भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1374, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1374
  • प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३४५

और रजतकी दक्षिणा दे। सोनेके सींग और चाँदीके खुरोंसे विभूषित रत्नमय पुच्छ और ताम्रमय पृष्ठभागवाली दुग्धयुक्त सवत्सा गौकी वस्त्र और आभूषणोंद्वारा पूजा करके भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे सप्तधान्यसहित उस गौका दान करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको सीमाके बाहरतक पहुँचाकर जितेन्द्रिय एवं पवित्र पुरुषों, दीनों, अन्धों और कृपणोंको अपनी शक्तिके अनुसार दान दे। गोमती नदी, गोमयस्नान, गोदान, गोपीचन्दन तथा गोपीनाथका दर्शन—ये पाँच गकार दुर्लभ हैं।* इसलिये मनुष्यको गोमतीके तटपर गोदान अवश्य करना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है। जो पूर्वकर्मोंके फलसे स्थावर (वृक्ष आदि)-की योनिमें चले गये हैं, ऐसे पितर, पितृकुलके हों या मातृकुलके, वे सभी कलियुगमें गोमतीके दर्शनसे मोक्षको प्राप्त होते हैं। गोमतीके तटपर श्राद्ध करनेसे निश्चय ही अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। प्रयागमें गंगा-स्नान करनेसे जो पुण्य होता है, उसे गोमतीके तटपर श्राद्ध करनेवाला पुरुष प्राप्त कर लेता है। उसके तीनों कुलोंके पितर विष्णुलोकमें जाते हैं तथा सहस्रों जन्मोंका किया हुआ पाप नष्ट हो जाता है। गोमतीके दर्शनसे मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए सभी पाप विलीन हो जाते हैं। भयभीत प्राणीको अभयदान देनेसे मनुष्य जिस पुण्यको पाता है, उसीको गोमतीके जलमें स्नान करके मनुष्य पा लेता है; इतना ही नहीं, वह पैतृक ऋणसे मुक्त एवं कृतकृत्य हो जाता है। मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए समस्त पाप गोमतीके जलका सम्पर्क होते ही नष्ट हो जाते हैं। गोमतीमें स्नान करनेवाला पुरुष सुन्दर वनमाला, चार भुजा तथा दिव्य गन्ध और अनुलेपनसे युक्त होकर उस विष्णुधाममें जाता है, जहाँसे पुनः लौटकर इस संसारमें नहीं आना पड़ता।

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चक्रतीर्थ तथा रुक्मिणीह्रदका माहात्म्य

प्रह्लादजी कहते हैं—विप्रवरो! यहाँसे चक्रतीर्थयुक्त समुद्रके समीप जाय, जहाँ मोक्ष देनेवाली चक्रांकित शिलाएँ देखी जाती हैं। जो प्रतिदिन भाव-भक्तिके साथ भगवान् जगन्नाथ श्रीकृष्णका पूजन करते हैं और सदा अपलक नेत्रोंसे उनका दर्शन करते रहते हैं, वे धन्य हैं। साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णने जिसे निरन्तर अपनी दृष्टिसे देखकर पालन किया है, वह श्रीहरिका सर्वपापनाशक चक्रतीर्थ सबसे श्रेष्ठ है। किसी दूसरे प्रसंगसे भी जिसका दर्शन कर लेनेपर मनुष्य पापमुक्त हो जाता है, वह चक्रतीर्थ सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ और पावन है। वहाँ जाकर प्रसन्नतापूर्वक हाथ-पैर धोकर आचमन करनेके पश्चात् साष्टांग प्रणाम करे। फिर पंचरत्नयुक्त अर्घ्यपात्र लेकर उसमें फूल, अक्षत, गन्ध, फल और चन्दन आदि मिलाकर अर्घ्य तैयार करे और फिर उसे हाथमें लेकर पश्चिम या समुद्रकी ओर मुँह करके निम्नांकित मन्त्र पढ़े—

ॐ नमो विष्णुरूपाय विष्णोश्चक्राय ते नमः। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं सर्वकामप्रदो भव॥

'ॐविष्णुस्वरूप तुम विष्णुचक्रको बार-बार नमस्कार है। मेरा दिया हुआ अर्घ्य स्वीकार करो और मेरे सम्पूर्ण मनोरथोंके दाता बनो।'

इस प्रकार अर्घ्य देकर समुद्रमें स्नान करे। फिर तीर्थकी भीगी हुई मिट्टी हाथमें ले उसे मस्तकपर धारण करके प्रणवका उच्चारण करते हुए पुनः स्नान करे। तदनन्तर क्रमशः देवता, ऋषि, मनुष्य तथा पितरोंका तर्पण करके भक्तिभावसे श्रीविष्णु और शिवका पूजन करे। भलीभाँति विधिपूर्वक किये हुए सहस्रों अश्वमेध यज्ञोंसे


* गोमती गोमयस्नानं गोदानं गोपिचन्दनम्। दर्शनं गोपिनाथस्य गकाराः पञ्च दुर्लभाः ॥ (स्क० पु०, द्वा० मा० ६। २३-२४)

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