संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| १३४० | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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कौन उद्धार करेगा? भगवान् पुण्डरीकाक्षके बिना इस कलियुगमें हम कैसे रहेंगे?'
इस प्रकार जब वे तपस्वी महर्षि दुखी एवं चिन्तित हो रहे थे, उस समय महर्षि उद्दालकने उन सबसे कहा—'मुनिवरो! हमलोग शीघ्र ही ब्रह्मलोकमें चलें और ब्रह्माजीसे पूछें, कलियुगमें भगवान् विष्णुकी स्थिति कहाँ है? क्योंकि कलिकालमें भगवान्के बिना संसारमें कौन रहेगा।'
उनकी बात सुनकर सब महर्षियोंने एक स्वरसे 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा' कहकर ब्रह्माजीके निकट प्रस्थान किया। वहाँ ब्रह्माजीका दर्शन करके उनके चरणोंमें प्रणाम किया और इस प्रकार स्तुति की—'कमलोद्भव! आपको नमस्कार है। अक्षय! अविनाशी! चतुरानन! आपको नमस्कार है। संसारकी सृष्टि करनेवाले! आपको नमस्कार है। पितामह! आपको नमस्कार है।'
मुनियोंके इस प्रकार स्तवन करनेपर ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए। फिर पाद्य और अर्घ्यसे उन मुनिवरोंका सत्कार करके उन्होंने पूछा—'पुत्रो! तुम्हारे आगमनका क्या प्रयोजन है? तुम लोगोंके पुत्र, शिष्य, अग्नि और भाई-बन्धु तो कुशलसे हैं न?'
ऋषियोंने पूछा—भगवन्! आपके प्रसादसे सर्वत्र कुशल है। आप सम्पूर्ण देवताओंके गुरु हैं। आपका दर्शन पाकर हमें तपस्याका सम्पूर्ण फल मिल गया। अब हम अपने आनेका कारण बतलाते हैं। सत्ययुग आदि तीन युग व्यतीत हो गये। अब भयंकर कलियुग प्राप्त हुआ है। इस समय पृथ्वीपर भगवान् विष्णु कहाँ हैं? जिनका दर्शन करके हम बन्धनरहित हो परम मुक्ति प्राप्त कर सकें।
ब्रह्माजीने कहा—तुमलोग पाताललोकमें जाओ और वहाँ दैत्योंमें श्रेष्ठ प्रह्लादजीसे पूछो। उन्हें कलियुगमें भगवान्के रहनेके स्थानका पता होगा। वे तुमसे सब कुछ बता देंगे।
ब्रह्माजीकी बात सुनकर उन तपस्वी महात्माओंने उन्हें प्रणाम किया और प्रह्लादजीकी प्रशंसा करते हुए वे दैत्यराजके नगरमें गये। उन्हें दूरसे ही आते देख राजा बलि और प्रह्लादजीने उठकर उनकी अगवानी की और पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क एवं गौ देकर उनका यथावत् पूजन किया। तत्पश्चात् प्रसन्न चित्तसे हाथ जोड़कर कहा—'महाभाग महात्माओ! आपका स्वागत है। आजका प्रभात हमारे लिये बड़ा उत्तम था, जो कि आपका दर्शन प्राप्त हुआ। कहिये, मैं आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ?'
इस प्रकार दैत्यराज प्रह्लादके द्वारा सत्कार किये जानेपर वे महर्षि बोले—'भगवान्के प्रिय भक्त प्रह्लादजी! आप इस भवसागरसे हमारे रक्षक होइये। इस भयंकर कलिकालमें भगवान् विष्णुके बिना हमलोग कैसे रह सकेंगे। इस युगमें अधर्मने सनातन धर्मपर विजय पायी है। झूठने सत्यको तथा शूद्रोंने ब्राह्मणोंको परास्त किया है। राजाका रूप धारण करके आये हुए म्लेच्छ ब्राह्मणोंको सता रहे हैं। वर्णाश्रम-धर्मका ह्रास हो गया है। वेदोक्त मार्ग लुप्त होता जा रहा है। ऐसे समयमें भगवान् विष्णु कहाँ हैं? जहाँ ज्ञान, ध्यान और इन्द्रियनिग्रहके बिना भी भगवान्की प्राप्ति हो, उस गूढ़ स्थानका पता हमें बताइये। दैत्यराज! आप हमारे सुहृद् हैं, मार्गदर्शक हैं, अतः कृपा करके बताइये, भगवान् विष्णु कहाँ विराज रहे हैं?'
इस प्रकार उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके पूछनेपर दैत्यराज प्रह्लादने उन्हें मस्तक झुकाया और देवताओंसहित ब्रह्माजी एवं परमात्माको नमस्कार करके उत्तर देना आरम्भ किया।
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- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य *
१३४१
द्वारकाकी महिमा, वहाँकी यात्रा और उसमें योग देनेका माहात्म्य, गोमती और चक्रतीर्थकी उत्पत्ति एवं महिमा, सनकादिकोंपर भगवान्की कृपा
श्रीप्रह्लादजी बोले— महर्षियो! आप सम्पूर्ण देवताओं, दैत्यों, दानवों तथा राक्षसोंके भी पूजनीय हैं। आप पूजनीय महापुरुषोंकी आज्ञा तथा भगवान् विष्णुके प्रसादसे मैं भगवान्के स्थानका परिचय देता हूँ—पश्चिम समुद्रके तटपर जो कुशस्थलीपुरी है, जिसका निर्माण पहले राजा कुशके द्वारा हुआ है, जहाँ गोमती नदी बहती है और समुद्रमें मिली है, वही द्वारावतीपुरी कहलाती है। उसे आनर्ता भी कहते हैं। उसीमें सोलह कलाओं तथा बारह मूर्तियोंसे युक्त विश्वात्मा भगवान् विष्णु निवास करते हैं। जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। वही परम धाम है, वही परमपद है। वह द्वारकापुरी धन्य है, जहाँ शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले चतुर्भुज श्रीकृष्ण विद्यमान हैं। वहाँ जानेसे कलिकालके मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर लेंगे। जहाँ गोमती नदी बहती हैं, जहाँ भगवान् विष्णुकी त्रिविक्रम मूर्ति है, उस द्वारकापुरीमें जाकर चक्रतीर्थमें स्नान करनेवाले मनुष्य मोक्ष प्राप्त करेंगे। जब भगवान् श्रीकृष्ण प्रभासक्षेत्रमें परमधामको पधारे, तब कलासहित वे उस त्रिविक्रम मूर्तिमें स्थित हुए, अतः ब्राह्मणो! इस कलिकालमें भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकाके सिवा अन्यत्र नहीं मिल सकते। यदि आपको श्रीकृष्णसे मिलनेकी इच्छा हो तो शीघ्र वहीं जाइये।
ऋषि बोले— भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ तथा उत्तम मार्ग दिखानेवाले प्रह्लादजी! आपको धन्यवाद है। आज हमने आपके द्वारा उस रहस्यको जान लिया, जिसे आपके सिवा दूसरा कोई नहीं जानता है। अब यह बताइये कि द्वारकापुरीमें जानेसे क्या फल होता है? वहाँ श्रीकृष्ण-दर्शनसे किस फलकी प्राप्ति होती है? द्वारकामें कौन-कौनसे तीर्थ और देवता हैं।
प्रह्लादजीने कहा— ब्राह्मणो! जब मनुष्य द्वारका जानेका विचार मनमें लाता है, उसी समय उसके पितर नरकसे मुक्त हो हर्षके गीत गाने लगते हैं। मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णके मार्गमें जितने पग आगे चलता है, उसे पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। जो मानव श्रीकृष्णपुरीकी यात्राके लिये दूसरोंको प्रेरणा देता है, वह निःसन्देह विष्णुधाममें जाता है। जो द्वारका अथवा मथुरा जानेवाले मनुष्यको धन देता है, वह भगवद्धाममें आनन्दक्रीड़ा करता है। उस मार्गमें थके हुए शरीरवाले मनुष्यको जो सवारी देता है, वह मनुष्य हंसयुक्त विमानसे स्वर्गमें जाता है। जो यात्रामें जाते हुए भूखे पुरुषको मध्याह्नकालमें अन्न देता है, वह गयाश्राद्धसे होनेवाले पुण्यको पाता है। वहाँ पितरोंकी अक्षय तृप्ति होती है। जो द्वारका जानेवाले यात्रीको पहननेके लिये जूते देता है, वह मानव भगवान् श्रीकृष्णके प्रसादसे हाथीपर बैठकर चलता है। जो द्वारका जानेवालेके मार्गमें विघ्न खड़ा करता है, वह मूढ एक कल्पतक रौरव नरकमें डूबा रहता है। जो द्वारकाके मार्गमें टिके हुए पुरुषको कमण्डलु देता है, उसे एक हजार पौंसला चलानेका फल होता है। जो उस तीर्थके मार्गमें जाते हुए पुरुषसे भगवान् विष्णुकी कथा-वार्ता एवं संगीत सुनता है अथवा उसे दान देता है, उससे बढ़कर धन्य मनुष्य कोई नहीं है। द्वारकामें देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णका मन्दिर कैलास-शिखरके समान ऊँचा और श्वेत बादलोंकी भाँति उज्ज्वल है। जो उसका दर्शन करता है, वह मनुष्योंमें श्रेष्ठ है। दूरसे ही फहराती हुई ध्वजा-पताकाके साथ भगवन्मन्दिरका सुवर्णमय कलश देखकर जो सवारीको त्याग देता और धरतीपर लोटकर उसे प्रणाम करता है, उसके पंचसूनाजनित पाप,
| १३४२ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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अन्यान्य, भयंकर पाप, मार्गमें पैरोंसे दबकर मरे हुए कृमि-कीट और पतंग आदिके वधसे होनेवाले, परान्न-भोजन, परकीय जलपान तथा स्पर्शसे होनेवाले पाप—ये सभी उस भगवत्क्षेत्रके दर्शनसे नष्ट हो जाते हैं। द्वारकाके यात्रीको चाहिये कि वह मार्गमें विष्णुसहस्रनाम, भीष्मस्तवराज अथवा गजेन्द्रमोक्षका पाठ करते हुए धीरे-धीरे चले। भगवान्के अनेक अवतारोंकी लीला-कथाका गान करते हुए सदा हर्षमें भरा रहे और पवित्रभावसे यात्रा करे। पहले बिना पैर धोये ही भगवान् गणेशको नमस्कार करे। इससे सब विघ्नोंका नाश होता है। जो पहले बड़े भैया बलरामजीको प्रणाम करके नीलकमलदलके समान श्याम वर्णवाले देवकीनन्दन श्रीकृष्णको प्रणाम करता है, वह उनके दर्शनमात्रसे बाल, कुमार तथा युवावस्थामें किये हुए समस्त पापोंका नाश कर देता है। इतना ही नहीं, सहस्रों जन्मोंके मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए उसके जितने भी पाप हैं, सब नष्ट हो जाते हैं। एक हजार भार सुवर्णदान करनेसे जो फल मिलता है, उससे कोटि गुना फल द्वारकामें श्रीकृष्णके मुखका दर्शन करनेसे मिल जाता है। कमलके समान नेत्रोंवाले देवेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण तथा द्वारकाकी रक्षा करनेवाले महर्षि दुर्वासाजीको गरुड़सहित प्रणाम करके द्वारकापुरीके उत्तम द्वारपर आवे।
तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण ही जिसके आश्रय हैं, उस गोमती नदीके समीप जाय। उसका दर्शनमात्र करके मनुष्य सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। गोमतीका जल पापराशि और अमंगलका विनाश करनेवाला तथा मनुष्योंकी सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। उसे प्रणाम करना चाहिये। वह महापापोंका क्षय करनेवाला, जिनकी कहीं भी गति नहीं है, उन्हें सद्गति देनेवाला तथा परम शीतल है। मनुष्यके सब पुण्य जब सहायक होते हैं, तभी उसे गोमतीका जल प्राप्त होता है।
ऋषियोंने पूछा—दैत्यराज ! यह गोमती कौन है और इसे कौन लाया है?
