भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1364
  • प्रभासखण्ड * | १३३५ ---|---

नहीं हुई। तब भगवान्‌ने हिरण्यकशिपुको घुटनोंपर सुलाकर उसकी छाती चीर डाली। देवता जय-जयकार करने लगे। चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें शान्ति छा गयी।

हिरण्यकशिपुकी मृत्युके पश्चात् विष्णुभक्त प्रह्लादजी दैत्योंके राजा बनाये गये। उन्होंने बहुत वर्षोंतक भूमण्डलका राज्य किया। उनके अनेक पुत्र हुए, जिनमें विरोचन ज्येष्ठ थे। विरोचनसे बलिके जन्म हुआ। बलिके उत्पन्न होनेके पश्चात् विरोचनने एकान्तमें योग-साधन करके श्रीहरिके तत्त्वका ज्ञान प्राप्त किया और राज्य त्यागकर वे पर्वतशिखरपर चले गये। श्रीहरिने उनके शरीरको कल्पान्तस्थायी कर दिया। तदनन्तर ‘हममेंसे कौन राजा होगा?' इस प्रश्नको लेकर दैत्यों और दानवोंमें बड़ा विवाद हुआ। तब प्रह्लादजीने आकर एक व्यवस्था की। उन्होंने कहा—'जो समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, दीर्घायु, अतिशय बलवान्, यज्ञशील, सदा आनन्दयुक्त, अधिक पुत्रोंवाला तथा अत्यन्त दुर्जय हो, जो देवताओंके साथ अकारण युद्ध न करे और भगवान् विष्णुको सर्वोपरि, अजेय शक्तिके रूपमें जाने, जिसकी संग्राममें मृत्यु न हो, जो सर्वस्व दक्षिणामें दे देनेवाला हो, अपनी बात कभी व्यर्थ न होने देता हो तथा सब पुत्रोंमें जो अपनी स्वाभाविक श्रीके द्वारा अधिक शोभा पाता हो, उस व्यक्तिको जब गुरुदेव शुक्राचार्य राज्यपदपर अभिषिक्त कर दें, तब वही सब दैत्योंका राजा हो। राजा होने योग्य कौन है—इसके निर्णयमें गुरुदेव ही प्रमाण हैं।' यों कहकर प्रह्लादजी चले गये। तदनन्तर दैत्य दानव एकमत होकर उस व्यवस्थाका पालन करने लगे। शुक्राचार्यजीने राजा बलिको ही गुणोंमें अधिक देखकर तथा प्रह्लादके सभी गुण बलिमें विद्यमान हैं—यों समझकर उन्हींको दैत्योंका राजा बनाया।

वामनजी! मुझे युद्ध देखनेके लिये बड़ी उत्कण्ठा रहती है। ब्राह्मणको युद्ध करते देख मुझे बड़ा हर्ष होता है। आप भी ब्राह्मणके रूपमें प्रकट हुए हैं; अतः बताइये, कब युद्ध करेंगे?

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वामनजीका बलिसे तीन पग भूमि ग्रहण करना तथा गंगा और वामनस्थलीकी महिमा, प्रभासखण्डका उपसंहार

वामनजीने हँसकर कहा—ठीक है, ठीक है। तुम्हारी इच्छा पूरी होगी। फिर मैं जमदग्निनन्दन परशुरामके रूपमें प्रकट होकर भगवान् शिवको गुरु बनाऊँगा और बहुत-से क्षत्रियोंके साथ कार्तवीर्य अर्जुनका वध करूँगा। आगे चलकर महाबली रावण लंकाका राजा होगा। वह अपने अत्याचारोंके कारण जब तीनों लोकोंके लिये कण्टकरूप कहा जाने लगेगा, तब मैं दशरथ और कौसल्याका पुत्र 'राम' होकर भाइयोंके साथ अवतार लूँगा। विश्वामित्रजीके यज्ञमण्डपमें जाऊँगा। ताड़काको मारकर सुबाहुको यमलोक पठाऊँगा। इस प्रकार यज्ञ पूर्ण करके सीताके स्वयंवरमें जाऊँगा और शंकरजीका धनुष भंग करके सीताके साथ विवाह करूँगा। तत्पश्चात् अयोध्याका राज्य छोड़कर चौदह वर्षोंके लिये वनमें चला जाऊँगा। वहाँ पहले मुझे सीता-हरणका दुःख प्राप्त होगा। इससे भी पहले मैं लक्ष्मणद्वारा राक्षसी शूर्पणखाकी नाक और कान कटवा दूँगा। फिर चौदह हजार राक्षसोंसहित खर, दूषण तथा त्रिशिराका वध करूँगा। मृगरूपधारी मारीच राक्षसको मौतके घाट उतारूँगा। तदनन्तर रावणद्वारा मेरी पत्नी सीताका अपहरण होगा। सीताकी रक्षाके लिये प्राण दे देनेवाले जटायुका दाह-संस्कार करके सुग्रीवसे मित्रता जोडूंगा। बालिको मारकर नल आदि वानरोंके सहयोगसे समुद्रपर पुल बाँधूँगा। लंकापर घेरा डाल दूँगा और सब राक्षसोंका संहार करूँगा। विभीषणको लंकाका राज्य दूँगा, फिर अयोध्या आकर वहाँका अकण्टक राज्य