भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1383

१३५४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

श्रीकृष्ण तथा रुक्मिणीदेवीके दर्शन और पूजनकी महिमा

**प्रह्लादजी कहते हैं—**द्वारकापुरीमें जाकर मधुसूदन श्रीविष्णुकी अवश्य पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् सुगन्ध लेप, चन्दन, वस्त्र, पुष्प, नैवेद्य, आभूषण, ताम्बूल, फल तथा आरती आदि उपचारोंसे भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करके उन्हें साष्टांग प्रणाम करे। घीका दीपक जलाकर अर्पण करे। रात्रिमें जागरण, गाने, बजाने तथा पुस्तक-पाठ करे। भादोंकी अष्टमी और द्वादशीको भी श्रीहरिका पूजन करना चाहिये। कलियुगमें गोमती और समुद्रके संगममें स्नान और श्रीकृष्णपूजन करके मनुष्य निर्मल लोकमें जाता है, जहाँ पहुँचकर फिर कभी शोकका सामना नहीं करना पड़ता।

विधिपूर्वक श्रीकृष्णकी पूजा करनेके अनन्तर मनुष्य रुक्मिणीजीके समीप जाय और दही, दूध, मधु, घी तथा शक्करसे उन्हें स्नान करावे। फिर गन्ध और फूलोंसे पूजा करे। जो तीर्थके जलसे स्नान कराता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जो इस प्रकार श्रीकृष्णप्रिया रुक्मिणीदेवीको नहलाता है, उसके लिये इहलोक और परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है। जो चन्दन, रोली तथा कस्तूरीका लेप लगाता है, वह कभी पुत्रहीनता और निर्धनताका कष्ट नहीं देखता। वह सदा भोग-सामग्रियोंसे सम्पन्न, रूपवान् तथा जनसम्मानित होता है। जो चमेली, सुगन्धित कमल, कनेर, बेला, तुलसी, राजचम्पा, जलमें होनेवाले फूल, केतकी तथा पाटल (गुलाब) आदि फूलोंसे, धूप, अगरु तथा गुग्गुलसे, सुन्दर एवं कोमल वस्त्रोंसे भक्तिपूर्वक कृष्णप्रिया रुक्मिणीकी पूजा करता है और मणि एवं रत्नोंके आभूषणोंसे उनका श्रृंगार करता है, उसके कुलमें कोई दुःखी, अधर्मी, निर्धन, पुत्रहीन, पापकमीं, धूर्त तथा नीचसेवी नहीं होता। कलियुगमें मनुष्योंको जगन्माता रुक्मिणीदेवीका भक्ष्य-भोज्य आदि नैवेद्योंके द्वारा पूजन करना चाहिये। 'देवी मे प्रीयताम्—रुक्मिणीदेवी मुझपर प्रसन्न हों' यही पूजनका उद्देश्य होना चाहिये। भक्तिभावसे रुक्मिणीजीको कर्पूरयुक्त ताम्बूल निवेदन करे। अक्षतोंके साथ दिव्य फल लेकर निम्नांकित मन्त्रसे विधिपूर्वक अर्घ्य दे—

कृष्णप्रिये नमस्तुभ्यं विदर्भाधिपनन्दिनि।
सर्वकामप्रदे देवि गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥

'विदर्भराजकुमारी! कृष्णप्रिया रुक्मिणीदेवी! तुम्हें नमस्कार है। तुम सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाली हो। मेरा यह अर्घ्य स्वीकार करो। तुम्हें नमस्कार है।'

इस प्रकार अर्घ्य देकर प्रज्वलित दीपकसहित आरती करे। विशेषतः कर्पूर जलाकर देवीकी नीराजना करे। शंखमें जल लेकर भावपूर्वक देवीके ऊपर घुमावे और फिर आत्मशुद्धिके लिये सिरपर धारण करे। तत्पश्चात् 'नमः कृष्णप्रिये'— ऐसा कहते हुए पृथ्वीपर लोटकर साष्टांग प्रणाम करे। जो कलियुगमें श्रीकृष्णपुरी द्वारकामें जाकर उनकी प्रिया रुक्मिणीदेवीका दर्शन करता है, वह इस लोक और परलोकमें सब कामनाओंको पाता है। माघ शुक्ला अष्टमीको जो चन्दन, पुष्प तथा अनेक प्रकारके उपहारोंसे कामदेवकी जननी रुक्मिणीदेवीका पूजन करते हैं, उनका जीवन सफल है, उनके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। जो चैत्र और वैशाखमें द्वादशी तिथिको कृष्णसहित रुक्मिणीदेवीका दर्शन करते हैं, वे मानव धन्य हैं। उन्हें श्रीकृष्णके साथ उनके धाममें रहनेका सौभाग्य प्राप्त होता है। जिन मानवोंने भाद्रपदमासमें सदा ही श्रीकृष्ण और रुक्मिणीका पूजन किया है, वे सब पापोंसे मुक्त हो वैकुण्ठ-धाममें जाते हैं। जो कार्तिक शुक्ला द्वादशीको श्रीकृष्णसहित रुक्मिणीका दर्शन करता है, उसका जीवन सफल हो जाता है और सन्तान-परम्पराका कभी नाश नहीं होता।

**सूतजी कहते हैं—**बलिको बाँधनेवाले भगवान्