प्रह्लादजीने कहा—प्राचीनकालमें जब एकार्णवके जलमें समस्त स्थावर-जंगम जगत्का नाश हो गया था, उस समय भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। भगवान्ने आज्ञा दी—'ब्रह्मन्! नाना प्रकारकी प्रजाकी सृष्टि कीजिये।' 'बहुत अच्छा' कहकर ब्रह्माजीने सृष्टिमें मन लगाया। उन्होंने अपने मनसे सनक, सनन्दन आदि कुमारोंको जन्म दिया और कहा—'पुत्रो! प्रजा उत्पन्न करो।' ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर सनक आदि महात्मा हाथ जोड़कर बोले—'भगवन्! प्रजापते! हम भगवत्स्वरूपका दर्शन करना चाहते हैं, अतः हम बन्धनमें नहीं पड़ेंगे। इस दुर्गम सृष्टिके चक्रमें नहीं फँसेंगे।' ऐसा कहकर सनकादि कुमार वहाँसे चल दिये। पश्चिम दिशामें समुद्रके तटपर आकर वे भगवान्के तेजोमय स्वरूपका दर्शन पानेकी इच्छासे उन्हींमें मन लगाकर उत्तम तपस्यामें संलग्न हो गये। बहुत वर्षोंके पश्चात् धरणीधर भगवान् विष्णु प्रसन्न हो समुद्रके जलका भेदन करके उनके सामने प्रकट हुए। उनका वह तेजोमय स्वरूप सूर्यके समान दुर्दर्श था। करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी तथा सहस्रों धारवाले सुदर्शन चक्रमय स्वरूपका दर्शन करके ब्रह्माजीके पुत्र सनकादि बड़े विस्मित हुए। वे भगवान्के उस उत्तम आयुधकी ओर देखते रह गये। उन्हें आश्चर्यमें पड़ा हुआ देख आकाशवाणी हुई—'ब्रह्मपुत्रो! भगवान् विष्णु शीघ्र ही प्रकट होंगे। भगवान्की पूजाके लिये शीघ्र अर्घ्य प्रदान करो। यह उन्हीं भगवान् जगन्नाथका आयुध है। इसके लिये भी शीघ्र अर्घ्य दो।'
आकाशवाणीका यह कथन सुनकर उन सब महर्षियोंने सुदर्शनकी स्तुति की। वे बोले—'ज्योतिर्मय सुदर्शन! तुम्हें नमस्कार है। हरिवल्लभ! तुम्हें नमस्कार है। सहस्र अरोंवाले सुदर्शनचक्र! तुम अविनाशी हो, तुम्हें नमस्कार है। सूर्यस्वरूप! तुम्हें नमस्कार है। ब्रह्मरूप! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारा प्रहार कभी व्यर्थ नहीं होता।
- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३४३
तुम्हें नमस्कार है। चक्ररूप! तुम्हें बार-बार नमस्कार है।'
इस प्रकार स्तुति करके उन्होंने फूल और अक्षत आदिसे भगवान्के प्रिय आयुध सुदर्शनका पूजन और प्रणाम किया। तत्पश्चात् भगवान्के दर्शनके लिये उत्सुक होकर सनकादिकोंने मन-ही-मन अपने पिता ब्रह्माजीका स्मरण किया। उनका अभिप्राय जानकर ब्रह्माजीने गंगाजीसे कहा—'सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगे! तुम भगवान्की सेवाके लिये भूतलपर जाओ। 'गो' अर्थात् इस दिव्य लोकमें तुम मुझे विशेष अभिमत हो, इसलिये पृथ्वीपर तुम्हारा नाम गोमती होगा। जैसे पिताके साथ पुत्री जाती है, उसी प्रकार तुम वसिष्ठजीके पीछे-पीछे पृथ्वीपर जाओ और वसिष्ठजीकी पुत्री होकर रहो।' 'बहुत अच्छा' कहकर गंगादेवी पश्चिम समुद्रकी ओर चलीं। आगे-आगे वसिष्ठजी और पीछे-पीछे गंगा। वसिष्ठजीके साथ गंगाजीको पश्चिम समुद्रकी ओर जाती देख सब लोगोंने नमस्कार किया। जहाँ सनकादि मुनि थे, वहीं गंगाजी प्रकट हुईं। उन महाभाग मुनियोंने दिव्य सुगन्धित माला, चन्दन, धूप आदिसे उनकी पूजा करके उनके ऊपर अक्षत और फूल बिखेरे। भगवान्के लक्ष्मीसेवित चतुर्भुजरूपका दर्शन करनेकी इच्छावाली सर्वलोकपावनी महाभागा गंगाजीकी उन सबने बड़ी प्रशंसा की और साधुवाद दिया। वसिष्ठजीको देखकर सब ब्राह्मण उठकर खड़े हो गये और बोले—'महर्षे! आप इस श्रेष्ठ नदीको यहाँ ले आये हैं, इसलिये यह लोकमें आपकी पुत्रीरूपसे विख्यात होगी। 'गो' अर्थात् स्वर्गसे इस स्थानपर आकर यह मतिस्वरूपा मानी गयी है, इसलिये लोकमें गोमती नामसे उसकी प्रसिद्धि हुई है। इसके दर्शनमात्रसे मनुष्य मोक्षको प्राप्त होंगे। फिर यहाँ स्नान-दान आदि करके वे श्रीहरिके धाममें जायँगे, इसके विषयमें कहना ही क्या।' सनकादि योगीश्वरोंने गोमतीको अर्घ्य देकर पुरुषसूक्तके मन्त्रोंसे शेषशायी भगवान् श्रीहरिका स्तवन किया। इस प्रकार स्तुति करते हुए उनके समक्ष साक्षात् भगवान् विष्णु प्रकट हुए। उन्होंने पीले रंगका रेशमी वस्त्र पहन रखा था। गलेमें वनमाला शोभा दे रही थी। दिव्य माला तथा दिव्य अनुलेपनसे उनके श्रीअंगोंकी बड़ी शोभा हो रही थी। वे दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थे। शेषनागकी शय्यापर पौढ़े हुए थे। उन्होंने हाथोंमें अनेकों दिव्य आयुध धारण कर रखे थे। उनके मस्तकपर किरीट-मुकुट जगमगा रहा था और कानोंमें मकराकृत कुण्डल चमचम कर रहे थे। भक्तोंको अभय देनेवाले कमनीय विग्रह महाबाहु श्रीहरिका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित था। उनके मुखपर शाश्वत प्रसन्नता छायी हुई थी। श्रीविग्रहकी कान्ति श्याम थी। चार भुजाओंसे शोभायमान वे भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीके द्वारा चरणसंवाहनजनित आनन्दमें मग्न होकर अतिशय मनोहर प्रतीत होते थे। उन्हें देखकर सनकादि मुनि बड़े प्रसन्न हुए और वैदिक विष्णुसूक्तके मन्त्रोंसे आनन्दस्वरूप श्रीविष्णुकी स्तुति करने लगे। उनके इस प्रकार स्तवन करनेपर दीनोंपर दया करनेवाले श्रीहरि प्रसन्नचित्त होकर इस प्रकार बोले—'ब्रह्मकुमारो! मैं तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ; अतः तुम्हें मनोवांछित वर दूँगा। तुम मेरी मायासे निर्लिप्त रहकर नित्य ज्ञानसम्पन्न होओगे। ब्राह्मणो! तुमने मोक्षकी अभिलाषा लेकर मुझ जलशायी विष्णुको प्रसन्न किया है; इसलिये यह मेरा श्रेष्ठ तीर्थ सदा मोक्षदायक होगा। तुमपर अनुग्रह करनेके लिये यहाँ पहले सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ है; अतः उस चक्रके नामपर यह तीर्थ चक्रतीर्थ कहलायगा। यहाँ महासागरमें मेरा भी नियमित रूपसे निवास होगा। जो मानव किसी अन्य प्रसंगसे भी यहाँ चक्रतीर्थमें स्नान करते हैं, उन्हें मुक्ति हाथ लग जाती है। विप्रवरो! आपलोग भी सदा यहाँ निवास करें।'
भगवान्का यह वचन सुनकर सनकादि
| १३४४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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महात्माओंके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने भगवान्को अर्घ्य दे गोमतीके जलसे उनके चरण पखारे और उन चरणोंको मस्तकपर धारण किया। इस प्रकार श्रीहरिके चरणोंका प्रक्षालन करके महाभयहारिणी गोमती महासागरमें मिल गयीं। तदनन्तर सनकादि महात्माओंको अभीष्ट वरदान दे श्रीहरि वहीं अन्तर्धान हो गये और ब्रह्मपुत्र सनकादि एकाग्रचित्त हो उसी तीर्थमें रहने लगे। इस प्रकार वहाँ गोमतीका प्रादुर्भाव हुआ और वह समुद्रमें जा मिली। पहले जिनका नाम गंगा सुना गया था, वे ही द्वारकामें सागरगामिनी गोमती कहलायीं।
### गोमतीमें स्नान और भगवत्पूजनकी महिमा
**ऋषि बोले—** दैत्यप्रवर महाभाग प्रह्लादजी! आपको अनेकशः धन्यवाद है; क्योंकि आपने इस कलियुगमें हमें भगवान् श्रीहरिका दर्शन कराया है। जहाँ गोमती नदी बहती है, उस स्थानपर हमें अवश्य जाना चाहिये; क्योंकि वहाँ भगवान् श्रीहरि चक्रतीर्थका निरीक्षण करते हुए सदा निवास करते हैं। महामते! अब गोमतीमें स्नान तथा भगवान् श्रीकृष्णके पूजनकी विधिका वर्णन कीजिये।
**प्रह्लादजीने कहा—** गोमतीके तटपर जाकर पहले उसे साष्टांग प्रणाम करे; फिर हाथ-पैर धोकर दोनों हाथोंमें कुशा ले तथा अक्षत और फल आदि संग्रह करके संयमपूर्वक पूर्वाभिमुख होकर बैठे और विधिवत् अर्घ्य दे। अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है—
> ब्रह्मलोकात्समायाते वशिष्ठतनये शुभे।
> सर्वपापविशुद्ध्यर्थं ददाम्यर्घ्यं च गोमति॥
> वशिष्ठदुहितर्देवि शक्तिज्येष्ठे यशस्विनि।
> त्रैलोक्यवन्दिते देवि पापं मे हर गोमति॥
'ब्रह्मलोकसे आयी हुई वसिष्ठकी पुत्री गोमती! मैं तुम्हें सब पापोंसे शुद्ध होनेके लिये अर्घ्य देता हूँ। वसिष्ठतनये! तुम्हारी शक्ति बहुत बड़ी है। सुयशसे सुशोभित होनेवाली त्रिभुवनवन्दिता गोमती देवी! मेरे पाप हर लो।'
इस मन्त्रका उच्चारण करके हाथमें मिट्टी लेकर मन-ही-मन भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करे—
> अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे।
> उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना॥
> मृत्तिके हर मे पापं यन्मया पूर्वसञ्चितम्।
> त्वया हतेन पापेन सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
'अश्व, रथ तथा भगवान् विष्णुके द्वारा आक्रान्त होनेवाली वसुन्धरे! तुम्हें सैकड़ों भुजाओंवाले वराहरूपधारी भगवान् विष्णुने जलके ऊपर उठाया है। मृत्तिके! मेरे पूर्वसंचित पाप हर लो। तुम्हारे द्वारा पापके नष्ट कर दिये जानेपर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।'
ऐसा कहकर उस मृत्तिकाको सब अंगोंमें लगावे और विधिपूर्वक स्नान करे। स्नानके समय **'आपो अस्मान्०'** इत्यादि वैदिक मन्त्रका भी उच्चारण करना चाहिये। सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमें स्नान करनेसे जो पुण्य होता है, वही श्रीकृष्णके समीप गोमतीमें स्नान करनेमात्रसे प्राप्त हो जाता है। अतः उत्तम भक्तिभावसे गोमतीमें स्नान करके यथोचित कर्म करे। देवताओं, पितरों और मनुष्योंका तर्पण करे। जो रौरव नरकमें स्थित हैं अथवा कीटयोनिमें पड़े हैं, वे सब पितर गोमतीका जल देनेसे निस्सन्देह मुक्त हो जाते हैं। अक्षत और कुशके बिना ही बिना भावनाके भी गोमतीका जलमात्र अर्पण करनेसे गया-श्राद्धका फल होता है।
इस प्रकार तर्पण करनेके पश्चात् तीर्थवासी वेदज्ञ ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे और विश्वेदेव आदिके पूजनपूर्वक पितरोंका श्राद्ध करे। सुवर्ण
- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३४५
और रजतकी दक्षिणा दे। सोनेके सींग और चाँदीके खुरोंसे विभूषित रत्नमय पुच्छ और ताम्रमय पृष्ठभागवाली दुग्धयुक्त सवत्सा गौकी वस्त्र और आभूषणोंद्वारा पूजा करके भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे सप्तधान्यसहित उस गौका दान करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको सीमाके बाहरतक पहुँचाकर जितेन्द्रिय एवं पवित्र पुरुषों, दीनों, अन्धों और कृपणोंको अपनी शक्तिके अनुसार दान दे। गोमती नदी, गोमयस्नान, गोदान, गोपीचन्दन तथा गोपीनाथका दर्शन—ये पाँच गकार दुर्लभ हैं।* इसलिये मनुष्यको गोमतीके तटपर गोदान अवश्य करना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। जो पूर्वकर्मोंके फलसे स्थावर (वृक्ष आदि)-की योनिमें चले गये हैं, ऐसे पितर, पितृकुलके हों या मातृकुलके, वे सभी कलियुगमें गोमतीके दर्शनसे मोक्षको प्राप्त होते हैं। गोमतीके तटपर श्राद्ध करनेसे निश्चय ही अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। प्रयागमें गंगा-स्नान करनेसे जो पुण्य होता है, उसे गोमतीके तटपर श्राद्ध करनेवाला पुरुष प्राप्त कर लेता है। उसके तीनों कुलोंके पितर विष्णुलोकमें जाते हैं तथा सहस्रों जन्मोंका किया हुआ पाप नष्ट हो जाता है। गोमतीके दर्शनसे मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए सभी पाप विलीन हो जाते हैं। भयभीत प्राणीको अभयदान देनेसे मनुष्य जिस पुण्यको पाता है, उसीको गोमतीके जलमें स्नान करके मनुष्य पा लेता है; इतना ही नहीं, वह पैतृक ऋणसे मुक्त एवं कृतकृत्य हो जाता है। मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए समस्त पाप गोमतीके जलका सम्पर्क होते ही नष्ट हो जाते हैं। गोमतीमें स्नान करनेवाला पुरुष सुन्दर वनमाला, चार भुजा तथा दिव्य गन्ध और अनुलेपनसे युक्त होकर उस विष्णुधाममें जाता है, जहाँसे पुनः लौटकर इस संसारमें नहीं आना पड़ता।
