संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१३५४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
श्रीकृष्ण तथा रुक्मिणीदेवीके दर्शन और पूजनकी महिमा
**प्रह्लादजी कहते हैं—**द्वारकापुरीमें जाकर मधुसूदन श्रीविष्णुकी अवश्य पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् सुगन्ध लेप, चन्दन, वस्त्र, पुष्प, नैवेद्य, आभूषण, ताम्बूल, फल तथा आरती आदि उपचारोंसे भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करके उन्हें साष्टांग प्रणाम करे। घीका दीपक जलाकर अर्पण करे। रात्रिमें जागरण, गाने, बजाने तथा पुस्तक-पाठ करे। भादोंकी अष्टमी और द्वादशीको भी श्रीहरिका पूजन करना चाहिये। कलियुगमें गोमती और समुद्रके संगममें स्नान और श्रीकृष्णपूजन करके मनुष्य निर्मल लोकमें जाता है, जहाँ पहुँचकर फिर कभी शोकका सामना नहीं करना पड़ता।
विधिपूर्वक श्रीकृष्णकी पूजा करनेके अनन्तर मनुष्य रुक्मिणीजीके समीप जाय और दही, दूध, मधु, घी तथा शक्करसे उन्हें स्नान करावे। फिर गन्ध और फूलोंसे पूजा करे। जो तीर्थके जलसे स्नान कराता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जो इस प्रकार श्रीकृष्णप्रिया रुक्मिणीदेवीको नहलाता है, उसके लिये इहलोक और परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है। जो चन्दन, रोली तथा कस्तूरीका लेप लगाता है, वह कभी पुत्रहीनता और निर्धनताका कष्ट नहीं देखता। वह सदा भोग-सामग्रियोंसे सम्पन्न, रूपवान् तथा जनसम्मानित होता है। जो चमेली, सुगन्धित कमल, कनेर, बेला, तुलसी, राजचम्पा, जलमें होनेवाले फूल, केतकी तथा पाटल (गुलाब) आदि फूलोंसे, धूप, अगरु तथा गुग्गुलसे, सुन्दर एवं कोमल वस्त्रोंसे भक्तिपूर्वक कृष्णप्रिया रुक्मिणीकी पूजा करता है और मणि एवं रत्नोंके आभूषणोंसे उनका श्रृंगार करता है, उसके कुलमें कोई दुःखी, अधर्मी, निर्धन, पुत्रहीन, पापकमीं, धूर्त तथा नीचसेवी नहीं होता। कलियुगमें मनुष्योंको जगन्माता रुक्मिणीदेवीका भक्ष्य-भोज्य आदि नैवेद्योंके द्वारा पूजन करना चाहिये। 'देवी मे प्रीयताम्—रुक्मिणीदेवी मुझपर प्रसन्न हों' यही पूजनका उद्देश्य होना चाहिये। भक्तिभावसे रुक्मिणीजीको कर्पूरयुक्त ताम्बूल निवेदन करे। अक्षतोंके साथ दिव्य फल लेकर निम्नांकित मन्त्रसे विधिपूर्वक अर्घ्य दे—
कृष्णप्रिये नमस्तुभ्यं विदर्भाधिपनन्दिनि।
सर्वकामप्रदे देवि गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥
'विदर्भराजकुमारी! कृष्णप्रिया रुक्मिणीदेवी! तुम्हें नमस्कार है। तुम सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाली हो। मेरा यह अर्घ्य स्वीकार करो। तुम्हें नमस्कार है।'
इस प्रकार अर्घ्य देकर प्रज्वलित दीपकसहित आरती करे। विशेषतः कर्पूर जलाकर देवीकी नीराजना करे। शंखमें जल लेकर भावपूर्वक देवीके ऊपर घुमावे और फिर आत्मशुद्धिके लिये सिरपर धारण करे। तत्पश्चात् 'नमः कृष्णप्रिये'— ऐसा कहते हुए पृथ्वीपर लोटकर साष्टांग प्रणाम करे। जो कलियुगमें श्रीकृष्णपुरी द्वारकामें जाकर उनकी प्रिया रुक्मिणीदेवीका दर्शन करता है, वह इस लोक और परलोकमें सब कामनाओंको पाता है। माघ शुक्ला अष्टमीको जो चन्दन, पुष्प तथा अनेक प्रकारके उपहारोंसे कामदेवकी जननी रुक्मिणीदेवीका पूजन करते हैं, उनका जीवन सफल है, उनके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। जो चैत्र और वैशाखमें द्वादशी तिथिको कृष्णसहित रुक्मिणीदेवीका दर्शन करते हैं, वे मानव धन्य हैं। उन्हें श्रीकृष्णके साथ उनके धाममें रहनेका सौभाग्य प्राप्त होता है। जिन मानवोंने भाद्रपदमासमें सदा ही श्रीकृष्ण और रुक्मिणीका पूजन किया है, वे सब पापोंसे मुक्त हो वैकुण्ठ-धाममें जाते हैं। जो कार्तिक शुक्ला द्वादशीको श्रीकृष्णसहित रुक्मिणीका दर्शन करता है, उसका जीवन सफल हो जाता है और सन्तान-परम्पराका कभी नाश नहीं होता।
**सूतजी कहते हैं—**बलिको बाँधनेवाले भगवान्
| * प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * | १३५५ |
|---|
विष्णुने इस पुराणसंहिताका संकलन किया है। उन्होंने कृपापूर्वक महात्मा प्रह्लादको इसका उपदेश किया। दैत्यराज प्रह्लादने ऋषियोंके पूछनेपर उनसे इसका वर्णन किया। जो मानव भक्तिपूर्वक इसको सुनता अथवा पढ़ता है, वह सम्पूर्ण मनोरथोंको पाता और विष्णुलोकमें जाता है। इस विषयमें महात्मा मार्कण्डेय तथा राजा इन्द्रद्युम्नका संवाद भी हुआ है, जिसे बताया जाता है।
~~ o ~~
द्वारकापुरी तथा वहाँ श्रीकृष्णके दर्शन-पूजनका माहात्म्य तथा तुलसीकी महिमा
मार्कण्डेयजी बोले—इन्द्रद्युम्न! कलियुगमें जो मानव श्रीकृष्णका माहात्म्य सुनते और पढ़ते हैं, उनका यमलोकमें निवास नहीं होता। जिन्हें सदा श्रीकृष्णकी कथा प्राणोंसे भी प्रिय है, उसके लिये इस लोक और परलोकमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है। कलियुगमें यदि चाण्डाल भी द्वारकापुरीमें निवास करता है, तो वह यतियोंकी गति पाता है। जो द्वारकापुरीकी यात्रा करता है, उसे मार्गमें प्रतिदिन कुरुक्षेत्र-सेवनका फल प्राप्त होता है। कलियुगमें जिनकी बुद्धि द्वारकाकी यात्रा और श्रीकृष्णका दर्शन करनेमें संलग्न होती है, वे मानव धन्य हैं और उनका वह मनोरथ भी धन्य है। जिन्होंने कोटि अयुत पापोंका नाश करनेवाले श्रीकृष्ण-मुखारविन्दका दर्शन किया है, वे धन्य हैं, कृतकृत्य हैं, वन्दनीय हैं और सम्पूर्ण लोकोंको पवित्र करनेवाले हैं। जो मानव श्रीकृष्णके मस्तकपर दूधसे स्नान कराते हैं, उन्हें सौ अश्वमेध यज्ञोंका पुण्य प्राप्त होता है। जो मनुष्य निष्कामभावसे श्रीकृष्णको स्नान कराता है, वह मोक्ष पाता है। जो स्नानसे भीगे हुए श्रीकृष्णविग्रहको वस्त्रसे पोंछता है, उसका जन्मभरका पाप नष्ट हो जाता है। जो जगदीश्वर श्रीकृष्णको स्नान कराकर उन्हें फूलोंकी माला पहनाता है, जो उनके स्नानकालमें शंख बजाता है, अथवा सहस्रनामोंका पाठ करता है, उसे एक-एक अक्षरपर कपिला गौके दानका फल प्राप्त होता है। गीता, गजेन्द्रमोक्ष, भीष्मस्तवराज तथा महर्षियोंद्वारा रचित अन्यान्य स्तोत्रोंके पाठका भी यही फल है। भगवान् उनके समीप आते और उनकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करते हैं। जो श्रीकृष्णके स्नानकालमें नृत्य और गान करता है, ताली बजाता और जय-जयकार करता है, वह योनि-यन्त्रसे निकलनेकी (जन्म लेनेकी) पीड़ासे छुटकारा पा जाता है। जो मानव कलियुगमें श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन करता है, वह पितरोंसहित वैकुण्ठधाममें निवास करता है। जो भाँति-भाँतिके कोमल वस्त्रोंसे पूजा करके माधवको धूप निवेदन करता है, वह विष्णुधाममें निवास करता है। जो भक्तिपूर्वक सुवर्ण, रत्न एवं मणियोंके आभूषणोंसे श्रीकृष्णका शृंगार करते हैं, उन्हें वह उत्तम फल प्राप्त होता है, जो इन्द्र, शिव, ब्रह्मा तथा मुनियोंको भी ज्ञात नहीं। जो मानव कोमल तुलसीदलोंसे और शुद्ध वस्त्रोंसे देवकीनन्दन श्रीकृष्णकी पूजा करता है, उसे यज्ञकर्ताओं, दानवीरों, तीर्थसेवियों, मातृभक्तों तथा वेधरहित द्वादशी तिथिको भगवान् विष्णुके आगे जागरण, नृत्य, गान और वैष्णवशास्त्रका पाठ करनेवाले भक्तोंको प्राप्त होनेवाला फल मिलता है। तुलसीमालासे पूजित होकर रुक्मिणीवल्लभ श्रीकृष्ण पूर्वोक्त सभी फल प्रदान करते हैं। जैसे लक्ष्मी भगवान् विष्णुको प्रिय हैं, उसी प्रकार उनसे भी अधिक तुलसी उन्हें प्रिय हैं। कलियुगमें जहाँ-कहीं भी तुलसीकी मालासे भगवान् विष्णुका पूजन होता है, वहाँ द्वारकाका समग्र पुण्य प्राप्त होता है। 'श्रीकृष्ण शरणं मम' (श्रीकृष्ण मेरे आश्रय हैं) यह आठ अक्षरोंवाला मन्त्र श्रीकृष्णकी कृपा प्राप्त करानेवाला है। जो कलियुगमें कपूरसहित
१३५६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
काले अगुरुसे श्रीकृष्णको धूप देते हैं, वे श्रीकृष्णका सारूप्य प्राप्त करते हैं। घी, गुग्गुल तथा सुगन्धित पदार्थके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णको धूप देकर मनुष्य सदा कल्याणमय पदको प्राप्त होता है। जो श्रीकृष्णको अगुरु धूप देता है, वह सब पातकोंका त्याग करके अत्यन्त सुन्दर रूप पाता है। जो श्रीकृष्णमन्दिरके द्वारपर प्रतिदिन दीपमाला जगाता है, वह सातों द्वीपोंसे युक्त पृथ्वीका सम्राट् होता है। जो श्रीकृष्णके आगे सुगन्धित नैवेद्य निवेदन करता है, उसके पितर कल्पपर्यन्त नित्य तृप्त रहते हैं। जो कपूर और सुपारीके साथ ताम्बूल निवेदन करता है, उसे देवपदकी प्राप्ति होती है। जो भगवान् श्रीकृष्णके आगे जलसे भरा हुआ कलश और कमण्डलु निवेदन करता है, उसके पितर एक कल्पतक जल पीनेकी इच्छा नहीं रखते। जो भगवान् श्रीकृष्णको मनोहर फल भेंट करता है, उसके उत्तम मनोरथ कल्पपर्यन्त सफल होते रहते हैं। जो देवदेव श्रीकृष्णकी परिक्रमा करता है, उसके कुलमें किसीको यमलोकका दण्ड नहीं भोगना पड़ता। जो श्रीकृष्णके मन्दिरमें सुन्दर पुष्प-मण्डप बनाता है, वह कोटि-कोटि पुष्पक विमानोंद्वारा दिव्यलोकमें क्रीड़ा करता है। जो श्वेत चँवरकी हवा देकर श्रीकृष्णको प्रसन्न करता है, देवेश्वर श्रीकृष्ण उसके मस्तकको अपने मुँहसे चूमते हैं। जो श्रीकृष्णके मन्दिरको केलेके खंभोंसे सुशोभित करता है, उसका स्वागत देवराज स्वयं करते हैं। जो मनुष्य श्रीकृष्ण-मन्दिरको ध्वजा-पताकाओंसे सजाता है, वह सदा सूर्यलोकमें निवास करता है। जो श्रीकृष्ण-मन्दिरके ऊपर ध्वजारोपण करता है, उसका ब्रह्मलोकमें निवास होता है। जो देवदेव श्रीकृष्णके आँगनको स्वस्तिकोंसे