संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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जो मनुष्य रात्रिमें जागरण करता है, वह उत्तम लोकको पाता है।
ब्रह्मतीर्थ और इन्द्रसरोवरका दर्शन करके भगवान् विष्णुके साथ अपनी एकता दिखाते हुए महादेवजीने भी वहाँ एक तड़ाग बनवाया। अथाह जलवाले उस सरोवरको देखकर पिनाकपाणि शिवजीने ब्रह्मा और विष्णुके सहित उसमें स्नान किया। यह देखकर देवताओंने कहा—'इस महासरोवरका निर्माण महादेवजीने किया है, इसलिये यह महादेवसरोवरके नामसे प्रसिद्ध होगा। जो इसमें भक्तिभावसे स्नान, तर्पण और श्राद्ध करेगा, वह उत्तम गतिको प्राप्त होगा। महादेवसरोवरके दर्शनसे मनुष्य पापमुक्त हो जाता है और भक्तिपूर्वक उसमें स्नान करनेसे उसकी कभी दुर्गति नहीं होती। स्त्री स्नान करे तो वह कभी सौभाग्य और सन्तानसे वंचित नहीं होती। वहीं गौरीसरोवर भी है। उसमें स्नान करके मनुष्य सब कामनाएँ प्राप्त कर लेता है।
वरुणजीने भी भगवान्के प्रति भक्तिभाव रखकर दिव्य सरोवरका निर्माण किया, जो वरुणसरोवरके नामसे विख्यात है। जो उसका दर्शन करता है, उसके सब पापोंका नाश हो जाता। भादोंकी पूर्णिमाको वहाँ तर्पण और श्राद्ध करनेसे मनुष्य उस उत्तम लोकमें जाता है, जहाँ जाकर फिर कभी शोकका अवसर नहीं आता।
भगवान् विष्णुको द्वारकामें पधारे हुए सुनकर ब्रह्मपुत्र मरीचि आदि ऋषि श्रीकृष्णपालित द्वारकापुरीमें आये। उन्होंने द्वारकापुरी और समुद्रमें मिली हुई गोमतीका दर्शन करके वहाँ पंचनदतीर्थको स्थापित किया। उनके आवाहन करनेपर वहाँ पाँच नदियाँ वेगपूर्वक आयीं। मरीचिके लिये गोमती नदी, अत्रिके लिये लक्ष्मणा नदी, अंगिराके लिये चन्द्रभागा, पुलहके लिये कुशावती तथा क्रतुको पवित्र करनेके लिये जाम्बवती नदी आयी। उन यशस्वी ब्रह्मपुत्रोंने उन सबमें स्नान करके उस स्थानका नाम पंचनदतीर्थ रखा, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। स्वर्ग और मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंको वहाँ सदा स्नान करना चाहिये। इन्द्रियसंयमपूर्वक फलसहित अर्घ्यपात्र ले निम्नांकित मन्त्रसे पाँचों नदियोंको अर्घ्य देना चाहिये—
ब्रह्मपुत्रैः समानीताः पञ्चैताः सरितां वराः।
गृह्णं त्वर्घ्यमिमं देव्यः सर्वपापप्रशान्तये॥
'ब्रह्माजीके पुत्रोंद्वारा लायी हुईं ये देवीस्वरूपा पाँचों श्रेष्ठ सरिताएँ सब पापोंकी शान्तिके लिये मेरे दिये हुए इस अर्घ्यको ग्रहण करें।'
इस प्रकार अर्घ्य देकर स्नान करनेके पश्चात् देवताओं और पितरोंका तर्पण तथा श्रद्धापूर्वक विधिवत् श्राद्ध करे। ब्राह्मणोंको पंचरत्न और सप्तधान्य दान करे। तदनन्तर दीनों, अन्धों और कृपणोंको अपनी शक्तिके अनुसार दान दे। ऐसा करनेवाला पुरुष सब कामनाओंको पाता और विष्णुलोकमें जाता है*। लोकमें पुत्र और पौत्रोंसे संयुक्त रहकर वह उत्तम सुख पाता है।
सिद्धेश्वरलिंग, ऋषितीर्थ, गदातीर्थ आदि विविध तीर्थों और देवी-देवताओंके सेवनकी महिमा तथा श्रीकृष्ण-दर्शनका माहात्म्य
प्रह्लादजी कहते हैं—अपने पिता ब्रह्माजीको द्वारकामें आया हुआ सुनकर सनकादि मुनि उन्हें प्रणाम करनेके लिये गये। उनका दर्शन करके सबने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। ब्रह्माजीने उनसे कुशल-समाचार पूछा और प्रसन्न होकर कहा—'पुत्रो! जिसने महादेवजीका पूजन किया है, उसपर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। यदि भगवान् शिवकी पूजा नहीं की जाय तो श्रीहरि अपनी पूजाको ग्रहण नहीं करते। अतः सब प्रकारसे यत्न करके भगवान् शंकरका पूजन
* दीनान्धकृपणानां च दानं दद्यात्स्वशक्तितः। सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोकं स गच्छति॥ (स्क० पु०, द्वा० मा० १४।५५)