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चक्रतीर्थ तथा रुक्मिणीह्रदका माहात्म्य
प्रह्लादजी कहते हैं—विप्रवरो! यहाँसे चक्रतीर्थयुक्त समुद्रके समीप जाय, जहाँ मोक्ष देनेवाली चक्रांकित शिलाएँ देखी जाती हैं। जो प्रतिदिन भाव-भक्तिके साथ भगवान् जगन्नाथ श्रीकृष्णका पूजन करते हैं और सदा अपलक नेत्रोंसे उनका दर्शन करते रहते हैं, वे धन्य हैं। साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने जिसे निरन्तर अपनी दृष्टिसे देखकर पालन किया है, वह श्रीहरिका सर्वपापनाशक चक्रतीर्थ सबसे श्रेष्ठ है। किसी दूसरे प्रसंगसे भी जिसका दर्शन कर लेनेपर मनुष्य पापमुक्त हो जाता है, वह चक्रतीर्थ सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ और पावन है। वहाँ जाकर प्रसन्नतापूर्वक हाथ-पैर धोकर आचमन करनेके पश्चात् साष्टांग प्रणाम करे। फिर पंचरत्नयुक्त अर्घ्यपात्र लेकर उसमें फूल, अक्षत, गन्ध, फल और चन्दन आदि मिलाकर अर्घ्य तैयार करे और फिर उसे हाथमें लेकर पश्चिम या समुद्रकी ओर मुँह करके निम्नांकित मन्त्र पढ़े—
ॐ नमो विष्णुरूपाय विष्णोश्चक्राय ते नमः। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं सर्वकामप्रदो भव॥
'ॐविष्णुस्वरूप तुम विष्णुचक्रको बार-बार नमस्कार है। मेरा दिया हुआ अर्घ्य स्वीकार करो और मेरे सम्पूर्ण मनोरथोंके दाता बनो।'
इस प्रकार अर्घ्य देकर समुद्रमें स्नान करे। फिर तीर्थकी भीगी हुई मिट्टी हाथमें ले उसे मस्तकपर धारण करके प्रणवका उच्चारण करते हुए पुनः स्नान करे। तदनन्तर क्रमशः देवता, ऋषि, मनुष्य तथा पितरोंका तर्पण करके भक्तिभावसे श्रीविष्णु और शिवका पूजन करे। भलीभाँति विधिपूर्वक किये हुए सहस्रों अश्वमेध यज्ञोंसे
* गोमती गोमयस्नानं गोदानं गोपिचन्दनम्। दर्शनं गोपिनाथस्य गकाराः पञ्च दुर्लभाः ॥ (स्क० पु०, द्वा० मा० ६। २३-२४)
१३४६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
जो फल प्राप्त होता है, वही चक्रतीर्थमें स्नान करनेमात्रसे मिल जाता है। चक्रतीर्थसे निकली हुई चक्रांकित शिला मनुष्योंद्वारा सदा पूजनेयोग्य है। उसके पूजनसे भगवान् विष्णुका सामीप्य प्राप्त होता है। मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए समस्त पाप वहाँ स्नानमात्रसे नष्ट हो जाते हैं।
वहाँसे सुप्रसिद्ध सात कुण्डोंके समीप जाय, जो सब पापोंका नाश करनेवाले तथा ऋद्धि और बुद्धिको बढ़ानेवाले हैं। कलियुगमें उनकी रुक्मिणीह्रदके नामसे प्रसिद्धि होगी। भृगुजीसे सेवित होनेके कारण उसे भृगुतीर्थ भी कहते हैं। वहाँ जाकर प्रसन्नतापूर्वक हाथ-पैर धोये और आचमन करके इन्द्रियसंयमपूर्वक पूर्वाभिमुख हो कुश, फल, फूल, अक्षत और रजत आदिसे युक्त भरा हुआ अर्घ्यपात्र लेकर मस्तकसे लगाकर इस प्रकार कहे—'मैं सब पापोंके नाश तथा रुक्मिणीजीकी प्रसन्नताके लिये रुक्मिणीह्रदनामक इस तीर्थको भक्तिपूर्वक अर्घ्य देता हूँ।' ऐसा कहकर अर्घ्य दे और सिरपर मार्जन करके स्नान करे। फिर देवता, ऋषि, मनुष्य और पितरोंका तर्पण करके ब्राह्मणोंको बुलाकर भक्तिभावसे श्राद्ध करे। फिर सुवर्ण और रजतकी दक्षिणा दे। विशेषतः रसीले फल अर्पण करने चाहिये। ब्राह्मणदम्पतिको मिष्टान्न भोजन करावे। पितृपंक्ति तथा अन्यान्य स्त्रियोंका यथाशक्ति कंचुकि और लाल वस्त्रोंके द्वारा पूजन करे। 'रुक्मिणी प्रीयताम्—रुक्मिणीदेवी प्रसन्न हों' ऐसा कहकर वह पूजन आदि कर्म रुक्मिणीदेवीको समर्पित करना चाहिये। ऐसा करनेपर मनुष्य कृतकृत्य होता, सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करता और विष्णुलोकमें जाता है। जो रुक्मिणीकुण्डमें स्नान करता है, वह शक्तिहीन तथा याचक नहीं होता। उसे संसारचक्रमें भटकना नहीं पड़ता। वह दुःख, शोक,पाप तथा महान् भयसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।
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विष्णुपदोद्भवतीर्थकी महिमा, उद्धवजीका ब्रजमें आगमन, उनके साथ गोपियोंकी बातचीत, गोपियोंका द्वारकागमन तथा मयसरोवरकी महिमा
**प्रह्लादजी कहते हैं—**विप्रवरो! वहाँसे विष्णुपदोद्भव तीर्थमें जाय, जिसके दर्शनमात्रसे गंगास्नानका फल मिलता है तथा जिसके स्मरण और कीर्तनसे सब पापोंका नाश हो जाता है। भगवान् श्रीकृष्णने रुक्मिणीजीके लिये जिस गंगाजीको प्रकट किया था, वही विष्णुपदा कहलाती हैं। उसमें आचमन करनेमात्रसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। श्रीविष्णुके चरणसे प्रकट हुई है, इसलिये वह वैष्णवी नामसे भी प्रसिद्ध है। वहाँ जाकर विधिपूर्वक अर्घ्य हाथमें लेकर निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करे—
नमस्ये त्वां भगवति विष्णुपदतलोद्भवे।
गृहाणार्घ्यमिदं देवि गङ्गे त्वं हरिणा सह॥
'भगवान् विष्णुके चरणतलसे प्रकट हुई भगवती गंगे! मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। देवि! तुम श्रीहरिके साथ मेरा यह अर्घ्य स्वीकार करो।'
ऐसा कहकर अर्घ्य दे। फिर हाथसे तीर्थकी मृत्तिका लेकर मस्तकमें लगाये और इन्द्रियोंको अपने वशमें रखते हुए पूर्वाभिमुख हो स्नान करे। स्नानके बाद देवताओं और पितरोंका तर्पण करे। फिर ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करके श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करे। सोना-चाँदी दक्षिणामें दे। अपनी शक्तिके अनुसार दीनों, अन्धों और कृपणोंको भी दान दे।
तत्पश्चात् गोप्रचार या गोपीसरोवर तीर्थमें जाय, जहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करके मनुष्य गोदानका फल पाता है। जहाँ जगदीश्वर श्रीकृष्ण श्रावण मासमें देवताओंसहित स्नान करते हैं, वहाँ द्वादशीको चटाई देनेका विधान है।
- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * | १३४७ ---|---
ऋषियोंने पूछा—दैत्यराज! वहाँ गोप्रचार तीर्थ कैसे हुआ? जिसमें साक्षात् भगवान् जनार्दन स्नान करते हैं?
प्रह्लादजीने कहा—अमित तेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा भोजराज कंसके मारे जानेपर जब उग्रसेन मथुरापुरीके राजा हुए, उस समय गोकुलप्रिय श्रीकृष्णने अपने सुहृद् गोपों तथा गोपीजनोंका प्रिय करनेके लिये उद्धवजीको गोकुलमें भेजा। उद्धवजी गोविन्दको नमस्कार करके उन्हींके समान वेष-भूषा तथा वस्त्रालंकार धारण करके नन्दगाँवकी ओर चले। सन्ध्याकालमें श्रीकृष्णके प्रिय सखा उद्धवजीको अपने घर आया देख पुत्रवत्सला माता यशोदाने अच्छे-अच्छे वस्त्र और आभूषण देकर उनका सत्कार किया। जब उद्धवजी भोजन करके विश्राम कर चुके, तब पुत्रस्नेहमयी यशोदा तथा नन्दबाबाने अपने नेत्रोंमें आँसू भरकर श्रीकृष्णका कुशल-समाचार पूछा—'उद्धवजी! बताओ तो सही, हमारे दोनों पुत्र श्रीकृष्ण-बलराम कुशलसे तो हैं न? क्या श्रीकृष्ण अपने साथी ग्वाल-बालोंको कभी याद करते हैं? क्या मथुरानाथ गोविन्द कभी गोकुलमें भी पधारेंगे? क्या हमारा लाला कन्हैया इस गोकुलका शोकसमुद्रसे उद्धार करेगा?' ऐसा कहकर पुत्रस्नेहके वशीभूत यशोदा मैया और नन्दबाबा—दोनों दीनभावसे फूट-फूटकर रोने लगे। उनके नेत्रोंसे अश्रुधारा बह रही थी। उद्धवने देखा, ये दोनों विरहकी अन्तिम सीमातक पहुँच गये हैं। अब इनके प्राण रहेंगे या नहीं, यह संशय उपस्थित हो गया है। तब उन्होंने श्रीकृष्णके स्नेहयुक्त मधुर सन्देश सुनाकर उन दोनोंको जीवनदान दिया। उद्धवजी बोले—'श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने अपने बड़े भैया बलरामजीके साथ आप दोनोंको नमस्कार कहलाया है। कुशल-मंगल पूछा है और वे दोनों भाई भी कुशलसे हैं। जगदीश्वर श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ शीघ्र ही यहाँ आवेंगे और आपलोगोंका हित-साधन करेंगे।'
इस प्रकार श्रीकृष्णके सन्देश-वाक्योंसे नन्द और यशोदाको सान्त्वना देकर उनके द्वारा सम्मानित हो उद्धवजी शय्यापर सुखपूर्वक सोये। प्रातःकाल गोपियाँ नन्दबाबाके द्वारपर रथ खड़ा देख अत्यन्त विस्मित हुईं। उनके मनमें सन्देह हुआ, श्रीकृष्ण तो नहीं आ गये? अतः वे परस्पर पूछने लगीं, 'नन्दरायजीके घरमें सूर्यके समान तेजस्वी रथसे ये श्रीकृष्णकी-सी वेष-भूषा धारण किये कौन आये हैं?' इस प्रकार जिज्ञासा करती हुई समस्त ब्रजसुन्दरियाँ परस्पर मिलकर एकान्त स्थानमें गयीं और शोकसे दुर्बल हो उद्धवजीको वहीं बुलाकर श्रीकृष्णका सन्देश पूछने लगीं—'तुम कहाँसे आये हो? और किसलिये यहाँ पधारे हो?' इतना कहते-कहते वे शोकसे विह्वल एवं मूर्च्छित हो गयीं और उद्धवजीकी ओर देखती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ीं।
श्रीकृष्ण-प्रेम-परवश गोपीजनोंकी यह अवस्था देखकर उद्धवजीने उन्हें श्रवण-सुखद वचनोंद्वारा आश्वासन देते हुए कहा—'गोपियो! भगवान् श्रीकृष्णकी भी यही दशा है। वे दिन-रात तुम्हारी ही याद करके निरन्तर दुःखी रहते हैं।' उद्धवजीकी यह बात सुनकर ललिता प्रणयकोपसे मूर्च्छित-सी होकर आँखें लाल किये रोती हुई बोलीं—'श्यामसन्दर झूठे हैं। मर्यादा भंग करनेवाले और क्रूर हैं। क्रूर मनुष्य ही उन्हें प्रिय हैं। कृतज्ञता तो उनमें छू भी नहीं गयी है। उद्धवजी! आप उनकी कोई चर्चा हमारे आगे न कीजिये।'
श्यामला बोली—सखियो! तुमलोग उनकी बात चलाती ही क्यों हो? छोड़ो श्रीकृष्णकी चर्चा, कोई दूसरी बातें करो।
धन्याने कहा—पुरुषार्थहीन लक्ष्मीपतिके इन दूत महोदयको कौन यहाँ बुला लाया है? श्रीकृष्णका साथ करनेसे कोई लाभ नहीं है।
विशाखा बोली—जिनके कुल और शीलका कोई पता नहीं है, उन्हें पापका भय क्या होगा? उनके जन्म-कर्मकी ख्याति तो स्त्रीवधसे ही प्रारम्भ हुई है।
| १३४८ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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श्रीराधाजीने कहा— सखियो ! जिन्हें प्राणियोंका वध करनेमें पापका कोई भय नहीं होता, उन्हें स्त्री-वध करनेमें क्या शंका हो सकती है?