विभूषित करता है, वह तीनों लोकोंमें क्रीड़ा करता है। जो मानव शंखमें जल लेकर भगवान् श्रीकृष्णके ऊपर घुमाता है, वह पूरे कल्पभर क्षीरसागरमें भगवान् विष्णुके समीप निवास करता है। जो विष्णुसहस्रनाम अथवा अन्य स्तोत्रोंका पाठ करते हुए भगवान् श्रीकृष्णकी परिक्रमा करता है, उसे पग-पगपर सातों द्वीपोंवाली पृथ्वीकी परिक्रमाका पुण्य प्राप्त होता है। जो उन्हें साष्टांग प्रणाम करता है, उसे दस हजार अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। जो मीठे स्वरवाले उत्तम गीतोंसे भगवान् श्रीकृष्णको सन्तुष्ट करता है, उसे सामवेदके पाठका फल प्राप्त होता है। जो प्रसन्नचित्त होकर भक्तिभावसे श्रीकृष्णके सम्मुख नृत्य करता है, वह अपने समस्त पापोंको भस्म कर देता है। जो श्रीकृष्णके समीप आकर भक्तिभावसे स्वस्तिवाचन करता है, उसे एक-एक अक्षरमें सौ कपिला-दानका पुण्य मिलता है। जो ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदकी वाणीसे श्रीकृष्णको सन्तुष्ट करते हैं, उन्हें ब्रह्मलोकका निवास प्राप्त होता है। जो योगी पुरुष श्रीकृष्णके समीप योग-शास्त्र और वेदान्तका पाठ करते हैं, वे सूर्यमण्डलको भेदकर भगवान् विष्णुके धाममें जाते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता, विष्णुसहस्रनाम, भीष्मस्तवराज, अनुस्मृति और गजेन्द्रमोक्ष—ये पाँचों स्तोत्र श्रीकृष्णको अत्यन्त दुर्लभ प्रतीत होते हैं—बहुत प्रिय लगते हैं*। श्रीकृष्णके समीप जो श्रीमद्भागवतका पाठ करता है, वह योगियोंके साथ क्रीड़ा करता है। जो वहाँ रामायण, महाभारत और पुराणोंका पाठ करता है, उसे मोक्ष प्राप्त होता है। जो गोमतीके जलमें स्नान करके पवित्र हो श्रीकृष्णके मुखारविन्दका दर्शन करते हैं, उनके दर्शनसे सौ वर्षोंका पातक नष्ट हो जाता है। संसारमें वे मनुष्य धन्य हैं, जो कलियुगमें द्वारकापुरी जाकर गोमती और समुद्रके संगममें देवताओं और पितरोंका तर्पण करते हैं;
* योगशास्त्राणि वेदान्तान् योगिनः कृष्णसन्निधौ। पठन्ति रविबिम्बं तु भित्त्वा यान्ति लयं हरेः॥
गीता नामसहस्रं तु स्तवराजस्त्वनुस्मृतिः। गजेन्द्रमोक्षणं चापि कृष्णस्यातीव दुर्लभम्॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० २३। ७९-८०)
* प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३५७
वे हरिद्वार, प्रयाग, गया, कुरुक्षेत्र, पुष्कर, प्रभास, श्रीस्थल और शुक्लतीर्थके सेवनका तथा सहस्रों चान्द्रायणव्रतका फल पाते हैं। द्वारकापुरी धन्य है, जहाँ गोमती नदी बहती है और जहाँ रुक्मिणीवल्लभ श्रीकृष्ण निवास करते हैं। जो कलिकालमें पापसे मोहित होकर गोमतीके जलमें स्नान नहीं करते, उनके पापबन्धनका नाश कैसे होगा। श्रीकृष्णने कलिकालके लिये गोमती नदीको स्वर्गलोककी सीढ़ी बनाया है। वह मनुष्योंके मनको आनन्द देनेवाली तथा स्नानमात्रसे मोक्ष प्रदान करनेवाली है। राजन्! जहाँ गोमतीके जलसे मिला हुआ समुद्र जाग रहा है, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण विराजमान हैं और जहाँ पूजन करनेपर मोक्ष देनेवाली चक्रांकित शिलाएँ उपलब्ध होती हैं, वहाँ चलो। जहाँकी मिट्टी भी चक्रसे चिह्नित होकर कलियुगमें पापका नाश करनेके लिये स्थित है, जो पुरी दैत्य, दानव, राक्षस तथा देवताओंको भी शरण देनेवाली है, जिसे देवकीनन्दन श्रीकृष्ण कलिकालमें कभी नहीं छोड़ते हैं, उस द्वारकापुरीका कौन सेवन नहीं करेगा? जो मनुष्य द्वारकामें श्रीकृष्णचन्द्रजीके मुखारविन्दका तीनों समय दर्शन करते हैं, उनकी करोड़ों कल्पोंमें भी पुनरावृत्ति नहीं होती। जो विधवा स्त्री द्वारकामें निवास करती है, वह परम पदको प्राप्त होती है। जो द्वारकापुरीको नहीं गया, वह इस संसारमें पुत्र लेकर भी क्या करेगा?
श्रीकृष्णकी द्वारकापुरीमें जाकर जो तुलसीदलोंसे उनकी पूजा करता है, उसने जन्मका फल पा लिया और पितरोंको तार दिया। जो श्रीकृष्णके श्रीविग्रहसे उतारी हुई प्रसाद-स्वरूपा तुलसीमाला धारण करता है, वह एक-एक पत्तेमें दस अश्वमेध यज्ञोंका फल पाता है। जिसके मस्तकपर तुलसीके काष्ठकी माला शोभा देती है, उस मानवके शरीरमें साक्षात् श्रीहरि विराजमान होते हैं। जो कलियुगमें तुलसीकाष्ठमालासे विभूषित होकर पुण्यकर्म करता है तथा देवताओं और पितरोंका पूजन करता है उसका वह सत्कर्म कोटिगुना हो जाता है। तुलसीकाष्ठकी माला देखकर यमराजके दूत दूर भागते हैं, जैसे आँधीसे उड़ाये हुए पत्ते दूर हो जाते हैं। जिसके घरमें तुलसीका काष्ठ तथा उसकी सूखी या हरी पत्ती रहती है, उसके घरमें कहींसे पापका संक्रमण नहीं होता। जो तुलसीमालासे भूषित होता है, उसके हृदयमें भगवान् श्रीकृष्णके प्रति अविचल भक्ति होती है तथा उसे इहलोक और परलोकमें भय नहीं प्राप्त होते। उसके दुःस्वप्न, अपशकुन और शत्रुभयका निवारण हो जाता है। बोधिनी, शयनी, त्रिस्पृशा तथा पक्षवर्द्धिनी एकादशी अवश्य करनी चाहिये। अष्टमीके भी जयन्ती, विजया और जया आदि कई भेद हैं। वह सब पापोंका नाश करनेवाली तथा श्रीकृष्णको अत्यन्त प्रिय है।
शंखोद्धारतीर्थकी महिमा
मार्कण्डेयजी कहते हैं—महाभारतमें कौरवसेनाके मारे जाने और समस्त योद्धाओंके नष्ट हो जानेपर अर्जुन भक्तिभावसे श्रीकृष्णके समीप गये और उनकी परिक्रमा तथा प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले—'भगवन्! शंखोद्धारतीर्थका फल बताइये।'
श्रीभगवान् बोले—महाबाहो! जो मनुष्य घरमें रहकर भी शंखोद्धारतीर्थका स्मरण करते हैं, उनकी पुनरावृत्ति नहीं होती। जो शंखोद्धारतीर्थमें जाकर मन-ही-मन भगवान् शंखधरका स्मरण करते हैं, वे विष्णुलोकमें निवास पाते हैं। जो शंखोद्धारतीर्थका दर्शन करता है, वह स्वर्गलोकको जाता है। अर्जुन! यदि शंखोद्धारकी यात्रा करनेवाला मनुष्य मार्गमें ही मर जाय और शंखोद्धारका दर्शन न कर सके तो वह भी मुझे वैसा ही प्रिय
१३५८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
है, जैसी कि लक्ष्मी हैं। मनुष्यको अपने घरमें रहते हुए भी शंखोद्धारतीर्थ और शंखधारी भगवान् विष्णुका स्मरण करना चाहिये। करोड़ों सूर्यग्रहणोंके समय सरस्वतीतीर्थमें जो फल होता है, वही आधे पलमें शंखोद्धारतीर्थके दर्शनसे हो जाता है। जो मनुष्य शंखोद्धारतीर्थमें स्नान करके शंखधारी श्रीहरिका दर्शन करता है, उसके पुण्यकी कोई संख्या नहीं है। मनुष्य तभीतक संसारमें तथा पापपूर्ण नरकमें भटकते हैं जबतक कलिमलनाशक शंखोद्धार-तीर्थका दर्शन नहीं करते। शंखोधारतीर्थमें स्नान करके मनुष्य फिर जन्म नहीं लेता। शंखोद्धारतीर्थके समान मोक्षदायक तीर्थ प्रायः नहीं देखा जाता। साढ़े तीन करोड़ तीर्थ कहे गये हैं। शंखोद्धारमें उन सभी तीर्थोंका फल प्राप्त होता है। जिसका मन श्रीकृष्णमें नहीं लगता है और जो शंखोद्धारतीर्थका दर्शन नहीं करता है, उसके स्वर्गवासी पितर भी उसे भयंकर शाप देते हैं। जो शंखोद्धारतीर्थमें रहकर अन्नदान करता है, उसने रुक्मिणीपतिकी प्रसन्नतासे स्वयं ही मुक्ति प्राप्त कर ली। अन्नदानके समान दूसरा कोई दान न हुआ है न होगा। इसलिये प्रयत्नपूर्वक अन्नदान करना चाहिये।
कुन्तीनन्दन! जो तुलसीदलसे मेरी पूजा करता है, उससे इन्द्रदेव भी भयभीत होते हैं। जो किसी भी कारणसे श्रीकृष्णका एकादशी व्रत कर लेते हैं, वे धन्य हैं। मृत्युके पश्चात् उन्हें चतुर्भुज भगवान् विष्णु प्राप्त होते हैं। द्वारका समुद्रके जलमें सब ओरसे दुर्जय है और उसके मध्यभागमें पापनाशक शंखदेव निवास करते हैं। जो मनुष्य शंखोद्धारमें स्नान करके विधिपूर्वक श्राद्ध करते हैं, वे अपने पितरोंका उद्धार करके उत्तम लोकको जाते हैं। भगवान् शंखधारीको नमस्कार और उनका पूजन करके मानव उस निर्मल लोकमें जाता है, जहाँ शोकका अत्यन्त अभाव है। भगवान् शंखधरका दर्शन करके मरणधर्मा मनुष्य अनेक जन्मोंके घोर पापोंसे मुक्त तथा कृतकृत्य हो जाता है। भगवान् शंख उसे मनोवांछित फल देते हैं।
द्वारकापुरी, गोपीचन्दन तथा गोमतीका माहात्म्य
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! कलिकालमें मथुरा, द्वारका और अयोध्या—ये तीन पुरियाँ भगवान्को अत्यन्त प्रिय तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देनेवाली हैं। मथुरामें यमुना, द्वारकामें गोमती तथा अयोध्यामें सरयू नदी है, जो सेवन करनेपर मोक्षदायिनी होती है। अयोध्यामें श्रीहरिका, द्वारकामें श्रीकृष्णका और मथुरामें केशवका स्मरण करनेसे मुक्ति प्राप्त होती है। संसारमें मथुरापुरी धन्य है, जहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु प्रकट हुए हैं। द्वारकापुरी सफल है, जहाँ रहकर श्रीहरिने अनेक प्रकारकी लीलाएँ की हैं और सब कामनाओंको देनेवाली अयोध्यापुरी धन्यातिधन्य है, जिसका स्वयं धर्मज्ञ भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने पालन किया है। अयोध्याके स्वामी भगवान् श्रीरामका, मथुरावासी केशवका तथा द्वारकानिवासी परम सुन्दर श्रीकृष्णका प्रेमसे कीर्तन करे। कीर्तन करनेसे मथुरा, स्मरण करनेसे द्वारकापुरी और यात्रा करनेसे अयोध्यापुरी पुण्यदायिनी होती है। इन तीनोंके द्वारा विशुद्ध पदकी प्राप्ति होती है। श्रीकृष्ण, ब्रह्माजी, श्रीविष्णु तथा द्वारकापुरीका श्रवण अथवा दर्शन करके मनुष्य जन्मके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। अयोध्या, मथुरा और द्वारकापुरी श्रवण अथवा दर्शनकी अभिलाषा करनेपर कल्पभरके पापका नाश कर देती है। कलियुगमें जो श्रीकृष्ण, विष्णु और हरिका स्मरण करता तथा द्वादशीको रातमें भगवान्के समीप जागता है, उसे दस हजार अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। कलिकालमें वे मनुष्य धन्य हैं, जो सरयू, गोमती
- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * । १३५९
और यमुनाके जलमें स्नान करते हैं। जो पश्चिम दिशाकी ओर मुँह करके स्नान करते और दोनों हाथ जोड़कर द्वारकापुरीका स्मरण करते हैं, उन्हें कोटिगुना फल होता है। कलियुगमें जो मानव द्वारकापुरीका चिन्तन करते हैं वे दस हजार कपिला गौओंके दानका पुण्य पाते हैं। राजन्! मैं मार्कण्डेय सात कल्पकी बातोंका स्मरण करनेवाला हूँ। कलियुगमें द्वारकापुरीके समान अथवा इससे बढ़कर दूसरी कोई पुरी नहीं है। कलियुगमें जो मनुष्य द्वारकापुरीको जाता है, वह पग-पगपर एक हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञोंका फल पाता है। नृपश्रेष्ठ! कलियुगमें द्वारकाकी यात्रा करते हुए जिन मनुष्योंका चित्त विचलित नहीं होता, उनका जीवन सफल है। जिसने गोमतीके तटपर भगवान् श्रीकृष्णके समीप पिण्डान किया है, उसी पुत्रसे माता पुत्रवती है और पितर पुत्रवान् है। गोपीचन्दनका तिलक करके मनुष्य यदि इस पृथ्वीपर भ्रमण करता है, तो उससे वह समूचा देश पवित्र हो जाता है। फिर जहाँ वह स्वयं स्थित है, उसके लिये तो कहना ही क्या है। जो द्वारकामें उत्पन्न हुई श्रीकृष्णसेवित तुलसीको अपने मस्तकपर धारण करता है, वह स्वर्गलोकका स्वामी होता है। भगवान् विष्णुको विजया एकादशी तिथि, गंगाजल, काशीपुरी, तुलसी, आँवलेका फल, भागवत शास्त्र, रामायण, द्वारकापुरी, चमेलीका फूल, एकादशीकी रातमें जागरण तथा कीर्तन और गायन—ये अधिक प्रिय हैं।* कलिकालमें जिसके घरमें सदा गोपीचन्दनकी मृत्तिका विद्यमान है वहाँ श्रीकृष्णसहित द्वारकापुरी स्थित है। कृतघ्न, गोघाती तथा समस्त पापोंका आचरण करनेवाला मनुष्य भी गोपीचन्दनके सम्पर्कसे तत्काल पवित्र हो जाता है। जो किसी वैष्णवको गोपीचन्दनका एक टुकड़ा देता है, वह अपने कुलका उद्धार करता है। जिसके मन्दिरमें द्वारकाकी तुलसी है, उससे यमराज भी डरते हैं। द्वारकाकी मृत्तिका, तुलसी तथा श्रीकृष्णका कीर्तन सौ करोड़ यज्ञोंसे भी अधिक पुण्यदायक बताया गया है। मैंने सब शास्त्रों और पुराणोंका बार-बार अवलोकन करके देख लिया, मुझे द्वारकाके समान दूसरी कोई पुरी नहीं दिखायी दी। जिसने द्वारकाकी यात्रा और श्रीकृष्णका कीर्तन किया है, उसने हजारों तीर्थोंमें स्नान और करोड़ों यज्ञोंका यजन कर लिया है। जिन मनुष्योंने द्वारकापुरीमें जाकर श्रीकृष्णके मुखारविन्दका दर्शन नहीं किया, वे मानव पंगु हैं, जन्मके ही अन्धे हैं। जिन्होंने द्वारकापुरीमें जाकर एकादशीकी रात्रिमें भक्तिपूर्वक जागरण और नृत्य किया है, वे कृतार्थ और धन्य हैं। जो श्रीकृष्णपुरी द्वारकामें जाकर गोमतीके तटपर पिण्डदान और यथाशक्ति दान करता है, उसके पितर तृप्त हो जाते हैं। जो द्वारकापुरीमें गया है, उस मनुष्यको सौ जन्मोंतक प्रेत और पिशाचकी योनि नहीं मिलती। जो मनुष्य वैशाखमासमें हिंडोलेपर बैठे हुए श्रीकृष्णका दर्शन करते हैं, उनके पुत्र, पौत्र, प्रपितामह, श्वशुर, दास, भृत्य और पशु भी भगवान् विष्णुके साथ क्रीड़ा करते हैं। जो मानव कलिकालमें श्रीकृष्णके समीप द्वादशीको उपवास करते हैं, उनमें तथा श्रीकृष्णमें मैं कोई अन्तर नहीं देखता। श्रीकृष्णके समीप द्वादशी तिथिके समान कोई दिन नहीं है। श्रीकृष्णके निकट सभी तिथियाँ युगादि तिथियोंके समान पुण्यदायिनी होती हैं। कलियुगमें अधिक पुण्यात्मा पुरुषोंको द्वारकापुरीका सेवन करना चाहिये। कलिमें श्रीकृष्णकी कृपाके बिना कोई द्वारकापुरीमें नहीं जा सकता। श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये शिव आदि देवता सदा द्वारकापुरी जाते हैं। जो 'कृष्ण-कृष्ण' का कीर्तन करता है,
* दैत्यारेर्भगवत्तिथिश्च विजया नीरं च गाङ्गोद्भवं नित्यं काशिपुरी तथैव तुलसी धात्रीफलं वल्लभम्।
शास्त्रं भागवतं तथा च दयितं रामायणं द्वारका पुष्पं मालतिसम्भवं सुदयितं गीतं कृतं जागरम्॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० २७। २८)
| १३६० | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
उसका जीवन सफल है, उसकी चेष्टा सफल है और उसीकी वाणी सफल है। द्वारकापुरीमें अपने पुत्रको देखकर नरकसे छूटे हुए पितर स्वर्गमें स्थित होकर हँसते, गाते और उछलते हैं। मनुष्योंका जो गुप्त पातक है, उसे गोमती अपना स्मरण और कीर्तन करनेसे भी नष्ट कर देती है, फिर उसकी स्तुति की जाय, तब तो कहना ही क्या है? जो कलिकालमें वर्द्धिनी एकादशीको उपवास करते हैं, वे दुर्लभ हैं। द्वारका, गया और वर्द्धिनी एकादशी—इन तीनोंका पुण्यफल एक-सा बताया गया है। वर्द्धिनी एकादशी सबसे बढ़कर है। क्योंकि उस दिन उपवास करके द्वादशीको पारण करनेपर भगवान् विष्णुका परम पद अनायास ही प्राप्त हो जाता है। वर्द्धिनी एकादशीको उपवास करनेसे घरमें ही तीर्थसेवन, तपस्याका अनुष्ठान और मोक्ष प्राप्त हो जाते हैं। वर्द्धिनी एकादशी, द्वारकापुरी, गंगा, गया, गोविन्दजीका दर्शन, गोमती, गोकुल, गीता और गोपीचन्दन—ये दुर्लभ हैं।<sup>१</sup>
जो मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णमें मन लगाकर इस प्रसंगको सुनता है, वह एक हजार अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। जो एकादशीकी रातमें जागरण करते समय भगवान् केशवके इस माहात्म्यको सुनेंगे, वे सब पापोंसे मुक्त हो वैकुण्ठधामको जायँगे। जो मानव इसे प्रतिदिन भक्तिपूर्वक पढ़ेंगे अथवा सुनेंगे, वे तुलादानका फल पावेंगे, एकादशीको जो थोड़ा भी दान किया जाता है, वह कोटिगुना होता है, ऐसा जानना चाहिये।
$\sim\sim\circ\sim\sim$
एकादशीकी रात्रिमें श्रीहरिके समीप जागरणका माहात्म्य
मार्कण्डेयजी कहते हैं—जिन्होंने पिताकी आज्ञासे समस्त राज्यको वस्त्रमें लगे हुए तिनकेके समान त्याग दिया और अनुपम धर्मका ही संबल लेकर भयंकर वनको प्रस्थान किया, 'मुझे वनवास दे दिया गया' यह समाचार सुनकर बलवान् होते हुए भी जिनके मनमें क्रोध आदि विकार नहीं उत्पन्न हुए, वे विभीषणकी पीड़ा दूर करनेवाले श्रीराम-नामसे प्रसिद्ध भगवान् विष्णु आपलोगोंकी रक्षा करें।<sup>२</sup>
एक समयकी बात है, सब धर्मोंके ज्ञाता, वेद और शास्त्रोंके अर्थज्ञानमें पारंगत, सबके हृदयमें रमण करनेवाले श्रीविष्णुके तत्त्वको जाननेवाले तथा भगवत्परायण प्रह्लादजी जब सुखपूर्वक बैठे हुए थे, उस समय उनके समीप स्वधर्मका पालन करनेवाले महर्षि कुछ पूछनेके लिये आये। वे बोले—'प्रह्लादजी! आप कोई ऐसा साधन बताइये, जिससे ज्ञान, ध्यान और इन्द्रियनिग्रहके बिना ही अनायास भगवान् विष्णुका परम पद प्राप्त हो जाता है।'
उनके ऐसा कहनेपर सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये उद्यत रहनेवाले विष्णुभक्त महाभाग प्रह्लादजीने संक्षेपसे इस प्रकार कहा—'महर्षियो! जो अठारह पुराणोंका सारसे भी सारतर तत्त्व है, जिसे कार्तिकेयजीके पूछनेपर भगवान् शंकरने उन्हें बताया था, उसका वर्णन करता हूँ, सुनिये।
महादेवजी कार्तिकेयसे बोले—जो कलिमें एकादशीकी रातमें जागरण करते समय वैष्णवशास्त्रका पाठ करता है, उसके कोटि जन्मोंके किये हुए
१- वर्द्धिनी द्वारका गङ्गा गया गोविन्ददर्शनम्। गोमती गोकुलं गीता दुर्लभं गोपिचन्दनम्॥
(स्क० पु०, ब्रा० मा० २७।६३)
२- राज्यं येन पटान्तलग्नतृणवत् त्यक्तं गुरोराज्ञया पाथेयं परिगृह्य धर्ममतुलं घोरं वनं प्रस्थितः।
श्रुत्वाप्याऽऽत्मविवासनं च बलवान् यो नागतो विक्रियां पायाद्वः स विभीषणार्तिहरणो रामाभिधानो हरिः॥
(स्क० पु०, ब्रा० मा० २८।१)
- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३६१
चार प्रकारके पाप नष्ट हो जाते हैं। जो एकादशीके दिन वैष्णव-शास्त्रका उपदेश करता है, उसे मेरा भक्त जानना चाहिये। जिसे एकादशीके जागरणमें निद्रा नहीं आती और जो उत्साहपूर्वक नाचता एवं गाता है, वह मेरा विशेष भक्त है। मैं उसे उत्तम ज्ञान देता हूँ और भगवान् विष्णु मोक्ष प्रदान करते हैं। अतः मेरे भक्तको विशेषरूपसे जागरण करना चाहिये। जो भगवान् विष्णुसे वैर करते हैं, उन्हें पाखण्डी जानना चाहिये। जो एकादशीको जागरण करते और गाते हैं, उन्हें आधे निमेषमें अग्निष्टोम तथा अतिरात्र-यज्ञके समान फल प्राप्त होता है। जो रात्रि-जागरणमें बारंबार भगवान् विष्णुके मुखारविन्दका दर्शन करते हैं, उनको भी वही फल प्राप्त होता है। जो मानव द्वादशी तिथिको भगवान् विष्णुके आगे जागरण करते हैं, वे यमराजके पाशसे मुक्त हो जाते हैं। जो द्वादशीको जागरण करते समय गीता-शास्त्रसे मनोविनोद करते हैं, वे भी यमराजके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। जो प्राणत्याग हो जानेपर भी द्वादशीका जागरण नहीं छोड़ते, वे धन्य और पुण्यात्मा हैं। जिनके वंशके लोग एकादशीकी रातमें जागरण करते हैं, वे ही धन्य हैं। जिन्होंने एकादशीको जागरण किया है, उन्होंने यज्ञ, दान, गयाश्राद्ध और नित्य प्रयागस्नान कर लिया। उन्हें संन्यासियोंका पुण्य भी मिल गया और उनके द्वारा इष्टापूर्त कर्मका भी भलीभाँति पालन हो गया। षडानन! भगवान् विष्णुके भक्त जागरणसहित एकादशीव्रत करते हैं, इसलिये वे मुझे सदा ही विशेष प्रिय हैं। जिसने वर्द्धिनी एकादशीकी रातमें जागरण किया है, उसने पुनः प्राप्त होनेवाले शरीरको स्वयं ही भस्म कर दिया। जिसने त्रिस्पृशा एकादशीको रातमें जागरण किया है, वह भगवान् विष्णुके स्वरूपमें लीन हो जाता है। जिसने हरिबोधिनी एकादशीकी रातमें जागरण किया है, उसके स्थूल-सूक्ष्म सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। जो द्वादशीकी रातमें जागरण तथा ताल-स्वरके साथ संगीतका आयोजन करता है, उसे महान् पुण्यकी प्राप्ति होती है। जो एकादशीके दिन ऋषियोंद्वारा बनाये हुए दिव्य स्तोत्रोंसे ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदके वैष्णव मन्त्रोंसे, संस्कृत और प्राकृतके अन्य स्तोत्रोंसे तथा गीत, वाद्य आदिके द्वारा भगवान् विष्णुको सन्तुष्ट करता है, उसे भगवान् विष्णु भी परमानन्द प्रदान करते हैं। जो एकादशीकी रातमें भगवान् विष्णुके आगे वैष्णवभक्तोंके समीप गीता और विष्णुसहस्रनामका पाठ करता है, वह उस परमधाममें जाता है, जहाँ साक्षात् भगवान् नारायण विराजमान हैं।