भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1379, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1379

१३५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

गोपी-सरोवरका निर्माण और उसकी महिमाका वर्णन

प्रह्लादजी कहते हैं—श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर गोपियोंके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उस मयसरोवरमें स्नान करके वे समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो गयीं। श्यामसुन्दर श्रीकृष्णके दर्शनसे उनके हृदयमें असीम आनन्द हुआ था। उन्होंने माधवसे मधुर वाणीमें कहा—'भगवन्! दैत्योंमें श्रेष्ठ मय धन्य है, जिसके बनाये हुए सरोवरमें सम्पूर्ण देवताओंके साथ जगदीश्वर निवास करें। प्रभो! यदि आप हम पर प्रसन्न हैं और हम आपके कृपापात्र हैं तो हमारे लिये भी एक तीर्थका निर्माण कराइये। जहाँ रहकर आपके नामोंका कीर्तन, आपका दर्शन तथा निरन्तर आपके स्वरूपका ध्यान करनेसे हम परम गतिको प्राप्त हों।'

श्रीकृष्णने कहा—साध्वी गोपियो! तुम मेरी आत्मीयजन हो; अतः तुम्हारा प्रिय कार्य अवश्य करूँगा। तुम सदैव मेरे अनुग्रहकी पात्र हो; क्योंकि मैं सदा भक्तिके वशीभूत रहता हूँ।

ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णने गोपियोंके हितके लिये मयसरोवरके समीप एक-दूसरे सरोवरका निर्माण कराया। उसमें अगाध जल था। कमलके पत्ते उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उस सरोवरका जल बड़ा ही स्वच्छ था। हंस, सारस और चक्रवाक आदि पक्षी उसे सुशोभित करते थे। कुमुद, उत्पल, कह्लार और पद्मखण्ड उस सरोवरके श्रृंगार थे। उसके तटपर मुख्य-मुख्य ब्राह्मण, सिद्ध और विद्याधर आकर रहने लगे। यदुकुलकी स्त्रियाँ, बालक और उस जनपदके लोग दिन-रात वहाँ भरे रहते थे। उस सरोवरको देखकर श्रीकृष्णने कहा—'गोपियो! मयसरोवरके समीप सज्जनोंके मनकी भाँति स्वच्छ जलसे भरे हुए इस सरोवरको देखो। यह तुम्हारे ही लिये तैयार कराया गया है। तुम्हारे नामसे ही इसकी ख्याति होगी। तुम्हें और मुझे गोवाचक शब्द अभीष्ट है; अतः गौके नामपर लोकमें यह तीर्थ गोप्रचार नामसे प्रसिद्ध होगा। मैंने तुम सब गोपियोंका प्रिय करनेकी इच्छासे इस सरोवरका निर्माण किया है; इसलिये यह गोपीसरोवरके नामसे भी विख्यात होगा। तुमलोग मेरे प्रति विशेष भक्तिके कारण यहाँ आयी हो, अतः तुम्हें जो अभीष्ट हो या तुम्हारे मनमें जो कुछ भी हो, वह माँगो।'

गोपियाँ बोलीं—माधव! आप प्रसन्नतापूर्वक इस सरोवरमें निवास करें। जहाँ आप हैं वहीं दान, व्रत, नियम, ॐकार, वषट्कार, स्वाहाकार, स्वधाकार, भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्गलोक, महर्लोक, जन, तप और सत्यलोक सबकी स्थिति है। देवता, असुर और मनुष्योंसहित यह सम्पूर्ण जगत् श्रीकृष्णमय ही है। तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली गंगा आपका चरणोदक ही तो हैं। आपके वक्षःस्थलमें लक्ष्मी और मुखमें सरस्वती देवीका वास है। जगदीश्वर! आप यहाँ अपने सर्वभूतमय स्वरूपसे स्नान करें। महाबाहो! यहाँकी यात्रा करनेसे जो फल होता हो, उसका वर्णन कीजिये।

श्रीकृष्णने कहा—गोपियो! सुनो—सदाचारी, शुद्ध, निर्धन, परोपकारी एवं कुटुम्बी ब्राह्मणको आवश्यक सामग्री, बछड़ा, वस्त्र, आभूषण तथा शास्त्रोक्त दक्षिणासे युक्त गाय दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह सब इस गोपी-तीर्थमें स्नान करनेमात्रसे मिल जाता है। जो मनुष्य अनेक प्रकारके स्तोत्रोंसे स्तुति करते हुए मेरे विग्रहके साथ गाते-बजाते गोपी-सरोवरकी यात्रा करते हैं, उन्हें कभी माताके गर्भकी यातना नहीं भोगनी पड़ती। वे समस्त मनोरथोंको पाते और विष्णुलोकको जाते हैं। गोपीसरोवरमें निम्नांकित मन्त्रसे श्रद्धापूर्वक अर्घ्य देकर स्नान करना चाहिये—

अर्घ्य-मन्त्र

नमस्ते गोपरूपाय विष्णवे परमात्मने।
गोप्रचार जगन्नाथ गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥

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