**शैव्या बोली—**महाभाग उद्धवजी ! सच बताइये, नागरी स्त्रियोंसे घिरे हुए यदुवंशशिरोमणि श्रीकृष्ण क्या कभी हमलोगोंका भी स्मरण करते हैं?
**पद्माने कहा—**उद्धवजी ! नागरीजनोंके प्रियतम तथा कमल-दलके सदृश विशाल नेत्रोंवाले श्रीकृष्ण यहाँ कब पधारेंगे?
**भद्रा बोली—**हा कृष्ण! हा गोपप्रवर! हा गोपीजनवल्लभ! महाबाहो ! हम गोपियोंका संसार-सागरसे उद्धार करो।
इस प्रकार नाना प्रकारकी बातें कह-कहकर ब्रजयुवतियाँ विलाप करने लगीं! वे श्रीकृष्णकी एक-एक लीला याद करके फूट-फूटकर रोने लगीं। उनका वह रोना सुनकर भक्ति और स्नेहमें डूबे हुए उद्धवजीको बड़ा विस्मय हुआ और वे उन गोपियोंकी सराहना करने लगे—'अहो ! ब्रह्मा, महादेवजी, देवता तथा महर्षि भी जिस भावतक नहीं पहुँच सकते, वहाँ इन गोपियोंकी पहुँच हो चुकी है। ब्रजकी ये समस्त सुन्दरियाँ धन्य हैं। इन सबका जन्म, जीवन तथा यौवन-धन सफल हो गया, क्योंकि भगवान् श्यामसुन्दरमें इनकी भक्ति अविचल है।'
**गोपियाँ बोलीं—**उद्धवजी ! आप हमें गोविन्दका दर्शन करा दें। प्यारे श्यामसुन्दरसे मिला दें। जहाँ श्रीकृष्ण रहते हैं, वहीं हमको भी ले चलें।
गोपांगनाओंकी यह बात और विलाप सुनकर उद्धवजी स्नेहसे विह्वल हो गये और 'बहुत अच्छा' कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया। तदनन्तर श्रीकृष्णदर्शनके लिये लालायित रहनेवाली समस्त ब्रजांगनाएँ बड़ी प्रसन्नताके साथ उद्धवजीके पीछे-पीछे चलीं। वे मार्गमें उनकी बाललीलाके प्रिय गीत गाती जा रही थीं। यदुपुरीके समीप पहुँचकर उन्होंने वहाँके उद्यानों और वन-श्रेणियोंको देखा। तब वे परस्पर कहने लगीं—'यहाँ हमें अपने प्यारे कमलनयन नन्दनन्दनका दर्शन होगा।' द्वारकामें जाने और लक्ष्मीपतिका चिन्तन करनेसे गोपियाँ समस्त पापोंसे मुक्त हो गयीं, उनके सारे बन्धन टूट गये। धीरे-धीरे वे मयसरोवरके तटपर आयीं। वहाँ उद्धवजीने उनके चरणोंमें प्रणाम करके कहा—'देवियो! तुमलोग यहीं ठहरो। महाबाहु श्रीकृष्ण यहीं आवेंगे और तुम सब लोगोंका हित करेंगे।'
**गोपियोंने पूछा—**उद्धवजी ! खिले हुए कमलों, कह्लारों, कुमुदों और उत्पलोंसे जिसकी विचित्र शोभा हो रही है और जहाँ सारस किलोल करते हैं, ऐसा यह सरोवर किसका है?
**उद्धवजीने कहा—**माया जाननेवाला महादैत्य मय तीनों लोकोंमें विख्यात है। उसीने यह सुन्दर सरोवर बनाया है; अतः उसीके नामसे यह मयसरोवर कहलाता है।
**गोपियाँ बोलीं—**अच्छा, उद्धवजी! आप शीघ्र जाइये और प्यारे श्यामसुन्दरको बुला लाइये। वे ही हमारे नयनोंमें आनन्दकी सृष्टि करते हैं। उन्हींसे हमारे तीनों तापोंका नाश होता है; अतः शीघ्र उनका दर्शन कराइये।
यह सुनकर उद्धवजी गये और भगवान् श्रीकृष्णको शीघ्र बुला लाये। गोपियोंने देखा, देवकीनन्दन आ रहे हैं। उनका श्रीअंग वनमालासे विभूषित है। मस्तकपर किरीटमुकुट जगमगा रहा है। कानोंमें मकराकार कुण्डल चमचम कर रहे हैं। वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न शोभा पा रहा है। उनकी बड़ी-बड़ी भुजाएँ हैं। उन्होंने रेशमी पीताम्बर पहन रखा है। तीनों लोकोंमें सबसे अधिक सुन्दर और सबका मन मोह लेनेवाले अपने प्रियतम श्यामसुन्दरको दीर्घकालके बाद देखकर श्रीकृष्णप्रिया गोपियाँ प्रेमावेशसे मूर्च्छित हो गयीं। कुछ देरके बाद जब वे सचेत हुईं, तब इस प्रकार विलाप करने लगीं—'हा नाथ! हा प्राणवल्लभ! हा स्वामिन्! हा ब्रजेश्वर! हा मनमोहन ! बचपनमें जिन्होंने तुम्हारा लालन-
- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३४९
| पालन किया, जिनके साथ तुमने क्रीडाएँ कीं, उनको भी तुमने त्याग दिया। निर्दयी! बताओ तो सही, हमपर इतने रुष्ट कैसे हो गये? हम जानती हैं, तुममें न धर्म है न सौहार्द, न मैत्री है और न सत्यवादिता, तुम तो पिता-माताका भी परित्याग करनेवाले हो। तुम्हें कैसे सद्गति प्राप्त होगी? प्राणवल्लभ! भक्तजनोंका परित्याग सब शास्त्रोंमें निन्दित बताया गया है। वीर! हमें वनमें छोड़ते समय तुमने उन शास्त्र-वचनोंपर भी दृष्टिपात नहीं किया?'<br><br>गोपियोंका यह विलाप सुनकर सबके आन्तरिक भावोंको जाननेवाले भगवान् श्रीकृष्णने यह जान लिया कि सब गोपियाँ अनन्यभावसे मेरी शरणमें आयी हैं; अतः व्रजेश्वरने उन सबको सान्त्वना देते हुए कहा—'देवियो! तुमसे मेरा कभी वियोग नहीं है। मैं समस्त प्राणियोंके हृदयमें सदा सामान्यरूपसे निवास करता हूँ। मैं ही सबकी उत्पत्तिका कारण हूँ। मुझसे ही इन्द्र आदि देवता प्रकट हुए हैं। आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुद्गण, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, आद्याशक्ति, महर्षि, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, सत्त्व, रज, तम, काम, क्रोध, लोभ, मद और अहंकार—इन सबकी प्रवृत्ति मुझसे ही होती है। ऐसा जानकर तुम मनमें शोक न करो। सब प्राणियोंके भीतर मुझे सदा ही स्थित जानकर अन्तर्यामीरूपसे मेरा चिन्तन करो। इससे सब प्रकारके पाप-तापसे मुक्त हो जाओगी।'<br><br>श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर गोपियोंके सब बन्धन कट गये। उनके संशय और क्लेश नष्ट हो गये। वे भगवद्दर्शनजनित आनन्दमें डूब गयीं। श्रीकृष्णके दर्शनसे उनका अन्तःकरण अत्यन्त निर्मल हो गया। वे इस प्रकार बोलीं—'गोविन्द! आज हमारा जन्म सफल हो गया। आज हमारे नेत्र सार्थक हो गये। क्योंकि आज दीर्घकालके बाद हमारी आँखें नागरीजनवल्लभ गोविन्दका दर्शन कर रही हैं। पुण्यहीन स्त्रियोंको पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका दर्शन नहीं होता। मधुसूदन! यद्यपि | आपने युक्ति तथा अर्थयुक्त वचनोंसे हमें ज्ञानका उपदेश दिया है तथापि हमारे हृदयसे माया नहीं निकलती।'<br><br>श्रीकृष्णने कहा—इस सरोवरके दर्शन और स्पर्शसे तुम सम्पूर्ण बन्धनोंसे मुक्त हो गयी हो। अब इसमें स्नान कर लेनेसे तुम्हारी सम्पूर्ण कामनाएँ पूरी हो जायेंगी।<br><br>गोपियाँ बोलीं—जगन्नाथ! आपने इस सरोवरका अद्भुत प्रभाव बतलाया है। अब इसमें स्नान करनेकी क्या विधि है, वह विस्तारपूर्वक कहिये।<br><br>श्रीकृष्णने कहा—गोपियो! इस सरोवरपर मेरे साथ तुम्हारा मिलन हुआ है, अतः यहाँ मेरे ही साथ तुम्हें नियमपूर्वक स्नान करना चाहिये। जो श्रावण शुक्ला द्वादशीको संयम, नियम एवं पवित्रतासे रहकर भक्तिपूर्वक इस सरोवरमें स्नान करके पितरोंका तर्पण करेगा और मेरे तथा पितरोंके उद्देश्यसे यथाशक्ति दान देगा, वह पितरोंसहित विष्णुधामको प्राप्त होगा। मयतीर्थके पास जाकर दोनों हाथोंमें कुश और फल ले निम्नांकित मन्त्रसे अर्घ्य दे—<br><br>गृहान्धकूपे पतितं मायापाशशतैर्वृतम्।<br>मामुद्धर महीनाथ गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥<br><br>'महीनाथ! मैं घरके अन्धकूपमें पड़ा हूँ। मायाके सैकड़ों बन्धनोंमें बँधा हूँ। मेरा उद्धार करो। यह अर्घ्य लो। तुम्हें नमस्कार है।'<br><br>इस प्रकार अर्घ्य दे भक्तिपूर्वक स्नान करे। भक्तिभावसे पितरोंका तर्पण और श्राद्ध करे। सोने और चाँदीकी दक्षिणा दे। शक्कर मिलाया हुआ खीर, मधु आदि अर्पण करे। मुझे तुमलोगोंका यहाँ दर्शन हुआ है; अतः मुझे सदा इस जलाशयमें आना और रहना चाहिये। प्यारी गोपियो! जो इस मयसरोवरमें स्नान करता है, उसे गंगास्नानका फल और अक्षय वैकुण्ठधाम प्राप्त होते हैं। उसके तीनों कुलोंके पितर मुक्त हो जाते हैं। वह स्वयं भी पुत्र-पौत्रसे युक्त तथा धन-धान्यसे सम्पन्न होता है। जीवनभर सुख भोगकर अन्तमें श्रीहरिके धामको जाता है। |
$\sim\sim\sim\circ\sim\sim\sim$
१३५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
गोपी-सरोवरका निर्माण और उसकी महिमाका वर्णन
प्रह्लादजी कहते हैं—श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर गोपियोंके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उस मयसरोवरमें स्नान करके वे समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो गयीं। श्यामसुन्दर श्रीकृष्णके दर्शनसे उनके हृदयमें असीम आनन्द हुआ था। उन्होंने माधवसे मधुर वाणीमें कहा—'भगवन्! दैत्योंमें श्रेष्ठ मय धन्य है, जिसके बनाये हुए सरोवरमें सम्पूर्ण देवताओंके साथ जगदीश्वर निवास करें। प्रभो! यदि आप हम पर प्रसन्न हैं और हम आपके कृपापात्र हैं तो हमारे लिये भी एक तीर्थका निर्माण कराइये। जहाँ रहकर आपके नामोंका कीर्तन, आपका दर्शन तथा निरन्तर आपके स्वरूपका ध्यान करनेसे हम परम गतिको प्राप्त हों।'
श्रीकृष्णने कहा—साध्वी गोपियो! तुम मेरी आत्मीयजन हो; अतः तुम्हारा प्रिय कार्य अवश्य करूँगा। तुम सदैव मेरे अनुग्रहकी पात्र हो; क्योंकि मैं सदा भक्तिके वशीभूत रहता हूँ।
ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने गोपियोंके हितके लिये मयसरोवरके समीप एक-दूसरे सरोवरका निर्माण कराया। उसमें अगाध जल था। कमलके पत्ते उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उस सरोवरका जल बड़ा ही स्वच्छ था। हंस, सारस और चक्रवाक आदि पक्षी उसे सुशोभित करते थे। कुमुद, उत्पल, कह्लार और पद्मखण्ड उस सरोवरके श्रृंगार थे। उसके तटपर मुख्य-मुख्य ब्राह्मण, सिद्ध और विद्याधर आकर रहने लगे। यदुकुलकी स्त्रियाँ, बालक और उस जनपदके लोग दिन-रात वहाँ भरे रहते थे। उस सरोवरको देखकर श्रीकृष्णने कहा—'गोपियो! मयसरोवरके समीप सज्जनोंके मनकी भाँति स्वच्छ जलसे भरे हुए इस सरोवरको देखो। यह तुम्हारे ही लिये तैयार कराया गया है। तुम्हारे नामसे ही इसकी ख्याति होगी। तुम्हें और मुझे गोवाचक शब्द अभीष्ट है; अतः गौके नामपर लोकमें यह तीर्थ गोप्रचार नामसे प्रसिद्ध होगा। मैंने तुम सब गोपियोंका प्रिय करनेकी इच्छासे इस सरोवरका निर्माण किया है; इसलिये यह गोपीसरोवरके नामसे भी विख्यात होगा। तुमलोग मेरे प्रति विशेष भक्तिके कारण यहाँ आयी हो, अतः तुम्हें जो अभीष्ट हो या तुम्हारे मनमें जो कुछ भी हो, वह माँगो।'
गोपियाँ बोलीं—माधव! आप प्रसन्नतापूर्वक इस सरोवरमें निवास करें। जहाँ आप हैं वहीं दान, व्रत, नियम, ॐकार, वषट्कार, स्वाहाकार, स्वधाकार, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्गलोक, महर्लोक, जन, तप और सत्यलोक सबकी स्थिति है। देवता, असुर और मनुष्योंसहित यह सम्पूर्ण जगत् श्रीकृष्णमय ही है। तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली गंगा आपका चरणोदक ही तो हैं। आपके वक्षःस्थलमें लक्ष्मी और मुखमें सरस्वती देवीका वास है। जगदीश्वर! आप यहाँ अपने सर्वभूतमय स्वरूपसे स्नान करें। महाबाहो! यहाँकी यात्रा करनेसे जो फल होता हो, उसका वर्णन कीजिये।
श्रीकृष्णने कहा—गोपियो! सुनो—सदाचारी, शुद्ध, निर्धन, परोपकारी एवं कुटुम्बी ब्राह्मणको आवश्यक सामग्री, बछड़ा, वस्त्र, आभूषण तथा शास्त्रोक्त दक्षिणासे युक्त गाय दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह सब इस गोपी-तीर्थमें स्नान करनेमात्रसे मिल जाता है। जो मनुष्य अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे स्तुति करते हुए मेरे विग्रहके साथ गाते-बजाते गोपी-सरोवरकी यात्रा करते हैं, उन्हें कभी माताके गर्भकी यातना नहीं भोगनी पड़ती। वे समस्त मनोरथोंको पाते और विष्णुलोकको जाते हैं। गोपीसरोवरमें निम्नांकित मन्त्रसे श्रद्धापूर्वक अर्घ्य देकर स्नान करना चाहिये—
अर्घ्य-मन्त्र
नमस्ते गोपरूपाय विष्णवे परमात्मने।
गोप्रचार जगन्नाथ गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥
- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * | १३५१ ---|---
'गोपरूपधारी परमात्मा विष्णुको नमस्कार है। गोप्रचार! जगन्नाथ! यह अर्घ्य ग्रहण करो। तुम्हें नमस्कार है।'
इस प्रकार विधिपूर्वक अर्घ्य दे हाथसे तीर्थकी मिट्टी लेकर मस्तकमें लगावे और श्रद्धापूर्वक स्नान करके देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करे। फिर एकाग्रचित्त हो भक्तिभावसे श्राद्ध करे और शास्त्रमें बताये अनुसार सुवर्ण तथा रजतकी दक्षिणा दे। ऐसा करनेसे मनुष्य उत्तम गतिको पाता है। उसके तीनों कुलोंके पितर उत्तम लोकमें जाते हैं। श्राद्धकर्ता पुरुष यदि पुत्रकी इच्छा रखनेवाला हो तो वह मनके अनुकूल पुत्र पाता है। जो गोपीसरोवरमें स्नान करता है, वह स्वर्ग और मोक्ष आदि जिस-जिस वस्तुको चाहता है, सब कुछ पा लेता है। जबतक जगत् रहेगा, तबतक यह सरोवर भी रहेगा और जबतक सरोवर रहेगा, तबतक तुम्हारी कीर्ति भी स्थिर रहेगी। मनुष्यलोकमें जबतक कीर्ति बनी रहती है, तबतक उसका स्वर्गलोकमें रहना निश्चित है। इसमें स्नान करके निष्पाप हुए समस्त प्राणी परम गतिको प्राप्त होंगे। भाद्रपदमास आनेपर जलसे भरे हुए पवित्र गोपीसरोवरमें नियमपूर्वक स्नान करना होगा। तुमलोग कान्तभावसे अथवा ब्रह्मभावसे मुझ परमेश्वरका चिन्तन करते हुए परम उत्तम गतिको प्राप्त होओगी।
इस प्रकार भगवान्की आज्ञा पाकर उन गोपकन्याओंने उन्हें नमस्कार किया और वे जैसे आयी थीं, वैसे ही चली गयीं। इस प्रकार गोपियोंको विदा करके उद्धवसहित श्रीकृष्ण अपने घरको गये।
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ब्रह्मकुण्ड, चन्द्रसरोवर, इन्द्रसरोवर, महादेवसरोवर, गौरीसरोवर, वरुणसरोवर तथा पंचनदतीर्थका माहात्म्य
प्रह्लादजी कहते हैं—द्वारकामें बहुत-से आश्चर्यजनक तीर्थ हैं, जो घोर कलियुग प्राप्त होनेपर समुद्रमें विलीन हो जाते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण पृथ्वीका भार उतारकर और साधु पुरुषोंको सन्मार्गमें स्थापित करके जब बड़े-बूढ़े वृष्णिवंशियोंके साथ द्वारका चले आये, तब उनके दर्शनके लिये सम्पूर्ण देवताओंके साथ इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर, सूर्य तथा चन्द्रमा वहाँ आये और श्रीकृष्णसे मिलकर अपना कार्य सिद्ध कर लेनेके पश्चात् ब्रह्माजीने अपने नामसे वहाँ एक तीर्थ निर्माण किया, जो ब्रह्मकुण्ड कहलाया। वह सब पापोंका नाश करनेवाला तीर्थ है। ब्रह्मकुण्डके तटपर उन्होंने सूर्यनारायणकी स्थापना की। लोकपितामह ब्रह्माजी सम्पूर्ण देवताओंके मूल हैं, अतः उनके द्वारा स्थापित उस तीर्थको मूल स्थान कहते हैं। उस ब्रह्मतीर्थको देखकर चन्द्रमाने भी अपने नामसे एक तड़ाग बनाया, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। उस तेजस्वी तीर्थको देखकर सब देवता बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने लोकस्रष्टा ब्रह्माजीसे कहा—'जो यहाँ स्नान करके पितरोंका तर्पण करेगा तथा जो माघशुक्ला सप्तमीको देवेश्वर मूलस्थानका पूजन करेगा, वह सब पापोंसे मुक्त हो धन-धान्यसे सम्पन्न होगा।'
ब्रह्माजीने उस सरोवरके तटपर एक शिवलिंगको भी स्थापित किया; फिर महाभाग इन्द्रने भी परम सुन्दर सरोवर बनाकर वहाँ इन्द्रेश्वर लिंगकी स्थापना की। वहाँ स्नान करके मनुष्य इन्द्रपद पाता है; अतः वह भूतलपर इन्द्रपदके नामसे प्रसिद्ध है। उसका दर्शन करके मनुष्य सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। अष्टमी और चतुर्दशीको इन्द्रपद तीर्थमें स्नान करके जो इन्द्रेश्वरकी पूजा करता है, वह मोक्ष पाता है। जब सूर्य मकर राशिपर स्थित हों, उस समय उत्तरायणकी संक्रान्तिके अवसरपर तथा विशेषतः शिवरात्रिको पार्वतीसहित इन्द्रेश्वरकी पूजा करके
१३५२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
जो मनुष्य रात्रिमें जागरण करता है, वह उत्तम लोकको पाता है।
ब्रह्मतीर्थ और इन्द्रसरोवरका दर्शन करके भगवान् विष्णुके साथ अपनी एकता दिखाते हुए महादेवजीने भी वहाँ एक तड़ाग बनवाया। अथाह जलवाले उस सरोवरको देखकर पिनाकपाणि शिवजीने ब्रह्मा और विष्णुके सहित उसमें स्नान किया। यह देखकर देवताओंने कहा—'इस महासरोवरका निर्माण महादेवजीने किया है, इसलिये यह महादेवसरोवरके नामसे प्रसिद्ध होगा। जो इसमें भक्तिभावसे स्नान, तर्पण और श्राद्ध करेगा, वह उत्तम गतिको प्राप्त होगा। महादेवसरोवरके दर्शनसे मनुष्य पापमुक्त हो जाता है और भक्तिपूर्वक उसमें स्नान करनेसे उसकी कभी दुर्गति नहीं होती। स्त्री स्नान करे तो वह कभी सौभाग्य और सन्तानसे वंचित नहीं होती। वहीं गौरीसरोवर भी है। उसमें स्नान करके मनुष्य सब कामनाएँ प्राप्त कर लेता है।
वरुणजीने भी भगवान्के प्रति भक्तिभाव रखकर दिव्य सरोवरका निर्माण किया, जो वरुणसरोवरके नामसे विख्यात है। जो उसका दर्शन करता है, उसके सब पापोंका नाश हो जाता। भादोंकी पूर्णिमाको वहाँ तर्पण और श्राद्ध करनेसे मनुष्य उस उत्तम लोकमें जाता है, जहाँ जाकर फिर कभी शोकका अवसर नहीं आता।
भगवान् विष्णुको द्वारकामें पधारे हुए सुनकर ब्रह्मपुत्र मरीचि आदि ऋषि श्रीकृष्णपालित द्वारकापुरीमें आये। उन्होंने द्वारकापुरी और समुद्रमें मिली हुई गोमतीका दर्शन करके वहाँ पंचनदतीर्थको स्थापित किया। उनके आवाहन करनेपर वहाँ पाँच नदियाँ वेगपूर्वक आयीं। मरीचिके लिये गोमती नदी, अत्रिके लिये लक्ष्मणा नदी, अंगिराके लिये चन्द्रभागा, पुलहके लिये कुशावती तथा क्रतुको पवित्र करनेके लिये जाम्बवती नदी आयी। उन यशस्वी ब्रह्मपुत्रोंने उन सबमें स्नान करके उस स्थानका नाम पंचनदतीर्थ रखा, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। स्वर्ग और मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंको वहाँ सदा स्नान करना चाहिये। इन्द्रियसंयमपूर्वक फलसहित अर्घ्यपात्र ले निम्नांकित मन्त्रसे पाँचों नदियोंको अर्घ्य देना चाहिये—
ब्रह्मपुत्रैः समानीताः पञ्चैताः सरितां वराः।
गृह्णं त्वर्घ्यमिमं देव्यः सर्वपापप्रशान्तये॥
'ब्रह्माजीके पुत्रोंद्वारा लायी हुईं ये देवीस्वरूपा पाँचों श्रेष्ठ सरिताएँ सब पापोंकी शान्तिके लिये मेरे दिये हुए इस अर्घ्यको ग्रहण करें।'
इस प्रकार अर्घ्य देकर स्नान करनेके पश्चात् देवताओं और पितरोंका तर्पण तथा श्रद्धापूर्वक विधिवत् श्राद्ध करे। ब्राह्मणोंको पंचरत्न और सप्तधान्य दान करे। तदनन्तर दीनों, अन्धों और कृपणोंको अपनी शक्तिके अनुसार दान दे। ऐसा करनेवाला पुरुष सब कामनाओंको पाता और विष्णुलोकमें जाता है*। लोकमें पुत्र और पौत्रोंसे संयुक्त रहकर वह उत्तम सुख पाता है।
सिद्धेश्वरलिंग, ऋषितीर्थ, गदातीर्थ आदि विविध तीर्थों और देवी-देवताओंके सेवनकी महिमा तथा श्रीकृष्ण-दर्शनका माहात्म्य