* पुण्यमय भागवत तथा स्कन्दपुराण भगवान् विष्णुको प्रिय है। मथुरा और ब्रजमें भगवान् विष्णुके बालचरित्रका जो वर्णन किया गया है, उसे जो एकादशीकी रातमें भगवान् केशवका पूजन करके पढ़ता है, उसका पुण्य कितना है, यह मैं भी नहीं जानता। कदाचित् भगवान् विष्णु जानते हों। बेटा! भगवान्के समीप गीत, नृत्य तथा स्तोत्रपाठ आदिसे जो फल होता है, वही कलिमें श्रीहरिके समीप जागरण करते समय विष्णुसहस्रनाम, गीता तथा श्रीमद्भागवतका पाठ करनेसे सहस्र गुना होकर मिलता है। जो श्रीहरिके समीप जागरण करते समय रातमें दीपक जलाता है, उसका पुण्य सौ कल्पोंमें भी नष्ट नहीं होता। जो जागरणकालमें मंजरीसहित तुलसीदलसे भक्तिपूर्वक श्रीहरिका पूजन करता है, उसका पुनः इस संसारमें जन्म नहीं होता। स्नान, चन्दन, लेप, धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल यह सब जागरणकालमें भगवान्को समर्पित किया जाय तो उससे अक्षय पुण्य होता है। कार्तिकेय! जो भक्त मेरा ध्यान
* यः पुनः पठते रात्रौ गीतां नामसहस्रकम्। द्वादश्यां पुरतो विष्णोर्वैष्णवानां समीपतः।
स गच्छेत्परमं स्थानं यत्र नारायणः स्वयम्॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० २८।४३-४४)
१३६२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
करना चाहता है, वह एकादशीकी रात्रिमें श्रीहरिके समीप भक्तिपूर्वक जागरण करे। एकादशीके दिन जो लोग जागरण करते हैं उनके शरीरमें इन्द्र आदि देवता आकर स्थित होते हैं। जो जागरणकालमें महाभारतका पाठ करते हैं, वे उस परमधाममें जाते हैं जहाँ संन्यासी-महात्मा जाया करते हैं। जो उस समय श्रीरामचन्द्रजीका चरित्र, दशकण्ठ-वध पढ़ते हैं, वे योगवेत्ताओंकी गतिको प्राप्त होते हैं। जिन्होंने श्रीहरिके समीप जागरण किया है, उन्होंने चारों वेदोंका स्वाध्याय, देवताओंका पूजन, यज्ञोंका अनुष्ठान तथा सब तीर्थोंमें स्नान कर लिया। श्रीकृष्णसे बढ़कर कोई देवता नहीं है। उनके दिनसे बढ़कर दूसरा कोई दिन नहीं है और एकादशी व्रतके समान दूसरा कोई व्रत नहीं है। जहाँ भागवत शास्त्र है, भगवान् विष्णुके लिये जहाँ जागरण किया जाता है और जहाँ शालग्रामशिला स्थित होती है, वहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु उपस्थित होते हैं।
o
द्वारका-यात्राकी विधि एवं महिमा
प्रह्लादजी कहते हैं—एक समय देवर्षि नारदजीने महर्षियोंसे इस प्रकार कहा—‘द्वारकाकी यात्रा करनेवाले श्रद्धालु मनुष्यको चाहिये कि पहले दिन तेल, उबटन लगाकर स्नान करके वैष्णवोंका पूजन करे और अपनी शक्तिके अनुसार उन्हें भोजन कराये। तदनन्तर भावनाद्वारा भगवान् महाविष्णुसे आज्ञा लेकर पक्वान्न भोजन करे और प्रसन्नतापूर्वक द्वारका तथा श्रीकृष्णका चिन्तन करते हुए रातमें पृथ्वीपर शयन करे। प्रातःकाल पवित्र हो स्नान करके जगदीश्वरकी पूजा, परिक्रमा और नमस्कार करे। तत्पश्चात् महाविष्णुकी आज्ञा लेकर कुलके बड़े-बूढ़े पुरुषों, ब्राह्मणों तथा वैष्णवजनोंसे मिले। गन्ध और ताम्बूलसे उनका अर्चन करे और उनके आगे महान् उत्सव मनावे। तदनन्तर गाने-बजाने और स्तुति-पाठके द्वारा द्वारकापुरीके लिये प्रसन्नतापूर्वक यात्रा प्रारम्भ करे। द्वारका जानेवाले पुरुषको शान्त, जितेन्द्रिय, पवित्र, ब्रह्मचारी तथा भूमिशायी होना चाहिये। मार्गमें एकाग्रचित्त होकर विष्णुसहस्रनाम आदि स्तोत्र, पुराण-पाठ और वैदिक सूक्तोंका पठन करना चाहिये। स्वयं प्रसन्न रहकर दूसरोंसे सदा प्रिय वचन बोले। सबको सम्मान दे। दूसरोंकी थकावट दूर करनेका प्रयत्न करे। द्वारका जानेवाले वृद्ध और असमर्थ पुरुषोंको जल दे। उन्हें सुखपूर्वक ठहरनेकी व्यवस्था करे और उन्हें सवारी भी दिलानेकी चेष्टा करे। मनमें दयाभाव रखते हुए उन सबकी सेवा करे। अपने पास धन हो तो मनुष्य उन यात्रियोंको अन्न और वस्त्र आदि भी दे। भगवान् श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये यह सब कुछ करे। इससे महान् पुण्यकी प्राप्ति होती है। उस समय अपनी शक्तिके अनुसार थोड़ा-सा भी दिया जाय तो वह कोटिगुना होकर फलता है। जो भक्तिभावसे मार्गमें श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये यात्रीको एक ग्रास अन्न भी देता है, उसके द्वारा मानो सात द्वीपोंवाली पृथ्वी दे दी गयी। उसके पुण्यका कभी अन्त नहीं होता। द्वारकाके क्षेत्रमें श्रीकृष्णके समीप एक ब्राह्मणको भोजन करानेपर दस राजसूय-यज्ञका फल मिलता है, जिन्होंने द्वारका जानेवाले यात्रियोंको अन्नदान किया है, उन्होंने लाखों बार गया-श्राद्ध कर लिया। अपने पास विभव हो तो जूता, खड़ाऊँ, छाता, कम्बल, अन्न, जल, वस्त्र तथा पात्र दान करे। महाविष्णुकी प्रसन्नताके लिये जो कुछ भी दान किया जाता है, वह सब मनोरथोंकी सिद्धि करनेवाला होता है। मनस्वी पुरुषोंको आदरपूर्वक भगवान् विष्णुकी आराधना करनी चाहिये। तीर्थयात्रीको परायी निन्दा कदापि नहीं करनी चाहिये। जिसके हाथ,
| * प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * | १३६३ |
|---|
| पैर और मन भलीभाँति वशमें होते हैं, उसीको उत्तम यशकी प्राप्ति होती है और उसे ही तीर्थका निश्चित फल प्राप्त होता है। यात्रीके पास धन हो तो वह दूसरेका अन्न और दूसरेकी रसोई अवश्य त्याग दे। धन न होनेपर भोजनमात्र दूसरोंसे ले लिया जाय तो उसमें कोई दोष नहीं है। द्वारकाके मार्गपर चलनेवाले मनुष्योंको परस्पर भक्तिभाव बढ़ानेवाली भगवान् विष्णुकी कथा सुननी चाहिये और प्रसन्नतापूर्वक श्रीहरिके नामोंका कीर्तन करना चाहिये। वैदिक मन्त्रोंका जप करना भी उचित है। आगमोक्त और पुराणोक्त स्तोत्र भगवान्की अत्यन्त प्रसन्नता बढ़ानेवाले होते हैं; अतः उनका भी पाठ करना चाहिये*।'<br><br> नारदजीके इस प्रकार कहनेपर सब महर्षि बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके मार्गपर जाते समय सब कुछ उसी प्रकार किया। कोई भगवान् विष्णुकी लोकविख्यात कथाएँ सुनते थे, जिनके श्रवण करनेमात्रसे भगवान् हृदयमें आकर बस जाते हैं। कुछ महर्षि महान् पुण्यदायक तथा कलिमें सबको पवित्र करनेवाले भगवन्नामोंका कीर्तन करते थे। कुछ मुनियोंने दिव्य पुराणसंहिताका पाठ किया, जो भगवान् विष्णुकी मंगलमयी महिमाको प्रकाशित करती है। भगवान्के जो सद्गुण हैं, उन्होंने पूर्वकालमें लीलावतार धारण करके जो पराक्रमपूर्ण लीलाएँ की हैं, उन्हींको कुछ लोग प्रसन्नतापूर्वक सुनते थे। कुछ मंगलमय महात्मा पुरुष आनन्दमें मग्न हो नेत्रोंसे प्रेमाश्रु बहाते हुए बड़ी भक्तिसे भगवान् वासुदेवकी लीला-कथा सुनाया करते थे। कुछ लोग प्राचीन मुनियोंद्वारा वर्णित भगवच्चरित्रोंका गान करते थे। दूसरे महात्मा | आदि-अन्तरहित देवेश्वर भगवान् विष्णुका भक्तिभावसे चिन्तन ही करते रहते थे। कुछ मुनि मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर बड़ी प्रसन्नताके साथ भगवान्के वैदिक, पौराणिक तथा वैष्णवशास्त्रोक्त स्तोत्रोंका पाठ करते थे। दूसरे महर्षि भगवान्के पापहारी नामोंका कीर्तन करते थे। कोई शतनाम, कोई सहस्रनाम और कोई लक्षनाम जपते थे। कुछ मुनि प्रसन्न होकर लौकिक भाषामें गाये हुए हरिनामोंका गान करते थे। कुछ लोग अपने शरीरकी सुधि भूलकर सब ओर भगवान्के सुन्दर रूपोंका साक्षात्कार करते थे। वे जो कुछ देखते और जो कुछ सुनते थे, वह सब उन्हें चतुर्भुज विष्णुरूप प्रतीत होता था। कोई गाने-बजाने और करतालकी ध्वनिके साथ उत्सव करते चलते थे। कोई गाते, कोई नाचते और कोई नृत्य एवं तालके अनुसार बाजे बजाते थे। सब लोग एक साथ मिलकर एक स्वरसे हरिनामकी गर्जना करते थे। परमानन्दमें निमग्न होकर वे परस्पर हँसते थे। गीत और नृत्यके साथ श्रीहरिका उत्सव मनाते थे और भगवान् विष्णुमें मन लगाकर वैष्णवमन्त्रोंका जप करते थे। ऐसे महात्माओंको देखकर पापी भी शुद्ध हो जाता है। जिसे ऐसे वैष्णव महात्माओंका दर्शन होता है, उससे बढ़कर धन्य पुरुष तीनों लोकोंमें कोई नहीं है। द्वारकाके मार्गमें नृत्य और कीर्तन करके प्रसन्न होनेवाले सभी पुरुषोंको उनके चरणोंमें लगे हुए धूलि-कणकी संख्याके बराबर अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। द्वारकाके यात्रीको पग-पगपर उसकी पग-धूलिकी संख्याके अनुसार सहस्रों यज्ञोंका पुण्य प्राप्त होता है। |
$\sim\sim\sim\sim$
| * यस्य हस्तौ च पादौ च मनो यस्य सुसंयतम् । | तस्य चैव पराकीर्तिर्भवेत्तीर्थफलं ध्रुवम् ॥ |
|---|---|
| परान्नं परपाकं च सति वित्ते त्यजेद् ध्रुवम् । | न दोषोऽसति वित्तेऽस्य तावन्मात्र प्रतिग्रहे ॥ |
| श्रोतव्या सत्कथा विष्णोर्नामसङ्कीर्तनं मुदा । | द्वारकापथि गच्छद्भिरन्योन्यं भक्तिवर्द्धनम् ॥ |
| जप्तव्यं वैदिकं जाप्यं स्तोत्रमागामिकं तथा । | पौराणिकं च यत्स्तोत्रं विष्णोः सुप्रीतिहेतवे ॥ |
(स्क० पु०, द्वा० मा० ३२। ३१-३४)
| १३६४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
