भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1377
१३४८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

श्रीराधाजीने कहा— सखियो ! जिन्हें प्राणियोंका वध करनेमें पापका कोई भय नहीं होता, उन्हें स्त्री-वध करनेमें क्या शंका हो सकती है?

**शैव्या बोली—**महाभाग उद्धवजी ! सच बताइये, नागरी स्त्रियोंसे घिरे हुए यदुवंशशिरोमणि श्रीकृष्ण क्या कभी हमलोगोंका भी स्मरण करते हैं?

**पद्माने कहा—**उद्धवजी ! नागरीजनोंके प्रियतम तथा कमल-दलके सदृश विशाल नेत्रोंवाले श्रीकृष्ण यहाँ कब पधारेंगे?

**भद्रा बोली—**हा कृष्ण! हा गोपप्रवर! हा गोपीजनवल्लभ! महाबाहो ! हम गोपियोंका संसार-सागरसे उद्धार करो।

इस प्रकार नाना प्रकारकी बातें कह-कहकर ब्रजयुवतियाँ विलाप करने लगीं! वे श्रीकृष्णकी एक-एक लीला याद करके फूट-फूटकर रोने लगीं। उनका वह रोना सुनकर भक्ति और स्नेहमें डूबे हुए उद्धवजीको बड़ा विस्मय हुआ और वे उन गोपियोंकी सराहना करने लगे—'अहो ! ब्रह्मा, महादेवजी, देवता तथा महर्षि भी जिस भावतक नहीं पहुँच सकते, वहाँ इन गोपियोंकी पहुँच हो चुकी है। ब्रजकी ये समस्त सुन्दरियाँ धन्य हैं। इन सबका जन्म, जीवन तथा यौवन-धन सफल हो गया, क्योंकि भगवान् श्यामसुन्दरमें इनकी भक्ति अविचल है।'

**गोपियाँ बोलीं—**उद्धवजी ! आप हमें गोविन्दका दर्शन करा दें। प्यारे श्यामसुन्दरसे मिला दें। जहाँ श्रीकृष्ण रहते हैं, वहीं हमको भी ले चलें।

गोपांगनाओंकी यह बात और विलाप सुनकर उद्धवजी स्नेहसे विह्वल हो गये और 'बहुत अच्छा' कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया। तदनन्तर श्रीकृष्णदर्शनके लिये लालायित रहनेवाली समस्त ब्रजांगनाएँ बड़ी प्रसन्नताके साथ उद्धवजीके पीछे-पीछे चलीं। वे मार्गमें उनकी बाललीलाके प्रिय गीत गाती जा रही थीं। यदुपुरीके समीप पहुँचकर उन्होंने वहाँके उद्यानों और वन-श्रेणियोंको देखा। तब वे परस्पर कहने लगीं—'यहाँ हमें अपने प्यारे कमलनयन नन्दनन्दनका दर्शन होगा।' द्वारकामें जाने और लक्ष्मीपतिका चिन्तन करनेसे गोपियाँ समस्त पापोंसे मुक्त हो गयीं, उनके सारे बन्धन टूट गये। धीरे-धीरे वे मयसरोवरके तटपर आयीं। वहाँ उद्धवजीने उनके चरणोंमें प्रणाम करके कहा—'देवियो! तुमलोग यहीं ठहरो। महाबाहु श्रीकृष्ण यहीं आवेंगे और तुम सब लोगोंका हित करेंगे।'

**गोपियोंने पूछा—**उद्धवजी ! खिले हुए कमलों, कह्लारों, कुमुदों और उत्पलोंसे जिसकी विचित्र शोभा हो रही है और जहाँ सारस किलोल करते हैं, ऐसा यह सरोवर किसका है?

**उद्धवजीने कहा—**माया जाननेवाला महादैत्य मय तीनों लोकोंमें विख्यात है। उसीने यह सुन्दर सरोवर बनाया है; अतः उसीके नामसे यह मयसरोवर कहलाता है।

**गोपियाँ बोलीं—**अच्छा, उद्धवजी! आप शीघ्र जाइये और प्यारे श्यामसुन्दरको बुला लाइये। वे ही हमारे नयनोंमें आनन्दकी सृष्टि करते हैं। उन्हींसे हमारे तीनों तापोंका नाश होता है; अतः शीघ्र उनका दर्शन कराइये।

यह सुनकर उद्धवजी गये और भगवान् श्रीकृष्णको शीघ्र बुला लाये। गोपियोंने देखा, देवकीनन्दन आ रहे हैं। उनका श्रीअंग वनमालासे विभूषित है। मस्तकपर किरीटमुकुट जगमगा रहा है। कानोंमें मकराकार कुण्डल चमचम कर रहे हैं। वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न शोभा पा रहा है। उनकी बड़ी-बड़ी भुजाएँ हैं। उन्होंने रेशमी पीताम्बर पहन रखा है। तीनों लोकोंमें सबसे अधिक सुन्दर और सबका मन मोह लेनेवाले अपने प्रियतम श्यामसुन्दरको दीर्घकालके बाद देखकर श्रीकृष्णप्रिया गोपियाँ प्रेमावेशसे मूर्च्छित हो गयीं। कुछ देरके बाद जब वे सचेत हुईं, तब इस प्रकार विलाप करने लगीं—'हा नाथ! हा प्राणवल्लभ! हा स्वामिन्! हा ब्रजेश्वर! हा मनमोहन ! बचपनमें जिन्होंने तुम्हारा लालन-