प्रह्लादजी कहते हैं—अपने पिता ब्रह्माजीको द्वारकामें आया हुआ सुनकर सनकादि मुनि उन्हें प्रणाम करनेके लिये गये। उनका दर्शन करके सबने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। ब्रह्माजीने उनसे कुशल-समाचार पूछा और प्रसन्न होकर कहा—'पुत्रो! जिसने महादेवजीका पूजन किया है, उसपर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। यदि भगवान् शिवकी पूजा नहीं की जाय तो श्रीहरि अपनी पूजाको ग्रहण नहीं करते। अतः सब प्रकारसे यत्न करके भगवान् शंकरका पूजन
* दीनान्धकृपणानां च दानं दद्यात्स्वशक्तितः। सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोकं स गच्छति॥ (स्क० पु०, द्वा० मा० १४।५५)
* प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३५३
करना चाहिये; जिससे सदा भगवान् विष्णुके लिये की हुई पूजा पूर्णताको प्राप्त हो।'*
ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर योगसिद्ध सनकादि महर्षियोंने शिवलिंग स्थापित किया। उसके पास ही ऋषियोंने एक कूपका निर्माण किया। यह देखकर ब्रह्माजीने कहा—'पुत्रो! तुम योगसिद्ध हो। तुम्हारे द्वारा यह शिवलिंग स्थापित हुआ है, इसलिये इसका नाम सिद्धेश्वर होगा। इसके समीप ही ऋषियोंने जो यह कूप निर्माण किया है, इसकी लोकमें ऋषितीर्थके नामसे प्रसिद्धि होगी। यहाँ श्राद्ध और तर्पण किये बिना ही केवल भक्तिपूर्वक स्नान करनेमात्रसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। असत्यवादी तथा परनिन्दापरायण मनुष्य भी ऋषितीर्थमें स्नानमात्र करके शुद्ध हो जाते हैं। ऋषितीर्थमें स्नान करनेवाले पुरुषके मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। जो ऋषितीर्थमें स्नान करके सिद्धेश्वरजीका दर्शन करता है, वह यदि पुत्रहीन हो तो उसे पुत्र-पौत्र प्राप्त होते हैं। सिद्धेश्वरके दर्शनसे पापका नाश और पुण्यकी वृद्धि होती है। उन्हें प्रणाम करनेवाले मनुष्योंको अभीष्ट मनोरथोंकी प्राप्ति होती है और उनके पितर सन्तुष्ट होते हैं।'
तदनन्तर अति उत्तम गदातीर्थमें जाय, जिसमें विधिपूर्वक स्नान करनेसे अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है। जो वाराहरूपधारी देवेश्वर श्रीविष्णुकी भक्तिपूर्वक पूजा और वन्दना करता है, वह विष्णुलोकमें पूजित होता है।
वहाँसे नागतीर्थमें जाय, जिसमें स्नान करके मनुष्य दिव्य लोकको पाता है। जिस समय समुद्रने द्वारकापुरीको डुबा दिया था, उस समय बहुत-से तीर्थ जल और बालूसे आच्छादित हो गये। उनमेंसे कुछ तो देखे जाते हैं और कुछ अदृश्य हैं। मैं उन सबका संक्षेपसे वर्णन करता हूँ। पापनाशिनी चन्द्रभागामें स्नान करके मनुष्य वाजपेय यज्ञका फल पाता है। वहीं यशोदा और नन्दकी पुत्री देवी चन्द्रार्चिताका स्थान है, जो कुमारी अवस्थामें हैं। उनके हाथोंमें शक्ति, ढाल और तलवार आदि शस्त्र शोभा पाते हैं। वे ही कंस आदि दैत्योंका दलन करनेवाली तथा बलराम और श्रीकृष्णकी बहिन हैं। उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य सब कामनाओंको पा लेता है। कलिकालमें पापनाशक मुक्तिद्वार तीर्थमें स्नान करके मनुष्य गंगास्नानका फल पाता है। जहाँसे गोमती निकलकर समुद्रमें मिली हैं, वहाँ स्नान करके मानव अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। वहीं भृगुजीने तपस्या की और अम्बिकाजीको स्थापित किया। वे देवी भृगु-अर्चिताके नामसे प्रसिद्ध हैं। उनके चिन्तनसे मनुष्य उत्तम सिद्धिको पाते हैं।
जालेश्वरजीका दर्शन करके मनुष्य गहरे पापसे छूट जाता है और भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करके वह शिवलोकको पाता है।
तत्पश्चात् चक्रस्वामीके उत्तम तीर्थमें जाय, जहाँ त्रिभुवनविख्यात जरत्कारुतीर्थ है। उसमें स्नान करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता।
इन सब तीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य यथायोग्य दक्षिणा देनेके पश्चात् परम पुरुष श्रीकृष्णका पूजन करे। पहले जयन्तका और उसके बाद पुलोमपुत्रका पूजन करना चाहिये। इन दोनोंको देवराज इन्द्रने श्रीहरिकी सेवाके लिये नियुक्त कर रखा है। तदनन्तर देवकीनन्दन श्रीकृष्णके समीप जाय। एक मनुष्य निरन्तर प्राणायाम आदिपूर्वक ज्ञान और ध्यानमें तत्पर है और दूसरा केवल देवेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन करता है। उन दोनोंका समान फल है। एक मानव गंगा आदि तीर्थोंमें स्नान करता है और दूसरा देवेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन; उन दोनोंको समान फलकी प्राप्ति होती है।
* येनार्चितो महादेवस्तस्य तुष्यति केशवः। अनर्चिते नीलकण्ठे न गृह्णात्यर्चनं हरिः॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पूज्यतां नीललोहितः। येन सम्पूर्णातां याति कृष्णपूजा कृता सदा॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० १५।४-५)
१३५४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
श्रीकृष्ण तथा रुक्मिणीदेवीके दर्शन और पूजनकी महिमा
**प्रह्लादजी कहते हैं—**द्वारकापुरीमें जाकर मधुसूदन श्रीविष्णुकी अवश्य पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् सुगन्ध लेप, चन्दन, वस्त्र, पुष्प, नैवेद्य, आभूषण, ताम्बूल, फल तथा आरती आदि उपचारोंसे भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करके उन्हें साष्टांग प्रणाम करे। घीका दीपक जलाकर अर्पण करे। रात्रिमें जागरण, गाने, बजाने तथा पुस्तक-पाठ करे। भादोंकी अष्टमी और द्वादशीको भी श्रीहरिका पूजन करना चाहिये। कलियुगमें गोमती और समुद्रके संगममें स्नान और श्रीकृष्णपूजन करके मनुष्य निर्मल लोकमें जाता है, जहाँ पहुँचकर फिर कभी शोकका सामना नहीं करना पड़ता।
विधिपूर्वक श्रीकृष्णकी पूजा करनेके अनन्तर मनुष्य रुक्मिणीजीके समीप जाय और दही, दूध, मधु, घी तथा शक्करसे उन्हें स्नान करावे। फिर गन्ध और फूलोंसे पूजा करे। जो तीर्थके जलसे स्नान कराता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जो इस प्रकार श्रीकृष्णप्रिया रुक्मिणीदेवीको नहलाता है, उसके लिये इहलोक और परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है। जो चन्दन, रोली तथा कस्तूरीका लेप लगाता है, वह कभी पुत्रहीनता और निर्धनताका कष्ट नहीं देखता। वह सदा भोग-सामग्रियोंसे सम्पन्न, रूपवान् तथा जनसम्मानित होता है। जो चमेली, सुगन्धित कमल, कनेर, बेला, तुलसी, राजचम्पा, जलमें होनेवाले फूल, केतकी तथा पाटल (गुलाब) आदि फूलोंसे, धूप, अगरु तथा गुग्गुलसे, सुन्दर एवं कोमल वस्त्रोंसे भक्तिपूर्वक कृष्णप्रिया रुक्मिणीकी पूजा करता है और मणि एवं रत्नोंके आभूषणोंसे उनका श्रृंगार करता है, उसके कुलमें कोई दुःखी, अधर्मी, निर्धन, पुत्रहीन, पापकमीं, धूर्त तथा नीचसेवी नहीं होता। कलियुगमें मनुष्योंको जगन्माता रुक्मिणीदेवीका भक्ष्य-भोज्य आदि नैवेद्योंके द्वारा पूजन करना चाहिये। 'देवी मे प्रीयताम्—रुक्मिणीदेवी मुझपर प्रसन्न हों' यही पूजनका उद्देश्य होना चाहिये। भक्तिभावसे रुक्मिणीजीको कर्पूरयुक्त ताम्बूल निवेदन करे। अक्षतोंके साथ दिव्य फल लेकर निम्नांकित मन्त्रसे विधिपूर्वक अर्घ्य दे—
कृष्णप्रिये नमस्तुभ्यं विदर्भाधिपनन्दिनि।
सर्वकामप्रदे देवि गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥
'विदर्भराजकुमारी! कृष्णप्रिया रुक्मिणीदेवी! तुम्हें नमस्कार है। तुम सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाली हो। मेरा यह अर्घ्य स्वीकार करो। तुम्हें नमस्कार है।'
इस प्रकार अर्घ्य देकर प्रज्वलित दीपकसहित आरती करे। विशेषतः कर्पूर जलाकर देवीकी नीराजना करे। शंखमें जल लेकर भावपूर्वक देवीके ऊपर घुमावे और फिर आत्मशुद्धिके लिये सिरपर धारण करे। तत्पश्चात् 'नमः कृष्णप्रिये'— ऐसा कहते हुए पृथ्वीपर लोटकर साष्टांग प्रणाम करे। जो कलियुगमें श्रीकृष्णपुरी द्वारकामें जाकर उनकी प्रिया रुक्मिणीदेवीका दर्शन करता है, वह इस लोक और परलोकमें सब कामनाओंको पाता है। माघ शुक्ला अष्टमीको जो चन्दन, पुष्प तथा अनेक प्रकारके उपहारोंसे कामदेवकी जननी रुक्मिणीदेवीका पूजन करते हैं, उनका जीवन सफल है, उनके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। जो चैत्र और वैशाखमें द्वादशी तिथिको कृष्णसहित रुक्मिणीदेवीका दर्शन करते हैं, वे मानव धन्य हैं। उन्हें श्रीकृष्णके साथ उनके धाममें रहनेका सौभाग्य प्राप्त होता है। जिन मानवोंने भाद्रपदमासमें सदा ही श्रीकृष्ण और रुक्मिणीका पूजन किया है, वे सब पापोंसे मुक्त हो वैकुण्ठ-धाममें जाते हैं। जो कार्तिक शुक्ला द्वादशीको श्रीकृष्णसहित रुक्मिणीका दर्शन करता है, उसका जीवन सफल हो जाता है और सन्तान-परम्पराका कभी नाश नहीं होता।
**सूतजी कहते हैं—**बलिको बाँधनेवाले भगवान्
| * प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * | १३५५ |
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विष्णुने इस पुराणसंहिताका संकलन किया है। उन्होंने कृपापूर्वक महात्मा प्रह्लादको इसका उपदेश किया। दैत्यराज प्रह्लादने ऋषियोंके पूछनेपर उनसे इसका वर्णन किया। जो मानव भक्तिपूर्वक इसको सुनता अथवा पढ़ता है, वह सम्पूर्ण मनोरथोंको पाता और विष्णुलोकमें जाता है। इस विषयमें महात्मा मार्कण्डेय तथा राजा इन्द्रद्युम्नका संवाद भी हुआ है, जिसे बताया जाता है।