ऋषियों और देवताओंकी द्वारका-यात्रा तथा भगवद्दर्शन एवं पूजन
प्रह्लादजी कहते हैं—द्वारकापुरी अपनी प्रभासे बाहरके गाढ़ अन्धकारका नाश कर देती है और भक्तोंको भयनाशक परमानन्दमय पद प्रदान करती है। पुण्यको बढ़ानेवाली द्वारकापुरी अपनी गगनचुम्बी ध्वजा-पताकाओं तथा दिव्य पुण्य प्रकाशसे गिरिराजके समान शोभा पाती है। पूर्वोक्त तीर्थयात्री महर्षियोंने द्वारकापुरीमें दूरसे ही चक्रविभूषित श्रीकृष्णमन्दिरका दर्शन करके छाता और खड़ाऊँ त्यागकर साष्टांग प्रणाम किया। वे दण्डकी भाँति पृथ्वीपर लोट गये। उनकी भक्ति बहुत बढ़ गयी और वे बार-बार धरतीपर लोटने लगे। कोई जय-जयकार और नमस्कारके साथ हरिनामकी गर्जना करने लगे। दूसरे लोग परमानन्दमें निमग्न हो स्तुति सुनाने लगे। सभी महर्षि तथा वहाँ प्रकट हुए सभी तीर्थ आनन्दके आँसू बहाते हुए प्रेमगद्गद वाणीमें भगवान्की स्तुति करने लगे।* उन सबको देखकर नारदजीने कहा—'तुमने सहस्रों जन्मोंमें सहस्रों पुण्यपुंजोंकी राशि संचित कर रखी थी, जिससे आज तुम्हें भगवान् श्रीकृष्णके मन्दिरका दर्शन हुआ है। भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन, द्वारका जानेकी बुद्धि और महादेवजीमें दृढ़ भक्ति—ये सब थोड़ी तपस्याके फल नहीं हैं। वे पूर्वज धन्य हैं, जिनके वंशज श्रीकृष्ण-दर्शनके लिये, उत्सवपूर्वक द्वारकाकी यात्रा करते हैं और वहाँ पहुँचकर अपने इष्टदेव श्रीहरिका दर्शन पाते हैं। सब मुनिलोग देखें, यह द्वारकापुरी तीनों लोकोंमें सुशोभित होती है। श्रीकृष्णप्रिया द्वारका इस पृथ्वीकी कीर्ति है, जहाँ गोमती, रुक्मिणीदेवी तथा स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण विराज रहे हैं। जिसके सम्बन्धसे यह पृथ्वी स्वर्गसे भी अधिक शोभा पाती है, वह पवित्र द्वारकापुरी अपने दिव्य तेजसे सुशोभित है।'
नारदजीका यह वचन सुनकर और द्वारकाके माहात्म्यको अपनी आँखों देखकर ऋषि और देवता आगे चले। वे सब ओर गीत, वाद्य, नृत्य और पताका आदिके द्वारा उत्सव मनाते हुए नाना प्रकारके स्तोत्र पढ़कर द्वारकाप्रिय श्रीकृष्णकी स्तुति कर रहे थे। हरिनामके उच्च घोषके साथ उनकी गर्जना सुनकर प्रसन्न हुए नारदजीने उन सबका एक व्यूह बनाया। इस प्रकार आगे बढ़ते हुए वे सब लोग गोमतीके तटपर आये। सबने गोमतीको प्रणाम किया और गोमतीकी महिमा देखकर नारदजीने कहा—'ये ही वे गोमतीदेवी हैं, जिनकी तीनों लोकोंमें ख्याति है। इनके जलमें किया हुआ एक बारका स्नान ब्रह्मविद्यासे स्पर्धा रखता है। गोमती ब्रह्मज्ञानके समान है। यह सब तीर्थोंमें उत्तम है। मनुष्य ब्रह्मज्ञानसे मुक्त होते हैं और वह ब्रह्मज्ञान गोमतीमें स्नान करनेसे सुलभ होता है। अथवा श्रीकृष्णके समीप गोमतीमें स्नान करनेमात्रसे सबकी मुक्ति हो जाती है।'
ऐसा कहकर नारदजीने हरिप्रिया द्वारकाको प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—'द्वारके! ये सब ऋषि और महर्षि तुम्हें बार-बार प्रणाम करते हैं। इन सबको देखो। ये सब गान, वाद्य और नृत्यके द्वारा प्रसन्न होकर श्रीहरिनामका कीर्तन कर रहे हैं। देवि! तुम सबसे श्रेष्ठ हो; क्योंकि साक्षात् भगवान् विष्णु तुम्हारा कभी त्याग नहीं करते हैं। हमें देवेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन कराओ।'
उनके ऐसा कहनेपर द्वारकादेवी प्रत्यक्ष प्रकट हुईं और हर्षसे विह्वल होकर बोलीं—'देवताओ! देखो, देखो; ये भगवान् द्वारकानाथ विराज रहे हैं।' उस समय देवताओंने पश्चिमाभिमुख श्रीकृष्णका
* जयशब्दैर्नमःशब्दैर्गर्जन्तो हरिनामभिः। ततोऽन्ये च स्तुवन्ति स्म परमानन्दसम्प्लुताः॥
आनन्दांश्च प्रमुञ्चन्तः प्रेम्णा गद्गदया गिरा। स्तुवन्ति ऋषयः सर्वे तीर्थादीनि च सर्वशः॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० ३३। ११-१२)
- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * | १३६५ ---|---
दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया और प्रसन्न होकर गीत, वाद्य तथा नृत्य किया। जय-जयकार और नमस्कार शब्दके साथ हरिनामकी गर्जना की। बारंबार श्रीकृष्णका दर्शन करके सबने भक्तिभावसे अनेक बार उठ-उठकर साष्टांग प्रणाम किया और—'हे कृष्ण! हे कृष्ण! जय कृष्ण!' ऐसा कहा। श्रीकृष्णके दर्शनसे उन सब सिद्धोंको उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई। गोमतीके जलमें और समुद्रके अन्तर्गत चक्रतीर्थके जलमें उन सबने स्नान करके श्रीकृष्णके दर्शनकी लालसा प्रकट की थी। तदनन्तर श्रीकृष्णके मुखारविन्दका दर्शन पाकर वे सभी परमानन्दमें डूब गये। नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहाने लगे। उन्हें अपने-आपकी भी सुधि नहीं रही। तत्पश्चात् कमलके आसनपर बैठे हुए बलराम और श्रीकृष्णका दर्शन करके उन सबने उन्हें पंचामृतसे तथा त्रिलोकीके सभी तीर्थोंके जलसे स्नान कराया। सनकादि योगियोंने भी उनका पूजन किया। नारदादि महर्षियोंने परम श्रद्धा-भक्तिसे पृथक्-पृथक् दिव्य वस्त्र, दिव्य गन्ध और दिव्य अनुलेपनोंसे पूजन किया। तुलसीदलसे श्रीकृष्णकी पूजा की। पृथक्-पृथक् दिव्य धूप देकर कपूरकी आरती उतारी। भाँति-भाँतिके कर्पूरवासित पवित्र पदार्थोंद्वारा नैवेद्य लगाया। कर्पूरमिश्रित ताम्बूल निवेदन किया। प्रिय वस्तुएँ भेंट कीं। मंगलमय स्तोत्रोंद्वारा स्तुति की तथा चवँर और व्यजन आदि डुलाकर महाविष्णुकी आराधना पूरी की। तत्पश्चात् ब्रह्मपुत्रोंने भगवान् श्रीकृष्णके आगे गीत गाये, बाजे बजाये और नृत्य किया। इतनेमें ही वहाँ भगवान् विष्णुके पार्षद प्रकट हो गये। देवताओं तथा ऋषियोंने उन पार्षदोंको प्रणाम किया। इसके बाद बड़े भैया बलरामसहित श्रीकृष्णको मस्तक झुकाया। तदनन्तर पुष्पांजलि देते हुए कहा—'देवि द्वारके! तुम सब तीर्थोंकी महारानी और अधीश्वरी हो।' ऐसा कहकर उन सबने द्वारकापुरीको प्रणाम किया।
$\sim\sim\circ\sim\sim$
दिलीप-वसिष्ठ-संवाद, द्वारकासे लौटे हुए यात्रीके दर्शनसे राक्षसके वज्रलेप पापका नाश
प्रह्लादजी कहते हैं—मुनीश्वरो! द्वारकापुरीका ऐसा ही अद्भुत माहात्म्य है। वह बड़े-बड़े पापोंको जलानेवाला है और महान् पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है। द्वारकाकी यात्रा अत्यन्त भयंकर पापराशिके दाहका स्थान है। जब बृहस्पति सिंह राशिपर स्थित हों, उस समय जो द्वारकाकी यात्रा करते हैं, उनके चरणोंकी धूलिका स्पर्श करके पापी मनुष्य भी स्वर्गलोकमें चले जाते हैं। गोमतीके जलसे पवित्र होकर श्रीकृष्णके मुखारविन्दका दर्शन करनेवाले उन पुण्यात्माओंके दर्शनसे सौ जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है—इस विषयमें राजा दिलीप और महर्षि वसिष्ठका संवाद बड़ा ही आश्चर्यजनक है।
दिलीपने पूछा—विप्रवर! काशीमें किया हुआ पाप वज्रलेप होता है। वह भयंकर वज्रलेप जहाँ नष्ट हो जाय, और सब प्रकारके महापुण्य जहाँ प्राप्त हों, वह ऐसा कौन-सा क्षेत्र है। यह बतानेकी कृपा करें। जहाँ जानेपर पापरूपी बीज अंकुरित नहीं होते, उस पुण्यक्षेत्रका वर्णन कीजिये।
वसिष्ठजीने कहा—काशीमें मोक्षधर्मको जाननेवाला कोई त्रिदण्डी संन्यासी रहता था। वह एक दिन एकाग्रचित्त हो दशाश्वमेध घाटपर गायत्रीका जप कर रहा था। उसी समय वहाँ कोई गजगामिनी युवती आयी और गंगाके तटपर अपने वस्त्र रखकर जलमें क्रीड़ा करने लगी। संन्यासी उस तरुणीको देखकर कामदेवके वशीभूत हो गया। उस कुलटाने भी मन-ही-मन उस तरुण संन्यासीसे मिलनेका संकल्प किया। वे
| १३६६ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
दोनों पापाचारके द्वारा एक दूसरेसे मिले। तरुणीने संन्यासीका मन मोह लिया था; अतः वह उसीके पीछे-पीछे लगा रहा। उसकी प्रसन्नताके लिये वह न्याय अथवा अन्यायसे भी धनकी याचना करने लगा। काशीमें रहकर वह चाण्डालसे भी दान लेता था। उसने स्नान छोड़ दिया। अपवित्र रहने लगा और पापमें प्रवृत्त होकर रातमें चोरी भी करने लगा। एक दिन वह दुराचारी यति मांस लानेकी इच्छासे वनमें गया। वहाँ उसकी दृष्टि एक चाण्डाल-कन्यापर पड़ी, जिसके नेत्र उस युवकको उन्मत्त बना देनेवाले थे। वह बड़ी ही सुन्दरी थी। उसका अतिशय सौन्दर्य देखकर उसने निर्जन वनमें उस चाण्डालीके साथ समागम किया। उसके साथ भोजन भी किया और उसीके घरमें उसकी मृत्यु हुई। पापात्मा और सर्वभक्षी होकर भी वह काशीके प्रभावसे नरकमें नहीं पड़ा; परन्तु उसके द्वारा अत्यन्त भयानक वज्रलेप पाप हुआ था, इसलिये क्रूर योनियोंमें उसका जन्म हुआ। पहले भेड़िया, फिर क्रमशः व्याघ्र, सिंह, कुत्ता, सियार और सूअर हुआ। इस प्रकार दस हजार युगोंमें भी उसका वह पाप नष्ट नहीं हुआ। तदनन्तर वह राक्षस हुआ और अनेक प्रकारके प्राणियोंका भक्षण करते हुए विन्ध्यपर्वतपर आकर रहने लगा। इसी समय एक अद्भुत घटना घटी। एक मनुष्य द्वारका और श्रीकृष्णचन्द्रके सुन्दर मुखारविन्दका दर्शन करके लौट रहा था। वह गोमतीके जलमें स्नान करके पवित्र हो चुका था। धीरे-धीरे जब वह विन्ध्याचलपर आया तो वह क्रूरकर्मी राक्षस उसे खानेके लिये उसके पास गया; परन्तु वह तीर्थयात्री तनिक भी भयभीत न हुआ। उसके दर्शनमात्रसे राक्षसका भयंकर वज्रलेप पाप क्षणभरमें जलकर भस्म हो गया और वह पुण्यके प्रकाशसे शोभा पाने लगा। तदनन्तर उसने उस पथिकके चरणोंमें श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और विस्मित होकर कहा—'अहो! आपके दर्शनमात्रसे मेरा यह भयंकर राक्षसभाव नष्ट हो गया और मुझे उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई। भद्रपुरुष! आप कहाँसे आये हैं और आपका ऐसा प्रभाव क्यों है?'
