भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1373
१३४४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

महात्माओंके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने भगवान्‌को अर्घ्य दे गोमतीके जलसे उनके चरण पखारे और उन चरणोंको मस्तकपर धारण किया। इस प्रकार श्रीहरिके चरणोंका प्रक्षालन करके महाभयहारिणी गोमती महासागरमें मिल गयीं। तदनन्तर सनकादि महात्माओंको अभीष्ट वरदान दे श्रीहरि वहीं अन्तर्धान हो गये और ब्रह्मपुत्र सनकादि एकाग्रचित्त हो उसी तीर्थमें रहने लगे। इस प्रकार वहाँ गोमतीका प्रादुर्भाव हुआ और वह समुद्रमें जा मिली। पहले जिनका नाम गंगा सुना गया था, वे ही द्वारकामें सागरगामिनी गोमती कहलायीं।


### गोमतीमें स्नान और भगवत्पूजनकी महिमा

**ऋषि बोले—** दैत्यप्रवर महाभाग प्रह्लादजी! आपको अनेकशः धन्यवाद है; क्योंकि आपने इस कलियुगमें हमें भगवान् श्रीहरिका दर्शन कराया है। जहाँ गोमती नदी बहती है, उस स्थानपर हमें अवश्य जाना चाहिये; क्योंकि वहाँ भगवान् श्रीहरि चक्रतीर्थका निरीक्षण करते हुए सदा निवास करते हैं। महामते! अब गोमतीमें स्नान तथा भगवान् श्रीकृष्णके पूजनकी विधिका वर्णन कीजिये।

**प्रह्लादजीने कहा—** गोमतीके तटपर जाकर पहले उसे साष्टांग प्रणाम करे; फिर हाथ-पैर धोकर दोनों हाथोंमें कुशा ले तथा अक्षत और फल आदि संग्रह करके संयमपूर्वक पूर्वाभिमुख होकर बैठे और विधिवत् अर्घ्य दे। अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है—

> ब्रह्मलोकात्समायाते वशिष्ठतनये शुभे।  
> सर्वपापविशुद्ध्यर्थं ददाम्यर्घ्यं च गोमति॥  
> वशिष्ठदुहितर्देवि शक्तिज्येष्ठे यशस्विनि।  
> त्रैलोक्यवन्दिते देवि पापं मे हर गोमति॥  

'ब्रह्मलोकसे आयी हुई वसिष्ठकी पुत्री गोमती! मैं तुम्हें सब पापोंसे शुद्ध होनेके लिये अर्घ्य देता हूँ। वसिष्ठतनये! तुम्हारी शक्ति बहुत बड़ी है। सुयशसे सुशोभित होनेवाली त्रिभुवनवन्दिता गोमती देवी! मेरे पाप हर लो।'

इस मन्त्रका उच्चारण करके हाथमें मिट्टी लेकर मन-ही-मन भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करे—

> अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे।  
> उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना॥  
> मृत्तिके हर मे पापं यन्मया पूर्वसञ्चितम्।  
> त्वया हतेन पापेन सर्वपापैः प्रमुच्यते॥  

'अश्व, रथ तथा भगवान् विष्णुके द्वारा आक्रान्त होनेवाली वसुन्धरे! तुम्हें सैकड़ों भुजाओंवाले वराहरूपधारी भगवान् विष्णुने जलके ऊपर उठाया है। मृत्तिके! मेरे पूर्वसंचित पाप हर लो। तुम्हारे द्वारा पापके नष्ट कर दिये जानेपर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।'

ऐसा कहकर उस मृत्तिकाको सब अंगोंमें लगावे और विधिपूर्वक स्नान करे। स्नानके समय **'आपो अस्मान्०'** इत्यादि वैदिक मन्त्रका भी उच्चारण करना चाहिये। सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमें स्नान करनेसे जो पुण्य होता है, वही श्रीकृष्णके समीप गोमतीमें स्नान करनेमात्रसे प्राप्त हो जाता है। अतः उत्तम भक्तिभावसे गोमतीमें स्नान करके यथोचित कर्म करे। देवताओं, पितरों और मनुष्योंका तर्पण करे। जो रौरव नरकमें स्थित हैं अथवा कीटयोनिमें पड़े हैं, वे सब पितर गोमतीका जल देनेसे निस्सन्देह मुक्त हो जाते हैं। अक्षत और कुशके बिना ही बिना भावनाके भी गोमतीका जलमात्र अर्पण करनेसे गया-श्राद्धका फल होता है।

इस प्रकार तर्पण करनेके पश्चात् तीर्थवासी वेदज्ञ ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे और विश्वेदेव आदिके पूजनपूर्वक पितरोंका श्राद्ध करे। सुवर्ण