संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
पृष्ठ 1378, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1378
- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३४९
| पालन किया, जिनके साथ तुमने क्रीडाएँ कीं, उनको भी तुमने त्याग दिया। निर्दयी! बताओ तो सही, हमपर इतने रुष्ट कैसे हो गये? हम जानती हैं, तुममें न धर्म है न सौहार्द, न मैत्री है और न सत्यवादिता, तुम तो पिता-माताका भी परित्याग करनेवाले हो। तुम्हें कैसे सद्गति प्राप्त होगी? प्राणवल्लभ! भक्तजनोंका परित्याग सब शास्त्रोंमें निन्दित बताया गया है। वीर! हमें वनमें छोड़ते समय तुमने उन शास्त्र-वचनोंपर भी दृष्टिपात नहीं किया?'<br><br>गोपियोंका यह विलाप सुनकर सबके आन्तरिक भावोंको जाननेवाले भगवान् श्रीकृष्णने यह जान लिया कि सब गोपियाँ अनन्यभावसे मेरी शरणमें आयी हैं; अतः व्रजेश्वरने उन सबको सान्त्वना देते हुए कहा—'देवियो! तुमसे मेरा कभी वियोग नहीं है। मैं समस्त प्राणियोंके हृदयमें सदा सामान्यरूपसे निवास करता हूँ। मैं ही सबकी उत्पत्तिका कारण हूँ। मुझसे ही इन्द्र आदि देवता प्रकट हुए हैं। आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुद्गण, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, आद्याशक्ति, महर्षि, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, सत्त्व, रज, तम, काम, क्रोध, लोभ, मद और अहंकार—इन सबकी प्रवृत्ति मुझसे ही होती है। ऐसा जानकर तुम मनमें शोक न करो। सब प्राणियोंके भीतर मुझे सदा ही स्थित जानकर अन्तर्यामीरूपसे मेरा चिन्तन करो। इससे सब प्रकारके पाप-तापसे मुक्त हो जाओगी।'<br><br>श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर गोपियोंके सब बन्धन कट गये। उनके संशय और क्लेश नष्ट हो गये। वे भगवद्दर्शनजनित आनन्दमें डूब गयीं। श्रीकृष्णके दर्शनसे उनका अन्तःकरण अत्यन्त निर्मल हो गया। वे इस प्रकार बोलीं—'गोविन्द! आज हमारा जन्म सफल हो गया। आज हमारे नेत्र सार्थक हो गये। क्योंकि आज दीर्घकालके बाद हमारी आँखें नागरीजनवल्लभ गोविन्दका दर्शन कर रही हैं। पुण्यहीन स्त्रियोंको पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका दर्शन नहीं होता। मधुसूदन! यद्यपि | आपने युक्ति तथा अर्थयुक्त वचनोंसे हमें ज्ञानका उपदेश दिया है तथापि हमारे हृदयसे माया नहीं निकलती।'<br><br>श्रीकृष्णने कहा—इस सरोवरके दर्शन और स्पर्शसे तुम सम्पूर्ण बन्धनोंसे मुक्त हो गयी हो। अब इसमें स्नान कर लेनेसे तुम्हारी सम्पूर्ण कामनाएँ पूरी हो जायेंगी।<br><br>गोपियाँ बोलीं—जगन्नाथ! आपने इस सरोवरका अद्भुत प्रभाव बतलाया है। अब इसमें स्नान करनेकी क्या विधि है, वह विस्तारपूर्वक कहिये।<br><br>श्रीकृष्णने कहा—गोपियो! इस सरोवरपर मेरे साथ तुम्हारा मिलन हुआ है, अतः यहाँ मेरे ही साथ तुम्हें नियमपूर्वक स्नान करना चाहिये। जो श्रावण शुक्ला द्वादशीको संयम, नियम एवं पवित्रतासे रहकर भक्तिपूर्वक इस सरोवरमें स्नान करके पितरोंका तर्पण करेगा और मेरे तथा पितरोंके उद्देश्यसे यथाशक्ति दान देगा, वह पितरोंसहित विष्णुधामको प्राप्त होगा। मयतीर्थके पास जाकर दोनों हाथोंमें कुश और फल ले निम्नांकित मन्त्रसे अर्घ्य दे—<br><br>गृहान्धकूपे पतितं मायापाशशतैर्वृतम्।<br>मामुद्धर महीनाथ गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥<br><br>'महीनाथ! मैं घरके अन्धकूपमें पड़ा हूँ। मायाके सैकड़ों बन्धनोंमें बँधा हूँ। मेरा उद्धार करो। यह अर्घ्य लो। तुम्हें नमस्कार है।'<br><br>इस प्रकार अर्घ्य दे भक्तिपूर्वक स्नान करे। भक्तिभावसे पितरोंका तर्पण और श्राद्ध करे। सोने और चाँदीकी दक्षिणा दे। शक्कर मिलाया हुआ खीर, मधु आदि अर्पण करे। मुझे तुमलोगोंका यहाँ दर्शन हुआ है; अतः मुझे सदा इस जलाशयमें आना और रहना चाहिये। प्यारी गोपियो! जो इस मयसरोवरमें स्नान करता है, उसे गंगास्नानका फल और अक्षय वैकुण्ठधाम प्राप्त होते हैं। उसके तीनों कुलोंके पितर मुक्त हो जाते हैं। वह स्वयं भी पुत्र-पौत्रसे युक्त तथा धन-धान्यसे सम्पन्न होता है। जीवनभर सुख भोगकर अन्तमें श्रीहरिके धामको जाता है। |
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