राक्षसकी यह बात सुनकर यात्रीने प्रसन्नचित्त होकर कहा—'राक्षस! मैं द्वारकापुरीका दर्शन करके आया हूँ। मुझमें वज्रलेप-जैसे पापको हर लेनेवाला प्रभाव भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे प्रकट हुआ है।' उसके ऐसा कहनेपर राक्षसने भक्तिभावसे उसे प्रणाम किया और उसकी परिक्रमा करके वह द्वारकापुरीको चला गया। वहाँ गोमतीके जलमें अपना शरीर त्यागकर उसने वैकुण्ठधाम प्राप्त किया। उस समय देवेश्वर तथा गन्धर्वगण फूलोंकी वर्षा करते हुए उसकी स्तुति कर रहे थे।
वसिष्ठजीके मुखसे यह कथा सुनकर राजा दिलीपका चित्त प्रसन्न हो गया। वे देवाधिदेव भगवान् श्रीकृष्णकी द्वारकापुरीका दर्शन करनेके लिये गये और आदरपूर्वक देवमन्दिरमें श्रीकृष्णका दर्शन करके परम सिद्धिको प्राप्त हुए।
द्वारकापुरी तथा श्रीकृष्ण-दर्शनका माहात्म्य
प्रह्लादजी कहते हैं—ब्रह्मा और शिव आदि भी जिनके चरणारविन्दोंकी वन्दना करते हैं, वे भगवान् श्रीकृष्ण जहाँ निवास करते हैं, वह द्वारकापुरी सब कुछ देनेवाली तथा सर्वज्ञ है। द्वारकाके प्रभावसे कीट, पतंग, पशु, पक्षी तथा सर्प आदि योनियोंमें पड़े हुए समस्त पापी भी मुक्त हो जाते हैं*। फिर जो प्रतिदिन द्वारकामें रहते और जितेन्द्रिय होकर भगवान् श्रीकृष्णकी सेवामें उत्साहपूर्वक लगे होते हैं, उन मनुष्योंकी मुक्तिके विषयमें क्या कहना है। द्वारकामें रहनेवाले
* अपि कीटपतङ्गाद्याः पशवोऽथ सरीसृपाः। विमुक्ताः पापिनः सर्वे द्वारकायाः प्रभावतः॥ (स्क० पु०, द्वा० मा० ३७।७)
* प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य *
१३६७
समस्त प्राणियोंको जो गति प्राप्त होती है, वह ऊर्ध्वरेता मुनियोंको भी दुर्लभ है। द्वारका सब क्षेत्रों और तीर्थोंसे उत्तम कही गयी है। द्वारकामें जो होम, जप, दान और तप किये जाते हैं, वे सब भगवान् श्रीकृष्णके समीप कोटिगुने एवं अक्षय होते हैं। जो द्वारकावासी श्रेष्ठ पुरुषोंकी निन्दा करते हैं, वे श्रीकृष्णकी कृपासे वंचित हो दुःखके घोर समुद्रमें गिरते हैं। अतः द्वारकावासी मनुष्य सदा सबके लिये पूजनीय हैं। द्वारकामें दी हुई अणुमात्र वस्तु भी अक्षय फल देनेवाली होती है। जो मनुष्य द्वारकामें अन्नदान करता है, उसके दानजनित उत्तम फलका वर्णन करनेमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी समर्थ नहीं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, अन्त्यज तथा स्त्री जो भी द्वारकामें भक्तिपूर्वक निवास करते हैं, वे विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होते हैं। द्वारकावासीका दर्शन और स्पर्श करके भी मनुष्य बड़े-बड़े पापोंसे मुक्त हो स्वर्गलोकमें निवास करते हैं। द्वारकाका माहात्म्य सबसे श्रेष्ठ है। वहाँकी पवित्र धूलि भी पापियोंको मोक्ष देनेवाली है।
विप्रवरो! जिस दिन बृहस्पति सिंह राशिपर आते हैं, उस तिथिको द्वारकामें कुशावर्तसे लेकर गोमती-समुद्र संगमतक कहीं भी गोमतीमें किया हुआ स्नान बारह गोदावरी स्नानके समान फल देनेवाला है। जो दूसरेको भी द्वारका भेजता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। 'द्वारका जाओ, द्वारका जाओ' ऐसा कहकर जो वहाँ जानेके लिये प्रेरणा करता है, उसके दर्शनसे ही मनुष्य पापमुक्त हो जाते हैं। जो मनुष्य द्वारकाकी ओर मुँह करके 'द्वारका, द्वारका' का कीर्तन करता है, वह भगवान् कृष्णकी कृपासे निश्चय ही मोक्षका भागी होता है। द्वारका, पुण्यमयी गोमती, रुक्मिणीदेवी तथा भगवान् श्रीकृष्णका जो लोग प्रतिदिन स्मरण करते हैं, वे द्वारकाके पुण्य-फलके भागी होते हैं। जो सहस्रों योजन दूर रहकर भी अपनी बुद्धिमें ऐसे विचार लाता है कि 'मैं द्वारका जाऊँगा और द्वारकानाथजीका दर्शन करूँगा' उसका मुँह देखनेसे महापातकी मनुष्य भी मुक्त हो जाते हैं। समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाले श्रीकृष्णभक्त धन्य हैं, समस्त लोकोंके लिये वन्दनीय हैं। भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनसे जो पुण्य होता है, उसका वर्णन सर्वज्ञ विद्वान् तथा शेषनाग भी नहीं कर सकते। श्रीकृष्ण-दर्शनके पुण्यफलका कभी अन्त नहीं होता। इस लोकमें जो बड़े-बड़े पापी हैं, वे भी द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करके सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। जिन भगवान् श्रीकृष्णके सामीप्यसे गोमतीका जड जल भी ब्रह्मविद्यासे स्पर्धा रखता है, स्नानमात्रसे ही बड़े-बड़े पापोंको भस्म कर डालता है, जिनके क्षेत्रकी चक्रचिह्नित शिलाएँ भी सबको मोक्ष देनेवाली हैं, मगध आदि देशोंमें भी पूजित होनेपर जहाँकी चक्रचिह्नित शिलाएँ मुक्ति देती हैं, जिनके क्षेत्रकी पवित्र धूलि सब पापियोंको मोक्ष देनेमें समर्थ है तथा जिनके क्षेत्रमें जानेके लिये विचार करना भी पातकोंका नाश कर देता है; उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी पुरी द्वारकाके दर्शनसे पाप नष्ट होता है; ऐसा कहनेसे उनकी क्या स्तुति होती है। द्वारका जाते हुए जो मनुष्य श्रीकृष्ण-दर्शनकी महिमाका वर्णन करता है, उसके पुण्यकी संख्या बताना शेषनाग-जैसे विद्वानोंके लिये भी असम्भव है। जहाँ श्रीकृष्ण-दर्शनकी महिमा बतानेसे भी पाप नष्ट हो जाता है, वहाँ साक्षात् श्रीकृष्णके दर्शनसे कितना पुण्य होता है—इसकी गणना कौन करेगा। संसारमें वे मनुष्य धन्य हैं, जो हर्षोल्लासमें भरकर भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करते हैं। जब दर्शनकी ऐसी महिमा है, तब उनके स्पर्शसे तथा दुग्ध आदिके द्वारा उनके स्नान-पूजन आदि करनेसे जो पुण्य होता है, उसे कौन बता सकता है। रातके चौथे पहरमें दुग्धका स्नान उत्तम है। पूजा, आरती, नैवेद्य, ताम्बूल, नमस्कार, गीत, वाद्य और नृत्य—ये श्रीकृष्णको प्रिय हैं। जो एकादशीको भगवान् श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये गीत और नृत्य करते हैं, वे भगवान् श्रीकृष्णके प्रिय भक्त हैं। जो
| १३६८ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
भलीभाँति पूजित होनेपर श्रीकृष्णकी झाँकी करते हैं, वे महान् पुण्यको प्राप्त होते हैं। श्रीकृष्णकी महापूजा करनेवालेको अनन्त पुण्य होता है। संसारमें वे मनुष्य धन्य हैं, जो सदा श्रीकृष्णदेवका दर्शन, स्पर्श, पूजन, स्तुति और नमस्कार करते हैं। जो मनुष्य द्वारकामें काष्ट या प्रस्तरकी प्रतिमा स्थापित करता है, उसने मानो तीनों लोकोंकी स्थापना कर ली। वह भगवान् विष्णुके समान होता है और तीनों लोकोंका साम्राज्य प्राप्त करता है।
~~ ० ~~
द्वारकामें श्रीकृष्णदर्शनकी महिमा, एकादशीव्रतके भेद, चक्रचिह्नित शिलाओंकी विशेष संज्ञा तथा भयनिवारणके उपाय
प्रह्लादजी कहते हैं—जो मन-ही-मन द्वारका जानेकी भावना करते हैं, उनके दस हजार जन्मोंके संचित पूर्वपाप नष्ट हो जाते हैं। जिस देहधारीके मनमें श्रीकृष्णके दर्शनका विचार उत्पन्न होता है, उसका मुख देखकर पापके सैकड़ों टुकड़े हो जाते हैं। जो परम सुन्दर श्रीकृष्णपुरीकी यात्रा करके गोमती-समुद्र-संगमपर पिण्डदान करते हैं, वे अपने पितरोंका उद्धार कर देते हैं। वैशाख शुक्ला द्वादशीको जो भगवान् श्रीकृष्णके समीप जागरण करता है, वह उनके मुखारविन्दका दर्शन करके पितरोंसहित मुक्त हो जाता है। जो श्रीकृष्णकी लीलाभूमिमें जानेकी मनसे इच्छा करते हैं, उनके अस्थिगत पापको भी प्रेतराज यम धो डालते हैं। जीव जबतक कलियुगमें द्वारकापुरीका दर्शन नहीं करता, तभीतक उसके शरीरमें अत्यन्त भयंकर पाप डेरा डाले रहते हैं। जो श्रवण और द्वादशीके योगमें गोमती-समुद्र-संगममें स्नान करके श्रीकृष्णके मुखचन्द्रका दर्शन करता है, वह मानव मोक्षको प्राप्त होता है। जिस किसी भी मासकी द्वादशी तिथिको श्रीकृष्णकी लीला-नगरी द्वारकाका दर्शन करके मनुष्य संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है। कलियुगमें बिना पिण्डदान किये भी गोमतीके जलमात्रसे पितरोंकी तृप्ति हो जाती है। चक्रतीर्थका ऐसा ही प्रभाव है। जिसने द्वारकामें जाकर श्रीकृष्णके मुखारविन्दका दर्शन कर लिया है, वह न तो प्रेत होता है और न उसे नरकका कष्ट भोगना पड़ता है। जो घरमें रहकर भी प्रतिदिन कलिकालमें श्रीकृष्णपुरीका स्मरण करते हैं, उनके पाप नष्ट हो जाते हैं। महाभाग! कलिकालके समान दूसरा कोई युग नहीं है; क्योंकि उसमें भगवान् विष्णुके स्मरण और कीर्तनसे मनुष्य परमपद प्राप्त कर लेता है। जो कलियुगमें नित्यप्रति 'कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण' का उच्चारण करेगा, उसे प्रतिदिन दस हजार यज्ञों और करोड़ों तीर्थोंका पुण्य प्राप्त होगा। जो मनुष्य नित्य 'कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण' का जप करता है, कलियुगमें श्रीकृष्णके ऊपर उसका प्रेम निरन्तर बढ़ता है।*
रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती, मित्रविन्दा, कालिन्दी, भद्रा, नाग्नजिती तथा लक्ष्मणा—श्रीकृष्णकी इन आठों प्रियतमा पत्नियोंका भी वहाँ भलीभाँति पूजन करना चाहिये। जो नियम और व्रतोंसे तथा गीत, वाद्य, दीपदान तथा जागरण आदिके द्वारा उन सबकी विधिपूर्वक पूजा करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको पाता है और उसके ऊपर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते
* नास्ति नास्ति महाभाग कलिकालसमं युगम्। स्मरणात् कीर्तनाद् विष्णोः प्राप्यते परमं पदम्॥
कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति कलौ वक्ष्यति प्रत्यहम्। नित्यं यज्ञायुतं पुण्यं तीर्थकोटिसमुद्भवम्॥
कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति नित्यं जपति यो जनः। तस्य प्रीतिः कलौ नित्यं कृष्णस्योपरि वर्द्धते॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० ३८। ४४-४६)
- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३६९
हैं। जो कलिमें प्रतिदिन जागते और सोते समय 'कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण' का कीर्तन करता है, वह श्रीकृष्णस्वरूप हो जाता है।* चन्द्रमामें उष्णता नहीं होती, अग्निमें शीतलता नहीं होती तथा एकादशीको उपवास करनेवाले वैष्णव भक्तोंमें पाप नहीं होता है। जब पूरे दिन-रात एकादशी हो और दूसरे दिन द्वादशीमें भी एकादशी पड़ गयी हो तो उसको उन्मीलिनी कहते हैं। वह तिथियोंमें उत्तम तिथि मानी गयी है। जो बंजुलीके दिन-रात्रिमें जागरण करते हैं, उन्हें आधे मुहूर्तमें दस हजार यज्ञोंका पुण्य होता है। यदि सम्पूर्ण दिन-रात द्वादशी होकर दूसरे दिन त्रयोदशीमें भी द्वादशी बढ़ गयी हो तो उसे बंजुली कहते हैं। वह कलियुगमें अत्यन्त दुर्लभ है। जो उन्मीलिनीमें जागरण करते हैं, उन्हें आधे पलमें कोटि गोदानका पुण्य प्राप्त होता है। पूरे दिन-रात एकादशी होकर यदि प्रतिदिन अमावस्या या पूर्णिमातक तिथि बढ़ती रहे तो उसे पक्षवर्द्धिनी एकादशी कहते हैं। उस एकादशीको जो जागरण करते हैं, उन्हें चौथाई पलमें ही कोटि गोदानका फल मिलता है। घरमें भी एकादशी करनेवालोंके लिये यह फल बतलाया गया है; फिर जो भगवान् विष्णुके समीप व्रत और जागरण करते हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है? कलियुग आनेपर द्वारकामें जो इस व्रतका अनुष्ठान करते हैं, उन्हें कोटिगुना फल होता है, द्वारकामें एक चक्रसे चिह्नित शिलाकी सुदर्शन संज्ञा है। सुदर्शनशिलाका पूजन करनेपर वह मोक्षरूप फल देनेवाली होती है। जिस शिलापर दो चक्रके चिह्न हों, वह लक्ष्मीनारायणका स्वरूप है। वे लक्ष्मीनारायण भोग और मोक्ष दोनों फलोंको देनेवाले हैं। तीन चक्रसे चिह्नित शिलाका नाम अच्युत है। अच्युतजी इन्द्रपद देनेवाले हैं। चार चक्रोंसे चिह्नित शिलाको जनार्दन कहते हैं, जनार्दनजी शत्रुनाशक तथा लक्ष्मीप्रद हैं। पाँच चिह्नोंसे चिह्नित शिलाकी वासुदेव संज्ञा है। वासुदेवजी जन्म-मृत्यु और जराका नाश करनेवाले हैं। छः चिह्नोंसे युक्त शिलाखण्डको प्रद्युम्न कहते हैं। वे उपासकको धन और कान्ति देते हैं। सात चिह्नोंसे युक्त होनेपर उसकी बलदेव संज्ञा होती है। बलदेवजी गोत्र और कीर्ति बढ़ानेवाले हैं। आठ चिह्नोंसे युक्त शिलाखण्ड पुरुषोत्तम है। भगवान् पुरुषोत्तम भक्तिभावसे पूजित होनेपर मनोवांछित फल देते हैं। नौ चिह्नसे युक्त होनेपर उसे नवव्यूह कहते हैं। यह देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। नवव्यूह भी सब कुछ दे सकते हैं। दस चिह्नोंसे युक्त शिलाखण्डोंको दशावतार संज्ञा है। उससे राज्यकी प्राप्ति होती है। एकादश चिह्नोंसे युक्त शिलाखण्ड अनिरुद्ध है, जो ऐश्वर्य प्रदान करता है। बारह चक्रोंसे युक्त शिलाको द्वादशात्मा कहते हैं। वह निर्वाण प्रदान करती है। इससे अधिक चिह्न होनेपर अनन्त संज्ञा होती है। भगवान् अनन्त भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं। श्रीकृष्णके चक्रसे चिह्नित जो कोई भी प्रस्तर वहाँ उपलब्ध होते हैं, उनके स्पर्शमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। मन, वाणी और क्रियाद्वारा किये हुए जितने भी ब्रह्महत्या आदि पाप हैं, वे सब चक्रचिह्नित शिलाके पूजनसे नष्ट हो जाते हैं। जो एक वर्षतक चक्रांकित शिलाकी पूजा, दर्शन और स्पर्श करते हैं, वे पापी रहे हों तो भी अविनाशी विष्णुमें प्रवेश करते हैं। मृत्युकाल प्राप्त होनेपर जो अपने वक्षपर चक्रचिह्नित शिला धारण करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। गोमतीचक्रसे चिह्नित शिला यदि छातीपर रखी हुई हो तो यमराजके दूत भयके मारे समीप नहीं आते और वह मनुष्य वैकुण्ठलोकमें जाता है। भगवान् श्रीकृष्णकी बाललीलाओं,
* कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति नित्यं जाग्रत् स्वपंश्च यः। कीर्तयेत्तु कलौ चैव कृष्णरूपी भवेद्धि सः॥ (स्क० पु०, द्वा० मा० ३९ । १)
| १३७० | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
|---|
गोकुलमें की हुई क्रीडाओं, गोपीजनोंके साथ की हुई क्रीडाओं तथा श्रीकृष्णावतारकी अन्य लीलाओंको भी बार-बार सुनना चाहिये। उत्कण्ठित होकर नृत्य और गान करना चाहिये तथा कमलनयन श्रीकृष्णके मुखारविन्दका बार-बार दर्शन करना चाहिये। बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान करनेसे जो फल मिलता है, उसको मनुष्य श्रीकृष्णके समीप आधे दिनमें प्राप्त कर लेता है। भगवान् श्रीकृष्णमें मन लगाकर मनुष्य जिस फलको पाता है, उसका हजारवाँ अंश भी दूसरे किसी कर्मसे नहीं पा सकता है। जो राग-द्वेषकी आगमें जल रहे हैं और अज्ञानमय विषयोंमें आसक्त हैं, ऐसे मनुष्योंको स्वस्थ करनेके लिये वैष्णवधर्म चिकित्सारूप है। कोरे तर्क और युक्तिपर टिके हुए मतवादोंकी कुदृष्टिसे अज्ञानान्धकारमें पड़कर जो लोग अन्धे हो रहे हैं, उनके लिये यह वैष्णव-शास्त्र दीपकका काम देता है। विद्वानोंको इसका सदैव मनन करना चाहिये। जहाँ श्रीहरिके समक्ष रात्रिमें जागरण किया जाता है, उसे ब्रह्मावर्तके समान ऋषिदेश और मध्यदेश जानना चाहिये। जो मानव कलियुगमें द्वारकाका माहात्म्य सुनता है या दूसरोंमें सुननेका भाव उत्पन्न करता है, उसे सौ यज्ञोंका फल मिलता है। जिसके घरमें द्वारकाकी मृत्तिका मौजूद है तथा जिसके ललाटमें गोपीचन्दनका तिलक लगा है; उसके घरको लक्ष्मीदेवी कभी नहीं छोड़ती हैं। वहाँ ग्रहों, रोगों तथा राक्षसोंकी बाधा भी नहीं होती है। पिशाच, कूष्माण्ड और प्रेत भी वहाँ उपद्रव नहीं करते हैं। उस घरमें अग्नि, चोर, शत्रु तथा सींगवाले पशुओंसे भी भय नहीं प्राप्त होता है। दैव, भूत, रोग, व्याधि तथा दरिद्रताका कष्ट भी वहाँ नहीं आता है। बिजली और उल्कापातका भी भय वहाँ नहीं रहता है।
जहाँ बंजुली द्वादशीके दिन रात्रिमें जागरण, भागवतके एक या चौथाई श्लोकका पाठ, वैष्णवशास्त्रका पठन, भगवद्भक्तका दर्शन, विष्णुकी रथयात्राका उत्सव, अश्वत्थवृक्षका दर्शन, विष्णु-भक्तका सत्कार और शालग्रामशिलाका पूजन किया जाता है, जहाँ भगवान्के चरणोदकका पान, नैवेद्यका भक्षण, तुलसी-पूजन, एकादशी-व्रतका अनुष्ठान, हेमन्त-ऋतुमें जलवास, ग्रीष्म-ऋतुमें त्रिस्पृशाको उपवास, धातूव्रत और अश्वत्थव्रतका पालन किया जाता है; जहाँ उन्मीलिनी, पक्षवर्द्धिनी, श्रावण (भाद्रपद)-मासकी रोहिणीयुक्त जयन्तीसंज्ञक अष्टमी, द्वादशी तथा प्रबोधिनी आदि एकादशियोंके व्रतका अनुष्ठान और रम्भाव्रत आदिका आचरण—ये सब पुण्यकर्म किये जाते हैं, वहाँ भी पूर्वोक्त भय नहीं आते हैं। जो प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक श्रीहरिके समीप भागवतशास्त्रका श्रवण या पाठ करता है, दशमीको केवल रातमें ही भोजन करता है, द्वादशीको शक्ति रहते पराये अन्नका भोजन नहीं करता, रातमें जागता है, शक्तिके अनुसार दान देता है तथा यथाशक्ति भगवान्की विशेष पूजा करता-कराता है तथा जो द्वादशीको गंगाकी मिट्टी या गोपीचन्दनका तिलक लगाता है, वह भी पूर्वोक्त सभी भयोंसे छुटकारा पा जाता है। भगवान् विष्णुका कथन है कि ‘जो मेरा तथा रुद्र, आदित्य और यमका भक्त है, उसे मैं श्रेष्ठ भागवत मानता हूँ। जिन्हें मेरे भक्त प्रिय हैं, उनपर मैं सदैव संतुष्ट रहता हूँ। कलियुग आनेपर मैं सदा द्वारकापुरीमें वास करता हूँ। जो मुझे प्रसन्न करना चाहता है, वह कलिकालमें परम सुन्दर द्वारकापुरीमें जाकर मेरा दर्शन करे।’
- प्रभासखण्ड-द्वारका-माहात्म्य * १३७१
द्वारका-माहात्म्यके पाठकी महिमा, वैष्णव-सेवाका महत्त्व, नीलका निषेध, वृक्ष काटनेसे हानि, उसे लगानेका फल, आक, बिल्वपत्र, आँवला एवं तुलसी-रोपणका महत्त्व तथा द्वारका-माहात्म्यका उपसंहार
