संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1380, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * | १३५१ ---|---
'गोपरूपधारी परमात्मा विष्णुको नमस्कार है। गोप्रचार! जगन्नाथ! यह अर्घ्य ग्रहण करो। तुम्हें नमस्कार है।'
इस प्रकार विधिपूर्वक अर्घ्य दे हाथसे तीर्थकी मिट्टी लेकर मस्तकमें लगावे और श्रद्धापूर्वक स्नान करके देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करे। फिर एकाग्रचित्त हो भक्तिभावसे श्राद्ध करे और शास्त्रमें बताये अनुसार सुवर्ण तथा रजतकी दक्षिणा दे। ऐसा करनेसे मनुष्य उत्तम गतिको पाता है। उसके तीनों कुलोंके पितर उत्तम लोकमें जाते हैं। श्राद्धकर्ता पुरुष यदि पुत्रकी इच्छा रखनेवाला हो तो वह मनके अनुकूल पुत्र पाता है। जो गोपीसरोवरमें स्नान करता है, वह स्वर्ग और मोक्ष आदि जिस-जिस वस्तुको चाहता है, सब कुछ पा लेता है। जबतक जगत् रहेगा, तबतक यह सरोवर भी रहेगा और जबतक सरोवर रहेगा, तबतक तुम्हारी कीर्ति भी स्थिर रहेगी। मनुष्यलोकमें जबतक कीर्ति बनी रहती है, तबतक उसका स्वर्गलोकमें रहना निश्चित है। इसमें स्नान करके निष्पाप हुए समस्त प्राणी परम गतिको प्राप्त होंगे। भाद्रपदमास आनेपर जलसे भरे हुए पवित्र गोपीसरोवरमें नियमपूर्वक स्नान करना होगा। तुमलोग कान्तभावसे अथवा ब्रह्मभावसे मुझ परमेश्वरका चिन्तन करते हुए परम उत्तम गतिको प्राप्त होओगी।
इस प्रकार भगवान्की आज्ञा पाकर उन गोपकन्याओंने उन्हें नमस्कार किया और वे जैसे आयी थीं, वैसे ही चली गयीं। इस प्रकार गोपियोंको विदा करके उद्धवसहित श्रीकृष्ण अपने घरको गये।
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ब्रह्मकुण्ड, चन्द्रसरोवर, इन्द्रसरोवर, महादेवसरोवर, गौरीसरोवर, वरुणसरोवर तथा पंचनदतीर्थका माहात्म्य
प्रह्लादजी कहते हैं—द्वारकामें बहुत-से आश्चर्यजनक तीर्थ हैं, जो घोर कलियुग प्राप्त होनेपर समुद्रमें विलीन हो जाते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण पृथ्वीका भार उतारकर और साधु पुरुषोंको सन्मार्गमें स्थापित करके जब बड़े-बूढ़े वृष्णिवंशियोंके साथ द्वारका चले आये, तब उनके दर्शनके लिये सम्पूर्ण देवताओंके साथ इन्द्र, वरुण, यम, कुबेर, सूर्य तथा चन्द्रमा वहाँ आये और श्रीकृष्णसे मिलकर अपना कार्य सिद्ध कर लेनेके पश्चात् ब्रह्माजीने अपने नामसे वहाँ एक तीर्थ निर्माण किया, जो ब्रह्मकुण्ड कहलाया। वह सब पापोंका नाश करनेवाला तीर्थ है। ब्रह्मकुण्डके तटपर उन्होंने सूर्यनारायणकी स्थापना की। लोकपितामह ब्रह्माजी सम्पूर्ण देवताओंके मूल हैं, अतः उनके द्वारा स्थापित उस तीर्थको मूल स्थान कहते हैं। उस ब्रह्मतीर्थको देखकर चन्द्रमाने भी अपने नामसे एक तड़ाग बनाया, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। उस तेजस्वी तीर्थको देखकर सब देवता बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने लोकस्रष्टा ब्रह्माजीसे कहा—'जो यहाँ स्नान करके पितरोंका तर्पण करेगा तथा जो माघशुक्ला सप्तमीको देवेश्वर मूलस्थानका पूजन करेगा, वह सब पापोंसे मुक्त हो धन-धान्यसे सम्पन्न होगा।'
ब्रह्माजीने उस सरोवरके तटपर एक शिवलिंगको भी स्थापित किया; फिर महाभाग इन्द्रने भी परम सुन्दर सरोवर बनाकर वहाँ इन्द्रेश्वर लिंगकी स्थापना की। वहाँ स्नान करके मनुष्य इन्द्रपद पाता है; अतः वह भूतलपर इन्द्रपदके नामसे प्रसिद्ध है। उसका दर्शन करके मनुष्य सब पातकोंसे मुक्त हो जाता है। अष्टमी और चतुर्दशीको इन्द्रपद तीर्थमें स्नान करके जो इन्द्रेश्वरकी पूजा करता है, वह मोक्ष पाता है। जब सूर्य मकर राशिपर स्थित हों, उस समय उत्तरायणकी संक्रान्तिके अवसरपर तथा विशेषतः शिवरात्रिको पार्वतीसहित इन्द्रेश्वरकी पूजा करके