे।
तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण ही जिसके आश्रय हैं, उस गोमती नदीके समीप जाय। उसका दर्शनमात्र करके मनुष्य सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। गोमतीका जल पापराशि और अमंगलका विनाश करनेवाला तथा मनुष्योंकी सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। उसे प्रणाम करना चाहिये। वह महापापोंका क्षय करनेवाला, जिनकी कहीं भी गति नहीं है, उन्हें सद्गति देनेवाला तथा परम शीतल है। मनुष्यके सब पुण्य जब सहायक होते हैं, तभी उसे गोमतीका जल प्राप्त होता है।
ऋषियोंने पूछा—दैत्यराज ! यह गोमती कौन है और इसे कौन लाया है?
प्रह्लादजीने कहा—प्राचीनकालमें जब एकार्णवके जलमें समस्त स्थावर-जंगम जगत्का नाश हो गया था, उस समय भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। भगवान्ने आज्ञा दी—'ब्रह्मन्! नाना प्रकारकी प्रजाकी सृष्टि कीजिये।' 'बहुत अच्छा' कहकर ब्रह्माजीने सृष्टिमें मन लगाया। उन्होंने अपने मनसे सनक, सनन्दन आदि कुमारोंको जन्म दिया और कहा—'पुत्रो! प्रजा उत्पन्न करो।' ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर सनक आदि महात्मा हाथ जोड़कर बोले—'भगवन्! प्रजापते! हम भगवत्स्वरूपका दर्शन करना चाहते हैं, अतः हम बन्धनमें नहीं पड़ेंगे। इस दुर्गम सृष्टिके चक्रमें नहीं फँसेंगे।' ऐसा कहकर सनकादि कुमार वहाँसे चल दिये। पश्चिम दिशामें समुद्रके तटपर आकर वे भगवान्के तेजोमय स्वरूपका दर्शन पानेकी इच्छासे उन्हींमें मन लगाकर उत्तम तपस्यामें संलग्न हो गये। बहुत वर्षोंके पश्चात् धरणीधर भगवान् विष्णु प्रसन्न हो समुद्रके जलका भेदन करके उनके सामने प्रकट हुए। उनका वह तेजोमय स्वरूप सूर्यके समान दुर्दर्श था। करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी तथा सहस्रों धारवाले सुदर्शन चक्रमय स्वरूपका दर्शन करके ब्रह्माजीके पुत्र सनकादि बड़े विस्मित हुए। वे भगवान्के उस उत्तम आयुधकी ओर देखते रह गये। उन्हें आश्चर्यमें पड़ा हुआ देख आकाशवाणी हुई—'ब्रह्मपुत्रो! भगवान् विष्णु शीघ्र ही प्रकट होंगे। भगवान्की पूजाके लिये शीघ्र अर्घ्य प्रदान करो। यह उन्हीं भगवान् जगन्नाथका आयुध है। इसके लिये भी शीघ्र अर्घ्य दो।'
आकाशवाणीका यह कथन सुनकर उन सब महर्षियोंने सुदर्शनकी स्तुति की। वे बोले—'ज्योतिर्मय सुदर्शन! तुम्हें नमस्कार है। हरिवल्लभ! तुम्हें नमस्कार है। सहस्र अरोंवाले सुदर्शनचक्र! तुम अविनाशी हो, तुम्हें नमस्कार है। सूर्यस्वरूप! तुम्हें नमस्कार है। ब्रह्मरूप! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारा प्रहार कभी व्यर्थ नहीं होता।