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द्वारकापुरी तथा वहाँ श्रीकृष्णके दर्शन-पूजनका माहात्म्य तथा तुलसीकी महिमा
मार्कण्डेयजी बोले—इन्द्रद्युम्न! कलियुगमें जो मानव श्रीकृष्णका माहात्म्य सुनते और पढ़ते हैं, उनका यमलोकमें निवास नहीं होता। जिन्हें सदा श्रीकृष्णकी कथा प्राणोंसे भी प्रिय है, उसके लिये इस लोक और परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है। कलियुगमें यदि चाण्डाल भी द्वारकापुरीमें निवास करता है, तो वह यतियोंकी गति पाता है। जो द्वारकापुरीकी यात्रा करता है, उसे मार्गमें प्रतिदिन कुरुक्षेत्र-सेवनका फल प्राप्त होता है। कलियुगमें जिनकी बुद्धि द्वारकाकी यात्रा और श्रीकृष्णका दर्शन करनेमें संलग्न होती है, वे मानव धन्य हैं और उनका वह मनोरथ भी धन्य है। जिन्होंने कोटि अयुत पापोंका नाश करनेवाले श्रीकृष्ण-मुखारविन्दका दर्शन किया है, वे धन्य हैं, कृतकृत्य हैं, वन्दनीय हैं और सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाले हैं। जो मानव श्रीकृष्णके मस्तकपर दूधसे स्नान कराते हैं, उन्हें सौ अश्वमेध यज्ञोंका पुण्य प्राप्त होता है। जो मनुष्य निष्कामभावसे श्रीकृष्णको स्नान कराता है, वह मोक्ष पाता है। जो स्नानसे भीगे हुए श्रीकृष्णविग्रहको वस्त्रसे पोंछता है, उसका जन्मभरका पाप नष्ट हो जाता है। जो जगदीश्वर श्रीकृष्णको स्नान कराकर उन्हें फूलोंकी माला पहनाता है, जो उनके स्नानकालमें शंख बजाता है, अथवा सहस्रनामोंका पाठ करता है, उसे एक-एक अक्षरपर कपिला गौके दानका फल प्राप्त होता है। गीता, गजेन्द्रमोक्ष, भीष्मस्तवराज तथा महर्षियोंद्वारा रचित अन्यान्य स्तोत्रोंके पाठका भी यही फल है। भगवान् उनके समीप आते और उनकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करते हैं। जो श्रीकृष्णके स्नानकालमें नृत्य और गान करता है, ताली बजाता और जय-जयकार करता है, वह योनि-यन्त्रसे निकलनेकी (जन्म लेनेकी) पीड़ासे छुटकारा पा जाता है। जो मानव कलियुगमें श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन करता है, वह पितरोंसहित वैकुण्ठधाममें निवास करता है। जो भाँति-भाँतिके कोमल वस्त्रोंसे पूजा करके माधवको धूप निवेदन करता है, वह विष्णुधाममें निवास करता है। जो भक्तिपूर्वक सुवर्ण, रत्न एवं मणियोंके आभूषणोंसे श्रीकृष्णका शृंगार करते हैं, उन्हें वह उत्तम फल प्राप्त होता है, जो इन्द्र, शिव, ब्रह्मा तथा मुनियोंको भी ज्ञात नहीं। जो मानव कोमल तुलसीदलोंसे और शुद्ध वस्त्रोंसे देवकीनन्दन श्रीकृष्णकी पूजा करता है, उसे यज्ञकर्ताओं, दानवीरों, तीर्थसेवियों, मातृभक्तों तथा वेधरहित द्वादशी तिथिको भगवान् विष्णुके आगे जागरण, नृत्य, गान और वैष्णवशास्त्रका पाठ करनेवाले भक्तोंको प्राप्त होनेवाला फल मिलता है। तुलसीमालासे पूजित होकर रुक्मिणीवल्लभ श्रीकृष्ण पूर्वोक्त सभी फल प्रदान करते हैं। जैसे लक्ष्मी भगवान् विष्णुको प्रिय हैं, उसी प्रकार उनसे भी अधिक तुलसी उन्हें प्रिय हैं। कलियुगमें जहाँ-कहीं भी तुलसीकी मालासे भगवान् विष्णुका पूजन होता है, वहाँ द्वारकाका समग्र पुण्य प्राप्त होता है। 'श्रीकृष्ण शरणं मम' (श्रीकृष्ण मेरे आश्रय हैं) यह आठ अक्षरोंवाला मन्त्र श्रीकृष्णकी कृपा प्राप्त करानेवाला है। जो कलियुगमें कपूरसहित
१३५६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
काले अगुरुसे श्रीकृष्णको धूप देते हैं, वे श्रीकृष्णका सारूप्य प्राप्त करते हैं। घी, गुग्गुल तथा सुगन्धित पदार्थके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णको धूप देकर मनुष्य सदा कल्याणमय पदको प्राप्त होता है। जो श्रीकृष्णको अगुरु धूप देता है, वह सब पातकोंका त्याग करके अत्यन्त सुन्दर रूप पाता है। जो श्रीकृष्णमन्दिरके द्वारपर प्रतिदिन दीपमाला जगाता है, वह सातों द्वीपोंसे युक्त पृथ्वीका सम्राट् होता है। जो श्रीकृष्णके आगे सुगन्धित नैवेद्य निवेदन करता है, उसके पितर कल्पपर्यन्त नित्य तृप्त रहते हैं। जो कपूर और सुपारीके साथ ताम्बूल निवेदन करता है, उसे देवपदकी प्राप्ति होती है। जो भगवान् श्रीकृष्णके आगे जलसे भरा हुआ कलश और कमण्डलु निवेदन करता है, उसके पितर एक कल्पतक जल पीनेकी इच्छा नहीं रखते। जो भगवान् श्रीकृष्णको मनोहर फल भेंट करता है, उसके उत्तम मनोरथ कल्पपर्यन्त सफल होते रहते हैं। जो देवदेव श्रीकृष्णकी परिक्रमा करता है, उसके कुलमें किसीको यमलोकका दण्ड नहीं भोगना पड़ता। जो श्रीकृष्णके मन्दिरमें सुन्दर पुष्प-मण्डप बनाता है, वह कोटि-कोटि पुष्पक विमानोंद्वारा दिव्यलोकमें क्रीड़ा करता है। जो श्वेत चँवरकी हवा देकर श्रीकृष्णको प्रसन्न करता है, देवेश्वर श्रीकृष्ण उसके मस्तकको अपने मुँहसे चूमते हैं। जो श्रीकृष्णके मन्दिरको केलेके खंभोंसे सुशोभित करता है, उसका स्वागत देवराज स्वयं करते हैं। जो मनुष्य श्रीकृष्ण-मन्दिरको ध्वजा-पताकाओंसे सजाता है, वह सदा सूर्यलोकमें निवास करता है। जो श्रीकृष्ण-मन्दिरके ऊपर ध्वजारोपण करता है, उसका ब्रह्मलोकमें निवास होता है। जो देवदेव श्रीकृष्णके आँगनको स्वस्तिकोंसे विभूषित करता है, वह तीनों लोकोंमें क्रीड़ा करता है। जो मानव शंखमें जल लेकर भगवान् श्रीकृष्णके ऊपर घुमाता है, वह पूरे कल्पभर क्षीरसागरमें भगवान् विष्णुके समीप निवास करता है। जो विष्णुसहस्रनाम अथवा अन्य स्तोत्रोंका पाठ करते हुए भगवान् श्रीकृष्णकी परिक्रमा करता है, उसे पग-पगपर सातों द्वीपोंवाली पृथ्वीकी परिक्रमाका पुण्य प्राप्त होता है। जो उन्हें साष्टांग प्रणाम करता है, उसे दस हजार अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। जो मीठे स्वरवाले उत्तम गीतोंसे भगवान् श्रीकृष्णको सन्तुष्ट करता है, उसे सामवेदके पाठका फल प्राप्त होता है। जो प्रसन्नचित्त होकर भक्तिभावसे श्रीकृष्णके सम्मुख नृत्य करता है, वह अपने समस्त पापोंको भस्म कर देता है। जो श्रीकृष्णके समीप आकर भक्तिभावसे स्वस्तिवाचन करता है, उसे एक-एक अक्षरमें सौ कपिला-दानका पुण्य मिलता है। जो ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदकी वाणीसे श्रीकृष्णको सन्तुष्ट करते हैं, उन्हें ब्रह्मलोकका निवास प्राप्त होता है। जो योगी पुरुष श्रीकृष्णके समीप योग-शास्त्र और वेदान्तका पाठ करते हैं, वे सूर्यमण्डलको भेदकर भगवान् विष्णुके धाममें जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता, विष्णुसहस्रनाम, भीष्मस्तवराज, अनुस्मृति और गजेन्द्रमोक्ष—ये पाँचों स्तोत्र श्रीकृष्णको अत्यन्त दुर्लभ प्रतीत होते हैं—बहुत प्रिय लगते हैं*। श्रीकृष्णके समीप जो श्रीमद्भागवतका पाठ करता है, वह योगियोंके साथ क्रीड़ा करता है। जो वहाँ रामायण, महाभारत और पुराणोंका पाठ करता है, उसे मोक्ष प्राप्त होता है। जो गोमतीके जलमें स्नान करके पवित्र हो श्रीकृष्णके मुखारविन्दका दर्शन करते हैं, उनके दर्शनसे सौ वर्षोंका पातक नष्ट हो जाता है। संसारमें वे मनुष्य धन्य हैं, जो कलियुगमें द्वारकापुरी जाकर गोमती और समुद्रके संगममें देवताओं और पितरोंका तर्पण करते हैं;
* योगशास्त्राणि वेदान्तान् योगिनः कृष्णसन्निधौ। पठन्ति रविबिम्बं तु भित्त्वा यान्ति लयं हरेः॥
गीता नामसहस्रं तु स्तवराजस्त्वनुस्मृतिः। गजेन्द्रमोक्षणं चापि कृष्णस्यातीव दुर्लभम्॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० २३। ७९-८०)
* प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३५७
वे हरिद्वार, प्रयाग, गया, कुरुक्षेत्र, पुष्कर, प्रभास, श्रीस्थल और शुक्लतीर्थके सेवनका तथा सहस्रों चान्द्रायणव्रतका फल पाते हैं। द्वारकापुरी धन्य है, जहाँ गोमती नदी बहती है और जहाँ रुक्मिणीवल्लभ श्रीकृष्ण निवास करते हैं। जो कलिकालमें पापसे मोहित होकर गोमतीके जलमें स्नान नहीं करते, उनके पापबन्धनका नाश कैसे होगा। श्रीकृष्णने कलिकालके लिये गोमती नदीको स्वर्गलोककी सीढ़ी बनाया है। वह मनुष्योंके मनको आनन्द देनेवाली तथा स्नानमात्रसे मोक्ष प्रदान करनेवाली है। राजन्! जहाँ गोमतीके जलसे मिला हुआ समुद्र जाग रहा है, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण विराजमान हैं और जहाँ पूजन करनेपर मोक्ष देनेवाली चक्रांकित शिलाएँ उपलब्ध होती हैं, वहाँ चलो। जहाँकी मिट्टी भी चक्रसे चिह्नित होकर कलियुगमें पापका नाश करनेके लिये स्थित है, जो पुरी दैत्य, दानव, राक्षस तथा देवताओंको भी शरण देनेवाली है, जिसे देवकीनन्दन श्रीकृष्ण कलिकालमें कभी नहीं छोड़ते हैं, उस द्वारकापुरीका कौन सेवन नहीं करेगा? जो मनुष्य द्वारकामें श्रीकृष्णचन्द्रजीके मुखारविन्दका तीनों समय दर्शन करते हैं, उनकी करोड़ों कल्पोंमें भी पुनरावृत्ति नहीं होती। जो विधवा स्त्री द्वारकामें निवास करती है, वह परम पदको प्राप्त होती है। जो द्वारकापुरीको नहीं गया, वह इस संसारमें पुत्र लेकर भी क्या करेगा?
