भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1367

१३३८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

ये तुम्हारा प्रिय करेंगे या अप्रिय।' तब बलिने कहा—'गुरुदेव! मेरी बात सुनिये। मैं इन्द्र हूँ, साक्षात् भगवान् विष्णु ही ब्राह्मण हैं और देनेयोग्य द्रव्य सूर्यदेवताका स्वरूप है। जब साक्षात् विष्णु ही यहाँ उपस्थित हैं, तब उनकी प्रीतिके लिये मुझे यह दान क्यों नहीं देना चाहिये?' यों कहकर बलिने वामनके हाथमें संकल्पका जल दे दिया। तब वामनजी चतुर्भुज रूप धारण करके बढ़ने लगे। उनके बढ़ते हुए स्वरूपको देखकर ब्राह्मण, ऋषि और देवता उनकी स्तुति करने लगे—'देव! आपकी जय हो; अनन्त! आपकी जय हो; सर्वव्यापी विष्णुदेव! आपकी जय हो; अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो; मत्स्यरूपधारी हरे! आपकी जय हो; कूर्मावतार! आपकी जय हो। पृथ्वीको उठानेवाले वाराह! आपको नमस्कार है। नरसिंह! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। जमदग्निनन्दन परशुराम! आपको नमस्कार है। लक्ष्मणसहित श्रीराम! आपकी जय हो। कृष्ण! जगन्नाथ! देवकीनन्दन! आपकी जय हो। बुद्ध और कल्कि को मैं प्रणाम करता हूँ।'

इस प्रकार सब नर-नारी भगवान्‌की स्तुति करते थे। देवर्षि नारद और सनकादि योगी भी उनके गुण गाते थे। भगवान् विष्णुने दो ही पगोंमें समस्त ब्रह्माण्डको माप लिया, तीसरेके लिये स्थान न रहा। उस समय देवता, दानव, मनुष्य, गन्धर्व, नाग तथा राक्षसों ने भी भगवान् विष्णुके चरणोंका पूजन और उनका स्तवन किया। गन्धर्वोंने उनके गुण गाये। भगवान् जब अपने चरणको समेटने लगे, उस समय उसके आघातसे ब्रह्माण्ड फूट गया और उससे बाहरका जल वहाँ प्रकट हो गया। वही जल भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई गंगा है। जो ब्रह्माण्डके शिरोभागसे निकली है। गंगा देवी त्रिभुवनको पवित्र करनेवाली हैं। साक्षात् भगवान् शंकरने अपने मस्तकपर उन्हें धारण किया है। वे स्वर्गलोकमें स्वर्धुनीके नामसे पूजित होती हैं और भूलोकमें आनेपर 'गां (भूमिं) गता' इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'गंगा' कहलाती हैं तथा जब वे पातालमें आयीं तब त्रिपथगाके नामसे प्रसिद्ध हुईं। गंगाजीके स्मरणमात्रसे सब पापोंका नाश हो जाता है। उनके दर्शनसे सम्पूर्ण अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। उनके जलमें स्नान करनेमात्रसे सात जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। जो गंगाजीमें स्नान करके देवी, विष्णु तथा शिवकी पूजा करता है, वह इन्द्रलोकको लाँघकर श्रीविष्णुके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। श्रीविष्णुके चरणोदकरूप गंगाका जल पीकर, उसमें स्नान करके तथा उसे प्रणाम करके मन और इन्द्रियोंका पूर्ण संयम रखनेवाला पुरुष मोक्षको प्राप्त होता है। एकादशीको उपवास करके मनुष्य मुक्ति पाते हैं। जो शुद्ध भावसे युक्त हो परमात्मचिन्तनमें स्थित होते हैं, जनसमुदायके स्थानोंसे विरक्त रहते हैं, वे संसार-बन्धनका उच्छेद करके परम गतिको प्राप्त होते हैं।

महादेवजी कहते हैं—देवि! प्रतिज्ञाकी पूर्ति न कर सकनेके कारण वामनजीने जो बलिका निग्रह किया, उससे देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। तत्पश्चात् भगवान्‌ने राजा बलिपर अनुग्रह किया और उन्हें पाताललोकमें भेजकर स्वयं वामनस्थलीमें निवास करनेका विचार किया। वहाँ उन्होंने पंचाग्नि-साधन किया और 'वामनपुरी' बसायी। विश्वकर्माद्वारा बनायी हुई वह पुरी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दी गयी। वह पुरी भद्रा नदीके किनारे स्थित है। मधुमतीमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं। वृद्ध प्रभासमें उन सबका विस्तार बताया गया है। भगवान् विष्णु वामनस्थलीमें स्थित हुए। राजा बलि पाताललोकमें रहने लगे, मधुमतीमें सब कामनाओं और फलोंके दाता भगवान् माधव विराजमान हैं। पार्वती! इस प्रकार मैंने तुमसे बारह योजन विस्तृत प्रभासक्षेत्रका वर्णन किया, जो स्मरण करनेमात्रसे सब सिद्धियोंको देनेवाला है।

~~ ० ~~ प्रभासखण्ड सम्पूर्ण ~~ ० ~~