संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अन्यान्य, भयंकर पाप, मार्गमें पैरोंसे दबकर मरे हुए कृमि-कीट और पतंग आदिके वधसे होनेवाले, परान्न-भोजन, परकीय जलपान तथा स्पर्शसे होनेवाले पाप—ये सभी उस भगवत्क्षेत्रके दर्शनसे नष्ट हो जाते हैं। द्वारकाके यात्रीको चाहिये कि वह मार्गमें विष्णुसहस्रनाम, भीष्मस्तवराज अथवा गजेन्द्रमोक्षका पाठ करते हुए धीरे-धीरे चले। भगवान्के अनेक अवतारोंकी लीला-कथाका गान करते हुए सदा हर्षमें भरा रहे और पवित्रभावसे यात्रा करे। पहले बिना पैर धोये ही भगवान् गणेशको नमस्कार करे। इससे सब विघ्नोंका नाश होता है। जो पहले बड़े भैया बलरामजीको प्रणाम करके नीलकमलदलके समान श्याम वर्णवाले देवकीनन्दन श्रीकृष्णको प्रणाम करता है, वह उनके दर्शनमात्रसे बाल, कुमार तथा युवावस्थामें किये हुए समस्त पापोंका नाश कर देता है। इतना ही नहीं, सहस्रों जन्मोंके मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए उसके जितने भी पाप हैं, सब नष्ट हो जाते हैं। एक हजार भार सुवर्णदान करनेसे जो फल मिलता है, उससे कोटि गुना फल द्वारकामें श्रीकृष्णके मुखका दर्शन करनेसे मिल जाता है। कमलके समान नेत्रोंवाले देवेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण तथा द्वारकाकी रक्षा करनेवाले महर्षि दुर्वासाजीको गरुड़सहित प्रणाम करके द्वारकापुरीके उत्तम द्वारपर आवे।
तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण ही जिसके आश्रय हैं, उस गोमती नदीके समीप जाय। उसका दर्शनमात्र करके मनुष्य सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। गोमतीका जल पापराशि और अमंगलका विनाश करनेवाला तथा मनुष्योंकी सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। उसे प्रणाम करना चाहिये। वह महापापोंका क्षय करनेवाला, जिनकी कहीं भी गति नहीं है, उन्हें सद्गति देनेवाला तथा परम शीतल है। मनुष्यके सब पुण्य जब सहायक होते हैं, तभी उसे गोमतीका जल प्राप्त होता है।
ऋषियोंने पूछा—दैत्यराज ! यह गोमती कौन है और इसे कौन लाया है?
प्रह्लादजीने कहा—प्राचीनकालमें जब एकार्णवके जलमें समस्त स्थावर-जंगम जगत्का नाश हो गया था, उस समय भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। भगवान्ने आज्ञा दी—'ब्रह्मन्! नाना प्रकारकी प्रजाकी सृष्टि कीजिये।' 'बहुत अच्छा' कहकर ब्रह्माजीने सृष्टिमें मन लगाया। उन्होंने अपने मनसे सनक, सनन्दन आदि कुमारोंको जन्म दिया और कहा—'पुत्रो! प्रजा उत्पन्न करो।' ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर सनक आदि महात्मा हाथ जोड़कर बोले—'भगवन्! प्रजापते! हम भगवत्स्वरूपका दर्शन करना चाहते हैं, अतः हम बन्धनमें नहीं पड़ेंगे। इस दुर्गम सृष्टिके चक्रमें नहीं फँसेंगे।' ऐसा कहकर सनकादि कुमार वहाँसे चल दिये। पश्चिम दिशामें समुद्रके तटपर आकर वे भगवान्के तेजोमय स्वरूपका दर्शन पानेकी इच्छासे उन्हींमें मन लगाकर उत्तम तपस्यामें संलग्न हो गये। बहुत वर्षोंके पश्चात् धरणीधर भगवान् विष्णु प्रसन्न हो समुद्रके जलका भेदन करके उनके सामने प्रकट हुए। उनका वह तेजोमय स्वरूप सूर्यके समान दुर्दर्श था। करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी तथा सहस्रों धारवाले सुदर्शन चक्रमय स्वरूपका दर्शन करके ब्रह्माजीके पुत्र सनकादि बड़े विस्मित हुए। वे भगवान्के उस उत्तम आयुधकी ओर देखते रह गये। उन्हें आश्चर्यमें पड़ा हुआ देख आकाशवाणी हुई—'ब्रह्मपुत्रो! भगवान् विष्णु शीघ्र ही प्रकट होंगे। भगवान्की पूजाके लिये शीघ्र अर्घ्य प्रदान करो। यह उन्हीं भगवान् जगन्नाथका आयुध है। इसके लिये भी शीघ्र अर्घ्य दो।'
आकाशवाणीका यह कथन सुनकर उन सब महर्षियोंने सुदर्शनकी स्तुति की। वे बोले—'ज्योतिर्मय सुदर्शन! तुम्हें नमस्कार है। हरिवल्लभ! तुम्हें नमस्कार है। सहस्र अरोंवाले सुदर्शनचक्र! तुम अविनाशी हो, तुम्हें नमस्कार है। सूर्यस्वरूप! तुम्हें नमस्कार है। ब्रह्मरूप! तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारा प्रहार कभी व्यर्थ नहीं होता।