श्रीकृष्णकी द्वारकापुरीमें जाकर जो तुलसीदलोंसे उनकी पूजा करता है, उसने जन्मका फल पा लिया और पितरोंको तार दिया। जो श्रीकृष्णके श्रीविग्रहसे उतारी हुई प्रसाद-स्वरूपा तुलसीमाला धारण करता है, वह एक-एक पत्तेमें दस अश्वमेध यज्ञोंका फल पाता है। जिसके मस्तकपर तुलसीके काष्ठकी माला शोभा देती है, उस मानवके शरीरमें साक्षात् श्रीहरि विराजमान होते हैं। जो कलियुगमें तुलसीकाष्ठमालासे विभूषित होकर पुण्यकर्म करता है तथा देवताओं और पितरोंका पूजन करता है उसका वह सत्कर्म कोटिगुना हो जाता है। तुलसीकाष्ठकी माला देखकर यमराजके दूत दूर भागते हैं, जैसे आँधीसे उड़ाये हुए पत्ते दूर हो जाते हैं। जिसके घरमें तुलसीका काष्ठ तथा उसकी सूखी या हरी पत्ती रहती है, उसके घरमें कहींसे पापका संक्रमण नहीं होता। जो तुलसीमालासे भूषित होता है, उसके हृदयमें भगवान् श्रीकृष्णके प्रति अविचल भक्ति होती है तथा उसे इहलोक और परलोकमें भय नहीं प्राप्त होते। उसके दुःस्वप्न, अपशकुन और शत्रुभयका निवारण हो जाता है। बोधिनी, शयनी, त्रिस्पृशा तथा पक्षवर्द्धिनी एकादशी अवश्य करनी चाहिये। अष्टमीके भी जयन्ती, विजया और जया आदि कई भेद हैं। वह सब पापोंका नाश करनेवाली तथा श्रीकृष्णको अत्यन्त प्रिय है।
शंखोद्धारतीर्थकी महिमा
मार्कण्डेयजी कहते हैं—महाभारतमें कौरवसेनाके मारे जाने और समस्त योद्धाओंके नष्ट हो जानेपर अर्जुन भक्तिभावसे श्रीकृष्णके समीप गये और उनकी परिक्रमा तथा प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले—'भगवन्! शंखोद्धारतीर्थका फल बताइये।'
श्रीभगवान् बोले—महाबाहो! जो मनुष्य घरमें रहकर भी शंखोद्धारतीर्थका स्मरण करते हैं, उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती। जो शंखोद्धारतीर्थमें जाकर मन-ही-मन भगवान् शंखधरका स्मरण करते हैं, वे विष्णुलोकमें निवास पाते हैं। जो शंखोद्धारतीर्थका दर्शन करता है, वह स्वर्गलोकको जाता है। अर्जुन! यदि शंखोद्धारकी यात्रा करनेवाला मनुष्य मार्गमें ही मर जाय और शंखोद्धारका दर्शन न कर सके तो वह भी मुझे वैसा ही प्रिय
१३५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
है, जैसी कि लक्ष्मी हैं। मनुष्यको अपने घरमें रहते हुए भी शंखोद्धारतीर्थ और शंखधारी भगवान् विष्णुका स्मरण करना चाहिये। करोड़ों सूर्यग्रहणोंके समय सरस्वतीतीर्थमें जो फल होता है, वही आधे पलमें शंखोद्धारतीर्थके दर्शनसे हो जाता है। जो मनुष्य शंखोद्धारतीर्थमें स्नान करके शंखधारी श्रीहरिका दर्शन करता है, उसके पुण्यकी कोई संख्या नहीं है। मनुष्य तभीतक संसारमें तथा पापपूर्ण नरकमें भटकते हैं जबतक कलिमलनाशक शंखोद्धार-तीर्थका दर्शन नहीं करते। शंखोधारतीर्थमें स्नान करके मनुष्य फिर जन्म नहीं लेता। शंखोद्धारतीर्थके समान मोक्षदायक तीर्थ प्रायः नहीं देखा जाता। साढ़े तीन करोड़ तीर्थ कहे गये हैं। शंखोद्धारमें उन सभी तीर्थोंका फल प्राप्त होता है। जिसका मन श्रीकृष्णमें नहीं लगता है और जो शंखोद्धारतीर्थका दर्शन नहीं करता है, उसके स्वर्गवासी पितर भी उसे भयंकर शाप देते हैं। जो शंखोद्धारतीर्थमें रहकर अन्नदान करता है, उसने रुक्मिणीपतिकी प्रसन्नतासे स्वयं ही मुक्ति प्राप्त कर ली। अन्नदानके समान दूसरा कोई दान न हुआ है न होगा। इसलिये प्रयत्नपूर्वक अन्नदान करना चाहिये।
कुन्तीनन्दन! जो तुलसीदलसे मेरी पूजा करता है, उससे इन्द्रदेव भी भयभीत होते हैं। जो किसी भी कारणसे श्रीकृष्णका एकादशी व्रत कर लेते हैं, वे धन्य हैं। मृत्युके पश्चात् उन्हें चतुर्भुज भगवान् विष्णु प्राप्त होते हैं। द्वारका समुद्रके जलमें सब ओरसे दुर्जय है और उसके मध्यभागमें पापनाशक शंखदेव निवास करते हैं। जो मनुष्य शंखोद्धारमें स्नान करके विधिपूर्वक श्राद्ध करते हैं, वे अपने पितरोंका उद्धार करके उत्तम लोकको जाते हैं। भगवान् शंखधारीको नमस्कार और उनका पूजन करके मानव उस निर्मल लोकमें जाता है, जहाँ शोकका अत्यन्त अभाव है। भगवान् शंखधरका दर्शन करके मरणधर्मा मनुष्य अनेक जन्मोंके घोर पापोंसे मुक्त तथा कृतकृत्य हो जाता है। भगवान् शंख उसे मनोवांछित फल देते हैं।
द्वारकापुरी, गोपीचन्दन तथा गोमतीका माहात्म्य
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! कलिकालमें मथुरा, द्वारका और अयोध्या—ये तीन पुरियाँ भगवान्को अत्यन्त प्रिय तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देनेवाली हैं। मथुरामें यमुना, द्वारकामें गोमती तथा अयोध्यामें सरयू नदी है, जो सेवन करनेपर मोक्षदायिनी होती है। अयोध्यामें श्रीहरिका, द्वारकामें श्रीकृष्णका और मथुरामें केशवका स्मरण करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है। संसारमें मथुरापुरी धन्य है, जहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु प्रकट हुए हैं। द्वारकापुरी सफल है, जहाँ रहकर श्रीहरिने अनेक प्रकारकी लीलाएँ की हैं और सब कामनाओंको देनेवाली अयोध्यापुरी धन्यातिधन्य है, जिसका स्वयं धर्मज्ञ भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने पालन किया है। अयोध्याके स्वामी भगवान् श्रीरामका, मथुरावासी केशवका तथा द्वारकानिवासी परम सुन्दर श्रीकृष्णका प्रेमसे कीर्तन करे। कीर्तन करनेसे मथुरा, स्मरण करनेसे द्वारकापुरी और यात्रा करनेसे अयोध्यापुरी पुण्यदायिनी होती है। इन तीनोंके द्वारा विशुद्ध पदकी प्राप्ति होती है। श्रीकृष्ण, ब्रह्माजी, श्रीविष्णु तथा द्वारकापुरीका श्रवण अथवा दर्शन करके मनुष्य जन्मके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। अयोध्या, मथुरा और द्वारकापुरी श्रवण अथवा दर्शनकी अभिलाषा करनेपर कल्पभरके पापका नाश कर देती है। कलियुगमें जो श्रीकृष्ण, विष्णु और हरिका स्मरण करता तथा द्वादशीको रातमें भगवान्के समीप जागता है, उसे दस हजार अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। कलिकालमें वे मनुष्य धन्य हैं, जो सरयू, गोमती
- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * । १३५९
और यमुनाके जलमें स्नान करते हैं। जो पश्चिम दिशाकी ओर मुँह करके स्नान करते और दोनों हाथ जोड़कर द्वारकापुरीका स्मरण करते हैं, उन्हें कोटिगुना फल होता है। कलियुगमें जो मानव द्वारकापुरीका चिन्तन करते हैं वे दस हजार कपिला गौओंके दानका पुण्य पाते हैं। राजन्! मैं मार्कण्डेय सात कल्पकी बातोंका स्मरण करनेवाला हूँ। कलियुगमें द्वारकापुरीके समान अथवा इससे बढ़कर दूसरी कोई पुरी नहीं है। कलियुगमें जो मनुष्य द्वारकापुरीको जाता है, वह पग-पगपर एक हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञोंका फल पाता है। नृपश्रेष्ठ! कलियुगमें द्वारकाकी यात्रा करते हुए जिन मनुष्योंका चित्त विचलित नहीं होता, उनका जीवन सफल है। जिसने गोमतीके तटपर भगवान् श्रीकृष्णके समीप पिण्डान किया है, उसी पुत्रसे माता पुत्रवती है और पितर पुत्रवान् है। गोपीचन्दनका तिलक करके मनुष्य यदि इस पृथ्वीपर भ्रमण करता है, तो उससे वह समूचा देश पवित्र हो जाता है। फिर जहाँ वह स्वयं स्थित है, उसके लिये तो कहना ही क्या है। जो द्वारकामें उत्पन्न हुई श्रीकृष्णसेवित तुलसीको अपने मस्तकपर धारण करता है, वह स्वर्गलोकका स्वामी होता है। भगवान् विष्णुको विजया एकादशी तिथि, गंगाजल, काशीपुरी, तुलसी, आँवलेका फल, भागवत शास्त्र, रामायण, द्वारकापुरी, चमेलीका फूल, एकादशीकी रातमें जागरण तथा कीर्तन और गायन—ये अधिक प्रिय हैं।* कलिकालमें जिसके घरमें सदा गोपीचन्दनकी मृत्तिका विद्यमान है वहाँ श्रीकृष्णसहित द्वारकापुरी स्थित है। कृतघ्न, गोघाती तथा समस्त पापोंका आचरण करनेवाला मनुष्य भी गोपीचन्दनके सम्पर्कसे तत्काल पवित्र हो जाता है। जो किसी वैष्णवको गोपीचन्दनका एक टुकड़ा देता है, वह अपने कुलका उद्धार करता है। जिसके मन्दिरमें द्वारकाकी तुलसी है, उससे यमराज भी डरते हैं। द्वारकाकी मृत्तिका, तुलसी तथा श्रीकृष्णका कीर्तन सौ करोड़ यज्ञोंसे भी अधिक पुण्यदायक बताया गया है। मैंने सब शास्त्रों और पुराणोंका बार-बार अवलोकन करके देख लिया, मुझे द्वारकाके समान दूसरी कोई पुरी नहीं दिखायी दी। जिसने द्वारकाकी यात्रा और श्रीकृष्णका कीर्तन किया है, उसने हजारों तीर्थोंमें स्नान और करोड़ों यज्ञोंका यजन कर लिया है। जिन मनुष्योंने द्वारकापुरीमें जाकर श्रीकृष्णके मुखारविन्दका दर्शन नहीं किया, वे मानव पंगु हैं, जन्मके ही अन्धे हैं। जिन्होंने द्वारकापुरीमें जाकर एकादशीकी रात्रिमें भक्तिपूर्वक जागरण और नृत्य किया है, वे कृतार्थ और धन्य हैं। जो श्रीकृष्णपुरी द्वारकामें जाकर गोमतीके तटपर पिण्डदान और यथाशक्ति दान करता है, उसके पितर तृप्त हो जाते हैं। जो द्वारकापुरीमें गया है, उस मनुष्यको सौ जन्मोंतक प्रेत और पिशाचकी योनि नहीं मिलती। जो मनुष्य वैशाखमासमें हिंडोलेपर बैठे हुए श्रीकृष्णका दर्शन करते हैं, उनके पुत्र, पौत्र, प्रपितामह, श्वशुर, दास, भृत्य और पशु भी भगवान् विष्णुके साथ क्रीड़ा करते हैं। जो मानव कलिकालमें श्रीकृष्णके समीप द्वादशीको उपवास करते हैं, उनमें तथा श्रीकृष्णमें मैं कोई अन्तर नहीं देखता। श्रीकृष्णके समीप द्वादशी तिथिके समान कोई दिन नहीं है। श्रीकृष्णके निकट सभी तिथियाँ युगादि तिथियोंके समान पुण्यदायिनी होती हैं। कलियुगमें अधिक पुण्यात्मा पुरुषोंको द्वारकापुरीका सेवन करना चाहिये। कलिमें श्रीकृष्णकी कृपाके बिना कोई द्वारकापुरीमें नहीं जा सकता। श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये शिव आदि देवता सदा द्वारकापुरी जाते हैं। जो 'कृष्ण-कृष्ण' का कीर्तन करता है,
* दैत्यारेर्भगवत्तिथिश्च विजया नीरं च गाङ्गोद्भवं नित्यं काशिपुरी तथैव तुलसी धात्रीफलं वल्लभम्।
शास्त्रं भागवतं तथा च दयितं रामायणं द्वारका पुष्पं मालतिसम्भवं सुदयितं गीतं कृतं जागरम्॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० २७। २८)