भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1372, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1372
  • प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३४३

तुम्हें नमस्कार है। चक्ररूप! तुम्हें बार-बार नमस्कार है।'

इस प्रकार स्तुति करके उन्होंने फूल और अक्षत आदिसे भगवान्के प्रिय आयुध सुदर्शनका पूजन और प्रणाम किया। तत्पश्चात् भगवान्के दर्शनके लिये उत्सुक होकर सनकादिकोंने मन-ही-मन अपने पिता ब्रह्माजीका स्मरण किया। उनका अभिप्राय जानकर ब्रह्माजीने गंगाजीसे कहा—'सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगे! तुम भगवान्की सेवाके लिये भूतलपर जाओ। 'गो' अर्थात् इस दिव्य लोकमें तुम मुझे विशेष अभिमत हो, इसलिये पृथ्वीपर तुम्हारा नाम गोमती होगा। जैसे पिताके साथ पुत्री जाती है, उसी प्रकार तुम वसिष्ठजीके पीछे-पीछे पृथ्वीपर जाओ और वसिष्ठजीकी पुत्री होकर रहो।' 'बहुत अच्छा' कहकर गंगादेवी पश्चिम समुद्रकी ओर चलीं। आगे-आगे वसिष्ठजी और पीछे-पीछे गंगा। वसिष्ठजीके साथ गंगाजीको पश्चिम समुद्रकी ओर जाती देख सब लोगोंने नमस्कार किया। जहाँ सनकादि मुनि थे, वहीं गंगाजी प्रकट हुईं। उन महाभाग मुनियोंने दिव्य सुगन्धित माला, चन्दन, धूप आदिसे उनकी पूजा करके उनके ऊपर अक्षत और फूल बिखेरे। भगवान्के लक्ष्मीसेवित चतुर्भुजरूपका दर्शन करनेकी इच्छावाली सर्वलोकपावनी महाभागा गंगाजीकी उन सबने बड़ी प्रशंसा की और साधुवाद दिया। वसिष्ठजीको देखकर सब ब्राह्मण उठकर खड़े हो गये और बोले—'महर्षे! आप इस श्रेष्ठ नदीको यहाँ ले आये हैं, इसलिये यह लोकमें आपकी पुत्रीरूपसे विख्यात होगी। 'गो' अर्थात् स्वर्गसे इस स्थानपर आकर यह मतिस्वरूपा मानी गयी है, इसलिये लोकमें गोमती नामसे उसकी प्रसिद्धि हुई है। इसके दर्शनमात्रसे मनुष्य मोक्षको प्राप्त होंगे। फिर यहाँ स्नान-दान आदि करके वे श्रीहरिके धाममें जायँगे, इसके विषयमें कहना ही क्या।' सनकादि योगीश्वरोंने गोमतीको अर्घ्य देकर पुरुषसूक्तके मन्त्रोंसे शेषशायी भगवान् श्रीहरिका स्तवन किया। इस प्रकार स्तुति करते हुए उनके समक्ष साक्षात् भगवान् विष्णु प्रकट हुए। उन्होंने पीले रंगका रेशमी वस्त्र पहन रखा था। गलेमें वनमाला शोभा दे रही थी। दिव्य माला तथा दिव्य अनुलेपनसे उनके श्रीअंगोंकी बड़ी शोभा हो रही थी। वे दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थे। शेषनागकी शय्यापर पौढ़े हुए थे। उन्होंने हाथोंमें अनेकों दिव्य आयुध धारण कर रखे थे। उनके मस्तकपर किरीट-मुकुट जगमगा रहा था और कानोंमें मकराकृत कुण्डल चमचम कर रहे थे। भक्तोंको अभय देनेवाले कमनीय विग्रह महाबाहु श्रीहरिका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे सुशोभित था। उनके मुखपर शाश्वत प्रसन्नता छायी हुई थी। श्रीविग्रहकी कान्ति श्याम थी। चार भुजाओंसे शोभायमान वे भगवान् विष्णु लक्ष्मीजीके द्वारा चरणसंवाहनजनित आनन्दमें मग्न होकर अतिशय मनोहर प्रतीत होते थे। उन्हें देखकर सनकादि मुनि बड़े प्रसन्न हुए और वैदिक विष्णुसूक्तके मन्त्रोंसे आनन्दस्वरूप श्रीविष्णुकी स्तुति करने लगे। उनके इस प्रकार स्तवन करनेपर दीनोंपर दया करनेवाले श्रीहरि प्रसन्नचित्त होकर इस प्रकार बोले—'ब्रह्मकुमारो! मैं तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ; अतः तुम्हें मनोवांछित वर दूँगा। तुम मेरी मायासे निर्लिप्त रहकर नित्य ज्ञानसम्पन्न होओगे। ब्राह्मणो! तुमने मोक्षकी अभिलाषा लेकर मुझ जलशायी विष्णुको प्रसन्न किया है; इसलिये यह मेरा श्रेष्ठ तीर्थ सदा मोक्षदायक होगा। तुमपर अनुग्रह करनेके लिये यहाँ पहले सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ है; अतः उस चक्रके नामपर यह तीर्थ चक्रतीर्थ कहलायगा। यहाँ महासागरमें मेरा भी नियमित रूपसे निवास होगा। जो मानव किसी अन्य प्रसंगसे भी यहाँ चक्रतीर्थमें स्नान करते हैं, उन्हें मुक्ति हाथ लग जाती है। विप्रवरो! आपलोग भी सदा यहाँ निवास करें।'

भगवान्का यह वचन सुनकर सनकादि