संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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जो फल प्राप्त होता है, वही चक्रतीर्थमें स्नान करनेमात्रसे मिल जाता है। चक्रतीर्थसे निकली हुई चक्रांकित शिला मनुष्योंद्वारा सदा पूजनेयोग्य है। उसके पूजनसे भगवान् विष्णुका सामीप्य प्राप्त होता है। मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए समस्त पाप वहाँ स्नानमात्रसे नष्ट हो जाते हैं।
वहाँसे सुप्रसिद्ध सात कुण्डोंके समीप जाय, जो सब पापोंका नाश करनेवाले तथा ऋद्धि और बुद्धिको बढ़ानेवाले हैं। कलियुगमें उनकी रुक्मिणीह्रदके नामसे प्रसिद्धि होगी। भृगुजीसे सेवित होनेके कारण उसे भृगुतीर्थ भी कहते हैं। वहाँ जाकर प्रसन्नतापूर्वक हाथ-पैर धोये और आचमन करके इन्द्रियसंयमपूर्वक पूर्वाभिमुख हो कुश, फल, फूल, अक्षत और रजत आदिसे युक्त भरा हुआ अर्घ्यपात्र लेकर मस्तकसे लगाकर इस प्रकार कहे—'मैं सब पापोंके नाश तथा रुक्मिणीजीकी प्रसन्नताके लिये रुक्मिणीह्रदनामक इस तीर्थको भक्तिपूर्वक अर्घ्य देता हूँ।' ऐसा कहकर अर्घ्य दे और सिरपर मार्जन करके स्नान करे। फिर देवता, ऋषि, मनुष्य और पितरोंका तर्पण करके ब्राह्मणोंको बुलाकर भक्तिभावसे श्राद्ध करे। फिर सुवर्ण और रजतकी दक्षिणा दे। विशेषतः रसीले फल अर्पण करने चाहिये। ब्राह्मणदम्पतिको मिष्टान्न भोजन करावे। पितृपंक्ति तथा अन्यान्य स्त्रियोंका यथाशक्ति कंचुकि और लाल वस्त्रोंके द्वारा पूजन करे। 'रुक्मिणी प्रीयताम्—रुक्मिणीदेवी प्रसन्न हों' ऐसा कहकर वह पूजन आदि कर्म रुक्मिणीदेवीको समर्पित करना चाहिये। ऐसा करनेपर मनुष्य कृतकृत्य होता, सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करता और विष्णुलोकमें जाता है। जो रुक्मिणीकुण्डमें स्नान करता है, वह शक्तिहीन तथा याचक नहीं होता। उसे संसारचक्रमें भटकना नहीं पड़ता। वह दुःख, शोक,पाप तथा महान् भयसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके धाममें जाता है।
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विष्णुपदोद्भवतीर्थकी महिमा, उद्धवजीका ब्रजमें आगमन, उनके साथ गोपियोंकी बातचीत, गोपियोंका द्वारकागमन तथा मयसरोवरकी महिमा
**प्रह्लादजी कहते हैं—**विप्रवरो! वहाँसे विष्णुपदोद्भव तीर्थमें जाय, जिसके दर्शनमात्रसे गंगास्नानका फल मिलता है तथा जिसके स्मरण और कीर्तनसे सब पापोंका नाश हो जाता है। भगवान् श्रीकृष्णने रुक्मिणीजीके लिये जिस गंगाजीको प्रकट किया था, वही विष्णुपदा कहलाती हैं। उसमें आचमन करनेमात्रसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है। श्रीविष्णुके चरणसे प्रकट हुई है, इसलिये वह वैष्णवी नामसे भी प्रसिद्ध है। वहाँ जाकर विधिपूर्वक अर्घ्य हाथमें लेकर निम्नांकित मन्त्रका उच्चारण करे—
नमस्ये त्वां भगवति विष्णुपदतलोद्भवे।
गृहाणार्घ्यमिदं देवि गङ्गे त्वं हरिणा सह॥
'भगवान् विष्णुके चरणतलसे प्रकट हुई भगवती गंगे! मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। देवि! तुम श्रीहरिके साथ मेरा यह अर्घ्य स्वीकार करो।'
ऐसा कहकर अर्घ्य दे। फिर हाथसे तीर्थकी मृत्तिका लेकर मस्तकमें लगाये और इन्द्रियोंको अपने वशमें रखते हुए पूर्वाभिमुख हो स्नान करे। स्नानके बाद देवताओं और पितरोंका तर्पण करे। फिर ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करके श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करे। सोना-चाँदी दक्षिणामें दे। अपनी शक्तिके अनुसार दीनों, अन्धों और कृपणोंको भी दान दे।
तत्पश्चात् गोप्रचार या गोपीसरोवर तीर्थमें जाय, जहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करके मनुष्य गोदानका फल पाता है। जहाँ जगदीश्वर श्रीकृष्ण श्रावण मासमें देवताओंसहित स्नान करते हैं, वहाँ द्वादशीको चटाई देनेका विधान है।