भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1366, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1366
  • प्रभासखण्ड * १३३७

न बुलाओ, सब ब्राह्मणोंका पूजन यज्ञमण्डपके द्वारपर ही करना चाहिये। दीन, अन्ध, कृपण, बधिर, वामन, कुब्ज तथा रोगी—ये सब द्वारपर ही पूजनेयोग्य हैं। आप द्वारपर ही जाकर सोने, चाँदी और वस्त्रोंसे वामनका सत्कार करें। चार पुरुषोंका जन्म व्यर्थ है और सोलह प्रकारके दान भी व्यर्थ हैं—जिनके पुत्र नहीं है, जो धर्मसे बहिष्कृत हैं, जो दूसरेके घर भोजन करते हैं तथा जो परायी स्त्रियोंमें आसक्त हैं। इन चार प्रकारके मनुष्योंका जन्म व्यर्थ माना गया है। अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको अन्यायोपार्जित धनका दान नहीं करना चाहिये। जो ब्राह्मण नहीं हैं, जिनका विवाह नहीं हुआ है, जो पतित हैं, सन्ध्याहीन हैं, चोर हैं, जो गुरुको प्रसन्न नहीं रख सकते, पिता-माताकी सेवासे विमुख हैं, ब्राह्मणोंमें अधम हैं, शूद्र स्त्रीसे संपर्क रखते हैं, वेद-विक्रेता, कृतघ्न, ग्रामपुरोहित (अथवा गाँव-गाँव भीख माँगनेवाले) हैं, जिन्हें स्त्रीने वशीभूत कर रखा है, जो साँप पकड़नेवाले हैं तथा दूसरोंकी निन्दामें रत रहते हैं, उन सबको दिया हुआ दान व्यर्थ होता है।'

राजा बलिने कहा—गुरुदेव! आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये। जो कोई भी वेदोंका स्वाध्याय करता है, वह ब्राह्मण मेरे लिये विष्णुके समान आदरणीय है। घरपर श्रोत्रिय ब्राह्मणके आनेपर उसके सत्कारमें विलम्ब नहीं करना चाहिये। उठकर उसका स्वागत करे, मीठे वचन बोले और चरण धोकर यथाशक्ति उसे भोजन दे। यही गृहस्थका धर्म है। यदि वामनजी मेरे यज्ञमण्डपसे बिना पूजा प्राप्त किये ही लौट जायँगे तो सर्वस्व दक्षिणाके संकल्पसे किया जानेवाला यह सम्पूर्ण यज्ञ व्यर्थ हो जायगा।

यह बातचीत हो ही रही थी कि वामनजी दैत्यराज बलिके समीप बुलाकर लाये गये। उनका पिंगल शरीर तेजसे सूर्यकी भाँति प्रज्वलित हो रहा था। विष्णुस्वरूप वामनजीको आते देख राजा बलि उठकर उनके सम्मुख गये और प्रणाम करके आगे खड़े हो इस प्रकार बोले—'मैं धन्य हूँ, जिसके यज्ञमें विष्णुके समान ब्राह्मणका शुभागमन हुआ है।' यों कहकर बलि उन्हें मध्यवेदीके समीप ले गये। उन्हें बैठनेको आसन दिया। पाद्य, आचमनीय और अर्घ्य अर्पण किया। चन्दन, धूप और गन्ध आदिके द्वारा उनकी पूजा करके सामने खड़े हो उन्हें मधुपर्क और गौ निवेदन की। वामनजीने मधुपर्कको सूँघकर गायको प्रणाम किया। बलिने कहा—'विप्रवर! आपका स्वागत है।' वामनजी बोले—'राजन्! तुम्हारा कल्याण हो; मैं याचक होकर आया हूँ, मुझे दान दो।' बलिने कहा—'प्रभो! बताइये, आपको क्या दिया जाय?' वामन बोले—'दैत्यराज! भूमि दो।' बलिने कहा—'प्रभो! कितनी भूमि दूँ?' वामन बोले—'राजन्! मुझे कुटी बनानेके लिये तीन पग भूमि दीजिये।' बलिने कहा—'मैंने आपको तीन पग भूमि दी।' वामन बोले—'मैंने तुम्हारा यह दान ग्रहण किया।'

इसी बीचमें शुक्राचार्य बोल उठे—'इन्हें दान न दो। ये सनातन विष्णु हैं।' तब बलिने कहा—'गुरुदेव! यदि ऐसी बात है तो इनसे बढ़कर दानका उत्तम पात्र और कौन हो सकता है।' यों कहकर बलिने सव्यभावसे दाहिने हाथमें कुश और अक्षत लिये; परंतु गुरुजीने न तो संकल्प पढ़ा और न वामनके हाथमें जल ही गिरवाया। यह देख सारे ऋषि, होता, सभासद, बहुत-से ब्राह्मण, दैत्य तथा राजाके स्त्री-पुत्र और बन्धु-बान्धव आश्चर्यचकित हो उठे और कहने लगे—'दत्तम्' (दिया) तथा 'गृहीतम्' (लिया) यह वाणीद्वारा दोनों ओरसे कह दिये जानेपर भी गुरुजी संकल्पके लिये जल क्यों नहीं छोड़ते हैं। वामनजीके हाथमें कल्याणके निमित्त ही जल दिया जाना चाहिये। वाणीद्वारा जो दान दे दिया गया, उसे क्रियाद्वारा निष्पन्न क्यों नहीं किया जाता? गुरुजी यजमानको नरकमें घसीट रहे हैं।

यह सब सुनकर शुक्राचार्यने कहा—'राजन्! ये वामन साक्षात् विष्णु हैं। दैवयोगसे तुम्हें देखनेके लिये आये हैं। पता नहीं दान लेकर

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