संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1369, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३४० | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
कौन उद्धार करेगा? भगवान् पुण्डरीकाक्षके बिना इस कलियुगमें हम कैसे रहेंगे?'
इस प्रकार जब वे तपस्वी महर्षि दुखी एवं चिन्तित हो रहे थे, उस समय महर्षि उद्दालकने उन सबसे कहा—'मुनिवरो! हमलोग शीघ्र ही ब्रह्मलोकमें चलें और ब्रह्माजीसे पूछें, कलियुगमें भगवान् विष्णुकी स्थिति कहाँ है? क्योंकि कलिकालमें भगवान्के बिना संसारमें कौन रहेगा।'
उनकी बात सुनकर सब महर्षियोंने एक स्वरसे 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा' कहकर ब्रह्माजीके निकट प्रस्थान किया। वहाँ ब्रह्माजीका दर्शन करके उनके चरणोंमें प्रणाम किया और इस प्रकार स्तुति की—'कमलोद्भव! आपको नमस्कार है। अक्षय! अविनाशी! चतुरानन! आपको नमस्कार है। संसारकी सृष्टि करनेवाले! आपको नमस्कार है। पितामह! आपको नमस्कार है।'
मुनियोंके इस प्रकार स्तवन करनेपर ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए। फिर पाद्य और अर्घ्यसे उन मुनिवरोंका सत्कार करके उन्होंने पूछा—'पुत्रो! तुम्हारे आगमनका क्या प्रयोजन है? तुम लोगोंके पुत्र, शिष्य, अग्नि और भाई-बन्धु तो कुशलसे हैं न?'
ऋषियोंने पूछा—भगवन्! आपके प्रसादसे सर्वत्र कुशल है। आप सम्पूर्ण देवताओंके गुरु हैं। आपका दर्शन पाकर हमें तपस्याका सम्पूर्ण फल मिल गया। अब हम अपने आनेका कारण बतलाते हैं। सत्ययुग आदि तीन युग व्यतीत हो गये। अब भयंकर कलियुग प्राप्त हुआ है। इस समय पृथ्वीपर भगवान् विष्णु कहाँ हैं? जिनका दर्शन करके हम बन्धनरहित हो परम मुक्ति प्राप्त कर सकें।
ब्रह्माजीने कहा—तुमलोग पाताललोकमें जाओ और वहाँ दैत्योंमें श्रेष्ठ प्रह्लादजीसे पूछो। उन्हें कलियुगमें भगवान्के रहनेके स्थानका पता होगा। वे तुमसे सब कुछ बता देंगे।
ब्रह्माजीकी बात सुनकर उन तपस्वी महात्माओंने उन्हें प्रणाम किया और प्रह्लादजीकी प्रशंसा करते हुए वे दैत्यराजके नगरमें गये। उन्हें दूरसे ही आते देख राजा बलि और प्रह्लादजीने उठकर उनकी अगवानी की और पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क एवं गौ देकर उनका यथावत् पूजन किया। तत्पश्चात् प्रसन्न चित्तसे हाथ जोड़कर कहा—'महाभाग महात्माओ! आपका स्वागत है। आजका प्रभात हमारे लिये बड़ा उत्तम था, जो कि आपका दर्शन प्राप्त हुआ। कहिये, मैं आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ?'
इस प्रकार दैत्यराज प्रह्लादके द्वारा सत्कार किये जानेपर वे महर्षि बोले—'भगवान्के प्रिय भक्त प्रह्लादजी! आप इस भवसागरसे हमारे रक्षक होइये। इस भयंकर कलिकालमें भगवान् विष्णुके बिना हमलोग कैसे रह सकेंगे। इस युगमें अधर्मने सनातन धर्मपर विजय पायी है। झूठने सत्यको तथा शूद्रोंने ब्राह्मणोंको परास्त किया है। राजाका रूप धारण करके आये हुए म्लेच्छ ब्राह्मणोंको सता रहे हैं। वर्णाश्रम-धर्मका ह्रास हो गया है। वेदोक्त मार्ग लुप्त होता जा रहा है। ऐसे समयमें भगवान् विष्णु कहाँ हैं? जहाँ ज्ञान, ध्यान और इन्द्रियनिग्रहके बिना भी भगवान्की प्राप्ति हो, उस गूढ़ स्थानका पता हमें बताइये। दैत्यराज! आप हमारे सुहृद् हैं, मार्गदर्शक हैं, अतः कृपा करके बताइये, भगवान् विष्णु कहाँ विराज रहे हैं?'
इस प्रकार उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके पूछनेपर दैत्यराज प्रह्लादने उन्हें मस्तक झुकाया और देवताओंसहित ब्रह्माजी एवं परमात्माको नमस्कार करके उत्तर देना आरम्भ किया।
$\sim\sim\circ\sim\sim$