प्रह्लादजी कहते हैं—मनुष्य जब द्वारका जानेमें समर्थ न हो तब घरपर ही द्वारका-माहात्म्यका पाठ करे। वैष्णवभक्तोंको इस माहात्म्यको सुनावे और भक्त पुरुष इसे भक्तिभावसे सुने। विशेषतः द्वादशी तिथिको इस माहात्म्यका पाठ अवश्य करना चाहिये। ऐसा करनेसे वह घरमें रहकर भी द्वारका-सेवनका पुण्य पा लेता है। इहलोक और परलोकमें उसे मनोवांछित फलकी प्राप्ति होती है। भगवान् जनार्दन सदैव उसके योगक्षेमका निर्वाह करते हैं। वह पापरहित होता है। उसके कुलमें कोई भी नरकगामी अथवा प्रेत नहीं होता। जो भगवान् श्रीकृष्णके समीप द्वारका-माहात्म्यका पाठ करता है, श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी तथा द्वादशीका व्रत करता तथा रातमें जागता है, उसके दर्शन, कीर्तन, स्मरण तथा स्पर्शसे करोड़ों तीर्थोंका फल प्राप्त होता है। उसके स्मरणसे दस हजार जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है। जिसके घरमें यह भागवतशास्त्र सदा विद्यमान रहता है, उसकी इस संसारमें पुनरावृत्ति नहीं होती है। वैष्णवके प्रसन्न होनेपर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं; अतः विष्णुकी प्रसन्नताके लिये वैष्णवको अवश्य प्रसन्न करे। जो पुण्यक्षेत्रमें नील बोता और मूली खाता है, नीली कर्म करता तथा रस बेंचता है, उसे पुण्यकी प्राप्ति नहीं होती है। वह पापका भागी होता है। सैकड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी वह पुण्यका भागी नहीं होता है। जो मनुष्य किसी वैदिक कर्मके प्राप्त हुए बिना ही पीपलकी लकड़ी काटता है, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है। मदारके वृक्षमें एक बार कुल्हाड़ी मारनेपर मनुष्य कई मन्वन्तरोंतक रौरव नरककी पीड़ा भोगता है। जो नीमका वृक्ष काटता है, वह कोढ़ी होता है। उसके किये हुए पूजन, व्रत एवं दानको भगवान् सूर्य नहीं ग्रहण करते हैं। जो अमावास्याको वनस्पतियोंका छेदन करता है, उसे द्वादशीका पुण्य नहीं मिलता और एक-एक पत्र, पुष्प तथा फलके बदलेमें ब्रह्महत्याका पाप लगता है। वह मनुष्य सात कल्पोंतक यमलोकमें निवास करता है। उसके किसी भी कार्यमें उन्नति नहीं होती है। जो मनुष्य आकका पेड़ लगाता और उसकी रक्षा करता है, वह सात कल्पोंतक भगवान् सूर्यनारायणके समीप वास करता है। एक लाख देववृक्ष लगानेसे जो फल होता है, वही एक पीपलका पेड़ लगानेसे प्राप्त हो जाता है। आँवला और तुलसी लगानेका भी ऐसा ही फल मिलता है। जो देवताओं, पितरों, मनुष्यों (सनकादिकों) तथा अतिथियोंका तर्पण एवं पूजन करते हुए वर्द्धिनी द्वादशीका व्रत करता है, वह परम पदको प्राप्त होता है। कलिकालमें प्रातःकाल उठकर द्वारकाका कीर्तन करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो निश्चय ही स्वर्गलोकमें जाता है।
जो भगवान्के भक्तोंसे वैर रखते और एकादशी व्रत नहीं करते हैं, उन्हें यमदूत ले जाते हैं। जो वैष्णवोंको गोपीचन्दनकी मृत्तिका देते हैं, उन्हें त्रिपुण्ड्रधारी महात्मा पुरुषोंके समान पुण्यफलकी प्राप्ति होती है। जो प्रातःकाल उठकर 'द्वारके! द्वारके!' ऐसा पुकारता है, वह द्वारकानामका नित्य कीर्तन करनेसे द्वारका-वासका फल पाता है। जो श्रीनामसे अंकित
१३७२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
बिल्वपत्रोंद्वारा श्रीपति भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह सातों द्वीपोंका स्वामी होता है। जो सदा कलिमें बिल्वपत्रोंसे देवताओंकी पूजा करते हैं, वे दस हजार अश्वमेध यज्ञोंका फल पाते हैं। पीपलके दलसे गिरे हुए जलसे देवता तथा ऋषि-मुनि पवित्र होते हैं। जो बिल्वपत्रसे ब्रह्मा, शिव तथा सूर्य आदिका पूजन करते हैं, वे अक्षय लोकोंमें जाते हैं। बिल्व-पत्रोंसे लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री तथा दुर्गाजीका पूजन करके मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं। बिल्वपत्रका महत्त्व तुलसीदलसे भी अधिक है, अतः यत्नपूर्वक उससे श्रीहरिका पूजन करना चाहिये। जो द्वादशी तथा रविवारको बिल्ववृक्षकी पूजा करते हैं, वे सैकड़ों ब्रह्महत्याओंके पापसे भी लिप्त नहीं होते हैं। कलियुगमें श्रीकृष्णका कीर्तन करनेसे मानव बीती हुई सात पीढ़ियों और आनेवाली चौदह पीढ़ियोंके सब मनुष्योंका उद्धार कर देता है।^१
श्रीमद्भागवतपुराणका एक-एक उत्तम श्लोक भी भगवान् श्रीकृष्णके लिये प्रीतिजनक है तथा पाठ करनेवालेको वह कोटि यज्ञोंका फल देनेवाला है। जो द्विज पूरे कार्तिकमासमें भगवान् श्रीकृष्णके सम्मुख बैठकर गीता-पाठ करते हैं, उनके सौ कोटि कल्पोंके पाप भी नष्ट हो जाते हैं।^२ कलियुगमें जो मनुष्य भक्तिभावसे गोमती-समुद्र-संगम तथा रुक्मिणीसहित श्रीकृष्णका दर्शन करते हैं, वे धन्य हैं। द्वारका जाते हुए मनुष्यकी यदि मार्गमें ही मृत्यु हो जाय तो पितरोंसहित उसकी परम धामसे पुनरावृत्ति नहीं होती है।^३ जो मनुष्य प्रतिदिन उत्तम भक्तिसे कृष्ण-कृष्णका कीर्तन करता है, वह अनायास ही सौ अश्वमेध यज्ञोंका फल पा लेता है।^४
द्वारका-माहात्म्य-खण्ड सम्पूर्ण
सं० स्कन्दपुराण सम्पूर्ण
१- अतीतान्सप्त पुरुषान् भविष्यांश्च चतुर्दश। नरस्तारयते सर्वान् कलौ कृष्णेति कीर्तनात् ॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० ४२। ११)
२- तथा भागवतस्योक्तं पुराणं श्लोकमुत्तमम् । कृष्णस्य प्रीतिजननं यज्ञकोटिफलप्रदम् ॥
तेषां विलीयते पापं कल्पकोटिशतैः कृतम् । गीतां पठन्ति कृष्णाग्रे कार्तिकं सकलं द्विजाः ॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० ४२। ३६-३७)
३- द्वारकां गच्छमानस्य विपत्तिर्भवते यदि । न तस्य पुनरावृत्तिः पितृभिः सह तत्पदात् ॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० ४५। २५)
४- कृष्ण कृष्णेति यो ब्रूयात् सद्भक्त्या प्रत्यहं नरः। हेलया सोऽश्वमेधानां शतानां लभते फलम् ॥
(स्क० पु०, द्वा० मा० ४६। २७)
गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित पुराण-साहित्य
श्रीमद्भागवतमहापुराण, व्याख्यासहित (कोड 26, 27) ग्रन्थाकार—श्रीमद्भागवत भारतीय वाङ्मयका मुकुटमणि है। भगवान् शुकदेवद्वारा महाराज परीक्षित्को सुनाया गया भक्तिमार्गका तो मानो सोपान ही है। इसके प्रत्येक श्लोकमें श्रीकृष्ण-प्रेमकी सुगन्धि है। यह सम्पूर्ण ग्रन्थरत्न मूलके साथ हिन्दी-अनुवाद, पूजन-विधि, भागवत-माहात्म्य, आरती, पाठके विभिन्न प्रयोगोंके साथ दो खण्डोंमें उपलब्ध है। पत्राकारकी तरह बेड़िया (कोड 1951, 1552) सचित्र, सजिल्द, (कोड 1552, 1553) गुजराती, (कोड 1678, 1735) सानुवाद, मराठी, (कोड 1739, 1740), कन्नड़, (कोड 1577, 1744) बँग्ला, (कोड 1966, 1967, 1968) तमिल, (कोड 1831, 1832) ओड़िआ, (कोड 1975, 1976) तेलुगु, (कोड 564, 565) अंग्रेजी-अनुवाद, (कोड 25) केवल हिन्दी बृहदाकार, बड़े टाइपमें, (कोड 1945) (वि० सं०) केवल हिन्दी (कोड 1930) केवल हिन्दी, (कोड 1608) केवल गुजराती, (कोड 29) मूल, मोटा टाइप, संस्कृत, ग्रन्थाकार (कोड 1573) मूल, मोटा टाइप, तेलुगु, ग्रन्थाकार (कोड 124) मूल मझला आकार, (कोड 1855) विशिष्ट सं० मूल, मझला संस्कृतमें भी।
संक्षिप्त शिवपुराण, मोटा टाइप (कोड 789) ग्रन्थाकार—इस पुराणमें परात्पर ब्रह्म शिवके कल्याणकारी स्वरूपका तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा और उपासनाका विस्तृत वर्णन है। सचित्र, सजिल्द, विशिष्ट संस्करण (कोड 1468) हिन्दी एवं (कोड 1286) गुजरातीमें भी उपलब्ध।
संक्षिप्त पद्मपुराण (कोड 44) ग्रन्थाकार—इस पुराणमें भगवान् विष्णुकी विस्तृत महिमाके साथ, भगवान् श्रीराम तथा श्रीकृष्णके चरित्र, विभिन्न तीर्थोंका माहात्म्य, शालग्रामका स्वरूप, तुलसी-महिमा, गीता माहात्म्य, विष्णुसहस्रनाम, उपासना-विधि तथा विभिन्न व्रतोंका सुन्दर वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।
संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण (कोड 539) ग्रन्थाकार—भगवतीकी विस्तृत महिमाका परिचय देनेवाले इस पुराणमें दुर्गासप्तशतीकी कथा एवं माहात्म्य, हरिश्चन्द्रकी कथा, मदालसा-चरित्र, अत्रि-अनसूयाकी कथा, दत्तात्रेय-चरित्र आदि अनेक सुन्दर कथाओंका विस्तृत वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।
श्रीविष्णुपुराण, अनुवादसहित (कोड 48) ग्रन्थाकार—इसके प्रतिपाद्य भगवान् विष्णु हैं, जो सृष्टिके आदिकारण, नित्य, अक्षय, अव्यय तथा एकरस हैं। इसमें आकाश आदि भूतोंका परिमाण, समुद्र, सूर्य आदिका परिमाण, पर्वत, देवतादिकी उत्पत्ति, मन्वन्तर, कल्प-विभाग, सम्पूर्ण धर्म एवं देवर्षि तथा राजर्षियोंके चरित्रका विशद वर्णन है। सचित्र, सजिल्द (कोड 1364) केवल हिन्दी अनुवादमें भी उपलब्ध।
संक्षिप्त नारदपुराण (कोड 1183) ग्रन्थाकार—इसमें सदाचार-महिमा, वर्णाश्रम धर्म, भक्ति तथा भक्तके लक्षण, देवपूजन, तीर्थ-माहात्म्य, दान-धर्मके माहात्म्य और भगवान् विष्णुकी महिमाके साथ अनेक भक्तिपरक उपाख्यानोंका विस्तृत वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।
संक्षिप्त स्कन्दपुराण (कोड 279) ग्रन्थाकार—यह पुराण कलेवरकी दृष्टिसे सबसे बड़ा है तथा इसमें लौकिक और पारलौकिक ज्ञानके अनन्त उपदेश भरे हैं। इसमें भगवान् शिवकी महिमा, सती-चरित्र, शिव-पार्वती-विवाह, कार्तिकेय-जन्म, तारकासुर-वध एवं धर्म, सदाचार, योग, ज्ञान तथा भक्तिके सुन्दर विवेचनके साथ-साथ अनेक साधु-महात्माओंके सुन्दर चरित्र पिरोये गये हैं। सचित्र, सजिल्द।
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण (कोड 1111) ग्रन्थाकार—इस पुराणमें सृष्टिकी उत्पत्ति, पृथुका पावन चरित्र, सूर्य एवं चन्द्रवंशका वर्णन, श्रीकृष्णचरित्र, कल्पान्तजीवी मार्कण्डेय मुनिका चरित्र, तीर्थोंका माहात्म्य एवं अनेक भक्तिपरक आख्यानोंकी सुन्दर चर्चा की गयी है। सचित्र, सजिल्द।
संक्षिप्त गरुडपुराण—(कोड 1189) ग्रन्थाकार—इस पुराणके अधिष्ठातृ देव भगवान् विष्णु हैं। इसमें ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, सदाचार, निष्काम कर्मकी महिमाके साथ यज्ञ, दान, तप, तीर्थ आदि शुभ कर्मोंमें सर्व-साधारणको प्रवृत्त करनेके लिये अनेक लौकिक एवं पारलौकिक फलोंका वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।
संक्षिप्त भविष्यपुराण—(कोड 584) ग्रन्थाकार—यह पुराण विषय-वस्तु एवं वर्णन-शैलीकी दृष्टिसे अत्यन्त उच्च कोटिका है। इसमें धर्म, सदाचार, नीति, उपदेश, अनेक आख्यान, व्रत, तीर्थ, दान, ज्योतिष एवं आयुर्वेदशास्त्रके विषयोंका अद्भुत संग्रह है। वेताल-विक्रम-संवादके रूपमें कथा-प्रबन्ध इसमें अत्यन्त रमणीय है। इसके अतिरिक्त इसमें नित्यकर्म, सामुद्रिक शास्त्र, शान्ति तथा पौष्टिक कर्मका भी वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।