संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1368, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३३९
श्रीद्वारका-माहात्म्य
भगवान्के परमधाम पधारनेपर महर्षियोंका ब्रह्माजीकी आज्ञासे प्रह्लादजीके समीप जाना और प्रश्न करना
श्रीशौनकजीने पूछा—सूतजी! अनेक प्रकारके पाखण्डोंसे भरे हुए इस भयंकर कलिकालमें हम भगवान् मधुसूदनको किस प्रकार प्राप्त कर सकेंगे?
सूतजीने कहा—महर्षियो! दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी महाराज जब परमधामको चले गये, उसके दीर्घकालके पश्चात् द्वापरमें जब दुष्ट राजाओंके भारसे यह पृथ्वी पीड़ित होने लगी, उस समय साक्षात् भगवान् विष्णु देवताओंका कार्य सिद्ध करने एवं पृथ्वीका भार उतारनेके लिये वसुदेवजीके कुलमें अवतीर्ण हुए। फिर वे नन्दके व्रजमें गये। वहाँ उनके द्वारा पूतनाका नाश हुआ। तृणावर्त मारा गया। दहीसे भरा हुआ छकड़ा उलट दिया गया। कालियनागका दमन और प्रलम्बासुरका संहार हुआ। तत्पश्चात् श्रीकृष्णने अपने हाथसे गोवर्धन पर्वतको उठाकर इन्द्रके कोपसे गोकुलकी रक्षा की। उनका गौओंके इन्द्रपदपर अभिषेक हुआ और इन्द्रका अहंकार दूर किया गया। फिर भगवान्ने रासक्रीड़ा की। उसके बाद केशी दानव मारा गया। फिर वे अक्रूरके कहनेसे मथुरापुरीमें गये। वहाँ भी श्रीकृष्णने कुबलयापीड हाथी और मल्लराज चाणूरको मौतके घाट उतारा। दैत्योंके स्वामी भोजराज कंसको भी मार गिराया। उग्रसेनको मथुराका राजा बनाया। जरासन्धकी असंख्य भयंकर सेनाका संहार किया। युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें शिशुपालका भी वध किया। उसके बाद महाभारत-युद्ध आरम्भ होकर समाप्त हो गया। इस प्रकार पृथ्वीका बहुत बड़ा भार उतर गया। तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण समस्त यदुवंशियोंको तीर्थयात्राके लिये प्रभासक्षेत्रमें ले आये। वहाँ उनमें परस्पर कलह आरम्भ हो गया और उस महाभयंकर कलहाग्निमें समस्त यादववंश जलकर भस्म हो गया। तब भगवान् विष्णु वहीं अस्त्र-शस्त्रोंका त्याग करके अश्वत्थ वृक्षकी जड़का सहारा लेकर भूमिपर जा बैठे। इतनेहीमें एक बहेलियेने बाण मारा और उनके चरणमें घाव हो गया। इसे ही निमित्त बनाकर भगवान् श्रीकृष्ण परमधामको चले गये। इसके बाद अर्जुन द्वारकामें आये और यदुकुलकी स्त्रियों तथा बालकोंको लेकर जब बाहर निकले, तब समुद्रने सब ओरसे यदुपुरीको डुबो दिया। श्रीहरिके मन्दिरका निर्माण कराकर वज्र इन्द्रप्रस्थ चले गये। इस प्रकार द्वापर बीत गया और महाभयानक कलिकाल आ पहुँचा। सद्धर्म क्षीण होने लगा। अधर्म प्रबल हो गया। वेदवादका बहिष्कार होने लगा। वर्ण और आश्रमधर्मका ह्रास हुआ तथा धर्मका एक ही चरण शेष रह गया। जब ऐसी अवस्था प्राप्त हुई, तब समस्त वनवासी महर्षि परस्पर मिलकर मन्त्रणा करने लगे। उस मन्त्रणामें गर्ग, च्यवन, गालव, असित, देवल, धौम्य तथा उद्दालक आदि अनेक महर्षि सम्मिलित थे। वे आपसमें इस प्रकार बोले—'अहो! देखो तो सही, पृथ्वीपर प्रत्येक दिशामें कलियुगका साम्राज्य हो गया है। सब ओर लुटेरों और डाकुओंसे प्रजाको बड़ा कष्ट हो रहा है। सत्य और सरलता आदि सद्गुणोंका त्याग करके प्रायः लोग पापमें प्रवृत्त हो रहे हैं। ऐसी दशामें हमें भगवान् विष्णुकी प्राप्ति कैसे होगी? भवसागरमें पड़े हुए हमलोगोंका