भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1376, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1376
  • प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * | १३४७ ---|---

ऋषियोंने पूछा—दैत्यराज! वहाँ गोप्रचार तीर्थ कैसे हुआ? जिसमें साक्षात् भगवान् जनार्दन स्नान करते हैं?

प्रह्लादजीने कहा—अमित तेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा भोजराज कंसके मारे जानेपर जब उग्रसेन मथुरापुरीके राजा हुए, उस समय गोकुलप्रिय श्रीकृष्णने अपने सुहृद् गोपों तथा गोपीजनोंका प्रिय करनेके लिये उद्धवजीको गोकुलमें भेजा। उद्धवजी गोविन्दको नमस्कार करके उन्हींके समान वेष-भूषा तथा वस्त्रालंकार धारण करके नन्दगाँवकी ओर चले। सन्ध्याकालमें श्रीकृष्णके प्रिय सखा उद्धवजीको अपने घर आया देख पुत्रवत्सला माता यशोदाने अच्छे-अच्छे वस्त्र और आभूषण देकर उनका सत्कार किया। जब उद्धवजी भोजन करके विश्राम कर चुके, तब पुत्रस्नेहमयी यशोदा तथा नन्दबाबाने अपने नेत्रोंमें आँसू भरकर श्रीकृष्णका कुशल-समाचार पूछा—'उद्धवजी! बताओ तो सही, हमारे दोनों पुत्र श्रीकृष्ण-बलराम कुशलसे तो हैं न? क्या श्रीकृष्ण अपने साथी ग्वाल-बालोंको कभी याद करते हैं? क्या मथुरानाथ गोविन्द कभी गोकुलमें भी पधारेंगे? क्या हमारा लाला कन्हैया इस गोकुलका शोकसमुद्रसे उद्धार करेगा?' ऐसा कहकर पुत्रस्नेहके वशीभूत यशोदा मैया और नन्दबाबा—दोनों दीनभावसे फूट-फूटकर रोने लगे। उनके नेत्रोंसे अश्रुधारा बह रही थी। उद्धवने देखा, ये दोनों विरहकी अन्तिम सीमातक पहुँच गये हैं। अब इनके प्राण रहेंगे या नहीं, यह संशय उपस्थित हो गया है। तब उन्होंने श्रीकृष्णके स्नेहयुक्त मधुर सन्देश सुनाकर उन दोनोंको जीवनदान दिया। उद्धवजी बोले—'श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने अपने बड़े भैया बलरामजीके साथ आप दोनोंको नमस्कार कहलाया है। कुशल-मंगल पूछा है और वे दोनों भाई भी कुशलसे हैं। जगदीश्वर श्रीकृष्ण बलरामजीके साथ शीघ्र ही यहाँ आवेंगे और आपलोगोंका हित-साधन करेंगे।'

इस प्रकार श्रीकृष्णके सन्देश-वाक्योंसे नन्द और यशोदाको सान्त्वना देकर उनके द्वारा सम्मानित हो उद्धवजी शय्यापर सुखपूर्वक सोये। प्रातःकाल गोपियाँ नन्दबाबाके द्वारपर रथ खड़ा देख अत्यन्त विस्मित हुईं। उनके मनमें सन्देह हुआ, श्रीकृष्ण तो नहीं आ गये? अतः वे परस्पर पूछने लगीं, 'नन्दरायजीके घरमें सूर्यके समान तेजस्वी रथसे ये श्रीकृष्णकी-सी वेष-भूषा धारण किये कौन आये हैं?' इस प्रकार जिज्ञासा करती हुई समस्त ब्रजसुन्दरियाँ परस्पर मिलकर एकान्त स्थानमें गयीं और शोकसे दुर्बल हो उद्धवजीको वहीं बुलाकर श्रीकृष्णका सन्देश पूछने लगीं—'तुम कहाँसे आये हो? और किसलिये यहाँ पधारे हो?' इतना कहते-कहते वे शोकसे विह्वल एवं मूर्च्छित हो गयीं और उद्धवजीकी ओर देखती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ीं।

श्रीकृष्ण-प्रेम-परवश गोपीजनोंकी यह अवस्था देखकर उद्धवजीने उन्हें श्रवण-सुखद वचनोंद्वारा आश्वासन देते हुए कहा—'गोपियो! भगवान् श्रीकृष्णकी भी यही दशा है। वे दिन-रात तुम्हारी ही याद करके निरन्तर दुःखी रहते हैं।' उद्धवजीकी यह बात सुनकर ललिता प्रणयकोपसे मूर्च्छित-सी होकर आँखें लाल किये रोती हुई बोलीं—'श्यामसन्दर झूठे हैं। मर्यादा भंग करनेवाले और क्रूर हैं। क्रूर मनुष्य ही उन्हें प्रिय हैं। कृतज्ञता तो उनमें छू भी नहीं गयी है। उद्धवजी! आप उनकी कोई चर्चा हमारे आगे न कीजिये।'

श्यामला बोली—सखियो! तुमलोग उनकी बात चलाती ही क्यों हो? छोड़ो श्रीकृष्णकी चर्चा, कोई दूसरी बातें करो।

धन्याने कहा—पुरुषार्थहीन लक्ष्मीपतिके इन दूत महोदयको कौन यहाँ बुला लाया है? श्रीकृष्णका साथ करनेसे कोई लाभ नहीं है।

विशाखा बोली—जिनके कुल और शीलका कोई पता नहीं है, उन्हें पापका भय क्या होगा? उनके जन्म-कर्मकी ख्याति तो स्त्रीवधसे ही प्रारम्भ हुई है।

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