संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1365, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३३६ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
भोगकर काल और दुर्वासाके अद्भुत चरित्रद्वारा प्रेरित हो पुत्रको राज्य दे भाइयोंके साथ सशरीर परमधामको जाऊँगा। द्वापर आनेपर जब बहुत-से असुर-भावापन्न क्षत्रियोंके भारसे आक्रान्त हो यह पृथ्वी रसातल जानेको उद्यत हो जायगी, तब मैं उसकी दुर्दशा नहीं देख सकूँगा। मथुराके राजा कंसको मारकर शिशुपालको भी परास्त करूँगा और समस्त असुरोंका संहार करके पृथ्वीका भार उतारूँगा। कलियुग आनेपर थोड़े जलवाले बादल होंगे, गौएँ बहुत कम दूध देंगी, दूधमें घी और मनुष्योंमें सत्यका अभाव होगा, लोकमें चोरोंका उपद्रव बढ़ जायगा, सब लोग रोगसे पीड़ित होंगे और किसीको अपना रक्षक नहीं पायेंगे। उस समय मैं बुद्धरूपमें अवतार लूँगा। उसके बाद जब नदियाँ क्षीण हो छोटी हो जायँगी, उनकी धारा पीछेकी ओर बहने लगेगी तथा कार्तिकमें ही वे सूख जायँगी, एकादशी और शिवरात्रिका व्रत बंद हो जायगा, उस समय कलियुगमें ऐसे-ऐसे बर्ताव होंगे, जो पहलेके तीन युगोंमें कभी नहीं हुए थे। बेटा माता-पिताको त्यागकर पत्नीकी सेवामें लग जायगा; न कोई गुरु होगा; न सेवक, कोई किसीकी सेवा नहीं करेगा। कलियुग इस पृथ्वीपर ज्यों-ज्यों अपने रोगका विस्तार करता जायगा; त्यों-त्यों सब लोग एकाकार होते जायँगे। सब कुछ म्लेच्छोंद्वारा दूषित होगा। लोग स्नान और सन्ध्या छोड़ देंगे। उस समय मैं कल्कि नाम विख्यात ब्राह्मण होऊँगा और म्लेच्छोंका संहार करके याज्ञवल्क्यजीको पुरोहित बनाकर म्लेच्छवधका प्रायश्चित्त करनेके लिये यज्ञ करूँगा। नारदजी ! इस प्रकार जो मेरे अवतार होंगे, उनमें युद्धका अवसर आयेगा। इस समय देवतालोग राजा बलिके साथ युद्ध नहीं करेंगे। दैत्यराज बलि मेरा यजन करते हैं; वे महात्मा पुरुष हैं, अतः मेरे द्वारा मारनेयोग्य नहीं हैं। उन्होंने महान् यज्ञका प्रारम्भ करके सर्वस्व-दानका नियम ग्रहण किया है।
यों कहकर वामनजी नगरमें गये और एक घरसे दूसरे घरको देखते हुए प्रतिदिन ब्राह्मणोंके घरोंपर भिक्षा माँगने लगे। वे प्रतिदिन स्नान और वेदाध्ययन करते और द्विजोंके घरोंमें भिक्षा एवं भोजन पाते थे। चौराहोंपर तथा सुन्दर मन्दिरोंमें ठहरते थे। वहाँ बहुत लोग उन्हें घेरे रहते थे। उनके कंधे मोटे और ठोढ़ी बड़ी थी। वे सिर हिला-हिलाकर ताल दे-दे नाचते और अत्यन्त मनोहर स्वरमें गाते थे। ब्राह्मणोंकी सभाओंमें वे चारों वेदोंका उच्चारण करते थे। वामनजीका स्वरूप बड़ा सुन्दर था। दैत्यों तथा ब्राह्मणोंके बालक उन्हें दिन-रात घेरे रहते थे। वे सब ब्रह्मचारी वामनको यज्ञमण्डपमें ले गये और बोले—'तुम अपनी कुटी बनानेके लिये कोई स्थान राजा बलिसे माँग लो। विद्वान् ब्राह्मणका इस नगरमें सदा आदर किया जाता है।' सब मनुष्य उनसे अनुरोध करने लगे—'वामनजी ! आप सदा दैत्यराज बलिके नगरमें निवास करें।' 'बहुत अच्छा' कहकर वामनजीने यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया। उस समय मण्डपके द्वारपर बड़ा कोलाहल हुआ। वामनजी अनेक ब्राह्मणोंके साथ वहाँ खड़े होकर वेदमन्त्रोंका उच्चारण करने लगे। वेदमन्त्रोंका वह महान् घोष समूचे मण्डपमें छा गया। पहलेसे भीतर गये हुए दैत्यों ने दैत्यराज बलिको सूचित किया—'देव! एक वामन ब्रह्मचारी यज्ञमें आपका दर्शन करनेके लिये आये हैं। आप उन्हें भीतर ले आनेके लिये द्वारपालको आज्ञा दें।'
एक मुखसे चारों वेदोंके उच्चारणकी ध्वनि सुनकर राजा बलिको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे द्वारपालसे बोले—"इन्हें आदरपूर्वक भीतर ले आओ, मैं इनकी पूजा करूँगा और इन्हें जिस वस्तुकी इच्छा होगी, वही दूँगा। मुझे वे बातें याद हैं, जो गुरुजीने सिखायी थीं—'कोई वेदमय पात्र होता है, कोई तपोमय। जो भी पात्र तुम्हारे पास आवेगा, वही तुम्हें तार देगा।' यज्ञ आरम्भ होनेपर मुझे सत्पात्रके लिये अवश्य दक्षिणा देनी चाहिये।"
बलिकी यह बात सुनकर गुरु शुक्राचार्यने उन्हें रोका और कहा—'राजन् ! वामनको भीतर