भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1382

* प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३५३

करना चाहिये; जिससे सदा भगवान् विष्णुके लिये की हुई पूजा पूर्णताको प्राप्त हो।'*

ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर योगसिद्ध सनकादि महर्षियोंने शिवलिंग स्थापित किया। उसके पास ही ऋषियोंने एक कूपका निर्माण किया। यह देखकर ब्रह्माजीने कहा—'पुत्रो! तुम योगसिद्ध हो। तुम्हारे द्वारा यह शिवलिंग स्थापित हुआ है, इसलिये इसका नाम सिद्धेश्वर होगा। इसके समीप ही ऋषियोंने जो यह कूप निर्माण किया है, इसकी लोकमें ऋषितीर्थके नामसे प्रसिद्धि होगी। यहाँ श्राद्ध और तर्पण किये बिना ही केवल भक्तिपूर्वक स्नान करनेमात्रसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। असत्यवादी तथा परनिन्दापरायण मनुष्य भी ऋषितीर्थमें स्नानमात्र करके शुद्ध हो जाते हैं। ऋषितीर्थमें स्नान करनेवाले पुरुषके मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। जो ऋषितीर्थमें स्नान करके सिद्धेश्वरजीका दर्शन करता है, वह यदि पुत्रहीन हो तो उसे पुत्र-पौत्र प्राप्त होते हैं। सिद्धेश्वरके दर्शनसे पापका नाश और पुण्यकी वृद्धि होती है। उन्हें प्रणाम करनेवाले मनुष्योंको अभीष्ट मनोरथोंकी प्राप्ति होती है और उनके पितर सन्तुष्ट होते हैं।'

तदनन्तर अति उत्तम गदातीर्थमें जाय, जिसमें विधिपूर्वक स्नान करनेसे अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है। जो वाराहरूपधारी देवेश्वर श्रीविष्णुकी भक्तिपूर्वक पूजा और वन्दना करता है, वह विष्णुलोकमें पूजित होता है।

वहाँसे नागतीर्थमें जाय, जिसमें स्नान करके मनुष्य दिव्य लोकको पाता है। जिस समय समुद्रने द्वारकापुरीको डुबा दिया था, उस समय बहुत-से तीर्थ जल और बालूसे आच्छादित हो गये। उनमेंसे कुछ तो देखे जाते हैं और कुछ अदृश्य हैं। मैं उन सबका संक्षेपसे वर्णन करता हूँ। पापनाशिनी चन्द्रभागामें स्नान करके मनुष्य वाजपेय यज्ञका फल पाता है। वहीं यशोदा और नन्दकी पुत्री देवी चन्द्रार्चिताका स्थान है, जो कुमारी अवस्थामें हैं। उनके हाथोंमें शक्ति, ढाल और तलवार आदि शस्त्र शोभा पाते हैं। वे ही कंस आदि दैत्योंका दलन करनेवाली तथा बलराम और श्रीकृष्णकी बहिन हैं। उनके दर्शनमात्रसे मनुष्य सब कामनाओंको पा लेता है। कलिकालमें पापनाशक मुक्तिद्वार तीर्थमें स्नान करके मनुष्य गंगास्नानका फल पाता है। जहाँसे गोमती निकलकर समुद्रमें मिली हैं, वहाँ स्नान करके मानव अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। वहीं भृगुजीने तपस्या की और अम्बिकाजीको स्थापित किया। वे देवी भृगु-अर्चिताके नामसे प्रसिद्ध हैं। उनके चिन्तनसे मनुष्य उत्तम सिद्धिको पाते हैं।

जालेश्वरजीका दर्शन करके मनुष्य गहरे पापसे छूट जाता है और भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करके वह शिवलोकको पाता है।

तत्पश्चात् चक्रस्वामीके उत्तम तीर्थमें जाय, जहाँ त्रिभुवनविख्यात जरत्कारुतीर्थ है। उसमें स्नान करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता।

इन सब तीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य यथायोग्य दक्षिणा देनेके पश्चात् परम पुरुष श्रीकृष्णका पूजन करे। पहले जयन्तका और उसके बाद पुलोमपुत्रका पूजन करना चाहिये। इन दोनोंको देवराज इन्द्रने श्रीहरिकी सेवाके लिये नियुक्त कर रखा है। तदनन्तर देवकीनन्दन श्रीकृष्णके समीप जाय। एक मनुष्य निरन्तर प्राणायाम आदिपूर्वक ज्ञान और ध्यानमें तत्पर है और दूसरा केवल देवेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन करता है। उन दोनोंका समान फल है। एक मानव गंगा आदि तीर्थोंमें स्नान करता है और दूसरा देवेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन; उन दोनोंको समान फलकी प्राप्ति होती है।


* येनार्चितो महादेवस्तस्य तुष्यति केशवः। अनर्चिते नीलकण्ठे न गृह्णात्यर्चनं हरिः॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पूज्यतां नीललोहितः। येन सम्पूर्णातां याति कृष्णपूजा कृता सदा॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० १५।४-५)