संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1370, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य *
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द्वारकाकी महिमा, वहाँकी यात्रा और उसमें योग देनेका माहात्म्य, गोमती और चक्रतीर्थकी उत्पत्ति एवं महिमा, सनकादिकोंपर भगवान्की कृपा
श्रीप्रह्लादजी बोले— महर्षियो! आप सम्पूर्ण देवताओं, दैत्यों, दानवों तथा राक्षसोंके भी पूजनीय हैं। आप पूजनीय महापुरुषोंकी आज्ञा तथा भगवान् विष्णुके प्रसादसे मैं भगवान्के स्थानका परिचय देता हूँ—पश्चिम समुद्रके तटपर जो कुशस्थलीपुरी है, जिसका निर्माण पहले राजा कुशके द्वारा हुआ है, जहाँ गोमती नदी बहती है और समुद्रमें मिली है, वही द्वारावतीपुरी कहलाती है। उसे आनर्ता भी कहते हैं। उसीमें सोलह कलाओं तथा बारह मूर्तियोंसे युक्त विश्वात्मा भगवान् विष्णु निवास करते हैं। जो भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। वही परम धाम है, वही परमपद है। वह द्वारकापुरी धन्य है, जहाँ शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले चतुर्भुज श्रीकृष्ण विद्यमान हैं। वहाँ जानेसे कलिकालके मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर लेंगे। जहाँ गोमती नदी बहती हैं, जहाँ भगवान् विष्णुकी त्रिविक्रम मूर्ति है, उस द्वारकापुरीमें जाकर चक्रतीर्थमें स्नान करनेवाले मनुष्य मोक्ष प्राप्त करेंगे। जब भगवान् श्रीकृष्ण प्रभासक्षेत्रमें परमधामको पधारे, तब कलासहित वे उस त्रिविक्रम मूर्तिमें स्थित हुए, अतः ब्राह्मणो! इस कलिकालमें भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकाके सिवा अन्यत्र नहीं मिल सकते। यदि आपको श्रीकृष्णसे मिलनेकी इच्छा हो तो शीघ्र वहीं जाइये।
ऋषि बोले— भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ तथा उत्तम मार्ग दिखानेवाले प्रह्लादजी! आपको धन्यवाद है। आज हमने आपके द्वारा उस रहस्यको जान लिया, जिसे आपके सिवा दूसरा कोई नहीं जानता है। अब यह बताइये कि द्वारकापुरीमें जानेसे क्या फल होता है? वहाँ श्रीकृष्ण-दर्शनसे किस फलकी प्राप्ति होती है? द्वारकामें कौन-कौनसे तीर्थ और देवता हैं।
प्रह्लादजीने कहा— ब्राह्मणो! जब मनुष्य द्वारका जानेका विचार मनमें लाता है, उसी समय उसके पितर नरकसे मुक्त हो हर्षके गीत गाने लगते हैं। मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णके मार्गमें जितने पग आगे चलता है, उसे पग-पगपर अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। जो मानव श्रीकृष्णपुरीकी यात्राके लिये दूसरोंको प्रेरणा देता है, वह निःसन्देह विष्णुधाममें जाता है। जो द्वारका अथवा मथुरा जानेवाले मनुष्यको धन देता है, वह भगवद्धाममें आनन्दक्रीड़ा करता है। उस मार्गमें थके हुए शरीरवाले मनुष्यको जो सवारी देता है, वह मनुष्य हंसयुक्त विमानसे स्वर्गमें जाता है। जो यात्रामें जाते हुए भूखे पुरुषको मध्याह्नकालमें अन्न देता है, वह गयाश्राद्धसे होनेवाले पुण्यको पाता है। वहाँ पितरोंकी अक्षय तृप्ति होती है। जो द्वारका जानेवाले यात्रीको पहननेके लिये जूते देता है, वह मानव भगवान् श्रीकृष्णके प्रसादसे हाथीपर बैठकर चलता है। जो द्वारका जानेवालेके मार्गमें विघ्न खड़ा करता है, वह मूढ एक कल्पतक रौरव नरकमें डूबा रहता है। जो द्वारकाके मार्गमें टिके हुए पुरुषको कमण्डलु देता है, उसे एक हजार पौंसला चलानेका फल होता है। जो उस तीर्थके मार्गमें जाते हुए पुरुषसे भगवान् विष्णुकी कथा-वार्ता एवं संगीत सुनता है अथवा उसे दान देता है, उससे बढ़कर धन्य मनुष्य कोई नहीं है। द्वारकामें देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णका मन्दिर कैलास-शिखरके समान ऊँचा और श्वेत बादलोंकी भाँति उज्ज्वल है। जो उसका दर्शन करता है, वह मनुष्योंमें श्रेष्ठ है। दूरसे ही फहराती हुई ध्वजा-पताकाके साथ भगवन्मन्दिरका सुवर्णमय कलश देखकर जो सवारीको त्याग देता और धरतीपर लोटकर उसे प्रणाम करता है, उसके पंचसूनाजनित पाप,